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समाज में सौहार्द की नई अलख जगा रही है इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा
देश में फैली नफ़रत और धार्मिक उन्माद के ख़िलाफ़ भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) मोहब्बत बांटने निकला है। देशभर के गावों और शहरों में घूम कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन किए जा रहे हैं।
रवि शंकर दुबे
01 May 2022
समाज में सौहार्द की नई अलख जगा रही है इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा

आज जब दुनिया में पूंजीवादी फासिस्ट ताकतें गरीब गुरबे के सभी हक हथियाने में लगी हैं, अमीर-ग़रीब के बीच गहराइयां निरंतर बढ़ती चली जा रही हैं। धर्मों में मतभेद का नया अध्याय जन्म ले रहा है। जब ऐसा लगने लगा हो दुनिया फिर सामंती विचारधारा की ग़ुलाम होने वाली है। ऐसे में कुछ युवाओं का जज्बा और बुज़ुर्गों का साहस मिलकर एक नया आयाम पेश कर रहे हैं। इस नफ़रत भरे दौर में इप्टा की ‘’ढाई आखर प्रेम का सांस्कृतिक यात्रा’’ समाज में सौहार्द की नई अलख जगाने की ओर अग्रसर है।

आज़ादी के 75वें साल के अवसर पर देश की संस्कृति का संदेश देते हुए इप्टा ‘’ढाई आखर प्रेम की’’ सांस्कृतिक यात्रा सीवान पहुंची। शनिवार यानी 30 अप्रैल को देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के गांव पहुंचकर कलाकारों ने प्रस्तुति दी। यहां फरीदपुर में मौलाना के आशियाने पर सुबह 10 बजे कार्यक्रम का आयोजन सीवान इप्टा द्वारा किया गया, इसके बाद शाम 7 बजे टॉउन हॉल में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें इप्टा के कलाकार ने अपनी प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का उदघाटन जिला परिषद की अध्यक्ष संगीता यादव, सदर एसडीओ रामबाबू बैठा, जिला अवर निबंधक तारकेश्वर पांडेय, डॉ. रामेश्वर सिंह व डॉ. सोहैल अब्बास ने किया। कार्यक्रम का लुत्फ लेने के लिए दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा।

इप्टा के इस ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा बिल्कुल अपने नाम के मुफीद ही चल रही है। इसमें शामिल कलाकार और वरिष्ठ जन पल-पल की ख़बर देकर लोगों को सूचित करते रहते हैं। इसी कड़ी में जब कार्यक्रम का 21वां दिन था और देश के पहले प्रधानमंत्री के गांव रवाना हो रहे थे, तब साथी मृगेंद्र ने बताया कि ब्रेकफास्ट चलती बस में ही कर लिया गया है जिसमें लोगों ने केले और ब्रेड खाए हैं। इस दौरान जत्थे में इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश वेदा, लखनऊ इप्टा से रंगकर्मी वेदा राकेश, बिहार इप्टा के महासचिव तनवीर अख्तर, शिक्षाविद गालिब खान, पटना इप्टा के सचिव पियुष सिंह, पटना इप्टा के साथी शाकिब खान, अखिल कुमार, अमन पाण्डेय, फिरोज़ आलम, किसलय कुमार, अक्षत निराला, सूरज विराज, सुमंत कुमार, कुमार संजय, स्वीटी कुमारी, शिवानी झा, रिशांक, आदित्य आनंद, मध्यप्रदेश इप्टा के साथी मृगेन्द्र सिंह शामिल थे। इसके अलावा साउण्ड सिस्टम संभाल रहे अभिषेक कुमार, बस चालक प्रमोद शाह और चालक सहयोगी संजय कुमार भी शामिल थे।  

आपको बता दें कि इप्टा की ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा 18 अप्रैल को ही बिहार पहुंच गई थी, जहां नवादा, बरबीघा, शेखपुरा, लखीसराय, भागलपुर, कटिहार, पूर्णियां, किशनगंज, अररिया, सुपौल, मथेपुरा, सहरसा, बेगूसराय, दरभंगा, मधुबनी, नरेंद्रपुर, जीरादेई, सिवान और छपरा में कार्यक्रम किए जा चुके हैं। जबकि अभी भी बिहार के कई इलाकों में इप्टा की ओर से प्रस्तुति दी जानी बाकी है।

27 अप्रैल को जब ये जत्था दरभंगा की ओर रवाना हुआ था तब मृगेंद्र ने जानकारी देते हुए बताया था कि बिहार में भूमिसंघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है। यहां जनता ने सामंतों-जमीदारों के सोषण और दमन का मुकाबला खुद के बलबूते किया। इसके लिए इनको जगाने और संगठित करने का काम कम्युनिस्ट पार्टी ने किया।

इस दौरान खाजहांपुर में मौजूद जत्थे के साथी मृगेंद्र बताते हैं कि 1970 तक यह पूरी तरह से खेत मज़दूरों का गांव था। 1970 के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने यहां पर काम करना शुरू किया। 72 तक यहां जबरदस्त संघर्ष चला और इस संघर्ष में मजदूरों का नेतृत्व कर रहे कॉमरेड विभूति सिंह शहीद हुए।

इस दौरान इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश वेदा ने बच्चों के साथ संवाद स्थापित करते हुए एक बाल कविता पढ़ी। इप्टा के साथी फिरोज ने बच्चों से गिनती बोलकर ताली बजाने जैसी एक्टिविटी कर बच्चों का मनोरंजन किया। इस कार्यक्रम में भन्ते बुद्ध प्रकाश ने जादू दिखाकर और जादू को कैसे किया जाता है बता कर पाखंड पर चोट करते हुए समाज को जागरूक रहने का आह्वान किया।

इससे पहले 26 अप्रैल को ढाई आखर प्रेम की इस सांस्कृतिक यात्रा ने ‘’सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है, दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है।‘’ के नारों के साथ दिनकर की धरती बीहट में दस्तक दी।

यहां पर शहीद वीर उचित सिंह, शहीद गेन्दा सिंह, शहीद सीताराम मिश्र, कामरेड चन्द्रशेखर सिंह, कामरेड चन्देश्वरी प्रसाद सिंह की प्रतिमाओं का माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, नगर में सांस्कृतिक रैली निकाली गई। सांस्कृतिक रैली में मादर, झाल, ढोलक की थाप पर झूमते लोक कलाकार, बीहट इप्टा और पटना इप्टा के साथियों द्वारा ढोलक, ढपली वह अन्य वाद्ययंत्रों की गूंज के साथ तिरंगा, पोस्टर, बैनर और इप्टा के झंडों का लहराना मुख्य आकर्षण का केंद्र रहा। रैली में इप्टा के अलावा बीहट के सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, साहित्यकार व अन्य सुधीजन शामिल रहे।

माध्यमिक विद्यालय बीहट के मैदान पर खुले मंच में आयोजित इस कार्यक्रम में जत्थे में शामिल केन्द्रीय इप्टा के साथियों ने रंगकर्मी वेदा राकेश के नेतृत्व में नफस-नफस कदम-क़दम.... गीत के साथ मंच पर अपना परिचय दिया। पटना इप्टा के साथियों ने रघुपति राघव राजा राम..एहो डूब गइले सबरे किसनबा राम राम हरे-हरे.. और  जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियां, फूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियां.... आदि जनगीत प्रस्तुत किए।

 

बिहार के शहरों और ज़िलों में कार्यक्रम के आयोजन के बाद इप्टा की ये सांस्कृतिक यात्रा उत्तर प्रदेश जाएगी जहां 8 मई से 15 मई तक कार्यक्रमों के आयोजन किए जाएंगे। फिर यही यात्रा 15 मई से 22 मई तक मध्यप्रदेश की संस्कृति की निहारेगी। 22 मई को ही इप्टा के ढाई आखर प्रेम की इस यात्रा का समापन भी होगा।

आपको बता दें कि इप्टा की ढाई आखर प्रेम की ये यात्रा 13 अप्रैल से 17 अप्रैल तक झारखंड में थी, यहां अलग-अलग शहरों में कार्यक्रमों की प्रस्तुति की गई, नाटक दिखाए गए, गीत गाए गए, नृत्य हुआ। और लोगों के साथ जागरूकता की सभाएं की गईं। पलामू झारखंड के साथी पंकज श्रीवास्तव कहते हैं कि त्रेता युग में जब पिता के वचन की मर्यादा का पालन करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने 14 वर्ष वनवास का विकल्प चुना, तो वनवास के दौरान भी वनों में रह-रहे तमाम ऋषि-मुनियों से व्यक्तिगत/पारिवारिक सम्पर्क साधा, उन्हें जाना-समझा, उनसे सीखा। यह राजसत्ता का जन संस्कृति के साथ घुलने-मिलने,जानने समझने, संपर्क, समन्वय, तादात्म्य स्थापित करने का अप्रतिम उदाहरण है।

पंकज श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी जीवंत,जाग्रत,सजग,सचेत समाज में बड़े परिवर्तनों की परिकल्पना राजसत्ता नहीं उस समाज के साहित्य-संस्कृति, कलाकार-रंगकर्मी करते हैं। असहयोग आंदोलन से महात्मा गांधी 1920 में अखिल भारतीय नेता के रूप में उभरे। उन्होंने विदेशी सामान और कपड़ों के बहिष्कार का नारा दिया। इसकी परिकल्पना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1884 में ददरी मेला, बलिया में की थी। 

आपको बता दें कि इप्टा के “ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा’’ की शुरुआत 9 अप्रैल को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नगर निगम गार्डन से हुई थी, जिसे इप्टा के महासचिव राकेश वेदा ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इस दौरान एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया। जिसमें राकेश वेदा ने इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य बताया, उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जिस तरह से नफ़रत फैलाई जा रही है उसके प्रतिरोध स्वरूप प्रेम का प्रसार करना है, आज लोगों को नफ़रत की नहीं प्रेम की ज़रूरत है। राकेश वेदा ने कहा कि कला जनता के नाम प्रेम पत्र होता है, कला प्रेम के प्रसार का एक सशक्त माध्यम है।

इप्टा की इस ‘ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा’’ का असल उद्देश्य स्वाधीनता संग्राम के गर्भ से निकले स्वतंत्रता, समता, न्याय और बंधुत्व के उन मूल्यों के तलाश की कोशिश है, जो आजकल नफ़रत, वर्चस्व और दंभ की खाई में डूब-सा गया है। यह यात्रा उन तमाम शहीदों, समाज सुधारकों और भक्ति आंदोलन और सूफीवाद के पुरोधाओं का स्मरण हैं, जिन्होंने भाषा, जाति, लिंग और धार्मिक पहचान से इतर मुनष्यता की मुक्ति और लोगों से प्रेम को अपना एकमात्र आदर्श घोषित किया। साथ ही यह यात्रा नई पीढ़ी को जागरूक करने की भी एक ज़रिया है। ये सांस्कृतिक यात्रा छत्तीसगढ़ के रायपुर से चली थी, जो मानवता को अमन और प्रेम की एक नई राह दिखाते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।

आपको बता दें कि इप्टा की इस शानदार मुहिम, इस अभियान को लेखकों, सांस्कृतिक संगठनों प्रगतिशील लेखक संघ(प्रलेस), जनवादी लेखक संघ(जलेस), जन संस्कृति मंच(जसम), दलित लेखक संघ(दलेस) और जन नाट्य मंच(जनम) ने भी अपना सहयोग दिया है।  इतना ही नहीं इप्टा की इस यात्रा को स्वतंत्र और सच लिखने वाले पत्रकारों समेत देशभर के कलाकारों का बखूबी समर्थन मिला है।

इसे भी पढ़ें--- https://hindi.newsclick.in/IPTA-Dhaai-Akshar-Prem-Ke-Fight-against-hate

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