NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
हिंदी की इस रात की सुबह कब होगी?
दरअसल, सवाल सिर्फ हिंदी का नहीं, बल्कि समूची भारतीय भाषाओं के स्वाभिमान और सम्मान का है। साथ ही यह संविधान के सम्मान से जुड़ा मसला भी। संविधान की जितनी अनदेखी और अवमानना भारत में होती है, उतनी दुनिया के किसी और देश में नहीं।
अनिल जैन
14 Sep 2020
भारतीय भाषा
फोटो साभार : पत्रिका

भाषा की गुलामी बाकी तमाम गुलामियों में सबसे बडी होती है। दुनिया में जो भी देश परतंत्रता से मुक्त हुए हैं, उन्होंने सबसे पहला काम अपने सिर से भाषाई गुलामी के गट्ठर को उतार फेंकने का किया है। यह काम रूस में लेनिन ने, तुर्की में कमाल पाशा ने, इंडोनेशिया में सुकर्णो ने और एशिया, अफ्रीका तथा लातिनी-अमेरिकी देशों के दर्जनों छोटे-बड़े देशों ने किया है। लेकिन भारत में जैसा भाषायी पाखंड जारी है, वैसा कहीं और देखने-सुनने में नहीं आता। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक गुलाम रहे देशों में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जो अपनी आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी भाषा के स्तर पर किसी भी मौजूदा गुलाम देश से ज्यादा गुलाम है।

इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और हास्यास्पद बात क्या हो सकती है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में फैसले अंगरेजी में सुनाए जाते हैं, जो आमतौर पर वादियों को समझ में नहीं आते, क्योंकि विदेशी भाषा की तासीर ही कुछ ऐसी है। जबकि इंसाफ का तकाजा यही है कि जो भी फैसला हो वह वादी की समझ में आना चाहिए। लेकिन होता यह है कि वादियों को उनके वकील ही बताते हैं कि वे मुकदमा हार गए हैं या जीत गए हैं। इस सिलसिले में करीब एक दशक पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि अंग्रेजी के बजाय हिंदी को अदालती कामकाज की आधिकारिक भाषा बनाया जाए। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उसका पक्ष जानना चाहा था। लेकिन सरकार ने गोलमोल जवाब देते हुए गेंद को सुप्रीम कोर्ट के पाले में ही डाल दिया था और याचिका खारिज हो गई थी।

सवाल सिर्फ न्यायपालिका के कामकाज का ही नहीं है। तमाम सरकारी और अर्द्ध सरकारी महकमों तथा लोकजीवन के अन्य क्षेत्रों में भी अंग्रेजी कुंडली मारकर बैठी हुई है। हकीकत यह भी है कि जब कभी हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के लिए कहीं कोई आवाज उठती है तो देश का शासक वर्ग यानी नौकरशाह, कारपोरेट क्षेत्र से जुड़े लोग, अभिजात्य वर्ग के राजनेता और कुछ बददिमाग अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी बुरी तरह परेशान हो उठते हैं। उन्हें अपनी इस लाडली भाषा के वर्चस्व के लिए खतरा दिखाई देने लगता है। अंग्रेजी का अंध हिमायती यह तबका चीख-चीख कर यह साबित करने की कोशिश करने लगता है कि अंग्रेजी ही देश की संपर्क भाषा है और उसके बगैर देश का काम नहीं चल सकता। बेशर्मी के साथ यह बेजा दलील भी दी जाती है कि यदि अंग्रेजी के प्रति नफरत का वातावरण बनाया गया तो यह देश टूट जाएगा। जबकि हकीकत यह है कि हिंदी और भारतीय भाषाओं के पक्षधरों का विरोध अंग्रेजी से नहीं होता है, बल्कि वे तो महज लोकजीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजी का दबदबा खत्म करने की मांग कर रहे होते हैं। लेकिन अंग्रेजी के बरक्स हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं की बात करने वालों को उसी तरह हिकारत से देखा जाता है जैसे कई यूरोपीय मुल्कों में काले लोगों को देखा जाता है। यह एक किस्म का भाषायी नस्लभेद है।

दरअसल, सवाल सिर्फ हिंदी का नहीं, बल्कि समूची भारतीय भाषाओं के स्वाभिमान और सम्मान का है। साथ ही यह संविधान के सम्मान से जुड़ा मसला भी। संविधान की जितनी अनदेखी और अवमानना भारत में होती है, उतनी दुनिया के किसी और देश में नहीं। संविधान में हिंदी को राजभाषा बनाया गया और कहा गया कि धीरे-धीरे सरकारी कामकाज से अंग्रेजी को हटाया जाए। लेकिन संविधान को लागू हुए भी लगभग सात दशक हो चुके हैं, मगर इस दौरान किसी भी सरकार ने संविधान के निर्देशानुसार अंग्रेजी की जगह हिंदी को स्थापित करने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ-साथ लोकजीवन के हर क्षेत्र में अंग्रेजी का रुतबा बढता गया।

यह हमारे देश की बदनसीबी है कि आजादी का सात दशक से ज्यादा का अरसा गुजर जाने के बाद भी भाषा के मामले में हम भारत के लोग आजाद नहीं हैं। संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बावजूद आजाद भारत में हिंदी को उसका उचित स्थान नहीं मिल सका। और तो और हिंदी को वह स्थान भी नहीं मिल सका, जो हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और संविधान निर्माताओं ने उसे प्रदान किया था।

हमारे संविधान की मंशा के मुताबिक कायदे से तो हिंदी को 1965 में ही केंद्र सरकार की भाषा बन जाना चाहिए था, लेकिन उसके काफी पहले ही दक्षिण के एक-दो राज्यों में हिंदी के विरोध में मामूली से उपद्रव होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह ऐतिहासिक आश्वासन दे डाला था कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी। नेहरू को दिवंगत हुए करीब छह दशक हो गए हैं, लेकिन इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला है कि हिंदी भले ही न थोपी जाए पर अंग्रेजी को देश पर क्यों थोपा जा रहा है? सवाल यह भी है कि अंग्रेजी क्यों अभी तक पटरानी बनी हुई है और हिंदी क्यों दासी बनी अपनी दुर्दशा पर विलाप कर रही है?

कोई माने या ना माने पर नेहरू के जमाने से लेकर आज तक किस्सा यही है कि भाषा के सवाल को राजनीति के तहखाने में डाल दिया गया है। डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे जिन-जिन लोगों ने हिंदी या भारतीय भाषाओं के सम्मान का सवाल उठाया, उनको या तो हिकारत से देखा गया या फिर पीछेदेखू करार देकर उनका उपहास उडाया गया। अब तो हालत यह हो गई है कि हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाने के लिए राजनीतिक स्तर पर कोई आवाज उठाने वाला ही नहीं है। लगभग सभी राजनीतिक दलों का आम कामकाज भी अंग्रेजी में ही होता है। यहां तक कि भारतीय संस्कृति को लेकर रात-दिन 'चिंतित’ रहने वाली भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के उसके अन्य सहोदर संगठनों की चिंता के दायरे में भी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को बचाने का सवाल कभी नहीं आता।

कुल मिलाकर सभी राजनीतिक दलों के एजेंडा से हिंदी का सवाल अब पूरी तरह गायब हो गया है। सारे राजनेताओं के लिए अब हिंदी महज नारेबाजी और भाषणबाजी यानी चुनाव प्रचार और वोट मांगने की भाषा बन कर रह गई है। कुल मिलाकर हिंदी को उसकी खोई हुई हैसियत लौटाने की राजनीति अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है। उसका स्थान अब हिंदी की भावुकता ने ले लिया है। यह भावुकता हिंदी भाषियों और हिंदी प्रेमियों को 'वह सुबह कभी तो आएगी’ की तर्ज पर तसल्ली देती रहती है कि कभी न कभी हिंदी के दिन बहुरेंगे। यह भावुकता सरकारी संसाधनों से होने वाली विश्व हिंदी सम्मेलनों जैसी नौटंकियों में पूरी शिद्दत से अपने घटिया स्वरूप में उभरकर सामने आती है, जिनमें तथाकथित साहित्यिक रुझान वाले कुछ राजनेता, कुछ नौकरशाह और सत्ता के गलियारों पैठ रखने वाले कुछ जुगाडू साहित्यकार तथा पत्रकार सरकारी पैसे पर विदेश का सैरसपाटा कर आते हैं।

अंग्रेजी का विरोध करने और हिंदी को उसकी खोई हुई जगह दिलाने के मकसद से राष्ट्रीय स्तर के जो सरकारी, अर्द्ध सरकारी और गैर सरकारी संस्थान बनाए गए हैं, उनके आचार-व्यवहार से खुशबू के झोंकें कम, बदबू के भभके ही ज्यादा उठते हैं। कहीं निकम्मापन है, तो कहीं दृष्टि का अभाव है और कहीं पदों व पैसे की नोंच-खसोट है। दरअसल, ये सारे संस्थान हिंदी के मवाद भरे जख्मों पर भिनभिनाती मक्खियों और मच्छरों की तरह हैं। लेकिन मवाद से भरे और बदबू मारते जख्मों को खुला छोडकर मक्खियों और मच्छरों को भगाने से भी कुछ नहीं हो सकता। जरूरत तो इस बात की है कि हिंदी भाषी और हिंदी अनुरागी इस जख्म के दर्द को अपने दिल में महसूस करें।

इस दर्द से ही कोई ऐसा कार्यक्रम बन सकता है या कोई ऐसा आंदोलन जन्म ले सकता है, जो हिंदी को उसकी वास्तविक और स्वाभाविक जगह दिला सकता है। कोई यह मानने की भूल न करें कि मौजूदा स्वार्थसनी और सत्तालोलुप राजनीति के चलते हिंदी कभी अपनी खोई हुई अस्मिता पा सकेगी। किसी को यह गलतफहमी भी नहीं पालना चाहिए कि आज नहीं तो कल देश को हिंदी की महिमा और महत्व स्वीकार करना ही पडेगा। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भूमंडलीकरण और बाजारवाद की जो विनाशकारी आंधी इस समय देश में बह रही है, इसमें हिंदी ही नहीं, दूसरी भारतीय भाषाएं भी सूखे पत्तों की तरह उड़ जाएगी और इन भाषाओं को लेकर चिंता करने वालों को पूरी तरह विदूषक बना दिया जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें :संस्कृत के मोह में रुक गया हिंदी का विकास

HINDI DIWAS
hindi
Sanskrit
urdu
Indian Languages
National language
Hindi as National Language
हिंदी दिवस

Related Stories

भोपाल के एक मिशनरी स्कूल ने छात्रों के पढ़ने की इच्छा के बावजूद उर्दू को सिलेबस से हटाया

अपनी भाषा में शिक्षा और नौकरी : देश को अब आगे और अनीथा का बलिदान नहीं चाहिए

हिंदी में नए विचार नहीं आ रहे हैं तो इसे बढ़ावा कैसे मिलेगा?

संस्कृत के मोह में रुक गया हिंदी का विकास

भाषा का सवाल: मैं और मेरा कन्नड़ भाषी 'यात्री-मित्र'

UP: हिंदी में फेल 8 लाख स्टूडेंट हमारी जीवन चिंतन का हिंदी से दूर हो जाने का रिजल्ट है !


बाकी खबरें

  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनाव: कांग्रेस ने इन महिलाओं को दिया है टिकट, जानिए क्यों अलग है इनके संघर्ष की कहानी
    13 Jan 2022
    प्रियंका गांधी ने डिजिटल संवाददाता सम्मेलन के माध्यम अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की है जिसमें विशेष रूप से 50 महिला उम्मीदवारों के नामों का उल्लेख किया गया है।
  • health
    सुहित के सेन
    पश्चिम बंगाल : तीसरी लहर के बीच राजनीति की वजह से नज़रअंदाज़ हो रही स्वास्थ्य व्यवस्था
    13 Jan 2022
    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक तरफ़ नाइट कर्फ़्यू लगाती हैं, मगर साथ ही गंगा सागर मेला को भी अनुमति दे देती हैं; ऐसे में कोविड से बचने के लिए उचित प्रबंधन होते नहीं दिख रहे हैं।
  • Guantanamo Bay
    ओलिवर सल्लेट
    ग्वांतानामो की विवादित जेल को हुए 20 साल
    13 Jan 2022
    क्यूबा में इस कुख्यात बंदी शिविर को 20 साल हो गए हैं। पिछले कई वर्षों से इसे बंद किये जाने की कई योजनाओं को ख़ारिज किया जाता रहा है। बंदियों के जीवन में पिछले दो दशकों में शायद ही कुछ बदलाव देखने को…
  • Berang goodrick
    संदीपन तालुकदार
    असम : बड़े-बड़े चाय बागानों वाले “बेहाली” में ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
    13 Jan 2022
    बेहाली के पास ज़िला अस्पताल की सुविधा तक नहीं है। बेहाली असम के कमज़ोर स्वास्थ्य तंत्र की गवाही देता है। यहां की कमज़ोर स्वास्थ्य सुविधाओं, खासतौर पर कोविड महामारी के दौर में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य…
  • CEL
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सरकार ने CEL को बेचने की कोशिशों पर लगाया ब्रेक, लेकिन कर्मचारियों का संघर्ष जारी
    13 Jan 2022
    यूनियन ने अपना प्रदर्शन जारी रखते हुए कहा है ‘जब तक कंपनी के विनिवेश का निर्णय "वापस नहीं ले लिया जाता है, उनका धरना प्रदर्शन जारी रहेगा।’ 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License