NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
अजय सिंह : "हर कविता सल्तनत के नाम एक बयान है...”
कवि-पत्रकार अजय सिंह की कविता में सांप्रदायिकता, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता, फासीवाद के ख़िलाफ़ बहुत तीखी नफ़रत है। इसलिए वह बहुत मुखर होकर बोलती है, कभी कभी सपाट बयानी की हद तक जाकर।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
05 Nov 2019
ajay singh

"मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं " वाकई अजय सिंह की कविता में करोड़ों लोग रहते हैं। देश ही नहीं दुनिया-जहान, सारा अवाम। ख़ासकर मेहनतकश, दलित, अल्पसंख्यक, स्त्री, बच्चे...सभी। उनके सुख-दुख, उनकी तकलीफ़ें। उनकी कविता में सांप्रदायिकता, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता, फासीवाद के ख़िलाफ़ बहुत तीखी नफ़रत है, विरोध है। इसलिए वह बहुत मुखर होकर बोलती है, कभी कभी सपाट बयानी की हद तक जाकर।

दुष्यंत कुमार के ही शब्दों में..."हर कविता (ग़ज़ल) अब सल्तनत के नाम एक बयान है। "

सच अजय सिंह के यहां प्रेम भी नितांत दैहिक या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि प्रतिरोध का ही एक जरिया है, राजनीतिक प्रतिरोध का जरिया। उनके लिए भाषा या कविता कला के विभिन्न रूपों को प्रकट करने का नहीं बल्कि हत्यारे को हत्यारा कहने का माध्यम है, हथियार है, तभी तो वह कहते हैं कि "हत्यारे को हत्यारा कहना/ भाषा के सही इस्तेमाल की पहली सीढ़ी है।"  

IMG-20191105-WA0015.jpg

ऐसे ही कड़ियल कवि, लेखक और पत्रकार अजय सिंह के सम्मान में गुलमोहर किताब, दिल्ली की ओर से सोमवार, 4 नवंबर को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान (जीपीएफ) में उनका एकल कविता पाठ हुआ। जिसमें उन्होंने करीब एक घंटा अपनी नई-पुरानी कविताएं सुनाईं और फिर उसपर वहां मौजूद लोगों ने चर्चा की।

कार्यक्रम की शुरुआत कवि-पत्रकार मुकुल सरल के स्वागत वक्तव्य से हुई। जिसमें उन्होंने अजय सिंह की कविता की पंक्ति "सुंदरता के दुश्मनों तुम्हारा नाश हो" का इस्तेमाल करते हुए कहा कि अजय सिंह की कविता न कमज़ोर का विलाप है, न किसी दुखियारे की बद्दुआ, बल्कि ये एक राजनीतिक वक्तव्य है जो सत्ता और शासक को सीधी चुनौती दे रहा है, चेतावनी दे रहा है। उनका यह कहना कि "हत्यारे को हत्यारा कहना/ भाषा के सही इस्तेमाल की पहली सीढ़ी है", वाकई इसकी सलाहियत, इसकी तमीज़ अभी हम जैसे बहुत कवि-लेखकों को सीखनी होगी।

कविताओं पर बातचीत में वरिष्ठ कवि-लेखकों के साथ अन्य सभी श्रोता शामिल हुए। सभी ने अजय सिंह की कविताओं की ख़ूबियों और ख़ामियों पर खुलकर चर्चा की।

दलित लेखक-चिंतक प्रोफेसर हेमलता महिश्वर ने कहा कि अजय सिंह की कविताओं की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ये कविताएं अपना सार्थक सामाजिक राजनीतिक हस्तक्षेप कर रही हैं। वह भी ऐसे वक्त में जबकि साहित्यकार दो खेमों में बंटे हैं। हालांकि ये दो खेमे हमेशा रहे हैं एक जो सत्ता के साथ होता है और एक समाज के साथ। समाज के साथ होना हमेशा कठिन होता है और अजय सिंह यही कठिन काम करते हैं।

वरिष्ठ कवि सविता सिंह ने कहा कि अजय सिंह के यहां कविता जीवन नहीं, जीवन ही कविता हो गईं हैं। कविता 'शिवकुमारी जी' का विशेष रूप से जिक्र करते हुए उन्होंने अजय की कविताओं के स्त्रीवादी दृष्टिकोण की सराहना की। इसके अलावा उन्होंने कहा कहा कि ये कविताएं सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे दु:स्वप्नों को संयोजित कर उसकी कोई प्रदर्शनी लगी हो। ये कविताएं दु:स्वप्नों की ही तस्वीरें हैं जिनमें कला है, हमारे समय का बिम्ब है।

अजय सिंह के करीबी दोस्त वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि अजय की कविताएं पढ़ते हुए कभी हमें लगता है कि हम कोई घोषणापत्र पढ़ रहे हैं। कोई विरोध प्रस्ताव पढ़ रहे हैं। कोई दस्तावेज़ पढ़ रहे हैं। ये एक रेटरिक (Rhetoric) है, जिसे अजय सिंह का आवेग कविता की शक्ल दे देता है। यह उनका गुण है। इसके अलावा इधर उनकी कविताओं में नया आयाम आया है जिसमें प्रेम-राजनीति, सुंदरता-राजनीति और क्रांति-प्रेम में कोई अंतर नहीं है। यह आयाम बहुत अच्छा है।

वरिष्ठ कहानीकार और समयांतर पत्रिका के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि वह मूलत: अजय सिंह को क्रांति का कवि मानते थे, लेकिन आज मालूम पड़ा कि वे प्रेम के भी कवि हैं। उनके मुताबिक अजय सिंह की कविता मूलत: आवेग की कविता है जिसमें अब आश्चर्यजनक रूप से निराशा, थकन, ठहराव, उदासी दिखाई दे रही है। शायद यह सब इस वजह से है कि जो बहुत कुछ होना था वह नहीं हुआ।

रंगकर्मी लोकेश जैन ने इन कविताओं के जरिये शब्दों से परे अर्थ और संवेदनाएं ग्रहण की। पत्रकार वीना को इन कविताओं में आशा के साथ लड़ने का औज़ार मिला। इस मौके पर महेंद्र मिश्र, अखिलेश कुमार, धीरेश सैनी, विप्लव राही, अरीज सैयद, शोभा सिंह, विपिन चौधरी, आशुतोष कुमार, वंदना, राज वाल्मीकि, रविंद्र पटवाल, कृष्ण, श्रीराम शिरोमणि, सईद अय्यूब, सफाई कर्मचारी आंदोलन के संयोजक और रेमन मैग्सेसे अवार्ड विजेता बैजवाड़ा विल्सन, दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय इत्यादि भी मौजूद रहे। जिनमें से ज़्यादातर ने अपनी बात रखी।

इस पूरी बातचीत में कई तरह की राय सामने आई लेकिन सभी इस बात पर एकमत थे कि अजय सिंह की कविताएं हमारे समय की बेहद साहसी और बेहद ज़रूरी कविताएं हैं। समय पर एक अनिवार्य हस्तक्षेप।

IMG-20191105-WA0016.jpg

ऐसा नहीं कि अपनी इन ख़ूबियों और ख़ामियों से खुद अजय सिंह परिचित नहीं। बल्कि बख़ूबी परिचित हैं, तभी वे दुनिया छोड़ चुके अपने कवि-लेखक दोस्तों को याद करते हुए लिखी गईं सात शोक कविताओं में खुद को भी शामिल करते हुए अपना मूल्यांकन या खुद को याद कुछ इस तरह करते हैं-

"यहां दफ़न है अजय सिंह
कलमघिस्सू कवि
कलमघिस्सू पत्रकार
हालांकि वह ढंग का न कवि बन पाया न पत्रकार
न कवियों की सूची में उसका नाम रहा न पत्रकारों की
वह अपने को लेखक व राजनीतिक विश्लेषक भी कहता था
इस मामले में भी वह फिसड्डी रहा...
...
लोगों के ज्ञानचक्षु खोलने वाला
बात-बात पर सलाह देने वाला मास्टर भी था
लेकिन सब आधा-अधूरा
…
जब वह अपने क़ब्र की ओर एक-एक क़दम बढ़ रहा था
रास्ते मे उसे अचानक एक परी मिली
न जाने किस लोक से भटकती हुई धरती पर आ गयी थी
पता नहीं क्यों उस परी में उसे अपना खोया हुआ अक्स दिखायी पड़ा
परी ने उसे रोका और पूछा: कहां जा रहे हो ?
जवाब मिला: अपनी क़ब्र की ओर !
परी ने कहा:  अरे, इतनी जल्दी !
वहां तो देर-सबेर हर किसी को जाना है
तुम्हें अभी कई काम करने हैं
और उसने बर्तोल्त ब्रेख्त़ का एक डाॅयलाग मारा: तुम अपनी आखिरी सांस तक नयी शुरूआत कर सकते हो !
और यह कह कर गायब हो गयी
उसने परी को बहुत ढूंढा लेकिन पता नहीं वह किधर उड़न-छू हो गयी थी
क़ब्र में लेटा हुआ वह सोच रहा है
वह भी उस परी के साथ उड़न-छू हो गया होता तो कितना अच्छा रहता
उसने अपनी क़ब्र के पत्थर पर  लिखवाया है :  
काॅमरडो और दोस्तो, तुम्हारे कल के लिए
मैंने अपना आज कुर्बान कर दिया !
वह मुस्करा रहा है लोग इस जुमले को पढ़ कर सोचते होंगे
अजय सिंह ज़िंदगी भर सिरफिरा ही रहा !”


अजय सिंह इस कविता में खुद अपनी कड़ी आलोचना कर रहे हैं और ज़माने पर तंज़ भी। कुछ को इसमें निराशा-हताशा दिखेगी, कुछ को एक बेदम बूढ़ा जो अब रुखसती की तैयारी कर इमोशनल हुआ जा रहा है, हालांकि हम इसे कुछ इस तरह ले सकते हैं। जैसे ग़ालिब ने कहा-

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

थी ख़बर गर्म कि 'ग़ालिब' के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ

और फिर वही कि...

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता


कार्यक्रम में अजय सिंह की कविताओं का सफ़र 'क़दीमी क्रबिस्तान' से शुरू हुआ और दोस्तो/कामरेडो को याद करते हुए, वह सुंदर औरत, शिवकुमारी जी से होता हुआ 'खिलखिल, हमारी प्यारी खिलखिल' पर जाकर ख़त्म हुआ।  उनकी कुछ चुनिंदा कविताओं के ख़ास हिस्से आपके लिए...

हिंदी के पक्ष में ललिता जयंती एस रामनाथन का मसौदा प्रस्ताव : एक संक्षिप्त बयान

हिंदी हिंदू हुई जा रही है
हिंदी न हुई
हिंदू महासभा हो गई
जिसका सरगना मदन मोहन मालवीय था
सारी पढ़ाई-लिखाई हिंदी को
हिंदू बनाने
और फिर उसे हिंदुस्तान में तब्दील
कर देने पर तुली है
गहरी चिंता की बात है
हिंदी को हिंदू होने से बचाना है
तो उसे रामचन्द्र शुक्ल से बचाना होगा
और उन्हें पाठ्यक्रम से बाहर करना होगा
और नये सिरे से लिखना होगा
हिंदी साहित्य का इतिहास
...
आधुनिक हिंदी का निर्माण
बाभनों कायस्थों राजपूतों बनियों ने नहीं
मुसलमानों ने किया
मुसलमानों ने ही
हिंदी को नई चाल में ढाला
जो मीर ग़ालिब नज़ीर को
हिंदी न कहे
समझो
वह हिंद से बाहर हुआ

प्रेम एक संभावना

वह दौड़ती-दौड़ती आती है
दौड़ती-दौड़ती प्रेम करती है
दौड़ती-दौड़ती चली जाती है
…लेकिन जब ज़माने की कड़ी मार खाये
उस व्यक्ति को
सड़क पार करनी हो
या सीढ़ियाँ चढ़ानी-उतारनी हों
तब उस दौड़ती हुई औरत का प्रेम देखिए
वह आहिस्ता से हाथ पकड़
सड़क पार कराती है।


और अंत में वही कविता जिसे आज पुरज़ोर आवाज़ में पढ़ा जाने की ज़रूरत हर किसी ने महसूस की-

 

‘हत्यारा सिर्फ़ हत्यारा होता है
बाक़ी उसकी अन्य पहचान
हत्या के गुनाह को
छिपाने के लिए होती है...
हत्यारे को हत्यारा कहना
भाषा के सही इस्तेमाल की
पहली सीढ़ी है।’
…

hindi poetry
hindi poet
Ajay Singh
Communalism
Brahminism
patriarchy
Fascism
Mukul Saral
अजय सिंह का कविता पाठ

Related Stories

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

फ़ासीवादी व्यवस्था से टक्कर लेतीं  अजय सिंह की कविताएं

देवी शंकर अवस्थी सम्मान समारोह: ‘लेखक, पाठक और प्रकाशक आज तीनों उपभोक्ता हो गए हैं’

गणेश शंकर विद्यार्थी : वह क़लम अब खो गया है… छिन गया, गिरवी पड़ा है

बना रहे रस: वे बनारस से उसकी आत्मा छीनना चाहते हैं

सफ़दर: आज है 'हल्ला बोल' को पूरा करने का दिन

सूर्यवंशी और जय भीम : दो फ़िल्में और उनके दर्शकों की कहानी

अदम गोंडवी : “धरती की सतह पर” खड़े होकर “समय से मुठभेड़” करने वाला शायर

तिरछी नज़र: 'नींद क्यों रात भर नहीं आती'


बाकी खबरें

  • bihar
    अनिल अंशुमन
    बिहार शेल्टर होम कांड-2’: मामले को रफ़ा-दफ़ा करता प्रशासन, हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
    05 Feb 2022
    गत 1 फ़रवरी को सोशल मीडिया में वायरल हुए एक वीडियो ने बिहार की राजनीति में खलबली मचाई हुई है, इस वीडियो पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान ले लिया है। इस वीडियो में एक पीड़िता शेल्टर होम में होने वाली…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    सत्ता में आते ही पाक साफ हो गए सीएम और डिप्टी सीएम, राजनीतिक दलों में ‘धन कुबेरों’ का बोलबाला
    05 Feb 2022
    राजनीतिक दल और नेता अपने वादे के मुताबिक भले ही जनता की गरीबी खत्म न कर सके हों लेकिन अपनी जेबें खूब भरी हैं, इसके अलावा किसानों के मुकदमे हटे हो न हटे हों लेकिन अपना रिकॉर्ड पूरी तरह से साफ कर लिया…
  • beijing
    चार्ल्स जू
    2022 बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक के ‘राजनयिक बहिष्कार’ के पीछे का पाखंड
    05 Feb 2022
    राजनीति को खेलों से ऊपर रखने के लिए वो कौन सा मानवाधिकार का मुद्दा है जो काफ़ी अहम है? दशकों से अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने अपनी सुविधा के मुताबिक इसका उत्तर तय किया है।
  • karnataka
    सोनिया यादव
    कर्नाटक: हिजाब पहना तो नहीं मिलेगी शिक्षा, कितना सही कितना गलत?
    05 Feb 2022
    हमारे देश में शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, फिर भी लड़कियां बड़ी मेहनत और मुश्किलों से शिक्षा की दहलीज़ तक पहुंचती हैं। ऐसे में पहनावे के चलते लड़कियों को शिक्षा से दूर रखना बिल्कुल भी जायज नहीं है।
  • Hindutva
    सुभाष गाताडे
    एक काल्पनिक अतीत के लिए हिंदुत्व की अंतहीन खोज
    05 Feb 2022
    केंद्र सरकार आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार को समर्पित करने के लिए  सत्याग्रह पर एक संग्रहालय की योजना बना रही है। इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के उसके ऐसे प्रयासों का देश के लोगों को विरोध…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License