NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
आर्थिक मंदी की कड़वी सच्चाई : "हम सब इसके शिकार हैं! मज़दूर आज मर रहा है, हम कल मरेंगे!"
त्योहार के मौसम में आर्थिक संकट कैसा है? इसका जवाब पाने के लिए न्यूज़क्लिक की टीम ने गुरुग्राम के खंडासा गाँव के बाज़ार में लोगों से बात की, जिससे पता चला कि अब मंदी उद्योगों के घटते आंकड़ों से आगे बढ़ गई है।
मुकुंद झा, रौनक छाबड़ा
11 Oct 2019
haryana
36 साल के रोहतास समोसे बनाते हुए। इसकी क़ीमत उन्हें 5 रुपये तक गिरानी पड़ी है।

4 अक्टूबर को, भारतीय रिज़र्व बैंक से पता चला कि भारतीय उपभोक्ताओं का बाज़ार में विश्वास सितंबर के महीने में कम हुआ है । यानी वो कम ख़रीदारी कर रहे हैं। ये सब एक मज़बूत प्रधानमंत्री के 6 साल के शासन में सबसे कम है। आरबीआई ने यह सर्वेक्षण 13 प्रमुख शहरों में किया। जिसमें सामान्य आर्थिक स्थिति पर जनता की राय जानने की कोशिश हुई, इस सर्वेक्षण में 47.9 प्रतिशत परिवारों ने माना कि स्थिति ख़राब है।

 गुरुग्राम में एक ऑटो-चालक नितेश जिनकी उम्र 24 वर्ष है। उन्हें इस मंदी का आभास बहुत पहले हो गया था। उनके अनुसार, हाल के महीनों में, साझा सवारी (शेयरिंग) वाले यात्रियों की संख्या में वृद्धि हुई है। वे कहते हैं, "लोग जहां भी पैसा बचा पा रहे हैं, बचा रहे हैं। यहां तक कि शर्ट और पैंट पहनने वाले [उन यात्रियों की ओर इशारा करते हैं जो अपेक्षाकृत मध्यम वर्ग के हैं] सह-यात्रियों के लिए इंतज़ार करने के लिए तैयार हैं, क्योंकि शेयरिंग में जाना सस्ता है।"

image 1 new_0.PNG

गुरुग्राम के इफ़्को चौक मेट्रो स्टेशन के बाहर एक शेयरिंग ऑटो का दृश्य

नितेश पिछले एक साल से एक ऑटो चला रहे हैं। विज्ञान स्नातक होने के बावजूद, वह नौकरी हासिल करने में असमर्थ रहे हैं। अब इस डर से कि ऑटो रिक्शा चलाने से उनकी आय भी आर्थिक बर्बादी की चपेट में आ जाएगी, उन्होंने टिप्पणी की, "हम सब इसके शिकार हैं। मज़दूर आज मर रहा है, हम कल मरेंगे।"

यह मौजूदा आर्थिक तबाही की गंभीर सच्चाई है। यह मंदी उद्योगों के घटते आंकड़ों से आगे बढ़ गई है। यह लाखों भारतीयों की दैनिक आजीविका को प्रभावित कर रहा है, अब इसे सब मान रहे हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि त्योहारी सीज़न भी डूबती अर्थव्यवस्था में कुछ उम्मीद थी। इसके विपरीत, ऐसा लगता है कि त्योहार भी इस साल इस मंदी में अपनी रौनक खो बैठे हैं।

बीकेश, जिनकी उम्र 25 और राकेश, जिनकी उम्र 28 दोनों के विचार एक ही हैं। ये दोनों भाई गुरुग्राम के खांडसा में एक सैलून चलते हैं। खांडसा में उद्योगों में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या ज़्यादा है। उनके लिए, अक्टूबर का महीना फ़ेस मसाज या चेहरे के सौंदर्य उपचार के ग्राहकों में वृद्धि का समय है। बीकेश कहते हैं, "यह एक ऐसा मौसम होता है जब श्रमिक छुट्टी लेकर अपने पैतृक गांव लौट रहा होता है। वह स्पष्ट रूप से अच्छा दिखना चाहता है और साल में कम से कम एक बार इस समय लक्ज़री का आनंद लेने के लिए ख़ुशी से अतिरिक्त ख़र्चा करता है।"

image 2 new_0.PNG

बिकेश (बाएँ) और राकेश (दायें) खंडासा में एक सैलून चलाते हैं

हालांकि, इस त्यौहार के सीज़न में अच्छा दिखने की इच्छा पर अधिक ख़र्च करना करना बहुत मुश्किल हो गया है। राकेश ने बताया, "यहां लोगों के पास खाना खाने या किराया देने के लिए पैसे नहीं हैं।" उन्होंने कहा, "वे इस साल घर वापस जा रहे हैं।" उन्होंने पूछा, "कौन अपनी नौकरी गंवाने के बाद अच्छा दिखना चाहेगा?"

इसी तरह की आशंका, 21 वर्षीय अजय ने ज़ाहिर की। वो उसी इलाक़े में एक कपड़े की दुकान चलाते हैं। अजय अपने पिता की पारिवारिक व्यवसाय चलाने में मदद कर रहे हैं। उनके अनुसार, अक्टूबर के महीने में रविवार को एक मिनट के लिए भी दोनों ख़ाली नहीं बैठे पाते थे, लेकिन इस बार स्थिति कुछ और है।

image 3 new_0.PNG

21 साल के अजय के पिता की कपड़े की दुकान है.

अजय कहते हैं, "हमें सभी ग्राहकों के आर्डर पूरा करने के लिए रात की शिफ़्ट भी करनी पड़ती थी। हालांकि, इस अक्टूबर की कहानी अलग है। जब न्यूज़क्लिक की टीम उनकी दुकान पर पहुंची तब उनकी दुकान सुनसान थी। अजय के चेहरे पर उदासी ख़ुद के ही स्थिति बता रही है। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि उनके पास इस त्योहारी सीज़न में भी काम नहीं है।

खंडासा बाज़ार में सभी के होंठों पर एक ही बात थी कि काम नहीं है। रविवार की दोपहर में भी सड़कें ख़ाली थीं, साइबर कैफ़े के मालिक 21 वर्षीय अमरेश ने कभी मार्किट में इतनी उदासीनता नहीं देखी थी। उनकी दुकान टिकट बुक करने से मिलने वाले कमीशन पर टिकी है। उन्होंने कहा कि उनकी आय में भारी कमी आई है। क्योंकि टिकट बुक करने के लिए श्रमिक कम संख्या में उनके पास आ रहे हैं।

image 4 new_0.PNG

अमरेश (21) खंडासा मार्केट में साइबर कैफ़े चलाते हैं

बाज़ार में आर्थिक मंदी का असर साफ़ दिख रहा था, क्योंकि मार्किट में अलग ही सन्नाटा पसरा था। ज्वैलरी स्टोर्स के कारीगर आराम कर रहे थे और किराने की दुकानों पर काम करने वाले श्रमिक ख़ाली बैठकर ना बिके माल को देख रहे थे।

लगता है कि मंदी के परिणामस्वरूप जनता का रवैया बदल गया है। जिन वस्तुओं को ख़रीदना है, उनकी सूची में से अब उन वस्तुओं को हटा दिया जाता है, जिनसे समझौता किया जा सकता है। जीवन के सपने दूर हो गए हैं, जब बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। एक त्योहार मनाने के लिए भारतीय नागरिक के लिए यह अनहोनी जैसी है।  हर कोई, खंडासा बाज़ार में, बाज़ार की रौनक के लिए तरस रहा है।

गुरुग्राम इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के महासचिव दीपक मैनी ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा, "संगठित क्षेत्र में मंदी का असर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।" उनके अनुसार, यह "डर" ही है जिसने उपभोक्ताओं के क्रय व्यवहार को कम कर दिया है।

उन्होंने कहा, "गुरुग्राम में 10,000 से अधिक फ़ैक्ट्री इकाइयाँ हैं और सभी उद्योगों में 20 से 25 प्रतिशत उत्पादन गिरावट देखी गई है।" उन्होंने औद्योगिक शब्दावली का उपयोग करते हुए आसानी से कह दिया कि उत्पादन में आई गिरावट ने श्रमिकों को "आराम दे दिया है।"

जिसे वो "आराम की अवधि" कह रहे हैं, उसी को आम भाषा में हम छंटनी कहते हैं। इस छंटनी ने उन अनगिनत श्रमिकों के जीवन को प्रभावित किया है, जिनकी रोज़ी रोटी इस पर आश्रित है। इस ने उनकी पूरी जीवनचर्या को  पूरी तरह से पलट दिया है। इसी से जुड़ा एक उदाहरण नीरज* का है, जो गुरुग्राम की वेल्डिंग कंपनी में एक ठेका कर्मचारी हैं। उन्हें इस साल कोई बोनस नहीं मिला है। नीरज ने कहा, "हमारी इकाई में पहले 20-25 कर्मचारी कार्यरत थे, अब केवल 5-6 ही बचे हैं।अगर मैं किसी भी बोनस के लिए कहूंगा, तो मुझे काम से निकाल दिया जाएगा।"

एक अन्य श्रमिक श्यामलाल* हैं जो वर्तमान में एक ऑटो कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग यूनिट में कार्यरत हैं, लेकिन मंदी  के असर को महसूस कर रहे हैं। श्यामलाल ने कहा, "हम 12 घंटे काम करते थे, जिसे 8 घंटे कर दिया गया, उसके बाद किसी भी दिन उत्पादन का काम नहीं होता था और अंततः उनके साथ 40 में से 7 श्रमिक ही बचे हैं। बाक़ियों को हटा दिया गया है।"

उन्होंने कहा, "अब नियोक्ता हमें हटाने के बहाने ढूंढ रहा है।" हमें अब अपनी आवाज़ उठाने का भी डर है। हालांकि हमारे पास काम है, लेकिन अब निरंतर डर बना हुआ है कि कब काम छीन लिया जाएगा।"

संयोग से, इस समय चल रहे संकट के बीच, दो राज्य महाराष्ट्र और हरियाणा जो अपने प्रमुख उद्योगों के लिए जाने जाते हैं, वहाँ इस महीने विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। क्या आर्थिक मंदी कि स्थिति पर यह सार्वजनिक भावना वोट में तब्दील होगी? इस पर विपक्ष की नज़र रहेगी, जबकि मतदाताओं का ध्यान भटकाने के लिए सत्ताधारी दल पूरी कोशिश करेगा।

Economic slowdown
Haryana Assembly polls
Gurugram
Workers' Layoffs
auto sector
Industrial Workers
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • अदिति निगम
    25 मार्च, 2020 - लॉकडाउन फ़ाइल्स
    26 Mar 2022
    दो साल पहले भारत के शहरों से प्रवासी परिवारों का अब तक का सबसे बड़ा पलायन देखा गया था। इसके लिए किसी भी तरह की बस या ट्रेन की व्यवस्था तक नहीं की गयी थी, लिहाज़ा ग़रीब परिवार अपने गांवों तक पहुंचने…
  • सतीश भारतीय
    गुरुग्राम में कॉलेज छात्रों की गैंग जबरन कर रही है, रेहड़ी-पटरी वालों से ‘हफ़्ता वसूली‘
    25 Mar 2022
    फिल्मों में ‘हफ्ता वसूली‘ गुन्डे करते हैं और गुरुग्राम की धरती पर पढ़े लिखे नौजवान कर रहे हैं।
  • रवि शंकर दुबे
    योगी को फिर मुख्यमंत्री बनाना भाजपा की मज़बूती दर्शाता है या मजबूरी?
    25 Mar 2022
    योगी आदित्यनाथ जब दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तो भाजपा हाईकमान के चेहरे पर बिखरी खुशी कितनी असली थी कितनी नकली? शायद सबसे बड़ा सवाल यही है।
  • सोनिया यादव
    यूपी से लेकर बिहार तक महिलाओं के शोषण-उत्पीड़न की एक सी कहानी
    25 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में जहां बीजेपी दूसरी बार सरकार बना रही है, तो वहीं बिहार में बीजेपी जनता दल यूनाइटेड के साथ गठबंधन कर सत्ता पर काबिज़ है। बीते कुछ सालों में दोनों राज्यों पितृसत्तात्मक राजनीति की…
  • अजय कुमार
    श्रीलंका की तबाही इतनी भयंकर कि परीक्षा के लिए कागज़ का इंतज़ाम भी नहीं हो पा रहा
    25 Mar 2022
    श्रीलंका में रसोई गैस के एक सिलेंडर की कीमत तकरीबन 4200 श्रीलंकन रुपये तक पहुंच गयी है। एक किलो दूध का पैकेट तकरीबन 600 श्रीलंकन रुपये में मिल रहा है। कागज की कमी की वजह से सरकार ने स्कूली परीक्षा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License