NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार में अवैध प्रवासी: क्या संघ की साज़िश में फंस गए नीतीश?
“यह कदम समाज में स्थायी नफ़रत और आतंक का माहौल बनाने की कवायद है। डिटेंशन सेंटर के इर्दगिर्द जो एजेंडा है, वह काफ़ी ख़तरनाक है।”
शशि शेखर
10 Sep 2021
नीतीश

नीतीश कुमार सेकुलर नेता हैं। इसमें कोइ शक नहीं है। लेकिन सत्ता सेकुलर लीडर को भी अपनी साजिश में फंसा ले, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है। जो नीतीश कुमार खुलेआम ये घोषणा कर चुके हैं कि वे राज्य में एनआरसी लागू नहीं करेंगे, अब वे “एनआरसी” जैसा कदम उठाने को क्यों मजबूर हो गए हैं? क्यों अब वे राज्य में असम जैसा हिरासत केंद्र बनाने की बात कर रहे हैं। और सबसे खतरनाक तो यह कि उनकी पुलिस अब आम लोगों से अपील कर रही है कि "संदिग्ध अवैध प्रवासियों" की रिपोर्ट निकटतम पुलिस स्टेशन में करें। इसके साथ ही, किशनगंज के जिलाधिकारी द्वारा डीपीआरओ को जारी एक अन्य पत्र में लोगों को किशनगंज में अवैध प्रवासियों की तत्काल आधार पर रिपोर्ट करने के लिए एक जागरूकता अभियान की योजना बनाने के लिए कहा गया है। अब ये सब देखने-सुनने में भले किसी को अच्छा लगे, लेकिन इसके निहितार्थ कितने खतरनाक हो सकते है, इसका अंदाजा तभी लगेगा जब आपका पड़ोसी आपको पुलिसिया कार्रवाई में फंसाने के लिए एक फोन कर के इतना भर कह दे कि फलां के घर में अवैध प्रवासी जैसा कोई व्यक्ति ठहरा हुआ है। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या नीतीश कुमार की सरकार पटना हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी या फिर संघ और भाजपा के इस एजेंडा को बिहार में लागू करेगी?  

क्या है पूरा मामला? 

दरअसल, 10 अक्टूबर 2015 को बांग्लादेश की एक महिला (कथित तौर पर ह्यूमन ट्रफिकिंग का शिकार) को पटना रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया था और उसे पटना स्थित रिमांड होम भेज दिया गया था। 5 साल बाद, पटना के एक वकील 2020 में बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट दायर की, जो उस बांग्लादेशी महिला की ओर से अदालत में उपस्थित हुए। 22 जुलाई, 2021 के अदालत के आदेश पर उक्त महिला को बांग्लादेश भेज दिया गया। आदर्श रूप से डिपोर्टेशन के बाद याचिका समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन, उसके बाद भी अदालत ने इस पर सुनवाई जारी राखी। अदालत ने 18 अगस्त, 2021 को अपने आदेश में बिहार सरकार से एक स्थायी निरोध केंद्र (डिटेंशन सेंटर) के निर्माण के लिए समय, स्थान और योजना सहित कई चीजों के बारे में पूछा। अदालत ने माना कि राज्य में एक डिटेंशन सेंटर की जरूरत है। सरकार से "अवैध विदेशियों" के बारे में जनता को जागरूक करने की रणनीति, डिजिटल और प्रिंट मीडिया के उपयोग का सुझाव देने की बात भी अदालत की तरफ से की गयी है। 

नफ़रत का स्थायी माहौल! 

न्यूजक्लिक ने इस मुद्दे पर जब भाकपा माले लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से बात की तो उनका कहना था, “बिहार में ऐसे किसी डिटेंशन सेंटर की जरूरत नहीं है। हम लोगों ने इसका पुरजोर विरोध करने का निर्णय लिया है।” वे इस व्यवस्था को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बताते हुए कहते हैं, “डिटेंशन सेंटर डेमोक्रेसी की कब्रगाह है, जहां किसी तरह का कोइ जस्टिस, ह्यूमन राइट्स नहीं है। असम में हमने ऐसा होता देखा है।” बातचीत में वे यह भी बताते है कि डिटेंशन सेंटर के जरिये असल में समाज में एक स्थायी नफ़रत-हिंसा-आतंक का माहौल बनाने के कोशिश की जा रही है, जहां कुछ लोग हमेशा यह साबित करने को विवश रहेंगे कि मैं अवैध प्रवासी नहीं हूँ वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो हमेशा इसके सहारे समाज में नफ़रत फैलाते रहेंगे। 

भूमिहीनों का क्या होगा? 

बिहार कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी का मानना है कि अवैध घुसपैठियों की पहचान तो की ही जानी चाहिए और यह भी जानने की कोशिश करनी चाहिए कि वो किन परिस्थितियों में अपना देश छोड़कर भारत आए और उनका मकसद क्या है। लेकिन यह काम बहुत ही पारदर्शी तरीके से करना होगा। असिटी नाथ तिवारी इस पर भी चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं, “बिहार में भूमिहीनों की आबादी बहुत बड़ी है और बहुत ही आसानी से इन भूमिहीनों को घुसपैठिया बताकर इनका शोषण किया जा सकता है। इसलिए सरकार को यह बताना चाहिए कि वह किस आधार पर किसी को घुसपैठिया घोषित करेगी।” 

जाहिर है, जिनके पास जमीन के दस्तावेज नहीं हैं उनकी भी कई पीढ़ियों ने इसी मिट्टी पर जन्म लिया है और इसी मिट्टी में मिले हैं‌। और आधार कार्ड से ले कर वोटर कार्ड तक, कोइ भी ऐसा राष्ट्रीय दस्तावेज नहीं है, सिवाए जमीन दस्तावेज के, जिससे किसी व्यक्ति की स्थायी भारतीय नागरिकता साबित की जा सके। तो क्या  किसी अवैध प्रवासी की पहचान किसी नागरिक की महज पहचान या फोन काल के आधार पर की जाएगी? असितनाथ कहते हैं, “इसके लिए एक साफ-सुथरी व्यवस्था बने और उस साफ-सुथरी व्यवस्था के तहत घुसपैठियों की पहचान की जाए। इसमें कोई जल्दबाजी ना हो। हड़बड़ी में किसी को डिटेंशन सेंटर में ना डाला जाए। पहचान के नाम पर लोगों का शोषण ना हो। अदालती आदेश की आड़ में सरकार संघ का एजेंडा न लागू करे। गुपचुप तरीके से एनआरसी पर अमल न किया जाए।” 

अदालत और सियासत 

देश में एनआरसी लागू करते वक्त मोदी सरकार का मानना था कि वो सिर्फ अदालती आदेश का पालन कर रही है। लेकिन, अदालत में दायर याचिका पूर्णत: राजनीतिक दुराग्रह से प्रेरित थी। लेकिन, जब असम में इसे लागू किया गया तब पाया गया कि लगभग 19 लाख लोग अपनी तरफ से उचित दस्तावेज पेश नहीं कर पाए और इस तरह वे एनआरसी से बाहर हो गए। इनमें भी हिन्दुओं की संख्या काफी थी। इससे इतर, यह प्रक्रिया इतनी खर्चीली और थकाऊ है, जिसे लागू कर पाने में राज्य सरकार खुद को असहज महसूस कर रही है। बजाय, असम के उदाहारण से सीखने के, अगर बिहार सरकार भी महज अदालती आदेश पर इसी तरह की प्रक्रिया (एनआरसी के जैसी ही) अपनाती है, तो निश्चित रूप से यह बिहार जैसे राज्य के लिए भारी बोझ साबित होने वाला है। आर्थिक और प्रशासनिक तौर पर भी और राजनीतिक तौर पर भी।     

भाजपा बिहार के सीमांचल क्षेत्र में हमेशा से कमजोर रही है। यहाँ राजद, कांग्रेस और अब ओवैसी की पार्टी का कब्जा रहा है। इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी भी अच्छी-खासी है। किशनगंज में 70 फ़ीसदी मुस्लिम हैं, वहीं पूर्णिया में 38 फ़ीसदी, कटिहार में 43 फ़ीसदी और अररिया में 42 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी है। चूंकि, यह इलाका पश्चिम बंगाल के करीब है, इसलिए भाजपा के लिए यहां बांग्लादेश घुसपैठियों का मुद्दा उठाना आसान और मुफीद रहा है। लेकिन, एक बार अगर यह मुद्दा बिहार में गरमाया तो सांप्रदायिक रूप से कम तनावग्रस्त रहने वाला यह राज्य पूरी तरह से सांप्रदायिकता की आग में जल सकता है। क्योंकि, फिर इसका असर सीमांचल से ले कर मिथिलांचल तक होगा। क्या सूबे के मुखिया नीतीश कुमार इस तथ्य को नहीं जानते-समझते/ निश्चित जानते-समझते हैं। फिर, उनकी ऐसी क्या मजबूरी है कि वे अदालती आदेश को संघ/भाजपा के एजेंडे को पूरा करने का जरिया बनने देना चाहते है? 

स्कूल नहीं हिरासत केंद्र बनेगा  

बहरहाल, जो बिहार सरकार पिछले 5 साल में केंद्र प्रायोजित 2 एकलव्य मॉडल रेसिडेंशियल स्कूल को फंक्शनल नहीं कर सकी, वो अब अदालत के आदेश पर हिरासत केंद्र बनाएगी। शायद बिहार के विकास के लिए स्कूल से ज्यादा हिरासत केंद्र की जरूरत है। शायद 20 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश कुमार जैसे विजनरी स्टेट्समैन के लिए भी “विकास” की परिभाषा बदल गयी है। और गोविन्दाचार्य के शब्दों में कहें तो शायद बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार भी अटल बिहारी बाजपेयी बन गए हैं। यानी, संघ के मुखौटे। जैसे कभी अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के मुखौटे कहे गए, क्या नीतीश कुमार भी बिहार एनडीए के मुखौटे बना दिए गए हैं? 

Bihar
Nitish Kumar
Illegal migrants
migrants

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

मिड डे मिल रसोईया सिर्फ़ 1650 रुपये महीने में काम करने को मजबूर! 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’

बिहार में ज़िला व अनुमंडलीय अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी


बाकी खबरें

  • veto
    एपी/भाषा
    रूस ने हमले रोकने की मांग करने वाले संरा के प्रस्ताव पर वीटो किया
    26 Feb 2022
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शुक्रवार को इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 और विपक्ष में एक मत पड़ा। चीन, भारत और संयुक्त अरब अमीरात मतदान से दूर रहे।
  • Gujarat
    राजेंद्र शर्मा
    बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!
    26 Feb 2022
    छुट्टा जानवरों की आपदा का शोर मचाने वाले यह नहीं भूलें कि इसी आपदा में से गोबर-धन का अवसर निकला है।
  • Leander Paes and Rhea Pillai
    सोनिया यादव
    लिएंडर पेस और रिया पिल्लई मामले में अदालत का फ़ैसला ज़रूरी क्यों है?
    26 Feb 2022
    लिव-इन रिलेशनशिप में घरेलू हिंसा को मान्यता देने वाला ये फ़ैसला अपने आप में उन तमाम पीड़ित महिलाओं के लिए एक उम्मीद है, जो समाज में अपने रिश्ते के अस्तित्व तो लेकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022: किस तरफ होगा पूर्वांचल में जनादेश ?
    26 Feb 2022
    इस ख़ास बातचीत में परंजॉय गुहा ठाकुरता और शिव कुमार बात कर रहे हैं यूपी चुनाव में पूर्वांचाल की. आखिर किस तरफ है जनता का रुख? किसको मिलेगी बहुमत? क्या भाजपा अपना गढ़ बचा पायेगी? जवाब ढूंढ रहे हैं…
  • manipur
    शशि शेखर
    मणिपुर चुनाव: भाजपा के 5 साल और पानी को तरसती जनता
    26 Feb 2022
    ड्रग्स, अफस्पा, पहचान और पानी का संकट। नतीजतन, 5 साल की डबल इंजन सरकार को अब फिर से ‘फ्री स्कूटी’ का ही भरोसा रह गया है। अब जनता को तय करना है कि उसे ‘फ्री स्कूटी’ चाहिए या पीने का पानी?    
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License