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भारत
राजनीति
बीच बहस: राष्ट्रपति कोविंद का मंदिर निर्माण में चंदा देना कितना उचित, कितना अनुचित?
एक व्यक्ति के तौर पर रामनाथ कोविंद अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए चाहे पांच रुपये दें या पांच लाख रुपये। यह सब उनका व्यक्तिगत मामला है। सवाल यहां है कि राष्ट्रपति होने के नाते क्या उन्हें मंदिर निर्माण के लिए दान करना चाहिए?
अजय कुमार
17 Jan 2021
कोविंद

एक धर्मनिरपेक्ष देश से सबसे न्यूनतम उम्मीद क्या हो सकती है? यह कि देश के प्रतिनिधि बिना किसी दबाव में कम से कम ऐसे काम ना करें जो संविधान में दर्ज धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के खिलाफ जाते हों।

एक व्यक्ति के तौर पर रामनाथ कोविंद अयोध्या मंदिर निर्माण के लिए चाहे पांच रुपये दें या पांच लाख रुपये। यह सब उनका व्यक्तिगत मामला है। उनके और उनकी आस्था से जुड़ा इलाका है। लेकिन सवाल यहां है कि राष्ट्रपति होने के नाते क्या उन्हें पांच लाख एक सौ रुपये का दान मंदिर निर्माण में करना चाहिए?

क्या भारत सरकार का सबसे ऊंचा प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें दान देना चाहिए था? क्या भारतीय कार्यपालिका का अध्यक्ष होने के नाते उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी व्यक्तिगत तौर भी आस्थावान जीवन शैली को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए या वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए जिसकी वकालत भारतीय संविधान में दर्ज नीति निदेशक तत्व भी करते हैं।

इन सारे सवालों का जवाब होगा कि राष्ट्रपति कोविंद का राष्ट्रपति होने के नाते मंदिर निर्माण के लिए चंदा देने का काम संविधान के मूल्यों के खिलाफ जाता है। राष्ट्रपति नामक संस्था और पद के द्वारा अपनाई जाने वाली संवैधानिक जिम्मेदारी के खिलाफ जाता है। 

अब यह कोई ऐसी बात नहीं है। जिसके बारे में स्वयं राष्ट्रपति को ना पता हो। इसके बारे में राष्ट्रपति से सभी तरह के जागरूक लोगों को जानकारी है। सबसे दुख भरी बात यह है कि मौजूदा समाज में हिंदुस्तान जिस माहौल में जी रहा है, उस माहौल में अगर भारत का सर्वोच्च  प्रतिनिधि ऐसा कोई कदम उठाता है तो उस पर कोई बात नहीं होती। सब उसे चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। जबकि ऐसे मामलों पर कठोर नागरिक आलोचना की जरूरत होती है। अब तो सरकारी प्रतिनिधियों और संस्थाओं द्वारा उठाए जाने वाले ऐसे सारे कदम बिल्कुल नॉर्मल हो चुके हैं। भारत जैसे सपने के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही है।

राष्ट्रपति द्वारा मंदिर निर्माण के किए दिया गया पांच लाख रुपये का दान हममें से बहुतों को बहुत मामूली लगता होगा। उन्हें लगता होगा कि बेवजह इसे तूल दिया जा रहा है। लेकिन जब हम एक बड़े फलक पर राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद के बारे में सोचते हैं तो यह कदम कहीं से भी उचित नहीं लगता। बल्कि भविष्य के लिए बहुत घातक दिखता है। इसी संदर्भ में सच की नब्ज़ पकड़ती हुए मशहूर कवि अशोक वाजपेयी की सुंदर कविता है -हमारी बनाई दुनिया नष्ट होती/हमारे बाद/वह नष्ट होती है/हमारे ही सामने धीरे धीरे/और कई बार ऐसे कि/हम समझ नहीं पाते कि वह नष्ट हो रही है।

साल 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राम मंदिर बनकर तैयार हो जाने का अनुमान है। राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने 39 महीने में राम मंदिर बन जाने का ऐलान किया है। इसके लिए चंदा जुटाने अभियान पूरे देश भर में शुरू हो गया है। राष्ट्रपति कोविंद के साथ भाजपा के कई बड़े नेताओं ने अंशदान कर चंदा जुटाने अभियान की शुरुआत कर दी है।

तकरीबन 42 दिनों में करीब पांच लाख गांवों के 12 करोड़ लोगों से सम्पर्क साधने की योजना है। भाजपा से जुड़े तमाम तरह के संगठन जैसे कि उसका पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके अनुषांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल सबने चंदा जुटाने अभियान के लिए पूरे देश भर में रैलियां करनी शुरू कर दी हैं।

यानी भगवा झंडा लहराते हुए चंदे वाली रसीद लेकर कई सारे कार्यकर्ता पूरे देश भर में घूमने वाले हैं। अगर कार्यकर्ताओं की माने तो सबका कहना है कि इस अभियान का मकसद यही है कि सबको लगे कि मंदिर निर्माण में उनकी भी भागीदारी हुई है। लेकिन थोड़ी सी पारखी नजर फिरा कर देखें तो बात यह है कि मंदिर निर्माण के नाम पर देश भर से बड़ा चंदा इकट्ठा हो जाए, देश भर में आस्था के नाम पर राजनीतिक संदेश पहुंच जाए और ऐन चुनावी साल 2024 से पहले मंदिर निर्माण पूरा कर हिंदू बहुसंख्यक आबादी के बीच इसका चुनावी फायदा भी ले लिया जाए।

और इसकी शुरुआत राष्ट्रपति कोविंद और भाजपा के बड़े नेताओं द्वारा की जा चुकी है। एक वक्त के लिए सोचिए कि अगर यही अभियान भारत जैसे देश में मस्जिद बनाने के नाम पर हो जाए तो उसे क्या नाम दिया जाएगा? आप सब समझदार हैं। ऐसे अभियानों के अंदर छुपे अर्थों को आसानी से समझ सकते हैं। यह समझते हुए यह भी पूछ सकते हैं कि पूरे देश भर में ऐसे सांस्कृतिक अभियान गरीबी हटाने के नाम पर क्यों नहीं होते? शिक्षा, रोजगार और सेहत के नाम पर क्यों नहीं होते? यह सब कुछ धर्म के नाम पर ही क्यों होता है? राष्ट्रपति कोविंद ने कोरोना के दौरान नंगे पैर चलकर अपने गांव देहात जाने के लिए मजबूर लोगों के लिए क्या किया? क्या ठीक ऐसे ही अभियान की शुरुआत सांस्कृतिक संगठनों ने ऐसे समय पर की? आपको जवाब मिलेगा। बिल्कुल नहीं। 

यह सब लोग उस भगवान को बचाने में लगे हैं, जिसे आस्था मानती है कि भगवान से ज्यादा शक्तिशाली कोई नहीं। उस राम मंदिर के लिए पूरे देश भर में अभियान करेंगे, जिस पर उनकी आस्था का कहना है कि राम हर मन के मंदिर में बसे हुए हैं। अगर किसी भक्त के आंखों पर आस्था के नाम पर पट्टी बांध दी जाए तो इसका साफ मतलब है कि भक्त और भगवान के बीच का रिश्ता किसी तीसरे ने आकर तोड़ दिया है।

हिंदू धर्म में निचली जातियों के साथ ऊंची जातियों ने सदियों से भगवान को लेकर यही मान्यता गढ़ी। पुजारियों पंडितों से लेकर तमाम तरह की मठाधीशों ने यह संस्कृति बना दी कि अगर कोई भगवान को मानता है, धर्म को मानता है तो उन्हें उन कर्मकांड को भी मानना पड़ेगा जिसका निर्धारण ऊंची जातियों ने भगवान का दूत होने के नाते किया है। भगवान द्वारा ऊंचा दर्जा मिलने की वजह से किया है। सार्वभौमिक प्रथा की तौर पर मौजूद इस तरह के घनघोर अन्याय और भेदभाव को संविधान के नियम और कानूनों ने खत्म किया। उसी संविधान के सहारे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की पीढ़ियों ने वह लड़ाई लड़ी होगी जिसकी बदौलत आज वह भारत के राष्ट्रपति हैं। अफसोस केवल चुनावी राजनीति में नंबर बनाने के मुहिम के चलते उन्होंने बड़े लंबे दौर से चली आ रही न्याय की राजनीति को चंदा देकर एक झटके में खारिज कर दिया।

दलित समुदाय के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण ऊंची जातियों का वर्चस्व रहा है। ऊंची जातियों के बनाए गए नियम और कानून रहे हैं। इसलिए दलित समुदाय की तरफ से एक गुस्सा हमेशा रहता है कि अगर वह फैसले लेने वाले पदों पर होते तो ठीक वैसे ही कदम नहीं उठाते जो अभी तक उठाया जाते आ रहे हैं। जो ऊंची जातियों का वर्चस्व स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस बड़ी और जायज लड़ाई में अगर राष्ट्रपति कोविंद चाहते तो संवैधानिक मर्यादाओं का इस्तेमाल कर बहुत बड़ा हस्तक्षेप कर सकते थे। लेकिन उन्होंने वही किया जो धर्म और चुनावी राजनीति का गठजोड़ आज तक करते आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी राम मंदिर बनवाने का जिम्मा सीधे सरकार को नहीं दिया। बल्कि इसके लिए एक ट्रस्ट को जिम्मेदारी दी। तीनों सेनाओं के अध्यक्ष, देश के मुखिया और किसी भी तरह के भारतीय सरकारी कामकाज पर मुहर लगाने वाले राष्ट्रपति का पद अगर चाहता तो अपनी तरफ बढ़े ऐसे किसी भी प्रस्ताव का सार्वजनिक तौर पर खंडन कर सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिवार के मुखिया ने ही राम मंदिर के नाम पर चंदा लेने का चलन का शुभारंभ कर दिया। ऐसे में इसकी भी संभावना पुरजोर बनती है कि विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय हिंदू युवा वाहिनी से जुड़े संगठन के लोग गांव देहात शहरों कस्बों में चंदा मांगने निकले और लोग इनकार करते हैं तो उन्हें डराया धमकाया जाए। जिस तरह के माहौल में हिंदुस्तान जी रहा है। उसमें ऐसी संभावनाओं से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।

भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह है कि राज्य और धर्म के बीच का संबंध शून्य होगा। राज्य निरपेक्ष भाव से सभी धर्मों का आदर करेगा। हस्तक्षेप तभी करेगा जब धर्म की वजह से किसी तरह की अमानवीय प्रथा और कर्मकांड को अंजाम दिया जा रहा होगा। धर्मनिरपेक्षता का यह सिद्धांत होने के बावजूद आजादी के बाद से लेकर अब तक धर्म को चुनावी फायदे के लिए जमकर इस्तेमाल किया गया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की पीढ़ी जानती है कि अगर धर्म और चुनाव के बीच आपसी गठजोड़ से जुड़े विषय पर अगर भारतीय इतिहास में कुछ जिक्र आएगा तो वहां सबसे पहला नाम बाबरी मस्जिद विवाद का होगा। मंदिर बनाने के नाम पर भारतीय जनमानस के बीच खींची गई सांप्रदायिकता का दीवार का होगा।

साथ में इसका भी जिक्र आएगा की राम मंदिर की भूमि पूजन में मौजूदा समय के प्रधानमंत्री खुद शामिल थे और राष्ट्रपति ने चुनावी चंदा जुटाने अभियान के पहले ही दिन 5 लाख एक सौ रुपये का चंदा दिया था। 

भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर गहरी पकड़ रखने वाले विद्वानों की मौजूदा समय में राय यह है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता अपने जीवन की सबसे जर्जर दौर से गुजर रही है। बहुत सारे लोग तो खुलकर यह स्वीकार करने लगे हैं कि हिन्दू बहुसंख्यकवाद को ही धर्मनिरपेक्षता की तौर पर अपनाया जाने लगा है। ऐसे समय में राष्ट्रपति कोविंद की कदम की आलोचना की जाएगी तो कोई नहीं सुनने वाला। ऐसी बातों को अब सब अनदेखा कर देते हैं। उनकी निराशा जायज है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता के जर्जर हो जाने के कारणों को देखते हुए राजनीतिक दलों को जिम्मेवार ठहराना भी सही है। लेकिन चुप बैठ जाना बिल्कुल गलत है। बहुत लंबे समय से धर्मनिरपेक्षता पर गहरा अध्ययन करने वाले विद्वान प्रोफेसर राजीव भार्गव की राय में कहा जाए तो धर्मनिरपेक्षता केवल राजनेताओं के भरोसे नहीं बचाई जा सकती। बल्कि केवल राजनेताओं के भरोसे छोड़ देने के चलते इस सिद्धांत पर कड़ा हमला होने का खतरा मौजूद रहता है। हाल फिलहाल धर्मनिरपेक्षता को बचाय रखने के लिए समाज की जुझारू प्रतिक्रिया की बहुत अधिक जरूरत है। बिना समाज, अदालत, मीडिया, कार्यकर्ता, जागरूक नागरिक समाज के धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्य को बचा पाना नामुमकिन है।

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