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कैसे ख़त्म हो दलितों पर अत्याचार का अंतहीन सिलसिला
दलितों पर अत्याचार और दलित महिलाओं से बलात्कार का अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के ही कानपुर के अकबरपुर में दलित युवक को सवर्ण समाज की लड़की से प्रेम करने की सज़ा उसे पेड़ से बांधकर बेरहमी से उसकी पिटाई कर दी गई।
राज वाल्मीकि
26 Jul 2021
कैसे ख़त्म हो दलितों पर अत्याचार का अंतहीन सिलसिला
Image courtesy : Newslaundry

हाल ही की बात है। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के सरधना में ठाकुरों द्वारा दलित युवक को उसकी शादी के समय धमकी दी गई कि यदि वह घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालेगा तो उसे जान से मार दिया जाएगा। युवक के पिता ने थाने जाकर पुलिस से गुहार लगाईं तब पुलिस की मौजूदगी में युवक घोड़ी पर चढ़ कर बरात निकाल सका। इसी तरह की खबर कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश से आई थी जहां दलित दूल्हे घोड़ी पर नहीं चढ़ सकते। दलितों पर अत्याचार और दलित महिलाओं से बलात्कार का तो अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के ही कानपुर के अकबरपुर में दलित युवक को सवर्ण समाज की लड़की से प्रेम करने की सजा उसे पेड़ से बांधकर बेरहमी से उसकी पिटाई कर दी गई।

छूआछूत और भेदभाव का अंतहीन सिलसिला

कहावत है कि “जाके पांव न फटे विबाई सो क्या जाने पीर पराई” या फिर “घायल की गति घायल जाने या जिन लागी होए”। आजकल बहुत से गैर दलित यह कहने लगे हैं कि अब कहां जाति के तहत भेदभाव होता है। अब तो जमाना बदल गया है। छूआछूत खत्म हो गई है। सब बराबर हो गए हैं। अब तो बड़े-बड़े राजनेता दलितों के घर जाकर खाना खाने लगे हैं। जाहिर है ये लोग जमीनी हकीकत से दूर हैं। खुद कभी भेदभाव सहा नहीं है। हकीकत तो ये है कि ये सवर्ण अपना वोट बैंक बनाने के स्वार्थवश दलितों के घर में भोजन करते हैं पर दलित नेताओं को न अपने घर में खाना खिलाते हैं और न अपनी थाली में। खुद घर की थाली में खायेंगे तो दलित नेता को डिस्पोजल थाली देंगे।

गाँव में इन दलितों और दलित नेताओं को पल पल में इनकी जात और औकात बताई जाती रहती है। अगर आरक्षण के आधार पर कोई दलित विधायक भी बन गया और समृद्ध हो गया तो उसे नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के षड़यंत्र किए जाते हैं। उनसे दुश्मनी निकालने और उन्हें सबक सिखाने के लिए उनकी महिलाओं को अपमानित किया जाता है। उनके घर भी तोड़ दिए जाते हैं।

हाल ही में बिहार की छपरा जिले में एक दलित द्वारा सवर्ण के हैंडपंप से पानी पीने पर उसकी पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। उत्तर प्रदेश के महोबा के नथूपूरा गाँव में अनुसूचित जाति की महिला प्रधान का कुर्सी पर बैठना सवर्ण समुदाय को बर्दाश्त नहीं हुआ और उसे कुर्सी से उतार दिया।

सफाई कर्मचारी आन्दोलन बिहार राज्य कन्वीनर रनबीर कुमार राम कहते हैं कि कि बिहार के दलित और खास कर सफाई कर्मचारियों के साथ आज इक्कीसवीं सदी में भी जाति व्यवास्था का दंश झेलने को अभिशप्त हैं। चाहे वे मैलाप्रथा से जुड़े हों, नगर निगम में काम करते हों, ठेकेदारी प्रथा के अंतर्गत काम करते हों जाति व्यवस्था के कारण सदियों से चला आ रहा उन पर अत्याचार और शोषण का सिलसिला आज भी जारी है।

अगर दलित या सफाई कर्मचारी किसी विभाग में बड़ा बाबू या अधिकारी हो गया अपर कास्ट को सुई की तरह चुभते हैं कि ये दलित कैसे कुर्सी पर बैठ गया।

स्कूल में दलित खास कर सफाई समुदाय के बच्चो के साथ भी भेदभाव होता है। क्लास टीचर तक जातिवादी व्यावहार करते हैं। कहते हैं –“तुम डोम हो पढ़-लिखकर क्या करोगे? करना तो तुम्हे सफाई का काम ही है। टीचर और सहपाठी जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। इसी अपमानजनक व्यवहार के कारण दलित बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं। इसलिए दलित बच्चों ड्राप आउट रेट सबसे अधिक होता है। मेरे पड़ोस के एक 13 साल के बच्चे ने पढाई छोड़ दी है। अपनी मां के साथ वह मैला साफ़ करवाने में मदद करवाता है।

दलित महिलाओं के बारे में रनबीर कुमार राम बताते हैं कि जो महिलाएं मैला प्रथा या नगर निगम में काम करती हैं उनको चाय समोसे जलेबी वाले दुकानदार भी कुर्सी टेबल पर नहीं बिठाते हैं। उन्हें नीचे बिठाया जाता है जबकि कथित उच्च जाति के लोगों को टेबल-कुर्सी पर नाश्ता दिया जाता है। चाय पानी के लिए भी महिलाएं अपना गिलास घर से लेकर आती हैं, उस में ऊपर से डाल कर चाय या पानी दिया जाता है।

दबंग या वर्चस्वशाली जातियों के अधिकारियों द्वारा दलित खास कर सफाई समुदाय की महिलाओं पर होने वाले यौन हिंसा की शिकायत महिलाएं नहीं करती है। उन्हें डर होता है कि कहीं उन्हें काम से न निकाल दिया जाए। कोई महिला यदि पुलिस थाने में शिकायत भी करती है तो पुलिस वाले उनकी F.I.R. भी दर्ज नहीं करते हैं। डांट कर भगा देते हैं।

जिन गैर दलितों को जातिगत भेदभाव बेमानी और बीते हुए जमाने की बात लगती है। उन्हें सवर्णों के मंदिरों के ऐसे बोर्ड भी पढ़ने चाहिए जिन पर लिखा होता है –“मंदिर के अन्दर हरिजनों का प्रवेश निषेध है”, “शूद्र मंदिर में प्रवेश न करें” या “संन्यासिओं के मंदिर में शूद्र का प्रवेश मना है”।

मध्य प्रदेश में चाइल्ड राइट्स ओबजवेंटरी और दलित अभियान संघ द्वारा किए गए एक सर्वे में पता चला कि 92 प्रतिशत दलित बच्चे स्कूल में खुद पानी लेकर नहीं पी सकते क्योंकि उन्हें स्कूल के हैंडपंप और टंकी छूने की मनाही है। इतना ही नहीं कुछ स्कूलों में वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को स्कूल में सवर्ण बच्चों के साथ न बिठाकर अलग बिठाते हैं।

मध्य प्रदेश के ही राजगढ़ में सवर्ण होटल मालिक ने दलितों को अपने होटल में खाना खिलाने से इनकार कर दिया।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में दलित किशोरी के साथ 7 युवक सामूहिक बलात्कार करते हैं। पर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता। पुलिस खानापूर्ति में लग जाती है। बलात्कारी खुले आम घूमते हैं।

अहमदाबाद के वीरमगाम तालुका के कराथकल गांव का मामला है। अनुसूचित जाति के सुरेश वाघेला ने शिकायत की है कि लंबी मूंछ रखने के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के 11 लोगों ने उस पर हमला किया और जाति सूचक गालियां दीं। एक घटना में तो तलवार जैसी मूंछें रखने के कारण एक दलित युवक को गोली मारकर उसकी हत्या कर दी गई।

देश की राजधानी के दक्षिण दिल्ली के तिगड़ी में हाल ही में एमसीडी की एक महिला सफाई कर्मचारी को टैंकर से पानी पीना महंगा पड़ गया। न केवल उसे जातिसूचक शब्द कहे गए बल्कि लात घूसों से उसकी पिटाई भी की गई।

ये तो छूआछूत और भेदभाव के कुछ उदाहरण मात्र हैं। इनमे दलितों की हत्याएं, दलित महिलाओं से बलात्कार और सीवर-सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों का जिक्र नहीं किया गया है।

दलितों से अनेक प्रकार से भेदभाव किए जाते हैं। दिल्ली सरकार में मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने यूपीएससी अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी है। उन्होंने चिट्ठी में अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ भेदभाव का आरोप लगाया है। दिल्ली सरकार ने बयान में कहा है कि ‘हाल ही में आरटीआई से यह पता चला कि इंटरव्यू में कैटेगरी देखकर कम नंबर देने का चलन रहा है’। उन्होंने यूपीएससी के अध्यक्ष को सुझाव भी दिया कि सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग का साक्षत्कार अलग-अलग न लेकर एक साथ लिया जाए और उसमे उम्मीदवार के नाम के साथ उसकी जाति सूचक शब्द का इस्तेमाल न हो। 

आरक्षण का लाभ ले दलित अगर सरकारी नौकरी में पहुँच जाएं तो स्टाफ में भी उनमें “कोटेवाले /कोटेवाली” का टैग लग जाता है और उनके साथ ऐसा व्यवहार होता है जैसे उन्होंने किसी सवर्ण के अधिकार पर अपना कब्ज़ा करने का दुस्साहस किया हो। उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। उन पर तरह तरह के तंज कसे जाते हैं। पर दलित जानते हैं कि उनकी व्यथा कौन सुनेगा किसे सुनाएं इसलिए वे चुप रहते हैं।

आखिर क्यों होते हैं दलितों पर अत्याचार?

अब संविधान ने जब उन्हें बराबरी का हक़ दिया और आरक्षण जैसा प्रतिनिधित्व दिया तो दलितों में से कुछ की हालत में कुछ सुधार आया। कुछ आर्थिक समृद्धि आई। इस कारण वे भी आत्म-सम्मान और मानवीय जिंदगी जीने लगे तो यह कथित सवर्ण और उच्च जाति का दंभ भरने वाले लोगों को बर्दाश्त नहीं होता। वे दलितों को उसी सदियों पुरानी स्थिति में रखना चाहते हैं। उन्हें गुलाम और स्वयं को मालिक बनाए रखना चाहते हैं। उनसे अपनी गन्दगी साफ़ करवाना और सेवा करवाना चाहते हैं। उन्हें यह नागवार गुजरता है कि कोई दलित उनकी बराबरी करे। यहीं से उन्हें दबाने का सिलसिला शुरू होता है। उनके साथ अन्याय और अत्याचार किए जाते हैं।

सामाजिक असमानता

इतने छूआछूत, भेदभाव और अत्याचारों की जड़ क्या है? दरअसल हमारी सामाजिक संरचना ही भेदभाव पर आधारित है। हम जाति और सम्प्रदाय में बंटे हैं। जाति व्यवस्था ऊंच-नीच पर आधारित है। जन्म पर आधारित है। हिन्दू धर्म में यह व्यवस्था मान्य और सामान्य है। इस व्यवस्था में जब हमारा पालन-पोषण होता है तो हम में श्रेष्ठ अथवा हीन होने का भाव अपने आप आ जाता है। समाज में हो रहा बर्ताव बचपन से हमारे अचेतन मन में बैठ जाता है। हमारा घर-परिवार, हमारा मोहल्ला, हमारी बस्ती, हमारा गाँव/शहर हमारे बड़े होने तक हमें इस व्यवस्था में ढाल चुके होते हैं। और हम चाहे-अनचाहे अन्य लोगों के साथ वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं जो हमारे माता-पिता कुल-खानदान और मोहल्ले-बस्ती के लोगों ने हमें वर्षों से सिखाया है।

आर्थिक असमानता

दलितों का शोषण कोई आज की बात नहीं है। सदियों से  उनका शोषण होता आया है। उनसे उनके सारे संसाधन छीन लिए गए हैं। मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने उन्हें और दीन-हीन बना दिया है। उन्हें शिक्षा से वंचित किया गया। उन्हें धन-संपदा से वंचित किया गया। उन्हें भाग्य, भगवान तथा पुनर्जन्म का भय दिखा कर और अन्धविश्वासी बनाकर गुलाम बनाए रखा गया। ऐसे में उनकी जिंदगी बद से बदतर होती गई।

राजनैतिक असमानता

हमारे संविधान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इस आरक्षण का लाभ उठाकर कुछ दलित लोग राजनीति और सरकारी नौकरियों में पहुंचे। यहाँ पहले से ही कथित उच्च कही जाने वाली जातियों का वर्चस्व था। वे नहीं चाहते थे कि दलित हमारे स्तर तक पहुंचे। पर संवैधानिक व्यवस्था होने के कारण वे एकदम से उन्हें रोक भी नहीं सकते थे। फिर भी वे उन्हें रोकने की पूरी कोशिश करते हैं। इंटरव्यू में जाति के कारण उन्हें कम अंक देते हैं। आरक्षित पदों को “सूटेबल कैंडिडेट नॉट फाउंड” लिख कर खाली रहने देते हैं। फिर अपने ही किसी सवर्ण को वह पद दे देते हैं।

कुछ जागरूक दलितों ने अपने राजनैतिक दल भी बनाए जैसे मान्यवर कांशीराम ने –बहुजन समाज पार्टी। रामविलास पावन ने लोक जनशक्ति पार्टी आदि। कुछ दलित चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक बने। पर सवर्ण लोगों ने इन्हें साम-दाम-दंड-भेद से अपने साथ मिला लिया। यही वजह है कि ये लोग दलितों के लिए कोई राजनीतिक लाभ नहीं दिला पाते।

सांस्कृतिक असमानता

जब हम भारत की धर्म-संस्कृति की बात करते हैं तो हिन्दूवादी लोग इसे हिन्दू-स्थान (हिन्दुस्तान) मानते हैं। फिर वे बड़े गर्व के साथ वेदों, पुराणों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत, मनुस्मृति आदि खोलकर बैठ जाते हैं। दलितों को वे शूद्र घोषित कर देते हैं। चार वर्ण घोषित कर देते हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। वे ब्राह्मण को ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय को ब्रह्मा की भुजा से और वैश्यों को ब्रह्मा के उदर से पैदा होना बताते हैं और अंत में शूद्रों को ब्रह्मा के पैरों से पैदा बताते हैं। इसके साथ ही वे सबके काम का भी वर्गीकरण कर देते हैं। ब्राह्मणों के कार्य पूजापाठ और शिक्षा देना, क्षत्रियों का काम युद्ध लड़ना,  वैश्यों का काम व्यापार करना और शूद्रों का काम उपरोक्त तीनों वर्णों की सेवा करना निर्धारित करते हैं।

विडंबना यह है कि एक तरफ हिन्दू धर्म “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना रखता है यानी पूरा विश्व ही एक परिवार है। और दूसरी ओर इस धर्म को मानने वाले ही दलितों के साथ छूआछूत और भेदभाव रखते हैं। उनके साथ अन्याय करते हैं। उन पर अत्याचार करते हैं।

कैसे बदले यह मानसिकता?

इस मानसिकता को बदलने में हमारे शिक्षा संस्थान और प्रचार माध्यम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। शिक्षा में संविधान के ऐसे अनुच्छेद शामिल किए जाएं जो  छूआछूत, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, साम्प्रदायिकता आदि का निषेध करते हैं जैसे आर्टिकल 14 और 15 और 17. साथ ही प्रतिष्ठा के साथ जीने का अधिकार जैसे आर्टिकल 21 आदि का शिक्षा के पाठ्यक्रम में समावेश किया जाए। इसके अलावा जो हमारे प्रचार माध्यम हैं जैसे टीवी, रेडियो, समाचारपत्र, सोशल मीडिया आदि पर इनका अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार किया जाए। गाँव-मुहल्लों और शहरी बस्तियों में इन को आधार बना कर नुक्कड़ नाटक खेले जाएं। जिस तरह आजकल मोबाइल पर कोरोना से सतर्क करने की ट्यून आती है उसी तरह संविधान के प्रमुख आर्टिकल को ट्यून के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। अभी कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी – आर्टिकल फिफ्टीन। इस तरह की शिक्षाप्रद फिल्में बनाई जा सकती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हम संविधान प्रदत्त समता, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व की भावना को अपना कर देश के सभी नागरिकों को बराबरी का दर्जा देकर एक समतावादी, समानतावादी सभ्य समाज बना सकते हैं। जीओ और जीने दो का मूलमंत्र अपना सकते हैं। बस अपनी सोच में बदलाव लाने  की जरूरत है। पुरानी परम्परावादी, सामंतवादी और जातिवादी सोच को दिमाग से डिलीट कर आज की संवैधानिक और वैज्ञानिक सोच को स्थापित करने की आवश्यकता है।

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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Cultural inequality

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