NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
स्कूलों का सैनिकीकरण कब तक?
क्या स्कूल सुरक्षा बलों की रिहायश और उनकी परेड के लिए होते हैं,  या वहाँ बच्चों के भविष्य के निर्माण के शुरुआती क़दम बढ़ाए जाते हैं?
सुभाष गाताडे
01 Feb 2020
स्कूलों का सैनिकीकरण कब तक
Image courtesy: Dailyhunt

कुछ माह पहले झारखंड के जनतांत्रिक संगठनों एवं इंसाफ़पसंद बुद्धिजीवियों द्वारा पत्थलगढ़ी आंदोलन के इलाक़ों में किए दौरे के बाद तथा उसके बाद जारी फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट के बाद यह सवाल उठा था कि स्कूल सुरक्षा बलों की रिहायश के लिए हैं, या फिर बच्चों की शिक्षा के लिए! टीम के सदस्यों को यह देख कर काफ़ी धक्का लगा था कि खूंटी ज़िले में - जो सूबे की सरकार के हिसाब से पिछड़ा ज़िला है - वहाँ नौ स्कूलों में और दो सामुदायिक भवनों में सुरक्षा बलों ने अपने शिविर क़ायम किए हैं, जिसके चलते बच्चों ने स्कूल जाना लगभग छोड़ दिया है। अपने मांगपत्र में उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया था कि अदरकी, कोचांग, कुरूंगा, बीरबांकी, किताहातू, केवरा और हट नामक गांवों में बने स्कूलों और वहाँ बने एवं दो सामुदायिक भवनों में लगे पुलिस शिविरों को तत्काल हटा दिया जाए।

एक वेबपत्रिका में छपी हालिया रिपोर्ट दरअसल इसी बात की ताईद करती है कि ज़मीनी स्तर पर कुछ भी नहीं बदला है। सरकारों एवं सुरक्षा बलों द्वारा अपनायी जा रही मनमानी पर रौशनी डालते हुए लिखा गया था कि संविधान की पांचवी अनुसूची में शुमार होने के बावजूद - जिसके लिए स्थानीय आबादी से पूछे बग़ैर या उनकी सहमति लिए बग़ैर केन्द्रीय बलों को भी कुछ करने का अधिकार नहीं है; इन गांवों में यह स्कूल बने हैं। ज़ाहिर है इसके लिए उनके विरोध को तवज्जो नहीं दी गयी होगी या उन्हें धाक दिखाया गया होगा।

ग़ौरतलब है कि स्कूल में सैनिक शिविर क़ायम होने के मामले में झारखंड कोई अकेला सूबा नहीं है।

इस मसले पर लिखे अपने आलेख में दिलनाज़ बोगा ने लिखा था:

"वर्ष 2010 में भारत भर में 129 से अधिक स्कूल बैरेक या बेस के तौर पर सेना द्वारा प्रयुक्त हो रहे थे, जिनका बहुलांश बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और भारत के उत्तरपूर्व में था, जिसके चलते हज़ारों छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद कुछ सुरक्षा बलों ने स्कूलों को ख़ाली करना भी शुरू किया था। ..मणिपुर के एक स्कूल कॉम्प्लेक्स से - जहां भारत के अर्द्धसैनिक बलों ने 80 के दशक में अपना बेस कैम्प बनाया था - वहाँ से आठ मानवीय खोपड़ियाँ बरामद हुई थीं।"

इस आलेख में ही दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर एवं मानवाधिकार कर्मी नंदिनी सुंदर का अनुभव दर्ज था जिन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डाली थी। इस मामले में - जिसे नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य कहा गया था, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए फ़ैसले के अनुच्छेद 18 में यह लिखा गया था:

"यह जानना ज़रूरी है कि अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और छत्तीसगढ़ राज्य को यह आदेश देना पड़ रहा है कि वह उन स्कूलों एवं छात्रावासों से सुरक्षा बलों को हटा दे; विडम्बना ही है कि हमारे द्वारा दिए गए आदेश के बावजूद कई स्कूल एवं छात्रावासों में सुरक्षा बल अभी भी क़ब्ज़ा जमाए हुए है। मानवीय जीवन और समाज के अवमूल्यन की इससे कल्पना ही की जा सकती है।"

एक साधारण सी बात है कि कौन माता पिता चाहेगा कि किसी अलसुबह उनकी सन्तान का स्कूल फ़ौजियों के या किसी हथियारबंद समूह के अड्डे में तब्दील हो जाए और उनकी सन्तान को किसी दूर वाले स्कूल में जाने के लिए कहा जाए या स्कूल के एक हिस्से में फ़ौजी अपने हथियारों के साथ विराजमान हो जाएं और उनके ख़तरनाक हथियारों की मौजूदगी में बच्चों को पढ़ने के लिए कहा जाए। ऐसा कौन चाहेगा?

यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि स्कूलों के सैनिक इस्तेमाल के शैक्षिक परिणामों को आसानी से देखा जा सकता है। ऐसे शिक्षा संस्थानों के ड्रॉप आउट रेट अर्थात विद्यार्थियों द्वारा संस्थान छोड़ने की दर में तेज़ी आती है, दाख़िले कम होते हैं, भीड़भाड़ वाले माहौल के चलते शिक्षा का समय प्रभावित होता है, लड़कियों पर अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

बहरहाल, किसी इलाक़ा विशेष में जनता के लड़ाकू संघर्षों वाले इलाक़ों में स्कूलों के अस्तित्व पर अलग तरह का संकट भी मंडराता रहता है, क्योंकि ऐसे संघर्ष की बात करते हुए शिक्षक दूरदराज़ बने स्कूल में जाने से इनकार करते हैं और शिक्षा विभाग भी उनकी निगरानी करने से इनकार करता है। नतीजा यही होता है कि महज़ काग़ज़ पर स्कूल चलते रहते हैं। याद किया जा सकता है कि पूर्ववर्ती छत्तीसगढ़ सरकार ने स्कूल रैशनलायज़ेशन के नाम पर लगभग तीन हज़ार स्कूलों को बंद करने का निर्णय लिया था जिनका 25 फ़ीसदी हिस्सा माओवादी प्रभाव वाले इलाक़ों में था। सोचने की बात है कि संघर्षों के इलाक़े में अगर बच्चे सरकारी स्कूल प्रणाली का हिस्सा बने रहना चाहते हैं, तो स्कूल बंद करके उन्हें दूर धकेलने का क्या औचित्य है? निश्चित ही कोई भी नहीं।

स्कूलों को सुरक्षा बलों को सौंपने का मामला कई बार ग्रामीण इलाक़ों तक भी सीमित नहीं रहता। चार साल पहले जब इससे लेकर बहस खड़ी हो रही थी तब नागपुर से इसकी मिसाल सामने आयी थी, जब देवेन्द्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा-शिवसेना की सरकार क़ायम थी। यहां उंटखाना इलाक़े में बने पहली से बारहवीं तक चल रहे स्कूल में सेन्टल इंडस्टियल सिक्युरिटी फ़ोर्स(सीआईएसएफ़) की बड़ी टीम को अस्थायी तौर पर टिकाने के बारे में नागपुर म्युनिसिपल कार्पोरेशन के पास राज्य के गृह विभाग ने अनुरोध किया था।

इसकी वजह यह थी कि संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत को उन दिनों ज़ेड प्लस सिक्युरिटी प्रदान की गयी थी और उसमें तैनात दर्जनों जवानों को इस स्कूल में टिकाने का निर्णय हुआ था। किसी ने यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि क्या उन्हें किसी ख़ाली मैदान में तम्बू लगा कर नहीं टिकाया जा सकता था ताकि इस पुराने स्कूल में पढ़ रहे हज़ारों छात्रों की पढ़ाई अबाध रूप से चलती रहे।

ध्यान रहे कि वर्ष 2011 से ही सुरक्षा परिषद ने ऐसे हथियारबंद संघर्षों वाले इलाक़ों में स्कूलों एवं अध्यापकों पर हमले की तथा स्कूलों के सैनिक कामों के इस्तेमाल की अधिक निगरानी शुरू की, यहाँ तक कि वर्ष 2014 में उसने ‘सभी सदस्य मुल्कों को ऐसे ठोस उपाय करने के लिए कहा ताकि अंतरराष्ट्रीय क़ानून के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करते हुए सरकारी सेनाओं एवं ग़ैरसरकारी हथियारबंद समूहों द्वारा स्कूलों के प्रयोग पर रोक लगायी जा सके।

’‘ग्लोबल कोएलिशन टू प्रोटेक्ट एजुकेशन फ़्रोम एटेक्स’ के बैनर तले इस सम्बन्ध में एक घोषणापत्र भी तैयार किया गया था, जिस पर नार्वे की राजधानी ओस्लो में अन्तरसरकारी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। दिलचस्प है कि प्रस्तुत घोषणापत्र में क्रोशिया, लाइबेरिया, फ़िलिस्तीन और कोट डी आइवरि  Côte d'Ivoire जैसे मुल्कों का विशेष उल्लेख था, जहाँ हथियारबंद संघर्ष चल रहे हैं, मगर उन्होंने इसके प्रति अपनी सहमति दर्ज करा दी थी।

वर्ष 2015 में जब पहली दफ़ा यह घोषणापत्र तैयार हुआ तब दक्षिण एशिया के इस हिस्से के पांच मुल्कों ने इस निवेदन पर दस्तख़त भी नहीं किए थे। इन पांच देशों में शुमार थे, भारत, अफ़ग़ानिस्तान, म्यांमार, पाकिस्तान, श्रीलंका थे। संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में जब ऐसे हथियारबंद संघर्षों के बच्चों पर होने वाले असर को न्यूनतम करने के लिए कुछ प्रस्ताव रखे गए, तो भारत भी इन देशों के साथ उन 38 मुल्कों में शामिल था, जिसने ‘सेफ़ स्कूल्स डिक्लेरेशन’ पर दस्तख़त करने से इनकार किया।

अब यह 2020 का साल है…

फ़र्क़ बस यही पड़ा है कि इन पांच मुल्कों से अफ़ग़ानिस्तान हट गया है। उसने सेफ़ स्कूल्स डिक्लेरेशन पर दस्तख़त किए हैं। वही अफ़ग़ानिस्तान जहाँ पिछले तीन दशकों से किसी न किसी स्तर पर गृहयुद्ध जारी है या विदेशी सेनाओं का हस्तक्षेप थमा नहीं है। लेकिन सरकार की तरफ़ से कम से कम यह संकल्प लिया गया है कि अपने यहां के बच्चों के भविष्य के साथ वह खिलवाड़ नहीं करेगा।

अब चार मुल्क बचे हैं जिन्हें अपने हस्ताक्षर करने हैं, जिसमें भारत भी है।

अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाला भारत कब इस दिशा में संकल्प लेगा, यह भी सोचने वाला प्रश्न है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

Jharkhand
pathalgadi
Pathalgarhi movement
Militarization of schools
CISF
Constitution of India

Related Stories

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

झारखंड: बोर्ड एग्जाम की 70 कॉपी प्रतिदिन चेक करने का आदेश, अध्यापकों ने किया विरोध

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं

झारखंडः आईएएस पूजा सिंघल के ठिकानों पर छापेमारी दूसरे दिन भी जारी, क़रीबी सीए के घर से 19.31 करोड़ कैश बरामद

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

आदिवासियों के विकास के लिए अलग धर्म संहिता की ज़रूरत- जनगणना के पहले जनजातीय नेता

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

यति नरसिंहानंद : सुप्रीम कोर्ट और संविधान को गाली देने वाला 'महंत'

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला


बाकी खबरें

  • अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर : रणनीतिक ज़ोजिला टनल के 2024 तक रक्षा मंत्रालय के इस्तेमाल के लिए तैयार होने की संभावना
    30 Mar 2022
    प्रोजेक्ट हैंडलर्स के मुताबिक़, ज़ोजिला टनल सहित पांचों टनल का काम सर्दियों के दौरान तेज़ किया गया है। यह रूट तय समय से एक साल पहले सितंबर 2025 में ही इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाएगा।
  • SC
    भाषा
    उच्चतम न्यायालय में चार अप्रैल से प्रत्यक्ष रूप से होगी सुनवाई
    30 Mar 2022
    शीर्ष अदालत में बुधवार को मामलों पर सुनवाई शुरू होने से पहले प्रधान न्यायाधीश ने यह घोषणा की।
  • Cartoonclick
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: चुनाव ख़तम-खेल शुरू...
    30 Mar 2022
    कहावत है कि ‘खेल ख़तम-पैसा हज़म’, लेकिन राजनीति के संदर्भ में इसे यूं भी कहा जा सकता है कि ‘चुनाव ख़तम-खेल शुरू...’ जी हां, तभी तो पांच राज्यों में चुनाव ख़त्म होते ही पेट्रोल-डीजल के दामों में आग
  • sabarmati ashram
    तुषार गांधी
    मैंने क्यों साबरमती आश्रम को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है?
    30 Mar 2022
    साबरमती आश्रम महज़ बापू और बा का स्मारक ही नहीं है, बल्कि यह आज़ादी को लेकर किये गए हमारे अनूठे अहिंसक जनांदोलन, यानी सत्याग्रह का भी एक स्मारक है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,233 नए मामले, 31 मरीज़ों की मौत
    30 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 14 हज़ार 704 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License