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तालिबान पर अपनी रणनीति में इतना पिछड़ा साबित क्यों हुआ भारत?
दुर्भाग्य से भारत में मोदी सरकार पिछले कुछ वक्त से हार्ले डेविडसन बाइक की पिछली सीट की सवारी में ही मशगूल रही। और यह मोटरसाइकिल उत्तरी अमेरिका की ओर भागती दिखी।
एम. के. भद्रकुमार
18 Sep 2020
तालिबान
दोहा, कतर, में 12 सितंबर, 2020 को अफगान शांति वार्ता के उद्घाटन समारोह में तालिबान प्रतिनिधिमंडल

इस साल मई में अफगानिस्तान समझौते के अमेरिकी प्रतिनिधि जलमय खलीलजाद दिल्ली आए थे। खलीलजाद की सलाह थी कि भारत को अब अपनी ख्याली दुनिया को छोड़ कर जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश करनी चाहिए। उसके लिए तालिबान से बातचीत शुरू करने का यह बिल्कुल सही वक्त है। लेकिन इस सलाह पर भारतीय टिप्पणीकारों ने उनकी खासी आलोचना की थी।

सदाशयता भरी जलमय की यह सलाह व्यावहारिक थी लेकिन भारत को यह समझ नहीं आया कि आखिर इसकी क्या जरूरत है। इसकी इतनी जल्दी क्यों हैं? भारत के अंदर कहीं यह बात गहरे धंसी थी कि शांति वार्ता शुरू होने में अभी वर्षों लगेंगे। हालांकि यह सही था कि उस दौरान अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए सभी पक्षों को सहमत करने में दिक्कतें आ रही थीं। लेकिन अमेरिका अफगानिस्तान की जंग खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा था ताकि नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप कोई बड़ा ऐलान कर सकें।

कहां चूक गई हमारी डिप्लोमेसी?

संयोग से इस सप्ताह न्यूयॉर्क स्थित यूरेशिया ग्रुप फाउंडेशन की एक रायशुमारी भी सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि दो तिहाई अमेरिकी अफगानिस्तान की 19 वर्ष पुरानी जंग छोड़ कर वापसी के पक्ष में हैं। सिर्फ 15 फीसदी लोग चाहते हैं कि अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी सैन्य तैनाती बरकरार रखनी चाहिए।

बहरहाल, खलीलजाद ने भारत को तालिबान से बातचीत शुरू करने की सलाह दी तो अधिकारियों ने व्यावहारिक सोच के बजाय उनके सामने वही पुराना राग दोहराना शुरू किया कि पाकिस्तान से पैदा आतंकवाद अफगानिस्तान में शांति में खलल डाल रहा है। अधिकारियों का कहना  था, “ भारत अफगान हिंदुओं और सिखों समेत अफगानिस्तानी समाज के हर वर्ग के अधिकारों की सुरक्षा चाहता है”।

विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया “ भारत ने  खलीलजाद से अपनी बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि अफगानिस्तान में अगर स्थायी शांति और सुरक्षा चाहिए तो पाकिस्तान में आतंकवादियों के सुरक्षित पनाहगाहों को खत्म करना होगा।

बयान में कहा गया कि भारत ने ‘अफगानिस्तान में हिंसा में आई तेजी’ पर अपनी गहरी चिंता जताई और तुरंत लड़ाई बंद करने की अपील की। भारत का कहना था कि इस वक्त अफगानिस्तान में कोरोनावायरस से जूझ रहे अफगानिस्तान के लोगों की मदद की जरूरत है।

साफ है कि विदेश मंत्रालय के अधिकारी अफगानिस्तान में भारत के पूरे दृढ़ रवैये को जाहिर कर रहे थे। लेकिन जब खलीलजाद एक बार फिर दिल्ली आ रहे हैं तो बदला हुआ माहौल उनके लिए एक सुखद आश्चर्य होगा (खलीलजाद 15 सितंबर को भारत दौरे पर आए)। क्योंकि अपने पिछले तेवरों के उलट वह भारतीय अधिकारियों को शांत होकर वही करते हुए पाएंगे, जिसकी सलाह उन्होंने मई की अपनी यात्रा में दी थी।

भारतीय अधिकारियों की यह कोशिश शुरू हो चुकी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर दोहा में हो रही अफगानिस्तान शांति वार्ता (दोहा फोरम) को 12 सितंबर को एक वर्चुअल मीटिंग के जरिये संबोधित कर चुके हैं। इसके अलावा विदेश मंत्रालय का एक सीनियर अफसर आनन-फानन में इस बातचीत के लिए आयोजित उद्घाटन समारोह में हिस्सा लेने के लिए रवाना किया जा चुका है।

विदेश मंत्रालय के एक और सीनियर अधिकारी ने दावा किया, “अफगानिस्तान में शांति के लिए संबंधित पक्षों से बातचीत को लेकर भारत के मन में कोई भ्रम नहीं था। अफगान सरकार और तालिबान के साथ बातचीत के लिए एक साथ बैठना भारत का रुख जाहिर करने के लिए काफी है। शांति वार्ता की मेजबानी कर रहे कतर के लिए सभी अहम पक्षों को बुलाए बगैर यह संभव नहीं था।”

भारत की तालिबान नीति में बिना शर्त यह जो यू-टर्न आया था वह इतना मुकम्मल था कि भारतीय अधिकारी रातोंरात इसे अपनी डिप्लोमेसी की महान ऐतिहासिक सफलता बता कर जश्न मनाने लगे। ऐसा लग रहा था कि तालिबान के साथ बातचीत की विशाल मेज के सामने बैठ कर वे दिव्य आनंद की अनुभूति कर रहे हों!

फिलहाल, इस पूरे खेल में भारत के हाथ से बाजी दूर ही रहेगी। इस मुकाम से आगे बाजी तालिबान और पाकिस्तान के हाथ में चली गई है। तालिबान ने अफगानिस्तान के कई जिलों पर फिर से कब्जा कर लिया है और अमेरिका समर्थित हजारों अफगान सैनिकों को मार डाला है। अब अमेरिका के घटते समर्थन की वजह से वहां अफगान सैनिकों की ताकत कम हो जाएगी। शायद ही वो अब तालिबान के सामने टिक पाएंगे।

कई जिलों में कब्जे के बाद अब यह और साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में कई और इलाकों पर उसका वर्चस्व हो जाएगा। यह स्थिति तभी रुकेगी जब लड़ाई तुरंत रोकने पर सहमति बन जाए। लेकिन इसकी संभावना नहीं दिखती। जैसे, इन वारदात को ही लीजिये। लोगार प्रांत के एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के घर पर तालिबान ने हमला किया और उनके एक भाई और निजी सुरक्षा गार्ड की हत्या कर दी। दूसरे भाई को घायल कर दिया। जलालाबाद सिटी में खुफिया एजेंसी की एक गाड़ी को दिन-दहाड़े आईईडी से उड़ा दिया गया। इस हमले में एजेंसी का एक अफसर और तीन अन्य लोग घायल हो गए।

पूरी तरह अलग-थलग पड़ा भारत

भारत के साथ असल दिक्कत यह है कि अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति में भारत पूरी तरह से अलग-थलग पड़ा हुआ है। अफगानिस्तान में शांति कायम करने के लिए दोहा में जो बातचीत चल रही है, उस पर असर डालने की उसकी क्षमता शून्य है। मई में खलीलजाद के सामने भारतीय अधिकारियों ने जो मांग रखी थी, उनमें से कोई भी पूरी नहीं हुई है।

तालिबान ने कई मुद्दों पर बड़े ही रणनीतिक ढंग से अपना रवैया अस्पष्ट रखा है। कई विवादास्पद मुद्दों मसलन भविष्य की सरकार के गठन, महिलाओं के अधिकार और नए संविधान जैसे मुद्दों पर उसने अपना अपना रवैया बिल्कुल भी साफ नहीं किया है।

दुर्भाग्य से भारत में मोदी सरकार पिछले कुछ वक्त से हार्ले डेविडसन बाइक की पिछली सीट की सवारी में ही मशगूल रही। और यह मोटरसाइकिल उत्तरी अमेरिका की ओर भागती दिखी। अगर अफगानिस्तान में भारत की नीति सधी हुई होती तो शायद वह आज इस देश का भविष्य तय करने वाली बातचीत में अहम भूमिका में होता। बातचीत भारत के मनमुताबिक नहीं होती तो भारत अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की तैनाती कर सकता था लेकिन लद्दाख में चीन के साथ तनातनी और नियंत्रण रेखा और कश्मीर तनाव की स्थिति में यह विकल्प उसके दायरे से बाहर हो गया है।

तालिबान की बदली हुई रणनीति

इन हालात के बीच दोहा में चल रही बातचीत में हिस्सा ले रहे तालिबानी दल में बदलाव पर गौर करना भी जरूरी हो गया है। तालिबान ने जिस तरह से कट्टरपंथी मौलवी अब्दुल हकीम हक्कानी को अपना प्रमुख वार्ताकार बनाया है, उसने कई शंकाओं को जन्म दिया है।  दरअसल, उदारवादी माने जाने वाले शेर मोहम्मद अब्बास स्तानकजाई और मुल्ला बारादर की जगह पर आए बेहद कट्टर हक्कानी तालिबान सुप्रीम हैबतुल्ला अखुनजादा के बेहद करीबी हैं। हक्कानी को प्रमुख वार्ताकार बना कर तालिबान ने यह संदेश देने की कोशिश की है वह भविष्य की सौदेबाजियों पर अपना सीधा नियंत्रण चाहता है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मौलवी हक्कानी के पाकिस्तान के साथ समीकरण कैसे हैं? पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के लिए मौलवी हक्कानी कोई नया नाम नहीं है क्योंकि वह क्वेटा में कई साल तक लो-प्रोफाइल में रहा है। 2001 में अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले के बाद यहीं पर अफगान तालिबान की पूरी लीडरशिप रह रही थी। मौलवी हाल तक वहां एक मदरसा चलाता था। यहीं से वह तालिबान का कोर्ट भी चलाता था और मौलवियों की एक काउंसिल का नेतृत्व करता था, जो इस्लामी अमीरात की विचारधारा के मुताबिक फतवे जारी किया करता था।

अहम बात यह है कि उम्र के छठे दशक की शुरुआत में चल रहे मौलवी को ऐसे समय में आगे कर तालिबान का मुख्य वार्ताकार बनाया गया, जब तालिबान और अफगान सरकार के बीच कैदियों की अदला-बदली की समस्या हल कर ली गई थी। शांति वार्ता के लिए दोहा में सजे मंच से पर्दा उठने से ठीक पहले मौलवी को मुख्य वार्ताकार बनाना एक तरह से आखिरी वक्त में बदली गई रणनीति थी।

फायदा किसका?

इस पूरे बदले हालात में किसका फायदा है? चीन बड़ी तेजी से चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर (CPEC)  को बढ़ा कर अफगानिस्तान तक ले जाने में लगा हुआ है. दूसरी ओर, पाकिस्तान ने शांति वार्ता पर अपनी पकड़ बना रखी है। इस पूरे मामले में तनाव अब चरम पर है। पाकिस्तान के पास अपना वीटो कार्ड है और वह इसका इस्तेमाल भारत को इस पूरी शांति प्रक्रिया के हाशिये पर रखने के लिए कमर कसे हुए है। पाकिस्तान और चीन सरकार के प्रति मोदी सरकार की अदावत को देखते हुए इससे अलग और उम्मीद ही क्या हो सकती थी?

बहरहाल, एक सप्ताह पहले अफगानिस्तान के उप राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह की हत्या की कोशिश को एक बड़ी चेतावनी के तौर पर लेने की जरूरत है। भारत अफगानिस्तान में अपनी परोक्ष लड़ाई हार चुका है और अफगानिस्तान लड़ाकों ने अपनी पैठ मजबूत कर ली है। फिलहाल कम से कम तालिबान की ओर हमारे कदम पाकिस्तान की पहल के समांतर बढ़ने चाहिए. खलीलजाद इस वक्त ज्यादा काम नहीं आने वाले।

साभार : Indian Punchline

इस लेख इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

India’s Overture to Taliban Comes too Late

Afghanistan
US
TALIBAN
India Doha
Donald Trump

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