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बर्बर पुलिसिया कार्रवाई के महीने भर बाद कैसी है जामिया की फ़ज़ा?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक महीने पहले सीएए और एनआरसी विरोधी प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बर्बर कार्रवाई की थी।
अजय कुमार
16 Jan 2020
JAMIA

जब आप दिल्ली के जामिया मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों से उतरते हैं तो आपको कब्रिस्तान दिखाई देता है। जमीन पर बिखरे कब्रिस्तान के कब्रों और आसमान छूती बिल्डिंगों को आप एक साथ देखते हैं तो मन के एक कोने में यह भी महसूस करते हैं कि एक दिन हम सब मिट्टी में मिल जाएंगे। देश, राष्ट्र, राज्य और इनकी सीमाएं सब नश्वर हैं। इन सबको आधार मानकर लड़ना बहुत बेईमानी किस्म की बात है। लेकिन मौजूदा हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। हकीकत यह है कि सर्वधर्म समभाव वाले भारत में धर्म के आधार भेदभाव करने वाला नागरिकता संशोधन कानून संसद से पारित हो जाता है।
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जामिया के विद्यार्थी विरोध में सड़क पर उतरते हैं। पुलिस बल विरोध रोकने के नाम पर विद्यार्थियों पर बर्बर तरीके से जुल्म करती है। सोशल मीडिया पर आपने वो तस्वीर भी देखी होगी जिसमें पुलिस जामिया के छात्रों के हाथ ऊपर करवाकर मार्च करवा रही है। आपने भी मन के किसी कोने में अफ़सोस के साथ सोचा होगा कि आखिरकार भारतीय राजसत्ता अपने ही छात्रों के साथ इतना बुरा बर्ताव क्यों कर रही है? क्या भारत का लोकतंत्र पूरी तरह से मर चुका है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया कैंपस में हुई इस बर्बर घटना के तकरीबन एक महीने हो गए हैं। एक महीने बाद जामिया का हाल क्या है? यह जानने के लिए मैंने जामिया की तरफ रुख किया। मेट्रो स्टेशन से उतरने के बाद ही देखा कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में नारा लगाते हुए पंजाबियों का एक जत्था सड़क से गुजर रहा है।

जामिया के इलाके में अचानक से पंजाब देखते ही एक सवाल खड़ा किया कि जब संशोधित नागरिकता कानून का विरोध पूरे भारत में हो रहा है तो पंजाब यहां पर क्यों आया है? पंजाब को वहीं से विरोध करना चाहिए। यही सवाल मैंने इस जत्थे में शामिल भटिण्डा के जोगिन्दर सिंह से किया। जोगिन्दर सिंह ने कहा कि इस कानून का विरोध पूरे देश में हो रहा है। पंजाब में भी विरोध रहा है। मुस्लिम समुदाय पंजाब में गिनती में कम है फिर भी हम वहां की लड़ाई लड़ रहे हैं। अभी हम जामिया के गेट पर खड़े थे अब हम शाहीन बाग़ की महिलाओं की हौसलाअफ़ज़ाई करने जा रहे हैं।  
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आगे बढ़ने पर जामिया स्कूल के बारहवीं क्लास के दो छात्र अमान और सोराब से मुलाकात हुई। इन दोनों छात्र का कहना था कि उस घटना के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव हमारी पढ़ाई पर पड़ा है। पता नहीं क्यों लेकिन उस दिन के बाद से हम नागरिकता कानून से जुड़ी सारी खबरें पढ़ने की कोशिश करते हैं। ऐसा पहले नहीं होता था। 15 दिसम्बर की रात बहुत डरावनी थी। हॉस्टल से हमें बाहर आने की इजाजत नहीं थी। 15 दिसंबर के बाद दो-तीन दिनों तक हमें स्कूल से बाहर नहीं निकलने दिया गया। हमारी अर्द्धमासिक परीक्षाएं थी। यह रोक दी गयीं। बहुत सारे छात्र घर चले गए। अब एक महीने बाद तकरीबन 70 फीसदी छात्र लौट आए हैं। अब सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है।

इसके बाद सवाल था कि घर वाले आपको नागरिकता संशोधन के प्रोटेस्ट में जाने की इजाजत देते हैं या नहीं। उनका कहना था कि यहां हो रहे प्रोटेस्ट में जाते रहने के लिए घर वाले कहते रहते हैं, अब फोन आता है तो अब्बा यह भी कहते हैं कि दिन भर में जामिया गेट के बाहर होने वाले प्रोटेस्ट में एक बार चले जाना। तुम्हारी मौजूदगी ही लड़ते रहने का सबसे बड़ा प्रतीक है, ये सब करते हुए अपना ख्याल रखना और पढ़ाई पर भी ध्यान देना।  

शाम का वक्त था, सूरज ढल रहा था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ा भीड़ घटने की बजाए बढ़ती चली गयी। देखा जामिया की  सड़कें विरोध की रचनात्मक रंग में रंगी हुई हैं। तभी जामिया के दीवारों पर लगी तस्वीर को बहुत गौर से देखती दिल्ली विश्वविधालय की एजुकेशन की छात्र गोमती से मुलाकात हुई।

उनका कहना था कि यह अद्भुत है। मैंने ऐसा अपने जीवन में कभी नहीं देखा। इन दीवारों पर लगी तस्वीरों को देखिये आपको एक ऐसा नागरिक समाज दिखाई देगा जो स्टेट की नाइंसाफियों के साथ जमकर हल्ला बोल रहा है। फिर भी मैं यहां यह समझने आयी हूं कि वह भारतीय महिलाएं जो अपने घर में होने वाली नाइंसाफियों पर नहीं बोलती हैं, वह इस मसले पर एकजुट कैसे हो गईं? इनकी मौजूदगी बताती है कि यह कानून हिंदुस्तान के लिए ठीक नहीं है। हिंदुस्तान के संविधान के तहत नहीं है। मैं मानती हूँ कि हमारे समाज में नफरत बढ़ा है। इस नफरत को कम करने के लिए हमारे एजुकेशन सिस्टम में सुधार की बहुत अधिक जरूरत है। यह एक दिन में खत्म नहीं होगा। हिंदुस्तान को उन मास्टरों की जरूरत है जो मोहब्बत की जुबान बोलते हैं।  
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इनसे बात करने के बाद गेट नंबर सात से जामिया मिलिया इस्लामिया कैंपस के अंदर गया। गेट पर आईकार्ड दिखाते हुए गार्ड से पूछा भाई साहेब पंद्रह दिसंबर के बाद यहां क्या बदला है? गॉर्ड से मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि बहुत कुछ बदला है लेकिन सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ है कि दिन भर हमारी नजरें लोगों की आई कार्ड देखते हुए गुजारती है। नींद में भी लगता है कि हम आई कार्ड ही देख रहे हैं। अच्छा किया आप आई कार्ड लेकर आये। नहीं तो मैं घुसने नहीं देता।  

अंदर जाकर जामिया के सेंट्रल लाइब्रेरी को देखा तो पाया कि वह बंद है। वहां खड़े आसपास के छात्रों ने कहा कि पंद्रह दिसंबर के बाद से सेंट्रल लाइब्रेरी के साथ सभी डिपार्टमेंटल लाइब्रेरी बंद है। जहां पर तोड़-फोड़ हुई थी, उसकी मरम्म्मत तो बहुत दूर की बात है। इसके साथ आप यह भी सोचिये कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले अधिकतर छात्र लाइब्रेरी के किताबों के जरिये ही पढ़ाई करते हैं। इतना पैसा नहीं होता कि वह महंगी-महंगी किताबें खरीदें और अपने नोट्स बनाए। उनकी भी पढ़ाई चौपट हो चुकी है।

ठीक इसी तरह का हाल जामिया के कैंटीनों का भी है। जिन कैंटीनों के आस-पास  खाना खाने को लेकर भीड़ लगी होती थी, उन कैंटीनों पर चाय-बिस्कुट के अलावा और कुछ नहीं मिलता और जो मिलता है उसे लेने के लिए कुछ ही छात्रों का झुंड खड़ा है।  

यह सब देखने के बाद वहां मौजूद छात्र अबरार अली से बात हुई। अबरार अली का कहना था कि लाइब्रेरी की कुर्सियां अभी तक टूटी पड़ी हैं। अभी तक प्रशासन ने उस दिन की हिंसा के प्रमाण नहीं जुटाए हैं। जामिया प्रसाशन ने महीने भर बाद भी अभी तक उस हिंसा के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की है। इसके खिलाफ हमने वाईस चांसलर का घेराव भी किया था। आप ही बताइये इसे क्या कहा जाएगा?

वहीं पर कानून की छात्रा नफीसा भी खड़ी थीं। इनका कहना था कि अभी चीजें नार्मल नहीं ही है। यूनिवर्सिटी को जो स्वाभाविक काम होता है, वह स्वाभाविक स्थिति अभी वापस नहीं लौटी है। इसमें अभी भी बहुत समय लगेगा। लेकिन इस यूनिवर्सिटी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। इस यूनिवर्सिटी का हर बच्चा पहले से बहुत अधिक मजबूत हो चुका है। सरकार हमारे खिलाफ बर्बर होगी या पुलिस हमें मारेगी, इसका ख़ौफ़ ख़त्म हो चुका है। हम जो अपने किताबों में पढ़ते हैं, वहीं अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करते हैं। भारत की कोई पढ़ाई की किताब धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं पढ़ाती है। इसलिए जो कह रहे हैं कि हमें भड़काए जा रहा है, उन्हें हम कह रहे हैं कि वे जाकर भारत के विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाने वाली किताबें पढ़ें। जो लोग हमें भटकने वाला कह रहे हैं उन्हें हम पर गर्व करना चाहिए क्योंकि हम लोगों ने पढ़ाई को अपने जीवन में उतार रहे हैं। आप ही बताइये पढ़ने-लिखने का मतलब यह होता है न कि गलत के खिलाफ आवाज बुलंद की जाए तो हम वही कर रहे हैं।  

इन सब बातों को सुनते हुए उमर अली ने अपनी राय देने की गुजारिश की। उमर अली ने कहा कि 15 दिसंबर के पहले तक लोग जामिया को मुस्लिमों का गढ़ समझते थे।  उन्हें लगता था कि यहां केवल मुस्लिम ही रहते हैं। पंद्रह दिसम्बर की जुल्म की रात के बाद बहुत कुछ बदला है। लोगों तक यह बात पहुंची है कि जामिया एक पढ़ाई का संस्थान है और यह सभी जाति, सम्प्रदाय, धर्म और भाषा के छात्र अपनी पढ़ाई करते हैं। यानी जामिया की छवि टूटी है। जामिया अब जंतर मंतर बन चुका है। यहां विरोध प्रदर्शन हो रहा है। लेबर यूनियन के लोग आ रहे हैं। अभी आपने सिख धर्म के लोगों की रैली देखी होगी। प्रतिरोध की जगह में बदल जाना एक खबूसूरत बदलाव है। जामिया ने हमें सेक्लुरिजम का यह पाठ पढ़ाया है कि सब अपने मजहब को लेकर आएं, दूसरे के मजहब को जाने और साथ- साथ चले। मैं मुस्लिम हूं तो दाढ़ी बढ़ाकर उस हिन्दू के साथ हाथ मिलकर चलूं जो जनेऊ पहनता है। हम विश्वविद्यालयों से ऐसी मोहब्बत सीखते हैं।  

इसके बाद मैं जामिया से बाहर निकलने का रास्ता भटक चुका था। तभी मुझे हिस्ट्री के छात्र आषुतोष दत्ता मिले। आशुतोष मुझे अपने साथ यूनिवर्सिटी की गलियों से होते हुए बाहर ले जा रहे थे और बता रहे थे कि मैं इतिहास का विद्यार्थी हूँ। सुनसान गलियों को सुनने की कोशिश करता हूँ। आप भी सुनिए पंद्रह दिसम्बर की रात। जुल्म की रात। लोगों के भागने की आवाज सब सुनाई देगी। यहीं आपको हिन्दुस्तान का आईन यानी संविधान का रूल ऑफ़ लॉ आपको दम तोड़ते हुए दिखाई देगा। मैंने कहा कि आप तो हिन्दू हैं आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं? जवाब मिला मैं इंसान हूँ, इतिहास का छात्र हूँ, हिन्दू-मुस्लिमों जैसी बातें इतिहास की लम्बी यात्रा में धूल के बराबर भी नहीं है। महज़ ये सोचिए कि आप इंसान है और क्या आप अपने दौर में इंसानियत बचा पायेंगे। 

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