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भारत
राजनीति
हिमाचल सरकार ने कर्मचारियों के धरना-प्रदर्शन, घेराव और हड़ताल पर लगाई रोक, विपक्ष ने बताया तानाशाही फ़ैसला
इस चेतावनी के अनुसार जिस दिन कर्मचारी धरना प्रदर्शन करेंगे, उस दिन का उनका वेतन काटने के निर्देश दिए गए हैं। कानून का उल्लंघन करने पर तो उसी दिन संबंधित कर्मचारी को सस्पेंड कर दिया जाएगा।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
01 Mar 2022
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'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

हिमाचल प्रदेश की बीजेपी सरकार ने कर्मचारियों के प्रदर्शन, घेराव, हड़ताल और काम बहिष्कार पर रोक लगा दी है। जिसके बाद से विपक्ष और मज़दूर संगठन सरकार पर हमलावर हैं। सरकार के इस निर्णय को तानशाही पूर्ण बताते हुए सड़क पर आंदोलन की चेतावनी भी दी है। जानकारों का कहना है कि चुनावी साल में सरकार ने लगातार प्रदेश में हो रहे सरकारी कर्मचारियों के विरोध प्रदर्शनों पर शिकंजा कसते हुए इस कड़ी कार्रवाई की चेतावनी जारी की है।

इस चेतावनी के अनुसार जिस दिन कर्मचारी धरना प्रदर्शन करेंगे, उस दिन का उनका वेतन काटने के निर्देश दिए गए हैं। कानून का उल्लंघन करने पर तो उसी दिन संबंधित कर्मचारी को सस्पेंड कर दिया जाएगा।

सरकार ने सिविल सर्विस रूल्स 3 और 7 का हवाला देते हुए आदेश जारी किए हैं कि प्रदर्शन, घेराव, हड़ताल, बायकॉट, पेन डाउन स्ट्राइक और सामूहिक अवकाश लेने और इस तरह की अन्य गतिविधियों में शामिल सरकारी कर्मचारियों का वेतन काटा जाएगा।

हालांकि सरकार के इस निर्णय के तुरंत बाद विपक्ष सरकार पर हमलावर हो गया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे बीजेपी की हताशा बताया। विपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री ने कहा, "सरकार कर्मचारियों के आंदोलन को कुचलना चाहती है। प्रदर्शन करना कर्मचारियों का अधिकार है। कर्मचारी ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने की मांग कर रहे हैं। यह उनका हक है।"

जबकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की राज्य कमेटी ने एक बयान जारी कर कहा है कि "हमारा मानना है कि सरकार द्वारा कर्मचारियों के द्वारा प्रदर्शन, घेराव, हड़ताल व कार्यों के बहिष्कार आदि को लेकर जो निर्देश जारी किये हैं यह सरकार की कर्मचारी आंदोलन को दबाने के लिए की गई असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक व तानाशाहीपूर्ण कार्यवाही है तथा पार्टी सरकार से मांग करती है कि इन तानाशाहीपूर्ण निर्देशों को तुरन्त वापिस लेकर अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करे। सरकार कर्मचारियों की जायज़ मांगो को लेकर किए जा रहे आंदोलन को दबाने के लिए इस प्रकार की तानाशाहीपूर्ण कार्यवाही रही है जिसकी पार्टी कड़ी निंदा करती है। सीपीएम कर्मचारियों के विभिन्न वर्गों के द्वारा जायज़ मांगों को लेकर चलाए जा रहे आंदोलन का समर्थन करती है।"

सरकार के इस फैसले के पीछे की पृस्ठभूमि की चर्चा करते हुए राज्य सचिवमण्डल सदस्य  संजय चौहान ने कहा, "प्रदेश में हर वर्ग का कर्मचारी जिसमें अराजपत्रित कर्मचारी, पुलिस कर्मी, डॉक्टर, नई पेंशन योजना कर्मचारी, आउटसोर्स व ठेका कर्मचारी, स्कीम वर्कर्स आदि सभी अपनी जायज़ मांगों को लेकर आंदोलनरत है। परन्तु सरकार इनकी मांगों पर अमल करने के बजाए इस प्रकार के तानाशाहीपूर्ण निर्देश जारी कर इनको डराने व इनके आंदोलन को दबाने का प्रयास कर रही है। कर्मचारी छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट में विसंगतियों को दूर करने व रिपोर्ट पंजाब की तर्ज पर लागू करने, पुरानी पेंशन योजना बहाल करने, डॉक्टर अपनी वेतन विसंगतियां व नॉन प्रैक्टिस अलाउंस में कई गई कटौती व इसे पुनः 25 प्रतिशत करने, पुलिस कर्मी अपनी वेतन पालिसी का युक्तिकरण करने, आउटसोर्स व ठेका कर्मचारी को नियमित करने तथा स्कीम व पार्ट टाइम वर्कर के लिए नीति बनाने आदि जायज़ मांगों को लेकर आंदोलन कर रही है। परन्तु सरकार इन पर कोई भी गौर नहीं कर रही है और कमिटियां गठित कर इनको टाल रही है।"

मौजूदा समय में राज्य भर के सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन की बहाली को लेकर आंदोलित हैं। बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आती है तो पुरानी पेंशन योजना को पुनः बहाल करेगी, आउटसोर्स व पार्ट टाइम कर्मियों के लिए नीति बनाएगी, कर्मचारियों को उनका देय समय रहते दिया जाएगा तथा रिक्त पड़े पदों पर भर्ती की जाएगी। परन्तु सरकार ने इन चार वर्षों में कर्मचारियों की किसी भी मांग पर आजतक गौर नहीं किया है और सरकार के इस कर्मचारी विरोधी व वादाखिलाफी के चलते कर्मचारियों के हर वर्ग में आक्रोश है और आंदोलनरत है। सरकार अब इन व्यापक आंदोलनों पर रोक लगाने के लिए इस तरह का भय दिखा रही है।

कर्मचारी संगठनों ने भी कहा कि सरकार उनके आंदोलन से डरकर तानाशाहीपूर्ण आदेश जारी कर इन आंदोलनों को दबाने का प्रयास कर रही है जिसमें सरकार कभी भी सफल नही होगी।

केंद्रीय मज़दूर संगठन सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) की हिमाचल राज्य इकाई ने सरकार चेताया है कि अगर कर्मचारियों का दमन हुआ, उनकी छुट्टियां बन्द की गईं व वेतन काटा गया,उनका निलंबन व निष्कासन हुआ या फिर किसी भी तरह का उत्पीड़न हुआ तो प्रदेश के मजदूर कर्मचारियों के समर्थन में सड़कों पर उतर जाएंगे व सरकार की तानाशाही का करारा जबाव देंगे।

सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा व महासचिव प्रेम गौतम ने कर्मचारियों के खिलाफ मुख्यमंत्री के बयान को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया है व यह लोकतंत्र विरोधी है। उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री अपने पद की गरिमा का ध्यान रखें व तानाशाही रवैया न दिखाएं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री व सरकार अपनी नालायकी को छिपाने व नवउदारवादी नीतियों को कर्मचारियों व आम जनता पर जबरन थोपने के उद्देश्य से ही तनाशहीपूर्वक रवैया अपना रहे हैं व उल-जलूल बयानबाजी कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को याद दिलाया है कि सन 1992 में इसी तरीके की बयानबाजी तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार ने की थी व कर्मचारियों पर तानाशाही "नो वर्क नो पे" क़ानून लादा था तो उक्त सरकार का हश्र सबको मालूम है। सरकार से खफ़ा होकर प्रदेश के हज़ारों कर्मचारियों के साथ ही मजदूर वर्ग हज़ारों की तादाद में सड़कों पर उतर गया था व शांता कुमार सरकार को चलता कर दिया था। उस वक्त गर्मियों की छुट्टियां काटने शिमला से निकले शांता कुमार दोबारा शिमला में मुख्यमंत्री के रूप में कभी वापसी नहीं कर पाए। अगले चुनाव में भाजपा दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाई थी। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी उसी नक्शे कदम पर आगे बढ़ रहे हैं जिस से भाजपा की दुर्गति होना तय है। इसका ट्रेलर उपचुनाव में सभी चारों सीटों में भाजपा की हार के तौर पर सामने आ चुका है।"

उन्होंने मुख्यमंत्री से अपना बयान वापस लेने व कर्मचारियों से माफी मांगने की मांग की है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री अनाप-शनाप बयानबाजी कर रहे हैं। मुख्यमंत्री द्वारा कर्मचारियों की छुट्टियों पर रोक लगाने व वेतन काटने का बयान देश में इमरजेंसी के दिनों की याद दिला रहा है जब लोकतंत्र का गला पूरी तरह घोंट दिया गया था।

उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की है कि वह सरकारी कर्मचारियों की वेतन आयोग संबंधी शिकायतों का निपटारा करें, ओल्ड पेंशन स्कीम बहाल करें, कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था पर पूर्ण रोक लगाएं। आउटसोर्स, ठेका प्रथा, एसएमसी, कैज़ुअल, पार्ट टाइम, टेम्परेरी, योजना कर्मी, मल्टी टास्क वर्कर के रूप में रोजगार के बजाए नियमित रोजगार दें। 

उन्होंने आगे कहा कि अगर सरकार इन समस्याओं का समाधान करने की पहलकदमी करेगी तो निश्चित तौर से कर्मचारियों को आंदोलन करने की आवश्यकता नहीं होगी।

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