NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल फिर आए दक्षिणपंथियों के निशाने पर
भारतीय विदेश मंत्रालय में पासपोर्ट और वीजा डिवीजन के काउंसलर को शिकायत दर्ज कराकर विलियम डेलरिम्पल का वीजा रद्द करने और उन्हें भारत छोड़ने का निर्देश देने की मांग की गई है।
यूसुफ़ किरमानी
26 Sep 2020
विलियम डेलरिम्प
विलियम डेलरिम्प। फोटो साभार :  सोशल मीडिया

करीब एक महीने की चुप्पी के बाद जाने-माने अंतरराष्ट्रीय इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल पर दक्षिणपंथियों ने फिर से निशाना साधा है। भारतीय विदेश मंत्रालय में पासपोर्ट और वीजा डिवीजन के काउंसलर को शिकायत दर्ज कराकर विलियम डेलरिम्पल का वीजा रद्द करने और उन्हें भारत छोड़ने का निर्देश देने की मांग की गई है। इस बार मामला गंभीर है।

पत्रकार से लेखक बने विलियम डेलरिम्पल स्कॉटिश नागरिक हैं लेकिन उन्हें भारत से इतना प्यार है कि उनका ज्यादातर समय भारत में ही बीतता है। वह दिल्ली में रहते हैं। “द व्हाइट मुगल्स”, “द लास्ट मुगल” और “द अनारकी” (The Anarchy) जैसी बेस्ट सेलर किताबों के लिए मशहूर विलियम डेलरिम्पल का ज्यादातर लेखन मुगल काल को लेकर है। उन्होंने 1857 के गदर पर भी अपनी कलम चलाई है। उनकी कई किताबों को तमाम अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और अंग्रेजी साहित्य के बड़े सम्मान मिल चुके हैं।

क्या है पूरा मामला

एक लेखिका और सुप्रीम कोर्ट में वकील मोनिका अरोड़ा ने 23 सितंबर को ट्वीट कर बताया कि उन्होंने विदेश मंत्रालय के वीजा विभाग में इतिहासकार विलियम डेल रिम्पल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। अंग्रेज़ी में किए इस ट्वीट में आरोप लगाया गया है कि विलियम डेलरिम्पल जो वामपंथी इतिहासकार हैं वे भारत के आंतरिक मामलों में लगातार दखल दे रहे हैं। वह सार्वजनिक रूप से बयान देते हैं, इंटरव्यू देते हैं, जिनमें भारत के राजनीतिक और लोकतांत्रिक स्थिति पर चिन्ता जताई जाती है। उन्होंने सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के खिलाफ बयान दिए और इसके खिलाफ माहौल बनाया। विलियम डेलरिम्पल के लेख और बयान भारतीय सम्प्रभुता और एक चुनी हुई सरकार के खिलाफ हैं।

Monika Arora Tweet.jpeg

इसी शिकायत में मोनिका अरोड़ा यह उल्लेख करना नहीं भूलीं कि देश में जब सीएए और एनआरसी के विरोध में आंदोलन चल रहे थे तो इसका विरोध करने वाले कुछ विदेशी नागरिकों को किस तरह भारत से डिपोर्ट कर दिया गया था।

Monika Arora.jpg

मोनिका अरोड़ा। फोटो साभार : सोशल मीडिया

कौन हैं मोनिका अरोड़ा

मोनिका अरोड़ा सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं और उनके सोशल मीडिया अकाउंट को देखने से पता चलता है कि वह हिन्दूवादी राजनीतिक संगठनों के नफ़रत भरे संदेशों, विवादास्पद नेताओं के बयानों को प्रसारित करने में आगे-आगे रहती हैं। आरएसएस और मोदी सरकार का विरोध करने वालों को वह "अर्बन नक्सल" कहकर संबोधित करती हैं।

उन्हें और ठीक से जानने के लिए दो महीने पहले हुई घटना को जानना होगा। मोनिका अरोड़ा समेत तीन लेखिकाओं ने दिल्ली के दंगों पर अंग्रेज़ी में एक किताब लिखी, जिसका नाम है – Delhi Riots 2020; The Untold Story यानी दिल्ली के दंगे 2020 : एक अनकही कहानी। इस किताब को जाने-माने ब्लूम्सबरी प्रकाशन ने छापने की घोषणा की थी। लेकिन जनसत्ता की 22 अगस्त को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक इस किताब को ब्लूम्सबरी ने ना छापने का फैसला किया।

दरअसल, इस किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा, सोनाली चितलकर और प्रेरणा मल्होत्रा ने इसकी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए एक प्री- लान्च कार्यक्रम अगस्त में रखा था। लेकिन जैसे ही प्री-लांच का शोर मचा तो देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों ने ब्लूम्सबरी की इस बात के लिए आलोचना की कि वह देश में नफरत फैलाने वाली किताब छापने जा रहा है। यह विरोध इतना बढ़ा कि ब्लूम्सबरी ने इस किताब को न छापने की घोषणा की। बहरहाल, बाद में गरुण प्रकाशन ने इस किताब को छापने की घोषणा कर दी। किताब ऐमजॉन पर उपलब्ध है और गरूण प्रकाशन के मुताबिक किताब की डिलीवरी शुरू हो चुकी है, किताब बेस्टसेलर है। लेखिका मोनिका अरोड़ा ने भी दावा किया है कि इस किताब की जबरदस्त बिक्री हो रही है। गरुण प्रकाशन इस किताब को हिन्दी में भी लाने वाला है।

विलियम डेलरिम्पल निशाने पर क्यों

ब्लूम्सबरी ने जब मोनिका अरोड़ा की विवादास्पद किताब को न छापने की घोषणा की तो लगभग उसी समय इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल की ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आगमन और पैर जमाने के घटनाक्रम पर ‘द अनारकी’ किताब आने वाली थी। इस किताब को ब्लूम्सबरी ने छापा है। लेकिन किताब छपकर आने से पहले ही पूरी दुनिया में इसकी धूम मच गई। ब्लूम्सबरी को किताब के आने से पहले ही रिकॉर्ड बिक्री के आर्डर मिल गए। किताब छपकर आने के दस दिन बाद ही दुनिया के बेस्ट सेलर में इसका नाम आ गया। विदेशी मीडिया में इसकी खूब चर्चा रही।

समझा जा रहा है कि मोनिका अरोड़ा ने अपनी किताब न छापने का बदला लेने के लिए ब्लूम्सबरी के अलावा विलियम डेलरिम्पल, लेखक आतिश तसीर, एक्टिविस्ट नंदिनी सुन्दर, पत्रकार साकेत गोखले, आरफा खानम शेरवानी, कवयित्री मीना कंडास्वामी की शिकायत दिल्ली पुलिस से की। द प्रिंट वेबसाइट की 3 सितम्बर की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोनिका अरोड़ा ने शिकायत में कहा कि इनके दबाव में आकर ब्लूम्सबरी ने उनकी किताब छापने से मना कर दिया। ब्लूम्सबरी प्रकाशक के पास मेरी किताब की पीडीएफ है, जिसे वह लीक कर सकता है। मोनिका अरोड़ा ने कुछ न्यूज पोर्टल के खिलाफ भी यही आरोप लगाया कि उनके दबाव पर ब्लूम्सबरी ने उनकी किताब प्रकाशित नहीं की। दिल्ली पुलिस इस अजीबोगरीब शिकायत पर क्या कार्रवाई करती, उसकी समझ में नहीं आया। मोनिका अरोड़ा की इस शिकायत को दिल्ली के झंडेवालान (संघ कार्यालय) से भी समर्थन नहीं मिला। इसलिए मामला लगभग दब गया।

दो महीने बाद चुप्पी क्यों टूटी?

दक्षिणपंथियों की टोली दो महीने तक चुप रही लेकिन ठीक दो महीने बाद पूरी तैयारी के साथ इस बार सिर्फ इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल को निशाना बनाते हुए शिकायत विदेश मंत्रालय में दर्ज कराई गई। दरअसल, दिल्ली के दंगों पर विवादास्पद किताब होने और सबकुछ एक पक्षीय लिखे जाने के बावजूद बाजार में इस किताब की चर्चा नहीं है। समीक्षक भी इसे तरजीह नहीं दे रहे हैं। एक भी अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट ने इस किताब की समीक्षा नहीं छापी है। संघ और बीजेपी की ओर से भी इसका प्रचार नज़र नहीं आया है। समझा जाता है कि अब मार्केटिंग रणनीति के तहत विलियम डेलरिम्पल का नाम नकारात्मक तरीके से घसीटकर उसके सहारे इस किताब की नैया पार लगाने की तैयारी की गई है। मोनिका अरोड़ा की ताजा शिकायत को सिर्फ दक्षिणपंथी पोर्टलों ने महत्व दिया है।

तीन दिन गुजरने और इस रिपोर्ट के प्रकाशन के अंतिम क्षणों तक इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने मोनिका अरोड़ा की ताजा शिकायत का संज्ञान तक नहीं लिया। विलियम अपने कार्यक्रमों और वेबिनार के बारे में लगातार ट्वीट कर रहे हैं लेकिन मोनिका अरोड़ा की शिकायत पर उन्होंने कुछ नहीं कहा है।

छह साल से देश में भाजपा की सरकार है। अभी तक संघ या भाजपा के किसी भी पदाधिकारी ने विलियम डेलरिम्पल पर किसी तरह का कोई आरोप नहीं लगाया है। विलियम ऐसे लिटरेरी फेस्टिवल्स में भी पहुंचे, जो विवाद का विषय बने लेकिन विलियम का उन विवादों से कभी कोई नाता नहीं रहा। जाने-माने लेखक सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन को लेकर भारत में तमाम विवाद हुए लेकिन उसमें भी विलियम डेलरिम्पल का नाम नहीं आया। देखना है कि इस बार दक्षिणपंथी गैंग उन्हें भारत से निकलवाने में कामयाब होता है या नहीं।

कहीं से वामपंथी नहीं हैं

दक्षिणपंथी खेमा जिस तरह विलियम डेलरिम्पल को वामपंथी साहित्यकार बता रहा है, वह भी सच नहीं है। दिल्ली में रह रहे विलियम डेलरिम्पल ने अपने किसी भी इंटरव्यू या लेख में किसी भी रूप में इस तरह का संकेत नहीं दिया। मुगलिया सल्तनत के बनने और बिगड़ने पर लिखी गई उनकी किसी भी किताब में इस तरह के संकेत नहीं मिलते। खुद भी विलासितापूर्ण जीवन जीने वाले विलियम डेलरिम्पल ने अपनी किताबों में कई मुगल बादशाहों और बेगमों के विलासितापूर्ण जीवन का खासा बखान किया है। अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की आड़ में भारत को जिस तरह बर्बाद किया, उसका जिक्र उनकी ताजा किताब द अनारकी (The Anarchy) में है, जो कहीं से भी वामपंथी विचार नहीं है। उसे उनका भारतीय प्रेम कहना ज्यादा ठीक रहेगा। भारत के जाने-माने दो महान इतिहासकारों प्रो. इरफान हबीब और प्रो. रोमिला थापर ने भी कभी विलियम डेलरिम्पल का जिक्र वामपंथी इतिहासकार के रूप में नहीं किया, बल्कि ये कहना चाहिए कि इनकी नजर में विलियम का काम कहीं ठहरता ही नहीं है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

William Dalrymple
Indian Ministry of External Affairs
Rightists
Delhi riots
Delhi Violence
Monika Arora

Related Stories

उमर खालिद पर क्यों आग बबूला हो रही है अदालत?

दिल्ली दंगा : अदालत ने ख़ालिद की ज़मानत पर सुनवाई टाली, इमाम की याचिका पर पुलिस का रुख़ पूछा

जहांगीरपुरी हिंसा : अब 'आप' ने मुख्य आरोपी अंसार को 'बीजेपी' का बताया

मुस्लिम विरोधी हिंसा के ख़िलाफ़ अमन का संदेश देने के लिए एकजुट हुए दिल्ली के नागरिक

दिल्ली हिंसा: उमर ख़ालिद के परिवार ने कहा ज़मानत नहीं मिलने पर हैरानी नहीं, यही सरकार की मर्ज़ी है

दिल्ली हिंसा में पुलिस की भूमिका निराशाजनक, पुलिस सुधार लागू हों : पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह

दिल्ली दंगों के दो साल: इंसाफ़ के लिए भटकते पीड़ित, तारीख़ पर मिलती तारीख़

हेट स्पीच और भ्रामक सूचनाओं पर फेसबुक कार्रवाई क्यों नहीं करता?

दिल्ली हिंसा मामले में पुलिस की जांच की आलोचना करने वाले जज का ट्रांसफर

अदालत ने फिर उठाए दिल्ली पुलिस की 2020 दंगों की जांच पर सवाल, लापरवाही के दोषी पुलिसकर्मी के वेतन में कटौती के आदेश


बाकी खबरें

  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध
    02 Feb 2022
    पिछले दिनों झारखंड सरकार के कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रदेश के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों की नियुक्तियों के लिए भोजपुरी, मगही व अंगिका भाषा को धनबाद और बोकारो जिला की स्थानीय भाषा का दर्जा…
  • ukraine
    पीपल्स डिस्पैच
    युद्धोन्माद फैलाना बंद करो कि यूक्रेन बारूद के ढेर पर बैठा है
    02 Feb 2022
    मॉर्निंग स्टार के संपादक बेन चाकों लिखते हैं सैन्य अस्थिरता बेहद जोखिम भरी होती है। डोंबास में नव-नाजियों, भाड़े के लड़ाकों और बंदूक का मनोरंजन पसंद करने वाले युद्ध पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ है।…
  • left candidates
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल
    02 Feb 2022
    “…वामदलों ने ये चुनौती ली है कि लूट-खसोट और उन्माद की राजनीति के खिलाफ एक ध्रुव बनना चाहिए। ये ध्रुव भले ही छोटा ही क्यों न हो, लेकिन इस राजनीतिक शून्यता को खत्म करना चाहिए। इस लिहाज से वामदलों का…
  • health budget
    विकास भदौरिया
    महामारी से नहीं ली सीख, दावों के विपरीत स्वास्थ्य बजट में कटौती नज़र आ रही है
    02 Feb 2022
    कल से पूरे देश में लोकसभा में पेश हुए 2022-2023 बजट की चर्चा हो रही है। एक ओर बेरोज़गारी और गरीबी से त्रस्त देश की आम जनता की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं, तो
  • 5 election state
    रवि शंकर दुबे
    बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन
    02 Feb 2022
    पूरा देश भारत सरकार के आम बजट पर ध्यान लगाए बैठा था, खास कर चुनावी राज्यों के लोग। लेकिन सरकार का ये बजट कल्पना मात्र से ज्यादा नहीं दिखता।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License