NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
विचार: व्यापार के गुर चीन से सीखने चाहिए!
व्यापार के लिए आपको अपने समाज की रूढ़ियों से निकलना होगा। इसके लिए दूसरों के आचार-विचारों और आस्थाओं का सम्मान करना पड़ता है। तब ही आदान-प्रदान संभव है, जब आप अपनी कुंठा और जकड़न से निकलेंगे।
शंभूनाथ शुक्ल
20 Dec 2021
india china trade
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : The Economic Times

सम्राट अशोक ने ईसा से दो सदी पूर्व पुरुष पुर (पेशावर) से पाटलिपुत्र (पटना) तक एक राजपथ (हाई-वे) बनवाया था। इसके पीछे एक उद्देश्य यह था कि राहगीरों के आने-जाने का रास्ता सुगम हो। तब इन रास्तों से व्यापारी गुजरते, धर्म प्रचारक गुजरते और सेनाएँ भी। बीच-बीच में इस मार्ग में सुधार होता रहा। लेकिन सम्राट हर्ष के बाद यह टूट-फूट गया। उस समय भारत के देशी राजे परस्पर लड़ते रहे और व्यापार हेतु बने इस रास्ते को दुरुस्त करने की सुधि किसी ने नहीं ली। ऐसे में व्यापारियों का क़ाफ़िला (सार्थवाह) भी लुट जाता इसलिए भारत में व्यापार ख़त्म हो गया।

इसके बाद व्यापार के लिए देश से बाहर जाने वालों को समाज से बहिष्कृत किया जाने लगा। समुद्र यात्रा पर धार्मिक प्रतिबंध लग गए। ज़ाहिर है जब व्यापार ध्वस्त हुआ तब बाहर के लोगों से घुलना-मिलना तथा सीखना-सिखाना सब नष्ट हो गया। यही भारत का अंधकार युग है, जो कई शताब्दियों तक चला।

लेकिन फिर जब तुर्क आए, अफ़ग़ानी आए और उनका शासन स्थायी हुआ, तब उन्होंने फिर से राजमार्ग बनवाए। शेरशाह सूरी ने इस पेशावर से पटना तक के मार्ग को बंगाल तक बढ़ाया। बाद में मुग़ल बादशाह अकबर ने और भी कई राजमार्ग बनवाए। ख़ासकर आगरा से दक्कन को। अंग्रेजों के समय इन्हें आधुनिक रूप दिया गया। अंग्रेजों का मक़सद व्यापार था इसलिए आवश्यक बुनियादे ढाँचे को व्यापार के अनुकूल बनाया गया और भारत के लोगों का भी देश के बाहर आना-जाना शुरू हुआ। सड़क और जल मार्ग को पनपाया गया। और  हमारे व्यापार की जो प्रक्रिया रुक गई थी, उसने गति पकड़ी। लेकिन इस औपनिवेशिक संस्कृति ने एक बात यह भी बताई कि व्यापार में बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करना ही होगा। अब चूँकि ज़माना बदल चुका है, इसलिए मुल्कों के बीच युद्ध ज़मीन हथियाने के लिए नहीं बल्कि व्यापार के लिए बाज़ार पर क़ब्ज़ा करने की नीयत से होते हैं।

व्यापार के लिए आपको अपने समाज की रूढ़ियों से निकलना होगा। इसके लिए दूसरों के आचार-विचारों और आस्थाओं का सम्मान करना पड़ता है। तब ही आदान-प्रदान संभव है, जब आप अपनी कुंठा और जकड़न से निकलेंगे।

इस संदर्भ में देखा जाए तो हाल के वर्षों में चीन व्यापार में सबसे आगे निकल गया है। इसका एक ही उदाहरण काफ़ी होगा। पिछले दिनों श्रीलंका में उसे एक सोलर प्लांट लगाना था। लेकिन अमेरिका के दबाव और भारत के विरोध के कारण यह प्लांट अभी तक लग नहीं सका। वहाँ पर सिंघलियों और तमिलों के बीच यूँ भी तना-तनी है। सिंघली अगर राज़ी हैं तो तमिल बिदक गए और जिस बात को तमिल सही मानते हैं, उससे सिंघली दूरी बरत लेते हैं। दोनों की एथिनिक पहचान और संस्कृति, धर्म तथा रीति-रिवाज़ भी अलग-अलग हैं। चीन ने इस बात को समझा और एक चतुर रवैया अपनाया।

16 दिसंबर को श्रीलंका स्थित चीन के राजदूत की जिन्होंग (Qi Zhenhong) श्रीलंका के तमिल बहुल क्षेत्र जाफना में गए और वहाँ उन्होंने तमिलों के प्रतिष्ठित मंदिर नल्लूर कंडास्वामी कोविल मंदिर के अंदर जा कर विग्रह के दर्शन किए। वे मंदिर के अंदर परंपरागत परिधान में गए। अर्थात् कमर के नीचे तमिलों की वेष्टी (लुंगी की तरह पहनी जाने वाली तमिल धोती) बाँधी और कमर के ऊपर के हिस्से पर कोई वस्त्र नहीं। उन्होंने प्रसाद भी लिया, चढ़ाया और बाँटा। इस तरह श्री जिन्होंग ने तमिलों का भरोसा जीत लिया। पूजा करते हुए उनकी तस्वीर मीडिया में आई और खूब वायरल हुई। अलग-अलग नज़रों से इसे देखा गया। कुछ ने कहा, चीन इस तरह शांत हो चुके तमिल बनाम सिंघली मुद्दे को गरमा कर श्रीलंका सरकार पर दबाव बना रहा है। कुछ ने इसे चीन के राजदूत की सद्भावना यात्रा के तौर पर देखा। लेकिन कुछ भी हो, यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि चीन कम्युनिस्ट देश ज़रूर हो मगर उसे व्यापार के गुर मालूम हैं। अर्थात् जहां व्यापार करना हो वहाँ के लोगों का दिल जीतो।

इसकी वजह भी है। प्राचीन काल से चीन की अर्थ व्यवस्था का आधार व्यापार रहा है। चीन में हालाँकि कृषि भी ठीक थी लेकिन उसे एक तरफ़ तो मंगोलिया के बर्बर योद्धाओं से लगातार भिड़ना पड़ता तथा दूसरी तरफ़ वह साइबेरिया के बर्फीले क्षेत्र से घिरा हुआ है। इसके अलावा हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियाँ उसे भारत से अलग करती हैं। एक तरफ़ समुद्र है। वहाँ की जलवायु कृषि के बहुत अनुकूल नहीं रही, इसलिए इस विशाल आबादी और क्षेत्र के लोगों का पेट भरने के लिए वह पर्याप्त नहीं थी। इसलिए व्यापार उसके लिए सर्वथा ज़रूरी था। स्थल मार्ग और जल मार्ग दोनों से।

व्यापार सदैव नए-नए आविष्कार की डिमांड करता है और बाज़ार खोजने को मजबूर करता है। जबकि कृषि यथास्थितिवाद को बढ़ावा देती है। ज़मीन पर बीज बो दिए, फसल तो होगी ही। और चूँकि कृषि तथा ग्राम्य आधारित अर्थ व्यवस्था जितना है, उतने में संतुष्ट रहना सिखाती है, इसलिए नए आविष्कारों तथा क्षेत्रों को खोजने की गुंजाइश वहाँ नहीं है न ही उसकी ज़रूरत होती है। इसीलिए विश्व में वे देश पिछड़ गए, जहां व्यापार का माहौल नहीं बन सका।

इसके अलावा व्यापार को सत्ता का संरक्षण और सपोर्ट भी चाहिए होता है। सौदागरों के क़ाफ़िले लंबी-लंबी यात्राओं पर निकलते हैं, रास्ते में चोर-डाकुओं और लुटेरों का डर होता है। इनसे निज़ात राज्य व्यवस्था ही दिला सकती है। जिन देशों में क़ानून-व्यवस्था बेहतर होती है, वहाँ व्यापार फलता-फूलता है। लेकिन जहां अंदरूनी झगड़े और लूट मार होगी, वहाँ व्यापार भी चौपट होगा। अब चूँकि व्यापार एक स्पर्धा को जन्म देता है इसलिए धर्म, समाज और व्यवस्था में निरंतर सुधार की प्रक्रिया चलती है। सरकार को भी व्यापार को सुगम बनाने के प्रयास करने होते हैं। राजकीय नौकरियों और जनता के हितार्थ शिक्षा एवं उनके स्वास्थ्य के देख़भाल को अपने हाथ में लेना पड़ता है। इसके अतिरिक्त व्यापार इज़ारेदारी में न बदल जाए, यानी कुछ हाथों में न सिमट जाए इसलिए समय-समय पर सख़्त कदम उठाने पड़ते हैं। अब यहाँ देखिए, तो अतीत से लेकर भारत एक पिछड़ा हुआ देश ही रहा है। यहाँ सदैव ज़मीन के लिए खून-ख़राबे होते रहे, कभी शांति के उपाय नहीं हुए।

अगर बुद्ध के काल को छोड़ दें, तो शांति के उपाय भारत में कभी नहीं हुए। इसलिए भारत में ख़ासकर विंध्य के इस तरफ़ के भू-भाग में व्यापार कभी नहीं फला-फूला जबकि विंध्य के दक्षिण में व्यापार फिर भी रहा। यही कारण है कि कम्बोडिया से लेकर मलयेशिया और इंडोनेशिया में तमिल और तेलगू मूल के लोग खूब बसे हैं।

इसी तरह केरल के लोग ईसा पूर्व से अरबों के साथ समुद्री व्यापार करते रहे और वह चलता रहा। वहाँ समुद्र यात्रा करने अथवा विदेश जाने पर पाबंदी नहीं थी। गुजरात के लोग भी व्यापार के लिए दूसरे देशों में जाते रहे। उत्तर भारत में भी जब तक पाटलिपुत्र का साम्राज्य रहा और बुद्ध के बताए गए मार्ग को प्रश्रय मिला, यहाँ के भी सार्थवाह विदेशों तक जाते रहे। चीन और जापान तक न सिर्फ़ बौद्ध भिक्षु गए बल्कि सौदागरों का भी आना-जाना रहा। यूँ ही नहीं पाँचवीं शताब्दी में चीन से यहाँ फाहियान नामक एक यात्री आया बल्कि सातवीं शताब्दी में ह्वेनसाँग आया। ह्वेनसाँग एक बौद्ध संन्यासी था। वह नालंदा के बौद्ध विहार गया। संस्कृत सीखी और फिर वाराणसी तथा प्रयाग आया। प्रयाग के कुम्भ में उसका वार्तालाप सम्राट हर्षवर्धन से हुआ। जिसका वर्णन उसने अपने ग्रंथ में किया है।

आज चीन भले विचारों से साम्यवादी हो लेकिन उन्होंने साम्यवाद को अपनी संस्कृति और अपने समाज के अनुरूप ढाला है। वहाँ व्यापार है और चीन व्यापार करने को बढ़ावा भी खूब देता है। लेकिन पूँजी को कुछ दो-चार हाथों में बँधने नहीं देता। इसलिए चीन में कोई कारपोरेट घराना राज नहीं करता बल्कि राजनयिक बताते हैं कि व्यापारी अपनी संपदा को लोक हित में कैसे वितरित करें। इसीलिए चीन जिस देश में व्यापार करता है, वहाँ के लोगों की आस्थाओं को पूरा सम्मान देता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

India
China
indo-china
India China Trade
International Trade
indian economy
Economy of China

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

जब 'ज्ञानवापी' पर हो चर्चा, तब महंगाई की किसको परवाह?


बाकी खबरें

  • sedition
    भाषा
    सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामलों की कार्यवाही पर लगाई रोक, नई FIR दर्ज नहीं करने का आदेश
    11 May 2022
    पीठ ने कहा कि राजद्रोह के आरोप से संबंधित सभी लंबित मामले, अपील और कार्यवाही को स्थगित रखा जाना चाहिए। अदालतों द्वारा आरोपियों को दी गई राहत जारी रहेगी। उसने आगे कहा कि प्रावधान की वैधता को चुनौती…
  • बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    एम.ओबैद
    बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    11 May 2022
    "ख़ासकर बिहार में बड़ी संख्या में वैसे बच्चे जाते हैं जिनके घरों में खाना उपलब्ध नहीं होता है। उनके लिए कम से कम एक वक्त के खाने का स्कूल ही आसरा है। लेकिन उन्हें ये भी न मिलना बिहार सरकार की विफलता…
  • मार्को फ़र्नांडीज़
    लैटिन अमेरिका को क्यों एक नई विश्व व्यवस्था की ज़रूरत है?
    11 May 2022
    दुनिया यूक्रेन में युद्ध का अंत देखना चाहती है। हालाँकि, नाटो देश यूक्रेन को हथियारों की खेप बढ़ाकर युद्ध को लम्बा खींचना चाहते हैं और इस घोषणा के साथ कि वे "रूस को कमजोर" बनाना चाहते हैं। यूक्रेन
  • assad
    एम. के. भद्रकुमार
    असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की
    11 May 2022
    राष्ट्रपति बशर अल-असद का यह तेहरान दौरा इस बात का संकेत है कि ईरान, सीरिया की भविष्य की रणनीति का मुख्य आधार बना हुआ है।
  • रवि शंकर दुबे
    इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा यूपी में: कबीर और भारतेंदु से लेकर बिस्मिल्लाह तक के आंगन से इकट्ठा की मिट्टी
    11 May 2022
    इप्टा की ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा उत्तर प्रदेश पहुंच चुकी है। प्रदेश के अलग-अलग शहरों में गीतों, नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License