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हाथरस केस: यूपी सरकार और पुलिस का रवैया चिंताजनक, क्या अब सीबीआई जांच ही है रास्ता
अलीगढ़ के अस्पताल में इलाज(!) से लेकर दिल्ली के सफदरजंग पहुंचने तक और मौत के बाद भी प्रदेश की सरकार का रवैया इस घटना के निन्दनीय पक्ष को चिंताजनक स्तर तक पहुंचा देता है।
प्रेम कुमार
30 Sep 2020
यूपी सरकार
Image courtesy: The Indian Express

हाथरस केस गैंगरेप है, मर्डर है, बर्बरता है। मगर, सिर्फ इतना नहीं है। एक बेबस, लाचार, दलित, गरीब परिवार पर जुल्म की दास्तान है। जुल्म करने वाले लोग सवर्ण हैं, दबंग हैं और उनके कृत्य की पर्देदारी में पुलिस महकमा पूरी तरह से शामिल रहा है। अलीगढ़ के अस्पताल में इलाज(!) से लेकर दिल्ली के सफदरजंग पहुंचने तक और मौत के बाद भी प्रदेश की सरकार का रवैया इस घटना के निन्दनीय पक्ष को चिंताजनक स्तर तक पहुंचा देता है। मगर, कुछ और भी अत्यंत महत्वपूर्ण बातें हैं जिससे यह तय हो जाता है कि हाथरस केस की जांच यूपी सरकार की पुलिस नहीं कर सकती।

न बलात्कार हुआ, न जीभ कटी थी!

अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ. एमएफ हुडा का मीडिया में आया यह बयान चौंकाने वाला है कि पीड़िता जब उनके पास इलाज के लिए लायी गयी थी तब उसके साथ यौन हिंसा का कोई संकेत नहीं था। डॉ. हुडा ने यह भी कहा है कि पीड़िता के सर्वाइकल स्पाइन टूटे हुए थे जिससे उसका पूरा शरीर पैरालाइज था लेकिन पीड़िता की जीभ कटी हुई नहीं थी। डॉ. हुडा ने यह भी दावा किया कि पीड़िता के जीभ में अल्सर था जो किसी पुराने घाव की वजह से हो सकता है। यह जरूरी नहीं कि ताजा घटना की वजह से हो। डॉ. हुडा के दावे पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि सफदरजंग में दो दिन चले इलाज के दौरान पीड़िता की जीभ कटे होने का जिक्र आया है। हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से इन बातों की पुष्टि होगी।

पीड़िता ने गैंगरेप का बयान दिया और डॉक्टर को पता नहीं चला!

अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में पीड़िता 14 सितंबर से 13 दिन तक वेंटिलेटर पर रही। घटना के पांच दिन बाद पुलिस 19 सितंबर को पीड़िता का बयान लेने पहुंची, लेकिन हालत गंभीर होने की वजह से बयान नहीं ले सकी।  21 और 22 सितंबर को सर्किल ऑफिसर और महिला पुलिसकर्मी बयान लेने के लिए पहुंचे। पीड़िता के बयान के बाद ही गैंगरेप का केस दर्ज हुआ। परिजन कह रहे हैं कि पीड़िता बोल नहीं पा रही थी। बहुत मुश्किल से बोलते हुए इशारों में उसने अपना बयान दर्ज कराया था।

...तो गैंगरेप पीड़िता को अलीगढ़ में इलाज ही नहीं मिला!

अब डॉ. हुडा की बात पर लौटते हैं जिनके अधीन इलाज हो रहा था लेकिन यौन शोषण का कोई चिह्न उन्हें नज़र नहीं आया। अगर यह सच था तो उसी अस्पताल में बयान लेने आयी पुलिस ने गैंगरेप का केस दर्ज कैसे कर लिया? क्या यह बात डॉक्टरों को बाद में भी नहीं मालूम चली? पीड़िता के भाई का कहना है कि लगातार ब्लीडिंग होती रही। ब्लीडिंग कभी रुकी नहीं। यह कैसा इलाज था! डॉक्टर को गैंगरेप तक का पता नहीं था! फिर इलाज क्या हुआ और कैसा हुआ, सोचा जा सकता है।

एडीजी! छेड़खानी का केस किसके बयान पर दर्ज हुआ?

एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार ने तो यहां तक कह डाला कि पीड़िता का पहला बयान 20 सितंबर को दर्ज हुआ और उससे पहले तक किसी को गैंगरेप की बात पता तक नहीं थी क्योंकि वह बेहोश थी। मगर, परिजनों ने इसे पूरी तरह से झूठा बताया है। परिजनों का कहना है कि वे लगातार पूरी कहानी बयां कर रहे थे। पुलिस को गैंगरेप के बारे में बता चुके थे।

पुलिस जो छिपा रही है वह शर्मनाक है

पुलिस जो छिपा रही है वह बहुत शर्मनाक है। घटना 14 सितंबर को घटी। पुलिस ने 20 सितंबर को छेड़खानी का केस दर्ज किया। इसी दिन पुलिस पीड़िता का बयान लेने अस्पताल पहुंची थी लेकिन वह बेहोश थी और बयान देने की स्थिति में नहीं थी। क्या एडीजी प्रशांत कुमार ये बताएंगे कि हमला, हत्या की कोशिश जैसे मामले दर्ज न कर पुलिस ने छेड़खानी का केस कैसे दर्ज कर लिया? किसने छेड़खानी की बात कही? पीड़िता ने बयान दिया नहीं और परिजन शुरू से बलात्कार और जानलेवा हमले की बात कह रहे थे।

चंद्रशेखर का सनसनीखेज दावा

चंद्रशेखर ने सफदरजंग अस्पताल प्रबंधन पर भी यह गंभीर आरोप लगाया है कि इलाज के दौरान देर रात वेंटीलेटर का स्विच ऑफ कर दिया गया जिस वजह से पीड़िता की जान गयी। उनका दावा है कि सरकार पीड़िता को जिन्दा नहीं रखना चाहती थी। यह बहुत गंभीर मामला है और इस आरोप के बाद घटना की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग गंभीर हो जाती है। भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर ने इस मामले को दलित लड़की पर सवर्णों के अत्याचार के तौर पर देखा था और पीड़िता को न्याय दिलाने की बात ट्वीट कहकर कही थी। उन्होंने हाथरस पहुंचने का एलान भी किया था। उसके बाद ही पुलिस हरकत में आयी और पीड़िता का बयान लिया गया।

परिजनों की शिकायत की लगातार अनदेखी

पुलिस ने परिजनों की बारंबार शिकायतों की अनदेखी की। एससी-एसटी एक्ट लगाने में आनाकानी की। बयान लेने के लिए भी पुलिस 5 दिन बाद पहुंची। 9 दिन बाद बयान लेने में सफलता मिली। पीड़िता के नाम लेने पर पुलिस ने संदीप, लवकुश, रामकुमार और रविके खिलाफ 22 सितंबर को गैंगरेप का मामला दर्ज किया। तब आरोपियों की गिरफ्तारी हुई।

हाथरस में बीजेपी विधायक भी बोले- नाजुक थी पीड़िता की हालत

हाथरस के बीजेपी विधायक हरिशंकर महोर ने इस लेखक को बताया कि वे पीड़िता से मिले थे। उसकी हालत खराब थी। रीढ़ की हड्डियां टूटी हुई थीं। जीभ जख्मी था। इसलिए वह बोल नहीं पा रही थी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वे नहीं बता सकते कि जीभ का जख्म काटे जाने की वजह से था या कुछ और बात थी। पीड़िता मौत से लड़ रही थी और बीजेपी विधायक ने उसकी बुरी स्थिति को देखा था। फिर भी अगर पीड़िता की मौत के बाद यह बात कही जा रही हो कि उसके साथ गैंगरेप नहीं हुआ या उसकी जीभ काटी नहीं गयी थी, तो ये दावे संदिग्ध हो जाते हैं।

क्यों न हो सीबीआई जांच?

रीढ़ की हड्डी टूटने, जुबान काटे जाने के बाद गैंगरेप पीड़िता को लकवा मार गया था, लेकिन वास्तव में ऐसा लगता है कि लकवा यूपी पुलिस को मार गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कई चीजें साफ होंगी। मगर, गैंगरेप की शिकार एक दलित बच्ची को जिस तरीके से मरने के लिए विवश कर दिया गया वह पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करता है। यह जांच सीबीआई से हो या अदालत इसका संज्ञान लेकर अपनी निगरानी में एसआईटी से इसकी जांच कराए मगर ये जरूरी है क्योंकि फौरी तौर पर पुलिस खुद इसकी पर्देदारी में जुटी नजर आती है।

गैंगरेप की पीड़िता का इलाज कर रहे डॉक्टर तक को गैंगरेप या फिर जीभ कटे होने की बात का पता नहीं चला। पुलिस ने गैंगरेप और हत्या की कोशिश को छेड़खानी मान लिया। आरोपियों पर एक्शन लेने में पुलिस ने देरी दिखलायी। आरोपियों को बचाने की कोशिश करती दिखी पुलिस। ये सारी बातें निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच मांगती हैं। सवाल ये है कि जब मुंबई में एक अभिनेता की आत्महत्या के मामले की सीबीआई जांच हो सकती है तो हाथरस में गैंगरेप और हत्या के इस मामले में सीबीआई जांच क्या इसलिए नहीं होगी कि पीड़िता दलित है और बलात्कारी व हत्यारे सवर्ण?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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