NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
रौशनी कानून रद्द करने के निर्णय पर पुनर्विचार याचिका पर 21 दिसंबर तक फैसला ले हाईकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट
रौशनी कानून सार्वजनिक भूमि पर बसे लोगों को मालिकाना हक प्रदान करता है। जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय ने नौ अक्टूबर को रौशनी कानून को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित करते हुये इस कानून के तहत भूमि आबंटन के मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दिया था।
भाषा
10 Dec 2020
SC

नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय से कहा कि रौशनी कानून निरस्त करने के निर्णय पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिकाओं पर 21 दिसंबर तक फैसला करे। रौशनी कानून सार्वजनिक भूमि पर बसे लोगों को मालिकाना हक प्रदान करता है।

न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की पीठ ने जम्मू कश्मीर प्रशासन की ओर से सालिसीटर जनरल तुषार मेहता के इस आश्वासन पर विचार किया कि इस मामले में शीर्ष अदालत में याचिका दायर करने वालों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जायेगी क्योंकि वे ‘सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले या अनधिकृत लोग’ नहीं है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय के नौ अक्टूबर के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर जनवरी के अंतिम सप्ताह में सुनवाई की जायेगी।

मेहता ने पीठ को बताया कि जम्मू कश्मीर प्रशासन ने उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की है और कहा है कि प्रशासन उन आम आदमियों के खिलाफ नहीं हैं जो सही हैं और जिन्होंने भूमि पर कब्जा नहीं किया है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत में लंबित अपील उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका पर निर्णय करने में बाधक नहीं होगी।

जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय ने नौ अक्टूबर को रौशनी कानून को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित करते हुये इस कानून के तहत भूमि आबंटन के मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दिया था।

रौशनी कानून 2001 में लागू किया गया था। इसका मकसद एक ओर बिजली परियोजनाओं के लिये वित्तीय संसाधन पैदा करना और दूसरी ओर सरकारी भूमि पर बसे लोगों को मालिकाना हक देना था।

वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि परस्पर विरोधी आदेशों से बचने के लिये अपीलकर्ताओं को इस फैसले पर पुनर्विचार के लिये उच्च न्यायालय जाना चाहिए।

पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘सभी याचिकाकर्ताओं को पुनर्विचार करने वाली पीठ के पास जाना चाहिए और उच्च न्यायालय को इन सभी को सुनना चाहिए। हम इस बारे में निर्देश देंगे।’’

मेहता ने कहा कि जम्मू कश्मीर प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि अतिक्रमण करने वाले और भूमि हथियाने वाले उच्च न्यायालय के आदेश से छूट का दावा नहीं कर सकते।

उन्होंने पीठ से कहा, ‘‘भूमि हथियाने वालों को बख्शा नहीं जा सकता और साथ ही वैध संपत्ति मालिकों को बचाया जायेगा।’’

सुनवाई शुरू होते ही एक याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उच्च न्यायालय ने कानून को निरस्त करके गलत किया और उच्च न्यायालय ने रौशनी कानून से लाभान्वित लोगों को सुना भी नहीं।

इस पर पीठ ने कहा, ‘‘क्या आपको पता है कि उच्च न्यायालय में कुछ पुनर्विचार याचिकायें लंबित हैं और इनमें से कुछ को संरक्षण प्रदान किया जा चुका है।’’

सालिसीटर जनरल ने इन अपील का जवाब देने के लिये एक सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया।

पीठ ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिकायें 21 दिसंबर के लिये सूचीबद्ध हैं। उच्च न्यायालय ने यथास्थिति बहाल कर रखी है और इसके बाद उच्च न्यायालय ने पुनर्विचार याचिकाओं को सूचीबद्ध किया है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘दो समानांतर कार्यवाही कैसे चल सकती हैं? यह मामला पुनर्विचार याचिका के रूप में उच्च न्यायालय में लंबित है।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि जम्मू कश्मीर प्रशासन ने भी पुनर्विचार याचिका दायर की है जिसमे भू स्वामियों की दो श्रेणियां- अवैध अतिक्रमण करने वाले और असली मालिक-बनाई गयी हैं।

रोहतगी ने पीठ से कहा कि इन अपील का मकसद यही है कि वैध मालिकों को उनकी जमीन के कब्जे से बेदखल नहीं किया जाना चाहिए।

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविन्द दातार ने कहा कि इस फैसले में अधिकृत भू स्वामियों का जिक्र नहीं है।

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश वासुदेव ने कहा कि पुनर्विचार तो कुछ लोगों तक सीमित है और शीर्ष अदालत को पुनर्विचार याचिका पर निर्णय होने तक इस मामले को विलंबित रखना चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘‘हम उच्च न्यायालय को निर्देश दे रहे हैं कि उसके पास लंबित पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई की जाये।’’

पीठ ने इस मामले को जनवरी में सूचीबद्ध करते हुये मेहता से कहा कि उस समय तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

इस बारे में कोई आदेश पारित नहीं करने का अनुरोध करते हुये मेहता ने कहा, ‘‘मैं यहां पर आपके सामने हूं और कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जायेगी।’’

मेहता ने कहा, ‘‘इस बारे में कोई भी आदेश भ्रम पैदा करेगा। कृपया इसे सोमवार के लिये सूचीबद्ध कर लें।’’

शीष अदालत ने कहा कि इस मामले में जनवरी के अंतिम सप्ताह में सुनवाई की जायगी।

उच्च न्यायालय ने सात दिसंबर को रौशनी कानून निरस्त करने के फैसले पर पुनर्विचार के लिये प्रशासन की याचिका पर सुनवाई अगले सप्ताह के लिये स्थगित कर दी थी।

यह याचिका राजस्व विभाग में विशेष सचिव नजीर अहमद ठाकुर ने चार दिसंबर को दायर की थी। न्यायालय के लगभग दो महीने पुराने फैसले में संशोधन के अनुरोध वाली याचिका में कहा गया कि इससे बड़ी संख्या में आम लोग अनायास ही पीड़ित हो जाएंगे जिनमें भूमिहीन कृषक और ऐसे व्यक्ति भी शामिल हैं जोकि स्वयं छोटे से टुकडे पर घर बनाकर रह रहे हैं।

याचिका के मुताबिक, लाभार्थियों में से आम लोगों और जमीन पर कब्जा जमाने वाले अमीर लोगों के बीच फर्क करने की आवश्यकता है। साथ ही भूमिहीन मजदूरों अथवा ऐसे लोगों को आवंटित भूमि का कब्जा बरबरार रखने की अनुमति का पक्ष लिया गया जोकि खुद ही उस जमीन पर घर बनाकर रह रहे हैं।

रोशनी कानून वर्ष 2001 में लागू किया गया था, जिसके तहत राज्य में 102750 हेक्टर सरकारी जमीन पर रहने वाले लोगों को इसका मालिकाना हक देने की योजना थी और यह मालिकाना हक देने के लिये सिर्फ 15.85 प्रतिशत भूमि ही मंजूर की गयी थी।

Jammu and Kashmir
Jammu & Kashmir High Court
Supreme Court
Roshni Act

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?


बाकी खबरें

  • Modi
    संजय कुमार
    क्या मोदी की निरंकुश शैली आगे भी काम करेगी? 
    02 Dec 2021
    नव-उदारवादी व्यवस्था आक्रोश पैदा करती है, आत्मविश्वास को नष्ट करती है, और लोगों को साज़िशपूर्ण विचार और भव्यता की नकली कहानियों का आसान शिकार बनाती है।
  • karnataka
    सबरंग इंडिया
    Hate watch: कथित बजरंग दल के सदस्यों ने कर्नाटक के बेलूर में ईसाई प्रार्थना कक्ष में हंगामा किया
    02 Dec 2021
    हंगामा करने वालों को बेलूर में प्रार्थना कक्ष में तबाही मचाते हुए वीडियो में देखा जाता है, और समुदाय की कुछ महिलाओं ने उनका सामना किया
  • Geneva
    पीपुल्स डिस्पैच
    कोविड-19 चिकित्सा उत्पादों पर ट्रिप्स छूट की मांग को लेकर जन आंदोलनों, ट्रेड यूनियनों और वाम दलों ने हाथ मिलाया
    02 Dec 2021
    ओमिक्रॉन वैरिएंट के सामने आने के बाद 12वें विश्व व्यापार संगठन के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन को रद्द कर दिया गया है और ट्रेड यूनियन, नागरिक समाज संगठन और वामपंथी पार्टियां कोविड-19 चिकित्सा उत्पादों को…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 9,765 नए मामले, 477 मरीज़ों की मौत 
    02 Dec 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 46 लाख 6 हज़ार 541 हो गयी है।
  • Sadhu Sants
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड: देवस्थानम बोर्ड वापसी, एक चुनावी फ़ैसला!
    02 Dec 2021
    “भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलेंगे कि जब कोई निर्वाचित सरकार किसी विधेयक को विधानसभा में ध्वनिमत से पारित करे और वही सरकार अपने बनाए हुए अधिनियम को वापस ले। निश्चित रूप से ये…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License