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सुरक्षा बलों में भी कम नहीं है महिलाओं का शोषण-उत्पीड़न : ITBP की पूर्व डिप्टी कमांडेंट की कहानी
करुणाजीत ने बड़ी उम्मीदों से करीब पांच साल पहले भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ज्वाइन किया, लेकिन इस साल जून में उनके साथ जो हुआ उसने उनकी ज़िंदगी बदल दी। अब वे नौकरी से इस्तीफ़ा देकर अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रही हैं।
सोनिया यादव
04 Dec 2019
महिला सुरक्षा

केंद्र की मोदी सरकार ने बड़ी शान से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' कार्यक्रम की शुरुआत की। जिसके तहत महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के तमाम दावे किये गए। लेकिन 'उस बेटी का क्या जो बची भी है और पढ़ी भी है लेकिन सिस्टम के आगे लाचार है'। इस बेटी ने अपने सम्मान के लिए अपनी अफ़सर पद की नौकरी छोड़ दी और आज सड़कों पर न्याय और इंसाफ की गुहार लगा रही है। ये कहानी है भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में डिप्टी कमांडेंट रहीं करुणाजीत कौर की।

करुणाजीत ने बड़ी उम्मीदों से करीब पांच साल पहले ITBP ज्वाइन किया। देश सेवा का सपना लिए ये जांबाज़ महिला अफसर अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ ही रही थी कि उन्हें इस पि़तृसत्ता से भरे समाज में ये एहसास करा दिया गया कि तुम महिला हो और केवल मर्दों की मौज के लिए तुम्हारी भर्ती हुई है।

करुणाजीत ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, 'मुझे जानबूझ कर इंडो-चाईना बार्डर पर भेजा गया, जहां कोई महिला डिप्लॉय नहीं थी। जबकि सर्विस के कोड के अनुसार जहां महिला डिप्लॉय न हो वहां महिला अधिकारी को नहीं भेजा जाता। इसके बावजूद मुझे और एक महिला अधिकारी डॉक्टर को वहां भेज दिया गया। हमने सुरक्षा के लिए महिला कॉन्सटेबल की भी मांग की लेकिन हमें मना कर दिया गया'।

आप शायद ये सुनकर हैरान हो जाएंगे कि जहां इन दोनों महिला अधिकारियों को भेजा गया वहां कि परिस्थितियां अपने आप में संदेहास्पद थीं। करुणाजीत बताती हैं, ' हम इसी साल सात जून को उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा पर मलारी पोस्ट पर पहुंचे। जिस कमरे में वहां हमें रोका गया, वहां कोई लाइट नहीं थी, दरवाजे पर कुंड़ी नहीं थी और न ही किसी प्रकार की कोई सुरक्षा व्यवस्था थी। आस-पास कोई जन-आबादी नहीं थी और पूरा इलाका जंगलों से घिरा हुआ था'।

आप में से कई लोग ये सवाल कर सकते हैं कि इन जगहों पर जब पुरुष पैरामिलिट्री जवान और अधिकारी रह सकते हैं तो महिला अधिकारियों को क्या दिक्कत है। दिक्कत जगह से नहीं है दिक्कत पुरुष प्रधान मानसिकता से है।

करुणाजीत कहती हैं, ‘ 9-10 जून की दरमियानी रात को करीब 12-1 के बीच एक कॉन्सटेबल हमारे कमरे में घुस आया और बोलने लगा कि 'मैंने दो महीने से किसी महिला को नहीं छुआ, मुझे एक औरत की जरूरत है' इसके बाद वो आगे बढ़ने लगा, मैंने किसी तरह इंटरकॉम के जरिए साथ वाले कमरों को फोन किया। जिसके बाद मौके पर जवान और अफसर आए और कॉन्सटेबल बाहर चला गया। जब मैंने उसे फॉलो किया तो देखा कि कोई उसे कुछ नहीं कह रहा, उल्टा उसे आइडिया दे रहे हैं कि तुम्हेंं कोई काम था तो हमारे पास आ जाते। इस पर भी मैंने आपत्ति जताई कि वो बालात्कार के इरादे से कमरे में घुसा था, और आप लोग उस कॉन्सटेबल के मुंह में ही शब्द डाल रहे हैं'।

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करुणाजीत ने आगे बताया कि इसके बाद उन्होंंने अधिकारियों से कहा कि उन्हें अपने सबसे उच्च अधिकारी डीजी यानी महानिदेशक से बात करनी है तो मुझे बताया गया कि यहां फोन नहीं काम करता, इसलिए सैटेलाइट फोन मुहैया करवाए गए हैं लेकिन मुुझे सैटेलाइट फोन भी खराब बताया गया। जिसके बाद मैंने वॉयरलैस टैलीकम्युनिक्शन से मैसेज भेजने की बात रखी तो मुझे बताया गया कि वो भी खराब है। आप यहां महिलाओं की सुरक्षा की बात तो छोड़ दीजिए आप यहां देश से गद्दारी कर रहे हैं। अगर यहां कोई रात को ऑपरेशनल दिक्कत हो जाती है तो आप कैसे संपर्क करेंगे। वहां लोग केवल दारू पीकर मौज लेने के लिए थोड़े हैं।

करुणाजीत की किस्मत शायद थोड़ी अच्छी थी, तो उन्हें वहीं कुछ लोग मदद के लिए मिल गए और उन्हें इंडियन आर्मी के कैंप तक पहुंचा दिया।
करुणाजीत बताती हैं, 'मुझे वहीं आईटीबीपी के कुछ दो-चार अच्छे लड़के मिल गए, जिन्होंने कहा कि यहां से कुछ ही दूरी पर आर्मी की सिग्नल यूनिट है, वहां चलते हैं शायद कुछ मदद मिल जाए। जिसके बाद भारतीय थलसेना ने मेरी मदद की और मुझे आईटीबीपी के फोन नंबर अरेंज करके दिए साथ ही अपने फोन से हमें फोन करवाया'।

हम अक्सर बातें करते हैं कि जब भी किसी मुसीबत का एहसास हो तो तुरंत फोन कर सूचना दें जिससे त्वरित कार्रवाई हो और अनहोनी से बचा जा सके लेकिन जब करुणाजीत ने अपने अधिकारियों को फोन किया तो उन्हें निराशा हाथ लगी। करुणाजीत ने कहा, 'मैंने तीन लोगों को फोन किया। अपने कमांडिंग अफसर, चंडीगढ़ के इंस्पेक्टर जनरल को, जिसके बाद उस एरिया के इंस्पेकर जनरल से कॉन्टेक्ट किया। लेकिन ये तीनों लोग फोन सुन कर सो गए। कमांडिंग अफसर ने मुझे नशे की हालत में कहा कि मामला सुबह देखेंगे। इसके बाद जब आर्मी कैंप से मैं बाहर आई तो आईटीबीपी कैंप में सब सो चुके थे, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। हम यानी मैं और महिला डॉक्टर पूरी रात सड़क पर डर के मारे गाड़ी में बैठे रहे'।

करुणाजीत को यह सब देखकर एहसास हो गया कि शायद इस मामले को यहीं दबा दिया जाएगा। इसलिए उन्होंने अगली सुबह ही जोशीमठ में एफआईआर करवा दी लेकिन तब तक सिस्टम भी अपराधियों को बचाने की तैयारी कर चुका था। करुणाजीत के अनुसार जब वह जोशीमठ पहुंची तो कमांडिंग अफसर ने उन्हें फोन पर कहा कि ये बात डीजी तक आखिर कैसे पहुंची रातों-रात। साथ ही ये भी कहा कि तुम ये बात किसी को नहीं बताओगी कि कमरे में कुंडी की व्यवस्था सही नहीं थी। इसके बाद जब हम शाम को पुलिस के साथ मौका-ए-वारदात पर पहुंचे तो कुंडी सही लगा दी गई थी और वो काम भी कर रही थी। उसके बाद मैैैंने अपने अधिकारियों को चिट्ठी लिखी की साक्ष्यों के साथ छेड़खानी करने की कोशिश की गई है, सुबूतों को मिटाया गया है। लेकिन उस चिट्ठी का कोई संज्ञान नहीं लिया गया।

आप समझ सकते हैं कि किसी की पूरी दुनिया उस एक रात में बदल गई, लेकिन हमारे प्रशासन में जमीं पितृसत्ता और पुरुष प्रधान मानसिकता पर जमीं धूल करुणाजीत की लाख कोशिश के बाद भी आज तक नहीं हट पाई।

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करुणाजीत कहती हैं, 'मैं दिल्ली में अपने डीजी से मिली, मैंने कई पत्र लिखें, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। मैंने प्रधानमंत्री मोदी से लेकर गृह मंत्रालय और केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भी पत्र लिखे लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई और अंत में मैंने इस्तीफ़ा देने का फैसला कर लिया। हालांकि राष्ट्रीय महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में विभाग को पत्र लिखा है'।

करुणाजीत नारी सशक्तीकरण की एक मिसाल हैं जो आज सशक्त भी हैं और अपने खिलाफ़ हुए अपराध पर आवाज़ भी बुलंद कर रही हैं। उन्होंने कहा, मेरा इस्तीफ़ा, मेरा सम्मान है, मुझे नौकरी नहीं इज़्ज़त चाहिए। मैं सर्विज में रहकर कोड ऑफ कन्डेक्ट में बंधी थी लेकिन मैने इस्तीफ़ा इन्हें समाज में बेपरदा करने के लिया दिया है, इनके चहरों से नकाब उठाने के लिए दिया है। ये बताने के लिए दिया है कि महिला कोई मौज़ लेने की वस्तु नहीं है। यदि कोई कांस्टेबल डिप्टी कमांडेंट का हाथ पकड़ सकता है और इस तरह की हरकत कर सकता है, तो आप सुरक्षा बल में दूसरी महिलाओं के सम्मान की कैसे उम्मीद कर सकते हैं जो छोटे पदों पर तैनात हैं। करुणाजीत के मामले में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उनका संघर्ष जारी है महिला शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ।

न्यूज़क्लिक ने इस संबंध में ITBP के महानिदेशक से ईमेल के जरिए सवाल पूछे हैं। खबर लिखने तक हमें कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है।

गौरतलब है कि 1997 से पहले महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाले यौन-उत्पीड़न की शिकायत आईपीसी की धारा 354 (महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ या उत्पीड़न के मामले) और 509 (किसी औरत के सम्मान को चोट पहुंचाने वाली बात या हरकत) के तहत दर्ज करवाती थीं।

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भंवरी देवी के मामले में साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर होने वाले यौन-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ कुछ निर्देश जारी किए। इन निर्देशों को ही 'विशाखा गाइडलाइन्स' के रूप में जाना जाता है। इसके तहत कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साल 1997 से लेकर 2013 तक दफ़्तरों में विशाखा गाइडलाइन्स के आधार पर ही इन मामलों को देखा जाता रहा लेकिन 2013 में 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट' आया। जिसमें विशाखा गाइडलाइन्स के अनुरूप ही कार्यस्थल में महिलाओं के अधिकार को सुनिश्चित करने की बात कही गई। इसके साथ ही इसमें समानता, यौन उत्पीड़न से मुक्त कार्यस्थल बनाने का प्रावधान भी शामिल किया गया। इस एक्ट के तहत किसी भी महिला को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सिविल और क्रिमिनल दोनों ही तरह की कार्रवाई का सहारा लेने का अधिकार है।

हांलाकि इस कानून के बाद भी महिलाओं के प्रति अपराध और अत्याचार कम नहीं हुए हैं और न ही शिकायत के बाद महिला के प्रति लोगों के व्यवहार में कोई सुधार हुआ है। शिकायतकर्ता महिला को क्या कुछ सहना पड़ता है ये किसी से छिपा नहीं है।

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