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भारत को फ़ाइव आइज़ देशों के साथ नहीं होना चाहिए
क्या भारत अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों से बने किसी समूह से जुड़ गया है?  हमें विदेशमंत्री के उत्साह के बावजूद इस सवाल पर गंभीरता से आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।
एम. के. भद्रकुमार
11 Jul 2020
Hong Kong protests

लद्दाख में सीमा पर तनाव की पृष्ठभूमि के बरक्स भारतीय मीडिया में जो अवधारणा बनी है, उसके हिसाब से हमारी विदेश-नीति में क्वाड और व्यापक रूप से अमेरिका की ओर आये झुकाव ही भारत-चीन सम्बन्धों के बीच आपसी विश्वास के टूटने के पीछे का कारण है। चीनी बयानों में बार-बार इस बात को लेकर खेद व्यक्त किया गया है कि नेतृत्व स्तर (वुहान और चेन्नई संपर्क में) पर आम सहमति से पैदा हुई उनकी वे उम्मीदें खरी नहीं उतर पायी है, जिसमें कहा गया था कि दोनों में से कोई भी पक्ष एक दूसरे पक्ष को प्रतिद्वंद्वी नहीं मानेगा।

हालांकि, भारतीय अवधारणा इस बात को समझ पाने में नाकाम रही कि दिल्ली और कैनबरा के बीच 2014 के बाद से विकसित हुई नज़दीकी हाल के वर्षों में चीनी सुरक्षा के लिहाज से एक ज़बरदस्त बढ़त है। दोनों पक्षों ने "सुरक्षा के क्षेत्र में नज़दीकी द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए" सुरक्षा सहयोग को लेकर इस फ़्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किये थे।

बात यह है कि हम ऑस्ट्रेलिया को पश्चिमी प्रशांत में अमेरिका के एक ऐसे शांतचित्त साथी के रूप में देखते हैं, जो पनीर और क्रिकेट के लिए मशहूर है। हालांकि वास्तविकता तो यही है कि ऑस्ट्रेलिया चीन के ख़िलाफ़ निर्देशित एंग्लो-अमेरिकी क्षेत्रीय रणनीतियों में एक ऐसी भूमिका निभाता है,जिसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता है।

ऑस्ट्रेलिया फ़ाइव आइज़ से जुड़ा हुआ है, इस पश्चिमी ख़ुफ़िया प्रणाली की तीन बुनियादी मंडलियां हैं। इन फ़ाइव आइज़ के साथ जो एक और मंडली है, उसे नाइन आईज़ के नाम से जाना जाता है और एक बाहरी मंडली भी है, जिसे फ़ोर्टीन आइज़ कहा जाता है। यह किसी प्याज़ के छिलके को उतराने जैसा है; जब आप प्याज़ के कंद तक पहुंचते हैं, तो आप अंततः फ़ाइब आइज़ (जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल हैं) को पाते हैं।

द फ़ाइव आइज़ शीत युद्ध के दौर के समय सामने आने वाला एक ऐसा समझौता है, जिसे यूके-यूएसए समझौता भी कहा जाता था। यह सोवियत ख़ुफ़िया सूचना को डिकोड करने के मक़सद से एक विशेष ख़ुफ़िया-साझाकरण समझौता है। 1950 के दशक के अंत तक कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड भी इस एंग्लो-अमेरिकन ख़ुफ़िया प्रणाली में शामिल हो गये। ये पांच अंग्रेज़ी भाषी देश फ़ाइव आइज़ गठबंधन बनाते हैं और आज हम इसे इसी नाम से जानते हैं।

सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध की समाप्ति के बावजूद, समय के साथ उनके बीच ख़ुफ़िया-साझाकरण समझौता मज़बूत होता गया है। सही मायने में इस सुपर-सीक्रेट फ़ाइव आइज़ के वजूद को केवल 2003 से ही जाना जाने लगा। एडवर्ड स्नोडेन की बदौलत हम इसके बारे में 2013 से बहुत कुछ जान गये हैं।

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नाइन आइज़ और फ़ोर्टीन आइज़ बुनियादी तौर पर इस फ़ाइव आइज़ के गठबंधन के ही विस्तार हैं। हालांकि ये देश फ़ाइव आइज़ गठबंधन के रूप में एक-दूसरे के साथ जितनी ज़्यादा जानकारी साझा करते हैं, उतनी ज़्यादा जानकारी नाइन आइज़ और फ़ोर्टीन आइज़ के साथ साझा नहीं कर सकते हैं, फिर भी वे सक्रिय रूप से और स्वेच्छा से अंतर्राष्ट्रीय ख़ुफ़िया-साझाकरण में भाग लेते हैं।

यह कहना काफ़ी होगा कि 4 जून को भारत-ऑस्ट्रेलिया वर्चुअल शिखर सम्मेलन के सिलसिले में पीछे मुड़कर जब नज़र डाली जाय, तो यह एक डर पैदा करने वाली घटना की तरह दिखेगी। इसके लिए जो वक्त चुना गया था, वह बहुत ही भयानक था, क्योंकि उस समय भारत-चीन गतिरोध के बीच अचानक सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था और कोविड-19 के चलते हांगकांग में चल रहे हलचलों पर पाबंदी लगा दी गयी थी।

उस भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई शिखर सम्मेलन में बहुत सारे प्रतीक थे। वास्तव में इसका पेचीदा और दिलचस्प हिस्सा तो यही है कि प्रधानमंत्री मोदी के सहयोगी आख़िर इस तरह के कार्यक्रम की योजना बनाकर अपने अविवेकी होने का परिचय कैसे दे सकते हैं, क्योंकि उस दरम्यान हिमालय में तनाव व्याप्त था! क़यास लगाया जा सकता है कि शायद अमेरिकी विदेश मंत्री (और पूर्व सीआईए निदेशक) माइक पोम्पिओ ने ही इस विचार को बढ़ावा दिया होगा?

अब, हांगकांग फ़ाइव आइज़ का एक खेल का मैदान बन गया है। सभी दिशाओं से मिल रही ख़बरों से तो यही पता चलता है कि ऑस्ट्रेलियाई ख़ुफ़िया हांगकांग में तबाही पैदा करने के लिए फ़ाइव आइज़ की तरफ़ से चलाये जा रहे खुफिया ऑपरेशन के अग्रिम मोर्चे पर रहा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने हाल के दिनों में इसके पर्याप्त संदर्भ दिये हैं। इस संदर्भ के कुछ अंश इस प्रकार हैं:

“हम अमेरिकी पक्ष से आग्रह करते हैं कि वे इस स्थिति को समझें, अंतर्राष्ट्रीय क़ानून और अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के बुनियादी मानदंडों का पालन करें, किसी भी ज़रिये से हांगकांग के मामलों में हस्तक्षेप करना बंद करें...अन्यथा, चीन कठोरता के साथ इसका जवाब देगा और अमेरिका इसके नतीजों को भुगतेगा...यही वजह है कि पोम्पिओ और उनके जैसे लोग इस क़ानून (हांगकांग के लिए हाल ही में अधिनियमित) को लेकर चाहे जितना भी हाय-तौबा मचा लें, मगर पहले की तरह जब-तब और अनियंत्रित तरीक़े से वे चीन की संप्रभुता और सुरक्षा को खतरे में नहीं डाल पायेंगे। यह क़ानून हांगकांग के लिए सेंधमारी से बचाने वाले किसी सुरक्षित दरवाज़े की तरह है।”

अफ़सोसनाक है कि हांगकांग में चीन को अस्थिर करने वाले पश्चिमी गुप्त ऑपरेशनों के तार भारतीय सुरक्षा एजेंसियों से जोड़ने को लेकर मीडिया रिपोर्टें आती रही हैं। भारत फ़ाइव आइज़ से जुड़ा हुआ नहीं है और इसलिए, शायद इन रिपोर्टों की सत्यता संदिग्ध है। लेकिन, ये रिपोर्टें ग़लतफ़हमी ज़रूर पैदा करती हैं।

असल में ऐसी ही एक रिपोर्ट में कहा गया था कि हांगकांग में संपन्न एनआरआई समुदाय के व्यापारिक प्रतिष्ठानों का हिंसक छात्र-प्रदर्शनकारियों की सभा के लिए गुप्त स्थल के रूप में दुरुपयोग किया गया था। (अगर यह सच है, तो लाखो की संख्या में हांगकांग में स्थित संपन्न भारतीय समुदाय के व्यवसायों को ख़तरे में डालने वाला यह कार्य निंदनीय है।) कम से कम एक भारतीय टीवी चैनल ने तो चीन में हो रहे उन विरोध प्रदर्शनों को सही ढंग से हमारे लिविंग रूम तक पहुंचाने के लिए दिल्ली से हांगकांग भेजी गयी एक टीम को नियुक्त कर दिया था।

हांगकांग, ताइवान, तिब्बत, झिंजियांग -ये चीन की आंतरिक सुरक्षा के मुख्य मुद्दे हैं। कोई भी देश, विदेशी दखल को राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के ऐसे गंभीर क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति नहीं देता है। अप्रत्याशित रूप से एक साल तक सहयोग नहीं मिलने के साथ-साथ हांगकांग में पश्चिमी गुप्तचर विभाग के हिंसात्मक आचरण की झलक मिलने के बाद बीजिंग अपने कमान में राष्ट्रीय साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ रहा है। 

बीजिंग का मतलब ही कारोबार है। ख़बरों के मुताबिक़, चीन के राज्य सुरक्षा मंत्रालय, जो सबसे बड़ी ख़ुफ़िया और राजनीतिक सुरक्षा एजेंसी है, उसने औपचारिक रूप से इस हफ़्ते हांगकांग में एक ऑफ़िस खोल लिया है। इसका मक़सद फ़ाइव आइज़ के उस बिन्दू का पता लगाना है,जहां खेले जा रहे खेल का आख़िरी चरण नज़र आये।

फ़ाइव आइज़ के विदेश मंत्रियों ने बुधवार को हांगकांग में उभरती स्थिति पर चर्चा करने के लिए आपस में बातचीत की है। कनाडा, यूके और ऑस्ट्रेलिया ने हांगकांग के लोगों के लिए अपने वीज़ा प्रतिबंधों में ढील देने की योजना की घोषणा भी की है। मानवीय भावना की आड़ में आने वाले दिनों में चीन से बाहर रहने और लड़ने के लिए फ़ाइव आइज़ के एजेंटों और सहयोगियों द्वारा वहां लोगों को हटाने को लेकर एक गुप्त निकासी योजना शुरू की जा रही है।

जाहिर है, बुधवार को राष्ट्रपति शी चिनपिंग की तरफ़ से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को किये गये फोन कॉल को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। शी ने दोनों देशों के आंतरिक मामलों में "बाहरी तोड़फोड़ और हस्तक्षेप" का मुक़ाबला करने में चीन-रूस सहयोग की अहमियत का ज़िक़्र किया।

क्रेमलिन के आधिकारिक बयान में ज़ोर देकर कहा गया है, "दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने संप्रभुता की रक्षा करने, आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को रोकने और अंतर्राष्ट्रीय़ाकानून की सर्वोच्चता सुनिश्चित करने को लेकर एक दूसरे देशों को मज़बूती के साथ खड़ा होने के लिए समर्थन दिया है।" (मेरा ब्लॉग देखें-रशिया, चाइना कीप द ‘ड्रैगन’ इन फ़ॉग)। इस सिलसिले में भारत को हर क़दम एहतियात के साथ बढ़ाना चाहिए। यह भारत-चीन सम्बन्धों को जटिल बनाने वाला एक ऐसा गेम प्लान है, जिसे पूर्व-सीआईए निदेशक पोम्पिओ ने हाल ही में महामारी के बाद के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए विदेश मंत्रियों के एक नये गठबंध में भारत को शामिल करते हुए रचा है। उम्मीद है कि दिल्ली को अबतक समझ में आ गया  हो कि (पूर्व सीआईए निदेशक) पोम्पिओ चाहते क्या हैं। विदेशमंत्री जयशंकर ने पोम्पिओ की पहल की सराहना करते हुए ट्वीट किया, "इस काम को आगे जारी रखने पर हमारी नज़र रहनी चाहिए।"

पोम्पियो और विदेशमंत्री जयशंकर के अलावा, इस नये गठबंधन में इज़रायल, जापान और दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री भी शामिल हैं। अब, ये तीन देश (साथ में सिंगापुर) भी इस फ़ाइव आइज़ का "तीसरा-पक्ष योगदानकर्ता" देश हो गये हैं, जिन्हें सहयोगी सदस्य के तौर पर शामिल कर लिया गया है या जिनके बारे में संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि ये फ़ोर्टीन आइज़ गठबंधन के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान करेंगे। सवाल है कि क्या भारत ऐसे समूह से जुड़ गया है ? पोम्पिओ की पहल को लेकर विदेशमंत्री के उत्साह बावजूद  हमें इस सवाल पर गंभीरता के साथ आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।

अगर पीछे मुड़कर देखें, तो 2014 में प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा को सुशोभित करने वाला एक सहज भारत-ऑस्ट्रेलिया सुरक्षा समझौते के रूप में जिसकी शुरुआत हुई थी, उसने अब अपना मकाम और एक आकार हासिल कर लिया है। लेकिन, सवाल वही है कि एशिया-प्रशांत में पश्चिम के किसी पहरेदार के साथ का यह गठबंधन भारत के हितों को कितना आगे बढ़ा पाता है? क्या पूर्वी लद्दाख में इसका कोई सार्थक इस्तेमाल हुआ था? इसे लेकर लागत-लाभ विश्लेषण की ज़रूरत है।

सौजन्य: इंडियन पंचलाइन

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-

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