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सफ़ूरा मामले में हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगी स्टेटस रिपोर्ट, जानें अब तक क्या-क्या हुआ!
न्यायमूर्ति राजीव शकधर की पीठ ने पुलिस को नोटिस जारी कर ज़मानत याचिका पर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 जून यानी सोमवार को होगी।
सोनिया यादव
19 Jun 2020
Image Courtesy:  The Week

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की छात्रा सफ़ूरा ज़रगर का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। इसकी वजह दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पुलिस से मांगी गई स्टेटस रिपोर्ट है। गुरुवार, 18 जून को इस मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजीव शकधर की पीठ ने पुलिस को नोटिस जारी कर ज़मानत याचिका पर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 जून यानी सोमवार को होगी।

बता दें कि 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सफ़ूरा ज़रगर को उनके घर से गिरफ्तार किया था। इसके बाद 4 जून को ट्रायल कोर्ट ने सफ़ूरा को ज़मानत देने से इंकार कर दिया था। निचली अदालत ने तब अपने आदेश में कहा था, ‘‘जब आप अंगारे के साथ खेलते हैं, तो चिंगारी से आग भड़कने के लिए हवा को दोष नहीं दे सकते।’’ इसी आदेश को सफ़ूरा ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

क्या है सफ़ूरा ज़रगर का पूरा मामला?

27 वर्षिय सफ़ूरा ज़रगर दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया की एमफिल छात्रा हैं। वो जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) की मेंबर हैं, मीडिया कोऑर्डिनेटर का भी काम करती थीं। लॉकडाउन के बीच 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने फरवरी में जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ हुए प्रदर्शन को लीड करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया था।

सफ़ूरा के वकील ने अगले ही दिन अधिकारियों को उनकी प्रेगनेंसी की जानकारी देते हुए बेल की अपील की थी। सफ़ूरा 13 अप्रैल को ज़मानत पर बाहर आ पातीं, इससे पहले ही दिल्ली पुलिस ने 6 मार्च को हुई एक FIR के तहत उन्हें दिल्ली दंगे भड़काने की साजिश करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सफ़ूरा पर एंटी टेरर एक्ट यानी अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) के तहत केस दर्ज किया गया है। अभी भी सफ़ूरा के ज़मानत की कोशिशें जारी हैं।

क्या UAPA मामलों में ज़मानत नहीं मिल सकती?

सफ़ूरा ज़रगर केस के संबंध में वकील आर्षी जैन कहती हैं कि अमूमन UAPA के तहत दर्ज मामलों में ज़मानत नहीं मिलती है, UAPA का सेक्शन 43 D(5) ज़मानत मिलने में एक वैधानिक रुकावट की तरह है लेकिन सफ़ूरा के केस को एक अलग नज़रिए से देखा जाना चाहिए।

आर्षि कहती हैं, “सेक्शन 43 D (5) तभी लागू होता है जब किसी व्यक्ति पर आतंकवाद का आरोप लगता है और पुलिस कोर्ट में साबित करती है कि प्राइमा फेसी केस बन रहा है यानी व्यक्ति ने आतंकवादी गतिविधि में हिस्सा लिया था। लेकिन सफ़ूरा के मामले में मुझे लगता है कि पटियाला हाउस कोर्ट में एडिशनल सेशन जज धर्मेंद्र राणा ने सुनवाई करते हुए पूरे समय गैरकानूनी गतिविधि का जिक्र किया। जज ने सुनवाई के दौरान कभी भी आतंकवादी गतिविधि का जिक्र नहीं किया। जस्टिस राणा ने ऐसा भी कुछ नहीं कहा कि प्रॉसिक्यूशन प्राइमा फेसी आतंकवाद का केस साबित कर रहा है। इसलिए सफ़ूरा को ज़मानत मिल सकती है।”

सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स, अमेरिकन बार एसोसिएशन ने भी सफ़ूरा की ज़मानत याचिका खारिज़ होने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इसे अनुचित बताया था। सेंटर के मुताबिक सफ़ूरा जरगर का प्री-ट्रायल डिटेंशन अंतरराष्ट्रीय कानून, जिनमें वो संधियां भी शामिल है, भारत जिनमें स्टेट-पार्टी है, के मानकों के अनुरूप प्रतीत नहीं होता है। इंटरनेशनल कोवनंट ऑफ सिविल एंड पॉलिटिकल राइट (ICCPR) कहता है कि "यह सामान्य नियम नहीं होना चाहिए कि ट्रायल का इंतजार कर रहे व्यक्तियों को हिरासत में रखा जाएगा।"

अभी तक सफ़ूरा के साथ क्या-क्या गलत हुआ?     

सफ़ूरा की गिरफ्तारी के बाद उनकी प्रेग्नेंसी को लेकर सोशल मीडिया पर अनर्गल बातें हुईं। कई बार ट्विटर पर इसे लेकर अलग-अलग हैशटैग भी ट्रेंड हुए। महिलाविरोधी, अपमानजनक, किसी महिला को ठेस पहुंचाने वाली तमाम अनाप-शनाब बातें कहीं गई।

पहली बार जब सफ़ूरा को बेल नहीं मिली तो कांग्रेस के एक नेता सलमान निज़ामी ने इस पर विरोध जताया। एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, ‘एक्टिविस्ट सफ़ूरा ज़रगर (प्रेगनेंट) रमज़ान के वक्त भी जेल में हैं, नफ़रत फैलाने वाले कपिल मिश्रा, जिन्होंने हिंसा भड़काई, वो आज़ाद हैं। मोदी के भारत में मुस्लिम होना अपराध है। कुछ तो शर्म करो। सफ़ूरा को रिलीज़ करो।’

इस पर भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने जवाब देते हुए लिखा, “‘प्लीज़ उनकी प्रेग्नेंसी को मेरी स्पीच से कनेक्ट मत करिए। ऐसे काम नहीं चलेगा।”

बता दें कि दिल्ली हिंसा में कपिल मिश्रा के ऊपर कथित भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगा था। जिसे जोड़ते हुए सलमान निज़ामी ने उन्हें लेकर ट्वीट किया था।

कपिल मिश्रा के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर सफ़ूरा के चरित्रहनन की बाढ़ आ गई। लोग उनके होने वाले बच्चे पर सवाल करने लगे।

बहरहाल सफ़ूरा के पक्ष में भी कई लोग आए, उन्होंने बताया कि सफ़ूरा की शीदी 2018 में शादी हुई थी, वो शादीशुदा हैं। कई लोगों ने कहा कि अगर सफ़ूरा अविवाहिता भी हैं और प्रेगनेंट हैं तो क्या हो गया। कई लोगों ने महिलाओं की आजादी की बातें तक कह डाली, ऑल्ट न्यूज़ ने पूरी खबर की पड़ताल कर दी।

क्या कहना है महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों का

इस पूरे मामले पर समाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि आखिर लोग सफ़ूरा के पक्ष-विपक्ष में गंदगी मचा क्यों रहे हैं। क्यों उनके खिलाफ में लिखने वाले लोग उनके चरित्र पर उंगली उठा रहे हैं, किसने दिया है उनको ये अधिकार तो वहीं मुझे ये भी नहीं समझ आ रहा कि आखिर उनका साथ देने वाले भी उन्हें शादीशुदा, विवाहिता दिखाने में क्यों लगे हैं। क्या एक महिला बिना शादी के बंधन में बंधे बच्चे को जन्म नहीं दे सकती? क्यों किसी औरत को शादी का सर्टिफिकेट चाहिए। जब कोर्ट तक ने इनकी मंजूरी दे दी है तो अब लोग कौन होते हैं उंगली उठाने वाले। ये पितृसत्तात्मक समाज की संकुचित मानसिकता का नमूना है।”

ऐपवा की सचिव कविता कृष्णन बताती हैं, “ये समाज में जो भी कुछ औरतों के साथ हो रहा है इसे राजनीति से दरकिनार करके नहीं देखा जा सकता। सफ़ूरा को एक मुस्लिम औरत होने के नाते, सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए निशाना बनाया जा रहा है। जब लॉकडाउन में ग्रीन और ऑरेंज जोन में भी महिलाओं को घर में रहने को बोला जो रहा है तो ऐसे समय में सफ़ूरा के साथ इस तरह का बर्ताव कितना जायज़ है? प्रधानमंत्री की पार्टी के नेता, यहां तक कि जिन लोगों को पीएम फॉलो करते हैं, वही लोग ऐसी टिप्पणियां करते हैं और फिर भी प्रधानमंत्री मौन साधे रहते हैं, इसका क्या मतलब है?

गौरतलब है कि मामले के तूल पकड़ने के बाद दिल्ली महिला आयोग (DCW) ने दिल्ली पुलिस की साइबर क्राइम सेल को नोटिस भेज कर सफ़ूरा के खिलाफ घटिया अभियान चलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने साइबर अपराध सेल में भी इसकी शिकायत की थी। हालांकि अभी तक इस मामले में क्या कार्रवाई हुई इसकी किसी को कोई जानकारी नहीं है।

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