NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कैसे पंजाब के भूमि संपन्न और भूमिहीन किसानों के बीच की दीवार सरकार से लड़ने के लिए ढह गई?
पंजाब के बड़े-छोटे, मझोले, भूमि विहीन किसान साथ मिलकर सरकार को चुनौती दे रहे हैं। आखिरकार इनके बीच मौजूद दरार किस तरह से पाट दी गई।
अजय कुमार
03 Dec 2020
farmers
Image courtesy: India Today

खेती किसानी की परेशानी भयंकर होते जा रही थी। पिछले कुछ सालों से सड़क से जुड़े आंदोलनों ने खेती-किसानी को लेकर सरकार को जमकर घेरा है। इसी कड़ी में अगर मौजूदा समय में पंजाब के किसानी आंदोलन को देखा जाए तो साफ तौर पर कहा जा सकता है कि पंजाब के किसान इस समय दिल्ली बॉर्डर पर इस तरह से जमे हुए हैं जैसे वह भारत सरकार की छाती पर चढ़कर उनसे अपना हक मांगने की लड़ाई लड़ रहे हो। यह अपने आप में ऐतिहासिक बेहद शानदार और लोकतंत्र को और अधिक गहरा करने वाला आंदोलन है।

इसलिए खासकर पंजाब की खेती-किसानी और यहां के आंदोलन को समझना थोड़ा वाजिब हो जाता है। तो चलिए पंजाब की खेती किसानी को समझने के सफर पर चलते हैं।

एनसीईआरटी की किताबों में आप सब ने हरित क्रांति के बारे में पढ़ा होगा। 1960 के दशक में हरित क्रांति की वजह से पंजाब के किसानों को हुए दमदार फायदे के बारे में भी जाना होगा। लेकिन कुछ चीजें भूल ही गए होंगे। पंजाब की हरित क्रांति से जुड़ी उन चीजों को यहां पर जोड़ते हैं।

पंजाब में दूसरे राज्यों के मुकाबले भू सुधार आंदोलन की वजह से भूमि सुधार अच्छा खासा हो चुका था। बहुतेरे किसानों के पास खेती करने के लिए बड़ी जोते थीं। इसलिए यहां के किसानों ने ऊंची कीमत पर आने वाले संकर बीजों रासायनिक खादों और बहुत अधिक खर्च कर की जाने वाली सिंचाई की लागत से खुद को बहुत अधिक प्रभावित नहीं होने दिया। कहने का मतलब यह है कि दूसरे राज्य के मुकाबले हरित क्रांति से जुड़े औजारों पर पैसे खर्च करने की काबिलियत पंजाब के पास ठीक-ठाक थी। इसलिए पंजाब में गेहूं और धान की बंपर पैदावार हुई।

इसी समय एपीएमसी की मंडिया भी बननी शुरू हुई। पहले से मौजूद थोक विक्रेता की जगह एपीएमसी की मंडियों में बदल गई। पंजाब में एपीएमसी की मंडियों का विकास ठीक-ठाक हुआ। क्योंकि एपीएमसी की मंडियों के खरीददार खुद सरकार थी, भारत अनाज के संकट से गुजर रहा था, इसलिए सरकार ने मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर पंजाब के गेहूं और धान खरीदी। किसान को वाजिब दाम मिला।

साल 2015 की शांताकुमार कमेटी कहती है कि मंडी सिस्टम की वजह से बड़े किसानों को बहुत अधिक फायदा हुआ। यह बात ठीक है क्योंकि बड़े किसानों के पास बड़ी जोते थीं, बड़ी जोतों बहुत अधिक उत्पादन हुआ, अधिक उत्पादन मंडी में पहुंचा तो मंडी में पहुंचाने की लागत बड़े किसानों ने आसानी से सहन कर ली। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि छोटे किसानों को मंडी सिस्टम की वजह से नुकसान हुआ। क्योंकि मंडी सिस्टम की वजह से एक ऐसा जाल तो बनता ही था जहां पर अनाज बेचने से एमएसपी मिल जाती है।

अब मंडी सिस्टम का विकास हुआ है तो आढ़तिया तंत्र का भी विकास हुआ। आढ़तिया,या कमीशन एजेंट या बिचौलिए या जो मर्जी सो कह लीजिए। बैंकिंग के अभाव में इन्होंने छोटे किसानों के लिए बैंकिंग की तरह से काम किया। छोटे किसानों को अपनी खेती करने के लिए पैसे की जरूरत होती थी। पैसा इन्हें आढ़तियों से मिल जाता था। बदले में आढ़ती इनकी फसल खरीद कर अपना कर्जा और ब्याज ले लेते थे। बाकी पैसा किसान को लौटा देते थे। चूंकि बिना किसी जमानत के आढ़ती किसान को कर्ज देते थे इसलिए ब्याज भी अधिक वसूलते थे और कर्ज की ऐसी शर्त भी रखते थे कि किसान अपने दैनिक जीवन की अधिकतर सामान आढ़ती और आढ़ती से जुड़े सगे संबंधियों से खरीदें।

इस तरह से मंडी सिस्टम के अंतर्गत आढ़ती और किसानों का सरकारी संस्थाओं के समानांतर एक अच्छा खासा गठजोड़ खड़ा हो गया। पंजाब के मामले में इस गठजोड़ को समझना जरूरी है।

आढ़ती का काम करने वाले अधिकतर लोग उस जाति से है जो जातिगत पदानुक्रम में व्यापारिक काम हो से जुड़ी हुई है। एक तरह से कह लीजिए तो मर्चेंटाइल कास्ट जिन्हें उत्तर भारत में बनिया कहा जाता है। पंजाब में सिख जाट इस जाति से जुड़े हुए लोग हैं। इसमें कोई छुपी हुई बात नहीं है कि कॉन्ग्रेस और शिरोमणि अकाली दल जैसी पंजाब की प्रमुख पार्टियों में अधिकतर किसान नेता आढ़ती का ही काम करते हैं।

अब जब कभी भी किसान यूनियन में आढ़ती के खिलाफ आवाज उठती थी तो मजबूत सिख, जाट आढ़ती या कमीशन एजेंट की अगुवाई में चल रही किसान यूनियन ही इस सवाल को दबा देती थी। अगर इसका मतलब यह है कि आढ़ती या कमीशन एजेंट पंजाब के किसानी के मजबूत खंभे हैं तो इसका मतलब यह भी है कि इन आढ़तियों कि पंजाब के किसानी के सामाजिक जीवन और ग्रामीण जीवन में मजबूत पकड़ है। यह एक तरह की अपने आप बनी हुई सामाजिक सहयोग की व्यवस्था है जिसे सरकारी तंत्र के नजरिए से देखते हुए पूरी तरह से खारिज करना कहीं से भी उचित नहीं है।

पंजाब की तरफ से प्रदर्शन के खबरों में मजदूर किसान एकता जिंदाबाद का नारा भी सुनाई दे रहा है। इसकी भी एक पृष्ठभूमि है। सिख जाट किसानों की आढ़तियों के तौर पर मौजूदगी थी। यह मजबूत किसान थे लेकिन इनके मुकाबले ऐसा समुदाय भी था जिसके पास जमीन नहीं थी। जो मझोले और छोटे किसानों की जमीनों पर काम करते थे। यह पंजाब का दलित समुदाय था। धीरे धीरे जैसे ही हरित क्रांति अपने दूसरे और तीसरे फेज में पहुंची तो हरित क्रांति की वजह से पंजाब की कृषि का संकट उजागर हो गया।

किसान जमकर खेतों में रासायनिक खाद और सिंचाई का इस्तेमाल कर पैदावार करते थे इसकी वजह से धीरे धीरे भूमि की उर्वरा शक्ति कमजोर हुई। पानी और भी जमीन के अंदर और अधिक नीचे चला गया। खेती किसानी की लागत बढ़ने लगी लेकिन वाजिब दाम नहीं मिलता था। इसकी वजह से किसान के साथ जमीन पर काम करने वाले मजदूरों के मजदूरी पर भी असर पड़ा। इसलिए फायदा इसी में दिखा कि अपनी आपसी असहमतियां पंजाब के सभी किसान और मजदूर वाजिब दाम की लड़ाई का हिस्सा बने।

पंजाब के छोटे किसान और मजदूर कर्जे के बोझ तले दब रहे थे। आर्थिक बोझ की वजह से नशे की लत से गुजर रहे थे। कई किसानों ने 2018-19 में आत्महत्या की। इसलिए बड़े, मझोले, छोटे, किसानों और मजदूरों का साथ मिलकर सरकार से लड़ने का रास्ता बनने की संभावना मौजूद रही। इस संभावना पर मजबूत किसानों के संगठनों और भूमिहीन मजदूरों से जुड़े संगठनों दोनों ने मिलकर काम किया। और आज स्थिति यह है कि पंजाब के सभी किसान धड़े सरकार से अपनी मांग मंगवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

(नोट - इस आर्टिकल से जुड़ी सामग्री पंजाब के कृषि संकट पर काम करने वाले शोधार्थियों के रिसर्च पेपर से इकट्ठा की गई है)

punjab
Punjab Farmers
Land-Rich and landless farmers
Deference between Poor and Rich
farmers protest
Farm bills 2020

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

लुधियाना: PRTC के संविदा कर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू

पंजाब: आप सरकार के ख़िलाफ़ किसानों ने खोला बड़ा मोर्चा, चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर डाला डेरा

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

ट्रेड यूनियनों की 28-29 मार्च को देशव्यापी हड़ताल, पंजाब, यूपी, बिहार-झारखंड में प्रचार-प्रसार 

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

केंद्र सरकार को अपना वायदा याद दिलाने के लिए देशभर में सड़कों पर उतरे किसान

प्रधानमंत्री मोदी की फिरोज़पुर रैली रद्द होने पर राजनीति तेज़, वार और पलटवार

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे


बाकी खबरें

  • ऋचा चिंतन
    WHO की कोविड-19 मृत्यु दर पर भारत की आपत्तियां, कितनी तार्किक हैं? 
    25 Apr 2022
    भारत ने डब्ल्यूएचओ के द्वारा अधिक मौतों का अनुमान लगाने पर आपत्ति जताई है, जिसके चलते इसके प्रकाशन में विलंब हो रहा है।
  • एजाज़ अशरफ़
    निचले तबकों को समर्थन देने वाली वामपंथी एकजुटता ही भारत के मुस्लिमों की मदद कर सकती है
    25 Apr 2022
    जहांगीरपुरी में वृंदा करात के साहस भरे रवैये ने हिंदुत्ववादी विध्वंसक दस्ते की कार्रवाई को रोका था। मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यकों को अब तय करना चाहिए कि उन्हें किसके साथ खड़ा होना होगा।
  • लाल बहादुर सिंह
    वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव को विभाजनकारी एजेंडा का मंच बनाना शहीदों का अपमान
    25 Apr 2022
    ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता की बुनियाद पर लड़ी गयी आज़ादी के लड़ाई से विकसित भारतीय राष्ट्रवाद को पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद (जो सहजता से मुस्लिम विरोध में translate कर…
  • आज का कार्टून
    काश! शिक्षा और स्वास्थ्य में भी हमारा कोई नंबर होता...
    25 Apr 2022
    SIPRI की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार ने साल 2022 में हथियारों पर जमकर खर्च किया है।
  • वसीम अकरम त्यागी
    शाहीन बाग़ की पुकार : तेरी नफ़रत, मेरा प्यार
    25 Apr 2022
    अधिकांश मुस्लिम आबादी वाली इस बस्ती में हिंदू दुकानदार भी हैं, उनके मकान भी हैं, धार्मिक स्थल भी हैं। समाज में बढ़ रही नफ़रत क्या इस इलाक़े तक भी पहुंची है, यह जानने के लिये हमने दुकानदारों,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License