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क्या भारत कोरोना का नया हॉटस्पॉट बन गया है?
भारत में कोरोना वायरस के नए मामलों में अब रोजाना ही नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। देश में मात्र 13 दिनों में कोविड-19 मरीजों की संख्या 30 लाख से 40 लाख के पार हुई।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
05 Sep 2020
कोरोना वायरस
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत में मात्र 13 दिनों में कोविड-19 मरीजों की संख्या 30 लाख से 40 लाख के पार पहुंच गई, जिनमें से शनिवार को दर्ज 86,432 नये मामले भी शामिल हैं। दुनिया में किसी भी और देश में कभी भी इस संख्या में नए मामले सामने नहीं आए।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा शनिवार सुबह आठ बजे जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल कोविड-19 मरीजों की संख्या बढ़कर 40,23,179 हो गई है। मंत्रालय के मुताबिक पिछले 24 घंटे में 1,089 मरीजों की मौत हुई है, जिन्हें मिलाकर अबतक देश में कुल 69,561 संक्रमितों की मौत हो चुकी है।

क्या कहते हैं आंकड़े?

आंकड़ों के मुताबिक, भारत में कोविड-19 मरीजों की संख्या 10 लाख से 20 लाख तक पहुंचने में 21 दिनों का समय लगा जबकि 20 से 30 लाख मरीज होने में 16 और दिन लगे। हालांकि, संक्रमितों की संख्या 30 लाख से 40 लाख तक पहुंचने में मात्र 13 दिनों का समय लगा है।

मंत्रालय के मुताबिक, कोविड-19 मरीजों की संख्या एक लाख तक पहुंचने में 110 दिन लगे थे जबकि संक्रमितों की संख्या एक लाख से 10 लाख तक पहुंचने में 59 दिन लगे। आंकड़ों के मुताबिक कोविड-19 से मरने वालों की दर में और गिरावट आई है और अब यह 1.73 प्रतिशत रह गई है। आंकड़ों के मुताबिक, इस समय देश में कोविड-19 के 8,46,395 मरीज उपचाराधीन हैं जो कुल संक्रमितों का 21.04 प्रतिशत है।

उल्लेखनीय है कि सात अगस्त को भारत में कोविड-19 मरीजों की संख्या 20 लाख के पार चली गई जबकि 23 अगस्त को संक्रमितों की संख्या 30 लाख को पार कर गई।

कम जांच चिंताजनक

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मुताबिक अबतक देश में कुल 4,77,38,491 नमूनों की जांच गई है, जिनमें से 10,59,346 नमूनों की जांच अकेले चार सितंबर को की गई।

इसके बावजूद भारत अभी भी जांचों की संख्या में दूसरे देशों से काफी पीछे है। अमेरिका में अभी तक आठ करोड़ से भी ज्यादा सैंपलों की जांच हो चुकी है। अगर आबादी के हिसाब से हर 10 लाख लोगों पर टेस्ट का आंकड़ा देखा जाए, तो भारत अब भी दूसरे देशों से बहुत पीछे है।

हर 10 लाख लोगों पर भारत अभी भी सिर्फ लगभग 32,000 टेस्ट कर रहा है, जबकि ब्राजील करीब 67,000 टेस्ट, अमेरिका और रूस 2.5 लाख से ज्यादा और दक्षिण अफ्रीका 62,000 से ही ज्यादा टेस्ट कर रहा है।

टेस्टिंग का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि कुल जांचों की संख्या में सबसे सटीक टेस्ट आरटी-पीसीआर की संख्या घटती जा रही है और कई बार गलत नेगेटिव नतीजा देने वाले रैपिड टेस्ट की संख्या बढ़ती जा रही है। जुलाई तक कुल टेस्टों में रैपिड टेस्टों का अनुपात औसत चार प्रतिशत के आस पास था, लेकिन अब यह लगभग 45 प्रतिशत के आसपास है।

पूरे देश में फैल रहा संक्रमण

पिछले तीन महीनों में संक्रमण के मामले पूरे देश में कुछ इस तरह से बढ़े हैं कि महामारी अब लगभग हर राज्य में और राज्यों के अधिकतर हिस्सों में फैल रही है। मई में देश के एक-तिहाई मामले सिर्फ महाराष्ट्र में थे जबकि कम से कम 19 दूसरे राज्यों में एक प्रतिशत से भी कम मामले थे। ये स्थिति अब बदल चुकी है। अब किसी भी राज्य में 20 प्रतिशत से ज्यादा मामले नहीं हैं।

महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत पर आ गई है और एक से 20 प्रतिशत तक हिस्से वाले राज्य बढ़ गए हैं। मई में ऊपर के तीन हॉट स्पॉटों की कुल मामलों में हिस्सेदारी 60 प्रतिशत हुआ करती थी, अब 44 प्रतिशत है। शुरू के कई हॉटस्पॉट अभी भी हॉटस्पॉट बने ही हुए हैं पर उनके अलावा 20 नए हॉटस्पॉट भी निकल कर आ रहे हैं।

आपराधिक लापरवाही

यह चिंताजनक है कि संक्रमण फैलते जाने के बावजूद तमाम लोग मास्क लगाने और शारीरिक दूरी के नियम का पालन करने में आनाकानी कर रहे हैं। यह एक किस्म की आपराधिक लापरवाही है। आखिर इससे खराब बात और क्या हो सकती है कि लोग इस तथ्य से परिचित होने के बाद भी सतर्कता का परिचय नहीं दे रहे हैं कि इस महामारी का कोई सीधा इलाज नहीं और इसका कोई भरोसा नहीं कि कारगर वैक्सीन कब आएगी।

सार्वजनिक स्थलों पर न जाने कितने ऐसे लोग दिखते हैं जो न तो मास्क लगाए होते हैं और न ही शारीरिक दूरी बनाए रखने की परवाह करते हैं। आखिर मास्क का सही से इस्तेमाल और शारीरिक दूरी के नियम का पालन करने के साथ साफ-सफाई और सेहत का ध्यान रखना हर किसी की प्राथमिकता क्यों नहीं बन सकता? ऐसा करना केवल नागरिक कर्तव्य ही नहीं, राष्ट्रीय दायित्व भी है। इसकी पूर्ति होने लगे तो कोरोना वायरस के संक्रमण की रफ्तार को जल्द ही काबू में करके जन-जीवन को पटरी पर लाया जा सकता है।

बेपरवाह सरकार

कोरोना संक्रमण के इस दौर में सबसे बुरी बात सरकार की बेपरवाही है। दुर्भाग्य यह है कि वायरस को फैलने से रोकने के लिए व्यापक व प्रभावी टेस्टिंग, संक्रमित व्यक्तियों का इलाज एवं महामारी से लड़ने के लिए क्षमता, बुनियादी ढांचे तथा मानव संसाधनों का विस्तार आदि सरकार की प्राथमिकता में आ ही नहीं पा रहे हैं।

इसकी कमी इस आपदा के आने के पहले दिन से थी और अब लगभग छह महीने बीत जाने के बाद भी इसी तरह की खबरें आ रही हैं। इसके उलट सरकार ने लंबे और अब लगभग नाकाम साबित हो चुके कठोर लॉकडाउन लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ ली थी। हालांकि उसके दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं। फिलहाल जिस रफ्तार से मरीजों की संख्या बढ़ रही है उससे आने वाला समय चिंताजनक है।

समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ 

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