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हिमाचल प्रदेश : सरकार की ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट के ख़िलाफ़ छात्रों का प्रदर्शन
प्रदर्शनकरियों ने कहा है कि इन्वेस्टर मीट में निवेशकों को प्रदेश के संसाधनों पर डाका डालने के लिए खुला अवसर प्रदान किया जा रहा है।
मुकुंद झा
07 Nov 2019
student protest

हिमाचल प्रदेश सरकार 7 और 8 नवंबर को ग्लोबल इन्वेस्टर मीट, यानी विश्व स्तर के निवेशकों की बैठक का आयोजन कर रही है। उसे उम्मीद है की इससे प्रदेश का विकास होगा। हिमाचल के गठन के बाद पहली बार निवेश को लेकर इतना बड़ा सम्मेलन हो रहा है। इन्वेस्टर्स मीट के लिए अभी तक 583 एमओयू साइन किए गए हैं। इसमें 82,344 करोड़ के निवेश की संभावनाएं देखी जा रही हैं। जयराम सरकार इन एमओयू के दम पर सूबे के लगभग पौने दो लाख लोगों को रोज़गार देने की उम्मीद कर रही है। इन्वेस्टर्स मीट से पहले जयराम सरकार ने राज्य में छह नई नीतियां इसी साल बनाई हैं।

हिमाचल प्रदेश पूरे देश में बेहतर शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जाना जाता है। शिक्षा में हिमाचल का नाम सबसे ऊपर है। पर्यावरण और स्वास्थ्य सेवाओं में दूसरे स्थान पर है। क़ानून व्यवस्था भी देश के सभी राज्यों की अपेक्षा में कहीं बेहतर है। दूसरी तरफ़ हिमालय क्षेत्र के प्रदेशों में हिमाचल पर्यटन की दृष्टि से सबसे मुख्य स्थल बना हुआ है। पिछले एक दशक में हिमाचल में पर्यटकों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा हो रहा है। पहले सिर्फ़ गर्मी के मौसम में पर्यटक हिमाचल का रुख करते थे, लेकिन अब 12 महीने पर्यटकों की आवाजाही रहती है।

हिमचाल प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित इन्वेस्टर्स मीट के विरोध में एसएफ़आई ने बुधवार को धरना-प्रदर्शन किया। इसमें छात्रों और नौजवानों की बड़ी स्तर पर भागीदारी रही। इनका कहना है, "प्रदेश का क़ानून धारा 118 के तहत साफ़ तौर पर प्रदेश के बाहर के किसी भी व्यक्ति को यहां ज़मीन ख़रीदने से प्रतिबंधित करता है। एक तरफ़ सरकारी या वन विभाग की ज़मीन पर पुश्तों से हिमाचल के स्थायी निवासी के रूप में रह रहे भूमिहीन, किसान या ग़रीब मज़दूर को यही सरकार उच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देकर ज़मीन से बेदख़ल करने के नोटिस निकाल रही है, वहीं दूसरी ओर विदेशी निवेश के बहाने बड़े निजी घरानों को क़ानून को दरकिनार करते हुए मुफ़्त में प्रदेश में ज़मीन बांटी जा रही है। एसएफ़आई भाजपा सरकार के इस दोहरे चरित्र एवं पूंजीपतियों को फ़ायदा पहुंचाने वाली नीति का विरोध करती है।"

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इसके अलावा प्रदेश के विश्वविद्यालयों में भी एसएफ़आई के छात्रों ने इसका विरोध किया है।

प्रदर्शनकरियों ने कहा है कि इन्वेस्टर मीट में निवेशकों को प्रदेश के संसाधनों पर डाका डालने के लिए खुला अवसर प्रदान किया जा रहा है।

राज्य अध्यक्ष रमन थार्टा ने कहा, "केंद्र और प्रदेश की सरकार हमेशा से ही अपने चहेते पूंजीपतियों को मुनाफ़ा देने के लिए तत्पर रही है। वहीं दूसरी ओर छात्रों तथा नौजवानों को लगातार रोज़गार से दूर किया जा रहा है। प्रदेश की जयराम सरकार अब तक के अपने कार्यकाल में सभी वर्गो को संतुष्ट करने में नाकाम रही है। प्रदेश में छात्रों, मज़दूरों, महिलाओं, बेरोज़गारों के लिए कोई ठोस रणनीति तैयार करने में विफल सरकार प्रदेश की जनता को गर्त में धकेलने के लिए निवेशकों को बुलाकर प्रदेश के बचे संसाधन लुटाना चाहती है।"

रमन आगे कहते हैं, "शिक्षा के क्षेत्र में वर्तमान की सरकार का दृष्टिकोण बहुत संकीर्ण है। सरकार लगातार सार्वजनिक क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों के बजट में कटौती कर रही है। छात्र-अध्यापक अनुपात में भारी गिरावट आई है। शिक्षा के क्षेत्र को नए आयाम देने के लिए बने आयोगों की सिफ़ारिशों को केंद्र सरकार मात्र एक दस्तावेज की तरह सुरक्षित रखे है बजाय इसके कि इनकी सिफ़ारिशों को लागू करे। आज तक भी सकल घरेलू उत्पाद तथा राज्य सरकार के बजट का अपर्याप्त प्रतिशत ही शिक्षा क्षेत्र में ख़र्च होता है। इससे पता चलता है कि हमारी सरकारी सार्वजनिक क्षेत्र की शिक्षा के लिए कितनी संवेदनशील है।"

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विरोध कर रहे लोगों ने यह भी कहा कि "पर्यटन हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन अकेले पर्यटन क्षेत्र में ही 15 हज़ार करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव इस इन्वेस्टर्स मीट का हिस्सा है। लगभग 200 करोड़ रुपये का निवेश इस क्षेत्र में तय माना जा रहा है। छोटे-मझौले पर्यटन क्षेत्र के उद्यमी का पूरा कारोबार चौपट करने की फ़िराक़ में सरकार केवल चंद पूंजीपरस्त लोगों को फ़ायदा पहुंचाना चाहती है।"

एसएफआई ने सरकार पर आरोप लगते हुए कहा, "यदि प्रदेश की सरकार समय रहते सार्वजनिक शिक्षा क्षेत्र की मज़बूती के लिए ठोस रणनीति तैयार नहीं करती तो आने वाले दिनों में सरकार के ख़िलाफ़ प्रदेश व्यापी आंदोलन की शुरुआत की जाएगी और चाहे जो भी परिस्थिति बने उसके लिए सरकार ख़ुद जवाबदेह होगी।"

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