NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
सरकारों द्वारा होने वाली आर्थिक हिंसा की तरह है बढ़ती असमानता- ऑक्सफ़ैम रिपोर्ट
रिपोर्ट अपने दावे में कहती है कि ग़लत सरकारी नीतियों के चलते असमानता में भारी वृद्धि हुई है। शुरुआती 10 अमीर पुरुषों ने, मार्च 2020 में महामारी की शुरुआत के बाद से नवंबर 2021 तक अपनी संपत्ति दोगुनी कर ली। जबकि इस दौर में दुनिया की 99 फ़ीसदी आबादी की आय कम हुई थी।
अब्दुल रहमान
20 Jan 2022
Oxfam report

ऑक्सफैम इंटरनेशनल ने सोमवार, 17 जनवरी को असमानता पर अपनी 2022 की रिपोर्ट जारी कर दी है। इस रिपोर्ट में संगठन ने दुनियाभर की सरकारों की असमानता को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ने देने के लिए आलोचना की है। रिपोर्ट कहती है कि सरकारों ने "ऐसी स्थितियां बनने दीं, जिसमें कोविड-19 वायरस, अरबपतियों की संपदा वाले नए वेरिएंट में बदल गया।" रिपोर्ट कहती है कि हर चार सेकेंड में असमानता एक व्यक्ति को मारती है। 

रिपोर्ट का दावा है कि दुनिया ने अरबपतियों की संपदा में अभूतपूर्व वृद्धि को देखा। जब से कोविड-19 चालू हुआ है, तबसे हर 26 घंटे में एक अरबपति पैदा होता है। रिपोर्ट में खोजे गए तथ्यों के मुताबिक़, दुनिया के 10 सबसे अमीर पुरुषों ने उस दौरा में अपनी संपत्ति दोगुनी कर ली, जब मार्च, 2020 से नवंबर, 2021 के बीच, दुनिया के कम से कम 16 करोड़ लोग गरीबी में धकेल दिए गए। 

ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट हर साल स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यू ई एफ- वर्ल्ड इक्नॉमिक फोरम) की बैठक से पहले जारी की जाती है। दुनिया में बढ़ती असमानता के लिए ज़िम्मेदार नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए विश्व आर्थिक मंच अहम रहा है।

रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के 10 सबसे अमीर लोगों ने 2020 मार्च में महामारी की शुरुआत के बाद से अब तक अपनी संपत्ति में दोगुनी वृद्धि कर ली है। इसी अवधि में दुनिया की 99 फ़ीसदी आबादी की आय कम हुई है। रिपोर्ट बताती है कि इस उछाल के चलते, इन 10 लोगों की संपत्ति दुनिया के 3।1 अरब सबसे कम आय वाले लोगों के बराबर है। 

रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी के दौरान ऐतिहासिक सामाजिक असमानताएं भी भयावह तरीके से बढ़ी हैं। आज, 252 पुरुषों के पास इतनी संपत्ति है, जितनी सारी महिलाओं और लड़कियों के पास है। इन लोगों के पास इतनी संपत्ति है, जितनी अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों के एक अरब लोगों के पास है। 

रिपोर्ट दावा करती है कि वैश्विक असमानता में वृद्धि और संपदा का केंद्रीयकरण, पूरे नवउदारवादी दौर का मुख्य तथ्य रहा है। इसके मुताबिक़, 1995 से वैश्विक आबादी के शुरुआती एक फ़ीसदी ने "दुनिया के सबसे कम संपत्ति वाले 50 फ़ीसदी लोगों की तुलना में 20 गुना ज़्यादा संपत्ति अर्जित की है।"

बढ़ती असमानता: ढांचागत नीतियों में चुने गए विकल्पों का नतीज़ा

रिपोर्ट में बड़े पैमाने की इस असमानता को आर्थिक हिंसा करार दिया गया है, "जो तब होती है, जब सबसे अमीर और ताकतवर लोगों के लिए सहूलियत वाली ढांचागत नीतियां बनाई जाती हैं।" अमीर लोगों पर जरूरी कर लगाने में सरकारों द्वारा की जाने वाली आनाकानी के चलते उनका मुनाफ़ा अधिकतम हुआ है, जबकि इसके लिए बड़े पैमाने पर दूसरे लोगों को दुख भोगने को मजबूर होना पड़ा है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे कुछ सरकारों ने सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य और शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च की नीतियों पर तब भी कटौती की, जब महामारी जारी थी, जिसके चलते जरूरी चीजों में महंगाई बेइंतहां बढ़ रही थी। 

रिपोर्ट बताती है कि सरकार के इस तरह के नीतिगत फ़ैसलों से ना केवल कुछ लोगों की संपदा में बेइंतहां वृद्धि हुई है, बल्कि इससे हम लोगों को सीधा नुकसान हुआ है, खासकर गरीब लोगों, महिलाओं, लड़कियों, खासतौर पर वंचित तबके को बहुत घाटा हुआ है।

रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए प्रोफ़ेसर जयती घोष ने लिखा है कि असमानता में इस तरीके की वृद्धि के प्रभाव बेहद बड़े होंगे। इसके पीड़ित वह लोग होंगे, जिनके पास पहले ही संसाधनों की कमी है, इनमें से ज़्यादातर कम और मध्यम आय वाले देशों में रहने वाले लोग होंगे, इस पीड़ित वर्ग में महिलाएं, लड़कियां और सामाजिक तौर पर वंचना के शिकार लोग और अनौपचारिक कामग़ार ज़्यादा शामिल होंगे।" उन्होंने कहा कि त्रासदी यह है कि इन पीड़ित समूहों में से कोई भी नीतियों को प्रभावित करने में सक्षम नहीं है।

असमानता मारती है

रिपोर्ट कहती है कि महामारी के चलते एक करोड़ सत्तर लाख लोगों की मौत हुई है, जिनमें से ज़्यादातर असमानता के चलते मारे गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़, कुछ देशों में कोविड-19 के चलते गरीब़ लोगों के मरने की संभावना अमीरों के चलते चार गुना रही। "और मध्यम व निम्न आय वाले देशों में कोविड-19 से संक्रमित होने वाले लोगों के मरने की संभवना, अमीर देशों के लोगों से दोगुनी होती है।"

रिपोर्ट कहती है कि "उम्र की तुलना में आपकी आय ज़्यादा मजबूत सूचकांक होती है, जो बताए कि आपकी कोविड-19 से मरने की संभावना कितनी है।" रिपोर्ट का दावा है कि अगर सही वक़्त पर वैक्सीन लग जाता तो लाखों लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती थी। लेकिन तकनीक पर नियंत्रण के कॉरपोरेट लालच के चलते वैक्सीन में छुआछूत किया गया और लाखों लोगों को मुनाफ़े के चलते वैक्सीन तक पहुंच से रोका गया। रिपोर्ट के मुताबिक़, "पारंपरिक अनुमानों के आधार पर असमानता हर दिन 21,300 लोगों की मौत की वज़ह बनती है।"

उदाहरण के लिए अमेरिका में अश्वेत अमेरिकियों में कोविड-19 के चलते होने वाली मौत की दर, श्वेत आबादी की तुलना में बहुत ज़्यादा है। कोविड-19 के चलते श्वेत लोगों की तुलना में 34 लाख अश्वेत ज्यादा मारे गए हैं। 

वैश्विक असमानता और कोविड-19 के प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि "मौजूदा विभाजन का सीधा संबंध नस्लभेद, गुलामी और साम्राज्यवाद की ऐतिहासिक विरासत से है।"

रिपोर्ट कहती है कि अगर शुरुआती 10 अरबपतियों पर ही महामारी के दौरान कमाए गए भारी मुनाफ़े पर 99 फ़ीसदी कर लगा दिया जाता है, तो इससे 812 अरब अमेरिकी डॉलर इकट्ठे किए जा सकते हैं। इतना पैसा कम से कम 80 देशों में वैक्सीन देने और सामाजिक सुरक्षा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा, लैंगिक आधार पर होने वाले हिंसा को खत़्म करने और पर्यावरण सुरक्षा के लिए उठाए जाने वाले जरूरी कदमों के लिए लगने वाले खर्च को पूरा कर सकता है। रिपोर्ट तो यह दावा तक करती है कि इतने कर के बाद भी शुरुआती 10 अमीरों के पास 80 अरब रुपये बचे होंगे, जो "उन्हें महामारी से पहले के दौर से बेहतर स्थिति में रखेगा।"

साभार : पीपल्स डिस्पैच

COVID-19
Davos
inequality
Neoliberal economic policies
Oxfam inequality report 2022
Racism
Universal Public Health
Vaccine aparthied
world economic forum

Related Stories

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

महामारी के दौर में बंपर कमाई करती रहीं फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

विश्व खाद्य संकट: कारण, इसके नतीजे और समाधान

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

भारत में असमानता की स्थिति लोगों को अधिक संवेदनशील और ग़रीब बनाती है : रिपोर्ट

जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप

कोरोना अपडेट: देश में एक हफ्ते बाद कोरोना के तीन हज़ार से कम मामले दर्ज किए गए

दिल्लीः एलएचएमसी अस्पताल पहुंचे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मंडाविया का ‘कोविड योद्धाओं’ ने किया विरोध


बाकी खबरें

  • Subramanian Swamy
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ख़बर भी, नज़र भी: भाजपा के अपने ही बाग़ी हुए जा रहे हैं
    04 Jan 2022
    मोदी सरकार चाहती है कि कोर्ट उनके ही नेता सुब्रमण्यम स्वामी की उस याचिका पर कोई ध्यान न दे जिसमें उन्होंने एअर इंडिया की विनिवेश प्रक्रिया रद्द करने और अधिकारियों द्वारा दी गई मंज़ूरी रद्द करने का…
  • Hindu Yuva Vahini
    विजय विनीत
    बनारस में हिन्दू युवा वाहिनी के जुलूस में लहराई गईं नंगी तलवारें, लगाए गए उन्मादी नारे
    04 Jan 2022
    "हिन्दू युवा वाहिनी के लोग चाहते हैं कि हम अपना धैर्य खो दें और जिससे वह फायदा उठा सकें। हरिद्वार में आयोजित विवादित धर्म संसद के बाद बनारस में नंगी तलवारें लहराते हुए जुलूस निकाले जाने की घटना के…
  • Maulana Hasrat Mohani
    परमजीत सिंह जज
    मौलाना हसरत मोहानी और अपनी जगह क़ायम अल्पसंख्यक से जुड़े उनके सवाल
    04 Jan 2022
    आज भी अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं, ऐसे में भारत को संविधान सभा में हुई उन बहसों को फिर से याद दिलाने की ज़रूरत है, जिसमें बहुसंख्यकवाद के कड़वे नतीजों की चेतावनी दी गयी थी।
  • Goa Chief Ministers
    राज कुमार
    गोवा चुनावः  34 साल में 22 मुख्यमंत्री
    04 Jan 2022
    दल बदल के मामले में गोवा बाकी राज्यों को पीछे छोड़ता नज़र आ रहा है। चुनाव से पहले गोवा के आधे से ज्यादा विधायक पार्टी बदल चुके हैं। आलम ये है कि कहना मुश्किल है कि जो विधायक आज इस पार्टी में है कल…
  • fark saaf hai
    सत्यम श्रीवास्तव
    फ़र्क़ साफ़ है- अब पुलिस सत्तासीन दल के भ्रामक विज्ञापन में इस्तेमाल हो रही है
    04 Jan 2022
    पिछले कुछ सालों से देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपने ही देश के नागरिकों को ‘कपड़ों से पहचानने’ की जो युक्ति ईज़ाद की है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरी मंशा से भाजपा ने इस विज्ञापन में दंगाई व्यक्ति…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License