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स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य: लोगों की बेहतर सेवाओं और ज़्यादा बजट की मांग
यूपी के कुछ ज़िलों के एक अध्ययन से पता चलता है कि स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति ख़र्च बहुत कम है और यह 2018-19 और 2019-20 के बीच और कम हो गया है। महामारी के दौरान परिवार नियोजन सेवाएं उपलब्ध नहीं थीं और लोगों के पास पीएमजेएवाई कार्ड होने के बावजूद उन्हें अपनी जेब से भुगतान करना पड़ा था।
ऋचा चिंतन
30 Dec 2021
health
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

* उत्तर प्रदेश के चुनिंदा ज़िलों में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति ख़र्च बहुत कम है और 2018-19 और 2019-20 के बीच यह और कम होता गया है।

* स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में ज़्यादतर ख़र्च दवाओं और इलाज की बजाय बुनियादी ढांचे पर होता है।

* यूपी के कुछ ज़िलों में कोविड-19 महामारी के दौरान परिवार नियोजन सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई थीं। महिलाओं के लिए अनचाहे गर्भ से छुटकारा, परामर्श, गर्भनिरोधक आदि जैसी सेवाएं शायद ही उपलब्ध थीं।

* प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) कार्ड होने के बाद भी लोगों को अपनी जेब से जांच, इलाज और दवाओं पर ख़र्च करना पड़ा था।

महिला स्वास्थ्य अधिकार मंच (Women Health Rights Platform) के नाम से ज्ञात यूपी में हाशिए के तबकों की महिलाओं की समुदाय-स्तरीय वकालत करने वाले इस समूह के कुछ अवलोकन हैं। इस मंच का गठन महिलाओं के प्रजनन और किशोर स्वास्थ्य अधिकारों और लैंगिक समानता तथा न्याय के मुद्दों पर काम करने वाले एक अलाभकारी संगठन-‘सहयोग’(SHAHYOG) ने किया था और इसी संगठन ने इस मंच की मदद भी की थी।

कुछ ज़िलों - हमीरपुर, बाराबंकी, जालौन, वाराणसी और लखनऊ पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस महिला स्वास्थ्य अधिकार मंच की रिपोर्ट निम्नलिखित चुनौतियों पर रौशनी डालती हैं:

* कोविड-19 महामारी के दौरान लोग प्रजनन और यौन स्वास्थ्य सेवाओं का फ़ायदा उठाने में इसलिए असमर्थ थे, क्योंकि ज़्यादतर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को कोविड केंद्रों में बदल दिया गया था।

* लंबे समय तक प्रजनन और यौन स्वास्थ्य सेवाएं इसलिए प्रभावित रहीं, क्योंकि आशा कार्यकर्ताओं सहित स्वास्थ्य विभाग के ज़्यादातर कर्मचारी इन कोविड केंद्रों में तैनात थे।

* गर्भवती महिलाएं प्रसव से पहले की जांच करा पाने में असमर्थ थीं और यहां तक कि आयरन और फ़ॉलिक एसिड की गोलियां भी उपलब्ध नहीं करायी जा रही थीं।

* कई महिलाओं को समय पर गर्भनिरोधक सेवाएं नहीं मिल पा रही थीं और उन्हें अनचाहे गर्भधारण से छुटकारा पाने को लेकर निजी स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर रहना पड़ रहा था।

* लॉकडाउन के दौरान गांवों में महिलाओं से संपर्क कर पाना इसलिए मुश्किल था, क्योंकि आवाजाही प्रतिबंधित थी और टेलीफ़ोन के साधन के कोई विकल्प नहीं थे।

17-18 दिसंबर को लखनऊ में सहयोग (SHAYAOG) की ओर से आयोजित एक ज़िला स्तरीय परामर्श में इन अवलोकनों को राज्य स्तर के अधिकारियों के साथ-साथ यूपी सरकार के स्वास्थ्य विभाग के साथ साझा किया गया था। इस परामर्श में यूपी के तक़रीबन 20 ज़िलों के 80 से ज़्यादा लोगों ने भाग लिया था।

स्वास्थ्य का घटता बजट

विश्लेषण करती इन हालिया रिपोर्टों ने बुनियादी ढांचे और मानव संसाधनों के मामले में यूपी में उस कमज़ोर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को बेपर्दा कर दिया है, जिसके चलते ख़राब स्वास्थ्य नतीजे सामने आए हैं।

ज़िला स्तर पर स्वास्थ्य क्षेत्र में धन के आवंटन और इस्तेमाल को लेकर ज़िला स्तर के बजट दस्तावेज़ों का अध्ययन करते हुए 'सहयोग' की ओर से जो विश्लेषण किया गया है, उससे पता चलता है कि कुछ चुनिंदा ज़िलों- हमीरपुर, बाराबंकी, जालौन और वाराणसी में स्वास्थ्य पर किए जाने वाले ख़र्च में कमी आयी है।

चित्र-1, 2018-19 और 2019-20 के बीच राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) पर प्रति व्यक्ति ख़र्च को दर्शाता है। बाराबंकी ज़िले में एनएचएम पर प्रति व्यक्ति ख़र्च सबसे कम है, हालांकि दो सालों के बीच इसमें इज़ाफा हुआ है। बाक़ी तीनों ज़िलों हमीरपुर, जालौन और वाराणसी में इस ख़र्च में कमी आयी है। सबसे ज़्यादा गिरावट वाराणसी में देखने को मिली है, जहां इस ख़र्च में 22 रुपये की कमी आयी है।

एनएचएम पर प्रति व्यक्ति ख़र्च: 2018-19 से 2019-20 (रुपये में)

एनएचएम के भीतर उत्तर प्रदेश और सभी चुने हुए इन चार ज़िलों (चित्र-2) के लिए परिवार नियोजन पर प्रति व्यक्ति ख़र्च 2018-19 और 2019-20 के बीच काफ़ी कम हो गया है।

परिवार नियोजन पर प्रति व्यक्ति ख़र्च: 2018-19 से 2019-20 (रुपये में)

इन ज़िलों में बाराबंकी का प्रदर्शन सबसे ख़राब है। इस ख़र्च में आयी गिरावट हमीरपुर में सबसे ज़्यादा है,यानी कि 8.7 रुपये से 5.2 रुपये प्रति व्यक्ति। यूपी के लिहाज़ से 2018-19 और 2019-20 के बीच औसतन गिरावट काफ़ी ज़्यादा थी, यानी कि 6.5 रुपये से लेकर 4.4 रुपये तक।

स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों पर ख़र्च

2017 में आयुष्मान भारत कार्यक्रम के हिस्से के रूप में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों (HWC) का ऐलान किया था। ज़्यादा व्यापक स्वास्थ्य सेवाओं को शामिल करने को लेकर उप केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को अपग्रेड करते हुए एचडब्ल्यूसी की स्थापना की गयी है।

सिर्फ़ 2019-20 में ही चुने हुए इन ज़िलों में एचडब्ल्यूसी पर ख़र्च किया गया था (चित्र-3)। वाराणसी को छोड़कर ज़्यादतर ज़िलों में प्रति व्यक्ति ख़र्च यूपी के औसत से ज़्यादा है, जहां बाक़ी ज़िलों या यहां तक कि यूपी के औसत के मुक़ाबले भी बहुत कम है।

एचडब्ल्यूसी पर प्रति व्यक्ति वास्तविक ख़र्च (रुपये में)

2019-20 में एचडब्ल्यूसी के तहत किये गये ख़र्च के ढांचे को देखते हुए चित्र-4 से पता चलता है कि यूपी में सबसे ज़्यादा ख़र्च (89.3%) बुनियादी ढांचे पर किया गया है। मानव संसाधन गतिविधियों पर किया जाने वाला ख़र्च तक़रीबन 2.5% है। राज्य स्तर पर मानव संसाधन, आईईसी, उपकरण और प्रशिक्षण पर किया जाने वाला कुल ख़र्च बहुत कम है।

एचडब्ल्यूसी के तहत ख़र्च का ढांचा: 2019-20 (% में)

ये ज़िले भी उसी पैटर्न पर चलते हुए दिखायी पड़ रहे हैं। हमीरपुर में तो तक़रीबन पूरा खर्च (99.6%) ही बुनियादी ढांचे पर कर दिया गया है। बाराबंकी में भी ज़्यादातर ख़र्च बुनियादी ढांचे पर ही किया है।

यह देखना चिंताजनक है कि उपकरणों, जांच और दवाओं पर किया जाने वाला ख़र्च बहुत ही मामूली है। इस मामूली ख़र्च से तो जिस मक़सद के लिए एचडब्ल्यूसी का ऐलान किया गया था, वही नाकाम हो जाता है। जैसा कि ज़िला स्तर के अवलोकनों से पता चलता है कि कई मामलों में यह सिर्फ़ इमारतों के नवीनीकरण या नये होर्डिंग और पोस्टर लगाने तक ही सीमित है। लोगों के लिए जितना ज़्यादा ख़र्च इलाज से जुड़ी सेवाओं और दवाओं पर होना चाहिए था, वह तो सिरे से ग़ायब है।

कोविड-19 महामारी ने एकदम साफ़ कर दिया था कि एक कुशल सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की सख़्त ज़रूरत है। सहयोग और इसके सहयोगी संगठन की ओर से जो समुदाय और ज़िला स्तर का विश्लेषण किया गया है, उससे साफ़-साफ़ पता चलता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत ज़्यादा सरकारी निवेश और हर बजट में इसे कहीं ज़्यादा प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। आईईसी और दूसरे ग़ैर-विकासात्मक मदों पर ख़र्च करने की बजाय, सेवाओं, उपकरणों, दवाओं पर ख़र्च करना कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। सरकार को इन पहलुओं पर ग़ौर करने और ख़र्च की योजना बनाने और स्वास्थ्य हस्तक्षेपों को जन-समर्थक तरीके से बनाने की आवश्यकता है। इस परामर्श के आख़िर में महिला समूह की ओर से रखी गयी मुख्य मांगों में शामिल हैं:

* सामुदायिक स्तर पर परिवार नियोजन परामर्श और दूसरी संबंधित सेवाओं को गांवों में उपलब्ध कराने की ज़रूरत है।

* गर्भ निरोधकों सहित प्रजनन और यौन स्वास्थ्य सेवाएं हर स्तर पर मुफ़्त उपलब्ध करायी जाये।

* एचडब्ल्यूसी को मानकों के मुताबिक़ जल्द मज़बूत किया जाना चाहिए और पर्याप्त मानव संसाधन लगाए जाने चाहिए।

* भारतीय जन स्वास्थ्य मानकों के मुताबिक़ अस्पतालों/स्वास्थ्य केंद्रों के सभी स्तरों पर पर्याप्त चिकित्सा कर्मचारियों की भर्ती की जानी चाहिए।

* सभी नागरिकों को निकटतम संभव जगहों पर समान, सुलभ और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करायी जानी चाहिए।

* सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में कहीं ज़्यादा आशा कार्यकर्ताओं की भर्ती की जानी चाहिए और उन्हें उचित वेतन दिया जाना चाहिए।

* चूंकि कम बजट आवंटन और स्वास्थ्य पर किया जाने वाला ख़र्च पूरे स्वास्थ्य प्रणाली पर असर डालता है, ऐसे में स्वास्थ्य बजट को वास्तविक रूप में बढ़ाया जाना चाहिए। स्वास्थ्य पर होने वाले प्रति व्यक्ति ख़र्च को बढ़ाया जाना चाहिए।

* निजी अस्पतालों, पैथोलॉजी और दूसरी सेवाओं की निगरानी के लिए नैदानिक प्रतिष्ठान (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 का अनुपालन को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Health in Uttar Pradesh: People Demand Better Services and More Budget

Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana
Mahila Swasthya Adhikar Manch
National Health Mission
Uttar pradesh
asha workers
Primary Health Centers
Health Budget

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