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कानून
भारत
राजनीति
राज्य कैसे भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष का नेतृत्व कर सकते हैं
यह दुर्भाग्य है कि यूपीए सरकार ने भेदभाव-विरोधी क़ानून बनाने की विधाई प्रक्रिया में शीघ्रता से काम नहीं किया।
अरविंद कुरियन अब्राहम
28 Sep 2021
DISCRIMINATION

राज्य विधानसभाओं की संवैधानिक शक्तियों के बारे में विस्तार से लिखते हुए अरविन्द कुरियन अब्राहम का कहना है कि जब तक संसद व्यापक भेदभाव-विरोधी क़ानून को अमल में नहीं लाती है, तब तक राज्य विधानसभाओं को भेदभाव-विरोधी क़ानून को बनाने के मामले में अपनी ओर से पहल लेने की ज़रूरत है।

भारत उन बेहद चंद उदार लोकतन्त्रों में से एक है जहाँ पर व्यापक भेदभाव-विरोधी क़ानूनी ढाँचे के बिना ही कार्य-व्यापार बदस्तूर जारी है। इस बात को क़ानून के जानकारों द्वारा अनेकों बार दुहराया गया है, जैसा कि इस बात को यहाँ, यहाँ और यहाँ पर देखा जा सकता है।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट, 2006 ने भेदभावपूर्ण व्यवहार को रोकने के लिए विधायी उपायों को लागू करने की सिफारिश की थी, विशेष रूप से एक समान अवसर आयोग को स्थापित करके। केंद्र सरकार ने तत्पश्चात सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिए एक क़ानून बनाने के सवाल पर विचार करने के लिए प्रोफेसर (डा.) एन.आर. माधव मेनन की अध्यक्षता में समान अवसर आयोग पर एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया।

विशेषज्ञ समूह का तर्क था कि भारत के संविधान के तहत समानता का अधिकार न सिर्फ प्रत्यक्ष भेदभाव को खत्म करने से भी परे है, बल्कि यह अप्रत्यक्ष भेदभाव और भेदभाव के चरम स्वरूपों को खत्म करने के लिए राज्य के सकारात्मक जनादेश तक भी विस्तारित है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए समूह ने समान अवसर आयोग विधेयक, 2008 को मसौदा तैयार किया। जहाँ मसौदा विधेयक की विद्वानों द्वारा अस्पष्ट एवं अप्रभावी प्रावधानों के लिए बेहद आलोचना की गई, इसके बावजूद इसने भारत में एक समानता पर आधारित क़ानून के लिए अभियान को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। 

दुर्भाग्यवश संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने भेदभाव विरोधी क़ानून बनाने की विधाई प्रक्रिया में तेजी नहीं दिखाई। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने काफी देर बाद फरवरी, 2014 में जाकर समान अवसर आयोग के गठन को अपनी मंज़ूरी दी। हालाँकि कुछ सप्ताह बाद ही लोक सभा चुनावों के बाद सरकार में बदलाव के साथ ही इस विधेयक को भी कमोबेश नजरअंदाज कर दिया गया।

भेदभाव-विरोधी क़ानून की बहस को एक बार फिर से जीवंत करने के प्रयास में डा. शशि थरूर ने लोकसभा में भेदभाव-विरोधी एवं समानता विधेयक, 2016 को पेश किया। दुर्भाग्यवश, सत्तापक्ष की ओर से इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई गई और इस प्रकार यह विधेयक 2019 में 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही संसद के ध्यानार्थ अप्रभावी हो गया।

देश के भीतर बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के हालिया उदाहरणों में भीड़ द्वारा लिंचिंग, घृणा अपराधों और कोविड-19 के प्रकोप के आलोक में अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के खिलाफ कलंकित करने के परिणामस्वरूप भेदभावपूर्ण कृत्यों ने एक बार फिर से देश में विभिन्न प्रकार के भेदभाव का मुकाबला करने के लिए विधायी कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता को उजागर कर दिया है। हालाँकि, इस बारे में संसद की ओर से कोई पहल ली जाये, का इंतजार करने के बजाय राज्य विधान सभाओं को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर राज्य-स्तरीय भेदभाव-विरोधी विधेयकों को अमल में लाने की ज़रूरत है।

राज्य विधि निर्माणों के जरिये राष्ट्रीय भेदभाव-विरोधी क़ानून को बनाने की ज़रूरत की बहस में अपना योगदान दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, संसद द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 को लागू किये जाने से पहले ही राजस्थान ने आरटीआई अधिनियम के अपने संस्करण को लागू कर दिया था, जिसने आरटीआई अभियान को मजबूती से आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया था।

विभिन राज्यों में प्रस्तावित भेदभाव-विरोधी विधेयकों से इन परस्तों के मूल और सार की दो महत्वपूर्ण विशेषताओं की पहचान की जा सकती है। इसमें से एक है नस्ल, धर्म, जातीयता, यौन अभिमुखता, और लैंगिक जैसी संरक्षित विशिष्टताओं के आधार पर भेदभाव के खिलाफ अधिकार को निहित रखना। और दूसरा गैर-क़ानूनी भेदभावपूर्ण कृत्य में लिप्त होने के लिए व्यक्तियों पर नागरिक दायित्वों का अधिरोपण करना है। 

सूची III, प्रविष्टि 8: ‘कार्यवाई योग्य गलतियाँ’

भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में सूची III की प्रविष्टि 8, संसद और राज्य विधानसभाओं को इस बात के लिए अधिकार संपन्न बनाती है कि वे “कार्यवाही योग्य गलतियों” के संबंध में क़ानून बना सकें। यह एक पारिभाषिक शब्द है जिसे नागरिक दायित्व के अधिकार क्षेत्र में सामान्य क़ानून से से उधार लिया गया है, और अक्सर इसे अपकृत्यों के साथ परस्पर एक दूसरे के बदले में इस्तेमाल में लाया जाता है। हालाँकि, ये दोनों ही अलग-अलग अवधारणायें हैं और जैसा कि भारत की सर्वोच्च अदालत द्वारा इसे स्टेट ऑफ़ त्रिपुरा बनाम प्रोविंस ऑफ़ ईस्ट बंगाल (1950) के मामले में अपने फैसले में व्याख्यायित किया गया है।

न्यायमूर्ति एम. पतंजलि शास्त्री ने अदालत के लिए लिखते हुए कहा था कि कार्यवाही योग्य गलती के लिए उत्तरदायी होना सिर्फ पूर्ण किये गए अपकृत्य तक ही सीमित नहीं है। जहाँ प्रत्येक अपकृत्य एक कार्यवाही योग्य गलती है, वहीं प्रत्येक कार्यवाई योग्य गलती एक अपकृत्य की श्रेणी में नहीं आता है। 

न्यायमूर्ति बी.के. मुखर्जी ने अपने मिलते-जुलते फैसले में इस बात पर प्रकाश डाला था कि आम क़ानून के तहत ‘अपकृत्य’ नागरिक चोट की एक प्रजाति है, जैसा कि अनुबंध के उल्लंघन के मामले में होता है। हालाँकि, ‘कार्यवाही योग्य गलतियां’ शब्द का अपना एक व्यापक दायरा है जो कि अपने भीतर अपकृत्य क़ानून और अनुबंध क़ानून से परे भी नागरिक गलतियों को शामिल करता है। कोई भी कृत्य गलत है यदि यह किसी अन्य के अधिकार का अतिक्रमण करता है और यदि कृत्य क़ानून में किसी कार्यवाई की वजह प्रदान करता है तो यह ‘कार्यवाई योग्य’ है।

न्यायमूर्ति मुखर्जी के अनुसार, एक नागरिक चोट जिसके लिए उचित उपायों को क़ानूनी अदालत में अस्थिर क्षतियों के लिए कार्यवाई करने की है, को एक अपकृत्य माना जाएगा। हालाँकि, यदि किसी नागरिक चोट के लिए उपर्युक्त उपाय क्षति के लिए कार्यवाई संभव नहीं है, किन्तु कुछ अन्य राहत जैसे कि निषेधाज्ञा दी जा सकती है, तो भी यह कार्यवाई योग्य गलत के दायरे में आएगा।

‘कार्यवाई योग्य गलत’ शब्द का व्यापक दायरा पूर्व के कई दृष्टान्तों में देखा जा सकता है। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने के. मुरारी एवं अन्य बनाम मुप्पला रंगाओयाकम्मा (1987) में अपने फैसले में कहा था कि कॉपीराइट उल्लंघनों को प्रतिबंधित करने के लिए संसद द्वारा अधिनियमित कॉपीराइट अधिनियम, 1957 क़ानून बनाने की इसकी विधाई शक्तियों को संविधान की सातवी अनुसूची की सूची III की प्रविष्टि 8 के तहत कार्यवाई योग्य गलतियों से संबंधित मामलों में और आगे बढ़ाता है। जे. पापा राव बनाम आंध्र प्रदेश सरकार (2004) में, आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने माना कि राज्य विधानमंडल द्वारा आरोपों की जांच के लिए एपी. लोक-आयुक्त एवं उपा-लोकायुक्त अधिनियम, 1983  अधिनियमन भी सूची III की प्रविष्टि 8 का अनुसरण करने वाले कदम के तौर पर है।

एक राज्य स्तरीय भेदभाव-विरोधी क़ानून व्यक्तियों के भेदभावपूर्ण व्यवहार के विरुद्ध अधिकार को निहित कर सकता है। इस अधिकार के हनन को निश्चित तौर पर संबंधित व्यक्ति की गरिमा को चोट पहुंचाने के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए, जिससे कि नुकसान की भरपाई जैसी विभिन्न नागरिक देनदारियों को आकर्षित किया जा सके। इस प्रकार की योजना क़ानून को स्पष्ट रूप से ‘कार्यवाई योग्य गलत’ के दायरे में लाने का काम करेगी।

सूची III, प्रविष्टि 11 ए: ‘न्याय का प्रशासन’   

राज्य-स्तरीय भेदभाव-विरोधी क़ानून की एक और केन्द्रीय विशेषता है गैर-क़ानूनी भेदभाव की शिकायतों का निपटारा करने के लिए समानता आयोग की स्थापना करना है। ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक विशेष अर्ध-न्यायिक तंत्र को विकसित करने से देश में दीवानी अदालतों के सामने आने वाले भारी-भरकम बैकलॉग को जुड़ने से रोकने में मददगार साबित होगा। इस प्रकार के निकाय को स्थापित करने की शक्ति को सूची III की प्रविष्टि 11ए में तलाशा जा सकता है, जो राज्य विधि निर्माण को “सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को छोड़कर सभी अदालतों के न्यायिक प्रशासन; रचना और गठन” के संबंध में अनुमति देता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रविष्टि 11ए को न्याय देने के लिए न्यायिक निकायों के निर्माण एवं विनियमन से निपटने की शक्ति के तौर पर व्यापक तौर पर व्याख्यायित किया है। इसमें केवल सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के संगठन और संविधान को इस प्रविष्टि के जरिये प्रशासित नहीं किया जा सकता है। 

जमशेद एन. गुजदार बनाम महाराष्ट्र सरकार एवं अन्य (2005) में, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है: 

“ ‘न्याय प्रशासन’ की अभिव्यक्ति का प्रयोग बिना किसी योग्यता या सीमा के व्यापक स्तर पर किया गया है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के सिवाय सभी अदालतों की ‘शक्तियाँ’ और ‘क्षेत्राधिकार’ शामिल हैं। प्रविष्टि 11ए में ‘न्याय प्रशासन’ शब्द के बाद अर्ध विराम (;) का अपना ही महत्व और अर्थ है। उसी प्रविष्टि में ‘न्याय प्रशासन’ के बाद आने वाले अन्य शब्द सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अलावा बाकी सभी अदालतों के संबंध में सिर्फ ‘संविधान’ और ‘संगठन’ के बारे में बोलते हैं। इसके अनुसार प्रविष्टि 11ए के तहत राज्य विधानमंडल को सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को गठित और संगठित करने की कोई शक्तियाँ नहीं हासिल हैं।

‘न्याय प्रशासन’ सिर्फ आधिकारिक अदालतों की स्थापना तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा अर्ध-न्यायिक निकायों की स्थापना करने तक भी विस्तारित है। पटना उच्च न्यायालय ने केदारनाथ गुप्ता बनाम नगीन्द्र नारायण सिन्हा (1953) मामले में अपने फैसले में कहा था कि “न्याय के प्रशासन” का आशय है:

“... यह इतना व्यापक है कि इसमें न सिर्फ तथाकथित अदालतों के जरिये न्याय का प्रशासन ही शामिल है बल्कि इसमें “प्रशासनिक न्याय” भी समाहित है जो कि प्रशासनिक न्यायाधिकरणों की मशीनरी के जरिये भी न्याय को मुहैय्या कराता है। मेरे विचार में, राज्य सूची की मद 3 राज्य विधानमंडल को सदन नियंत्रक के कार्यालय की शक्तियाँ और अधिकार क्षेत्र को निर्मित और निर्धारित करने के लिए स्पष्ट शक्ति देने के लिए पर्याप्त है जो कि अपनी प्रकृति में एक अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण है।”

[नोट: आरंभ में “न्याय प्रशासन” सूची II का हिस्सा था, जिसे एक संशोधन के जरिये प्रविष्टि 11ए के रूप में सूची III में स्थानांतरित कर दिया गया था।]

यह निर्धारित करने के लिए कि क्या प्रविष्टि 11ए के तहत “प्रशासनिक न्याय” मुहावरे को सिर्फ औपचारिक अदालतों तक ही सीमित किया गया है, या क्या इसे न्यायाधिकरणों को स्थापित करने के लिए भी लागू किया जा सकता है, के बारे में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन बनाम भारत सरकार (1995) ने अपने फैसले में कहा: 

“संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची III की प्रविष्टि 11-ए में प्रदर्शित होने के रूप में “न्याय के प्रशासन” की अभिव्यक्ति में न्यायाधिकरणों के साथ साथ न्याय के प्रशासन की भी देखरेख शामिल होगी।

झारखण्ड उच्च न्यायालय ने इस स्थिति को ऋषि सीमेंट कंपनी लिमिटेड बनाम भारत सरकार (2001) के अपने आदेश में दोहराया है। इस आदेश में यह कहा गया है कि प्रविष्टि 11-ए की व्याख्या को व्यापक रूप में लिए जाने की आवश्यकता है। इसमें “केवल अदालतों के माध्यम से सही ढंग से न्यायिक प्रशासन को शामिल नहीं किया गया है, बल्कि प्रशासनिक न्याय, यानि न्याय को प्रशासनिक न्यायाधिकरणों की मशीनरी के माध्यम से भी माना गया है।”

प्रविष्टि 11ए के अतिरिक्त राज्य विधानसभाएं सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 65 पर भी भरोसा कर सकती हैं, जो “इस सूची में शामिल किसी भी मामले के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय को छोड़कर सभी न्यायालयों की अधिकार क्षेत्र और शक्तियों के संबंध में निपटने में सक्षम हैं।”

एक राज्य-स्तरीय भेदभाव-विरोधी क़ानून अपने तहत उन सेवाओं और क्षेत्रों को समाहित नहीं कर सकता है जो सातवीं अनुसूची की सूची I के अंतर्गत आती हैं। हालाँकि इसके लिए राज्य सूची के तहत कई विषय हैं जिन्हें राष्ट्रीय क़ानून के तहत भी कवर नहीं किया जा सकता है। सूची II राज्य विधानसभाओं को पुलिस, अस्पतालों, सिनेमाघरों, बाजारों, राज्य के भीतर व्यापार सहित अन्य क्षेत्रों को भेदभाव-विरोधी विधेयक के जरिये अपने दायरे में सम्मिलित करने में सक्षम बनाती है। 

भारतीय संविधान की सातवीं अधिसूची को व्याख्यायित करते वक्त, सर्वोच्च न्यायालय ने बारम्बार इस बात को माना है कि तीन सूचियों में प्रविष्टियों को संकीर्ण रूप से पढने के बजाय विस्तृत तरीके से पढ़े जाने की ज़रूरत है। इसलिए, सूची II और सूची III का एक विस्तृत पठन, विधानसभा को व्यापक स्तर वाले भेदभाव-विरोधी क़ानून के ढांचे को लागू करने का अधिकार देता है।

जब तक संसद अपनी ओर से सातवीं अनुसूची की सूची I में शामिल केंद्रीय सेवाओं और क्षेत्रों को अपने दायरे में समाहित करने के लिए एक व्यापक भेदभाव-विरोधी क़ानून को नहीं बनाता है, तब तक यह राज्य विधानसभाओं के जिम्मे है कि वे राज्य स्तरीय भेदभाव-विरोधी क़ानूनों को अमली जामा पहनायें। गेंद अब उनके पाले में है।

(अरविन्द के. अब्राहम एक वकील हैं, वे हार्वर्ड लॉ स्कूल से स्नातक हैं। आप संवैधानिक क़ानून के विशेषज्ञ हैं और आपने कई विधाई मसलों पर सांसदों को सलाह दी है। व्यक्त किये गए विचार निजी हैं।)

मूलतः इस लेख को द लीफ़लेट द्वारा प्रकाशित किया गया था।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

How States Can Lead the Fight Against Discrimination

Constitutional Law
Judiciary
Policy

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