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गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया
मोदी सरकार पिछले 8 साल से भारतीय राज और समाज में जिन बड़े और ख़तरनाक बदलावों के रास्ते पर चल रही है, उसके आईने में ही NEP-2020 की बड़ी बड़ी घोषणाओं के पीछे छुपे सच को decode किया जाना चाहिए।
लाल बहादुर सिंह
03 Jun 2022
nep

प्रख्यात कन्नड़ साहित्यकार राम कृष्णा ने सरकार से कहा है, " बच्चों की शिक्षा को अपनी विघटनकारी राजनीति का लक्ष्य बनाना और उनके कोमल मस्तिष्कों में ज़हर भरना, एक अक्षम्य अपराध है। इस पृष्ठ भूमि के मद्देनज़र मेरा कहना है कि कर्नाटक सरकार द्वारा मेरी किसी भी रचना को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल न किया जाए।”

ज्ञातव्य है कि श्री राम कृष्णा की कई कहानियां कर्नाटक के स्कूल पाठ्यक्रम में पढाई जाती हैं।

दरअसल, कर्नाटक से पिछले दिनों यह खबर आई थी कि तमाम प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाओं को तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ शहादत का वरण करने वाले भगत सिंह और टीपू सुल्तान को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया और RSS के संस्थापक हेडगेवार पर अध्याय शामिल कर लिया गया है।

उसी के बाद से वहां के स्थापित साहित्यकारों ने पाठ्यक्रम से प्रगतिशील content हटाकर अवैज्ञानिक, विषाक्त सोच को बढ़ावा देने वाली विषयवस्तु शामिल किए जाने के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।

पाठ्यक्रमों में बदलाव और इसी तरह के अनेक और कारनामे केंद्रीय स्तर पर तथा भाजपा शासित राज्यों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के नाम पर अथवा उसकी दिशा के अनुरूप किये जा रहे हैं। जाहिर है यह सब शिक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित 'युगान्तकारी' बदलावों की झांकी भर है।

दरअसल, शिक्षानीति का क्षेत्र कोई island नहीं है, बल्कि सरकार की जो समग्र दिशा है, शिक्षा उसी की सेवा के लिये है और उसी का हिस्सा है। मोदी सरकार पिछले 8 साल से भारतीय राज और समाज में जिन बड़े और खतरनाक बदलावों के रास्ते पर चल रही है, उसके आईने में ही NEP की बड़ी बड़ी घोषणाओं के पीछे छुपे सच को decode किया जाना चाहिए।

प्रो. प्रभात पटनायक ने बिल्कुल सटीक ढंग से नोट किया है, " NEP भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक बेहद प्रतिगामी और घातक paradigm shift है। शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का माध्यम समझने की जगह, यह शिक्षानीति जिसमें हिन्दू अंधराष्ट्रवाद की छौंक होगी, छात्रों को नवउदारवादी पूंजीवाद के चारे में तब्दील करेगी। इस तरह NEP सत्तारूढ़ कारपोरेट-हिंदुत्व की पूर्ण संगति में है।"

यही NEP का सार है। बाकी सब इस बुनियादी सच को छिपाने और आंख में धूल झोंकने के लिए शब्द-जाल है।

इस NEP की मूल बात है exclusion, बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों को अच्छी शिक्षा की पहुंच से बाहर कर देना, इन अर्ध-शिक्षितों के लिए so-called स्किल विकास का झुनझुना और दूसरी ओर नवउदारवादी वैश्विक पूंजीवाद की सेवा के लिए privileged तबकों के छात्रों के बीच से शिक्षित officials और professionals तैयार करना जो हिंदुत्व के रंग में रंगे होंगे। छोटे से तबके को जो " क्वालिटी एजुकेशन " दी जायेगी वह अमेरिका, यूरोप की universities के पैटर्न पर होगी और global capital की जरूरतों से निर्देशित है। प्रो. पटनायक कहते हैं कि ऐसी शिक्षा में जाहिर है उपनिवेशों से आर्थिक दोहन ( drain of surplus ) और deindustrialization जैसे विषय नहीं होंगे क्योंकि वे विकसित देशों के लिए मौजूं विषय नहीं हैं। लेकिन इनको समझे बिना भारत को कैसे समझा जा सकता है ?

जैसे कभी मैकाले ने भारत में आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य बताया था, " ऐसे भारतीय पैदा करना जो रंग-रूप में तो भारतीय होंगे लेकिन विचार और नैतिकता में अंग्रेज होंगे."

वैसे ही आज NEP का उद्देश्य लगता है ऐसे भारतीय पैदा करना जो रंग-रूप में तो भारतीय होंगे, लेकिन जो भारत की सच्चाई से अनजान वैश्विक पूँजी के वफादार सेवक होंगे और हिंदुत्व की फ़ासिस्ट विचारधारा के रंग में रंगे होंगे।

NEP कारपोरेट-साम्प्रदायिक फासीवाद की परियोजना के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था को अति-केंद्रीकृत नौकरशाही ढांचे में जकड़ देगी। Higher Education Commission of India ( HECI ) जैसे मैकेनिज्म के माध्यम से जो यूजीसी और Council of Technical Education जैसी संस्थाओं को replace कर देगा, शिक्षा पर कठोर नियंत्रण शिक्षानीति का प्रमुख तत्व लगता है।

जाहिर है शिक्षण संस्थाओं की बची खुची स्वायत्तता ( Autonomy ) भी खत्म हो जाएगी। Academic Freedom का पूरा तरह गला घोंट दिया जाएगा। ये दोनों पूरी दुनिया में academic excellence तथा वस्तुगत, सत्यनिष्ठ ज्ञान-विज्ञान के विकास के दो सर्वस्वीकृत आधारभूत सिद्धांत हैं। लेकिन आज उसकी न वित्तीय पूँजी के धकुबेरों को कोई जरूरत है, न हिंदुत्व के पैरोकारों को। बल्कि वह उनके रास्ते में बाधक है।

इस सब का शिक्षा की गुणवत्ता, उदार, मुक्तिकामी मूल्यों के पोषक के बतौर उसकी भूमिका, स्वतंत्रचेता गम्भीर शोध कार्य जैसे उच्चशिक्षा के बुनियादी लक्ष्यों पर सांघातिक असर पड़ेगा।

यह अनायास नहीं है कि शिक्षा का जो विषय राज्य और केंद्र दोनों की समवर्ती सूची में है, उसकी राष्ट्रीय नीति के निर्माण में राज्यों की कोई राय नहीं ली गयी है,जो संविधान के federal ढांचे की भावना का पूरी तरह निषेध है। न ही शिक्षकों व छात्रों की कोई राय ली गयी जो इसमें सीधे stake-holder हैं। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे बिना विचार विमर्श किये गैर-लोकतांत्रिक ढंग से किसानों पर तीन कृषि कानून या मजदूरों पर चार लेबर कोड थोप दिए गए।

जहां तक शिक्षा पर कुल खर्च को GDP के 6% तक पहुंचाने की बात है, तो यह लक्ष्य तो 60 के दशक में बने कोठारी आयोग के समय से ही दुहराया जा रहा है। लेकिन वास्तविक व्यवहार में मोदी राज में शिक्षा पर सरकारी निवेश साल दर साल घटता गया है। विशेषज्ञ यह भी पूछ रहे हैं कि क्या इसमें प्राइवेट investment भी शामिल है या यह सरकार के बजट से होने वाले खर्च के बारे में है ?

विशेषज्ञों का मानना है कि NEP 2020 का अंजाम राज्य और शिक्षा की संस्थागत decoupling होगी और graded autonomy और HECI के माध्यम से शिक्षा के निजीकरण के रास्ते पूरी तरह खोल दिए जाएंगे।

सरकार भले यह दावा करे कि NEP का उद्देश्य ड्राप-आउट दर कम करना है, वास्तविक जीवन में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण तथा multiple exit point आदि का सीधा परिणाम ड्राप आउट रेट में वृद्धि होगी। नयी शिक्षानीति के ड्राफ्ट के अनुसार आज की तारीख में पूरे देश में लगभग 50000 महाविद्यालय और विश्वविद्यालय हैं, जिनकी संख्या 2032 तक घटाकर 12300 करने की योजना है, लेकिन छात्रों की संख्या दोगुना करने का लक्ष्य है !

हाल ही में मोदी सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर राजधानी में दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम हुए। 27 मई को AIFRTE की ओर से दिल्ली में उच्च शिक्षा पर राष्ट्रीय कन्वेंशन हुआ और 31 मई को जंतरमंतर पर NEP 2020 के खिलाफ छात्र-संसद का आयोजन।

जहां GPF में दिन भर चले मैराथन सम्मेलन में तमाम शिक्षकों एवम शिक्षाविदों ने NEP के दुष्प्रभावों पर गम्भीर चर्चा की, वहीं 31 मई की छात्र संसद में पूरे देश से आये छात्र-युवाओं ने NEP 2020 को वापस लेने की मांग उठाई। संसद मार्ग पर आयोजित इस समानान्तर संसद को बड़ी संख्या में शिक्षकों व अन्य महत्वपूर्ण वक्ताओं ने भी संबोधित किया। छात्रों का युद्धघोष था, "NEP हटाओ - देश का भविष्य बचाओ"।

कर्नाटक के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों ने रास्ता दिखाया है। उम्मीद है आने वाले दिनों में युवा-पीढ़ी और हमारे लोकतन्त्र दोनों के भविष्य को दांव पर लगाने वाली NEP -2020 के खिलाफ पूरे देश के प्रबुद्ध नागरिक छात्रों तथा शिक्षकों के साथ खड़े होंगे।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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