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मज़दूर-किसान
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हिमाचल : मनरेगा के श्रमिकों को छह महीने से नहीं मिला वेतन
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में मनरेगा मज़दूरों को पिछले छह महीने से वेतन नहीं मिल पाया है। पूरे  ज़िले में यही स्थिति है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
30 May 2022
MNREGA
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

मनरेगा योजना की शुरुआत इसलिए की गई कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले श्रमिकों को उनके क्षेत्र में ही रोजगार मिल जाए ताकि उन्हें पैसा कमाने के लिए इधर-उधर भटकना न पड़ें। लेकिन इस योजना में आज भी कई तरह की खामियां देखने को मिलती हैं। कहीं काम कराने के बाद मजदूरों को समय पर पैसा नहीं मिलता है तो कहीं उन्हें काम ही नहीं मिल पाता है। देश भर में करीब-करीब इसी तरह की स्थिति मौजूद है।

हिमाचल प्रदेश के कांगरा जिले में मनरेगा मजदूरों को पिछल छह महीने से वेतन नहीं मिल पाया है। द ट्रिब्यून से बात करते हुए जिले के कई पंचायतों प्रधान कहते हैं कि पूरे जिले में यही स्थिति है और पिछले पांच साल में ऐसा पहली बार हो रहा है जब मनरेगा मजदूरों के वेतन में छह महीने की देरी हुई है। वे आगे कहते हैं, "इसके अलावा, सीमेंट और स्टील आदि सामग्री की खरीद के लिए धन के अभाव में मनरेगा के तहत अधिकांश कार्य ठप हो गए हैं।"

ज्ञात हो कि मनरेगा के प्रावधानों के अनुसार लाभार्थियों को काम पूरा होने के 15 दिनों के भीतर उनके बैंक खातों में बकाया राशि मिल जानी चाहिए लेकिन ऐसा न होने से मजदूर परेशान हैं।

बाथन पंचायत की प्रधान सीमा कुमारी कहती हैं, “कार्यों के लिए मस्टर रोल जमा किए छह महीने से अधिक समय हो गया है लेकिन लाभार्थियों को भुगतान नहीं मिला है।” वे आगे कहती हैं, "इसने कई विकास कार्यों को भी धीमा कर दिया है।"

भुगतान में देरी की बात स्वीकार करते हुए कि एक प्रखंड विकास अधिकारी का कहना है कि "यह मुद्दा पिछले साल तब उठा जब राज्य ने अपने अर्ध-वार्षिक लक्ष्यों को प्राप्त किया। सरकार ने केंद्र से मनरेगा बजट फिर से आवंटित करने का अनुरोध किया है। उम्मीद है कि कुछ दिनों में समस्या का समाधान हो जाएगा।"

बता दें कि भुगतान में देरी का प्रभाव कांगड़ा में अधिक रहा है जहां अधिक लोगों के पास मनरेगा जॉब कार्ड हैं। जिले में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग अपने दिन-प्रतिदिन के खर्च के लिए मनरेगा पर ही निर्भर हैं। भुगतान में देरी होने से हजारों परिवारों को आर्थिक रुप से और कमजोर कर दिया है।

ध्यान रहे कि पिछले दो वर्षों में कोविड के कारण नौकरियों के चले जाने से जिले में मनरेगा पर निर्भरता बढ़ गई है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में काम करने वाले हजारों युवा अपने घर की तरफ लौट चुके हैं। ऐसे में ये योजना इन लोगों के मददगार तभी हो सकता है जब ज्यादा से ज्यादा काम मिले और काम होने के बाद उनके खातों में समय पर पैसा चला जाए ताकि उनके परिवार को आर्थिक तंगियों से न गुजरना पड़े।

बता दें कि करीब दो सप्ताह पहले ही देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश से मनरेगा मजदूरों को वेतन न मिलने की खबर सामने आई थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के करीब 10लाख मनरेगा श्रमिकों का पिछले तीन चार महीने से भुगतान नहीं हो पाया था। वहीं, निर्माण सामग्री का 1800 करोड़ रुपये बकाया होने से ग्राम पंचायतों के स्थायी निर्माण कार्य भी ठप हो गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर जैसे जिलों को छोड़ दिय तो अधिकांश जिलों में तालाब खोदाई, बरसाती पानी की निकासी के लिए नाला, खड़ंजा, चक और संपर्क मार्ग निर्माण, पीएम व सीएम आवास, खेत की मेड़बंदी और समतलीकरण जैसे कार्य कराए गए। मनरेगा में सौ दिन काम करने के बाद भी श्रमिकों को तीन चार महीने से समय पर वेतन नहीं मिला।

उधर मनरेगा में ग्राम रोजगार सहायक,परियोजना अधिकारी, तकनीकी सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर, लेखाकार सहित अन्य संविदा कर्मियों की बात करें तो उनकी संख्या करीब 40हजार से अधिक हैं और उन्हें भी पिछले तीन महीने से समय पर मानदेय नहीं मिला।

Himachal
MNREGA
Salary Delay
MNREGA Workers

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