NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
तालिबान पर अपनी रणनीति में इतना पिछड़ा साबित क्यों हुआ भारत?
दुर्भाग्य से भारत में मोदी सरकार पिछले कुछ वक्त से हार्ले डेविडसन बाइक की पिछली सीट की सवारी में ही मशगूल रही। और यह मोटरसाइकिल उत्तरी अमेरिका की ओर भागती दिखी।
एम. के. भद्रकुमार
18 Sep 2020
तालिबान
दोहा, कतर, में 12 सितंबर, 2020 को अफगान शांति वार्ता के उद्घाटन समारोह में तालिबान प्रतिनिधिमंडल

इस साल मई में अफगानिस्तान समझौते के अमेरिकी प्रतिनिधि जलमय खलीलजाद दिल्ली आए थे। खलीलजाद की सलाह थी कि भारत को अब अपनी ख्याली दुनिया को छोड़ कर जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश करनी चाहिए। उसके लिए तालिबान से बातचीत शुरू करने का यह बिल्कुल सही वक्त है। लेकिन इस सलाह पर भारतीय टिप्पणीकारों ने उनकी खासी आलोचना की थी।

सदाशयता भरी जलमय की यह सलाह व्यावहारिक थी लेकिन भारत को यह समझ नहीं आया कि आखिर इसकी क्या जरूरत है। इसकी इतनी जल्दी क्यों हैं? भारत के अंदर कहीं यह बात गहरे धंसी थी कि शांति वार्ता शुरू होने में अभी वर्षों लगेंगे। हालांकि यह सही था कि उस दौरान अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए सभी पक्षों को सहमत करने में दिक्कतें आ रही थीं। लेकिन अमेरिका अफगानिस्तान की जंग खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा था ताकि नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप कोई बड़ा ऐलान कर सकें।

कहां चूक गई हमारी डिप्लोमेसी?

संयोग से इस सप्ताह न्यूयॉर्क स्थित यूरेशिया ग्रुप फाउंडेशन की एक रायशुमारी भी सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि दो तिहाई अमेरिकी अफगानिस्तान की 19 वर्ष पुरानी जंग छोड़ कर वापसी के पक्ष में हैं। सिर्फ 15 फीसदी लोग चाहते हैं कि अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी सैन्य तैनाती बरकरार रखनी चाहिए।

बहरहाल, खलीलजाद ने भारत को तालिबान से बातचीत शुरू करने की सलाह दी तो अधिकारियों ने व्यावहारिक सोच के बजाय उनके सामने वही पुराना राग दोहराना शुरू किया कि पाकिस्तान से पैदा आतंकवाद अफगानिस्तान में शांति में खलल डाल रहा है। अधिकारियों का कहना  था, “ भारत अफगान हिंदुओं और सिखों समेत अफगानिस्तानी समाज के हर वर्ग के अधिकारों की सुरक्षा चाहता है”।

विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया “ भारत ने  खलीलजाद से अपनी बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि अफगानिस्तान में अगर स्थायी शांति और सुरक्षा चाहिए तो पाकिस्तान में आतंकवादियों के सुरक्षित पनाहगाहों को खत्म करना होगा।

बयान में कहा गया कि भारत ने ‘अफगानिस्तान में हिंसा में आई तेजी’ पर अपनी गहरी चिंता जताई और तुरंत लड़ाई बंद करने की अपील की। भारत का कहना था कि इस वक्त अफगानिस्तान में कोरोनावायरस से जूझ रहे अफगानिस्तान के लोगों की मदद की जरूरत है।

साफ है कि विदेश मंत्रालय के अधिकारी अफगानिस्तान में भारत के पूरे दृढ़ रवैये को जाहिर कर रहे थे। लेकिन जब खलीलजाद एक बार फिर दिल्ली आ रहे हैं तो बदला हुआ माहौल उनके लिए एक सुखद आश्चर्य होगा (खलीलजाद 15 सितंबर को भारत दौरे पर आए)। क्योंकि अपने पिछले तेवरों के उलट वह भारतीय अधिकारियों को शांत होकर वही करते हुए पाएंगे, जिसकी सलाह उन्होंने मई की अपनी यात्रा में दी थी।

भारतीय अधिकारियों की यह कोशिश शुरू हो चुकी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर दोहा में हो रही अफगानिस्तान शांति वार्ता (दोहा फोरम) को 12 सितंबर को एक वर्चुअल मीटिंग के जरिये संबोधित कर चुके हैं। इसके अलावा विदेश मंत्रालय का एक सीनियर अफसर आनन-फानन में इस बातचीत के लिए आयोजित उद्घाटन समारोह में हिस्सा लेने के लिए रवाना किया जा चुका है।

विदेश मंत्रालय के एक और सीनियर अधिकारी ने दावा किया, “अफगानिस्तान में शांति के लिए संबंधित पक्षों से बातचीत को लेकर भारत के मन में कोई भ्रम नहीं था। अफगान सरकार और तालिबान के साथ बातचीत के लिए एक साथ बैठना भारत का रुख जाहिर करने के लिए काफी है। शांति वार्ता की मेजबानी कर रहे कतर के लिए सभी अहम पक्षों को बुलाए बगैर यह संभव नहीं था।”

भारत की तालिबान नीति में बिना शर्त यह जो यू-टर्न आया था वह इतना मुकम्मल था कि भारतीय अधिकारी रातोंरात इसे अपनी डिप्लोमेसी की महान ऐतिहासिक सफलता बता कर जश्न मनाने लगे। ऐसा लग रहा था कि तालिबान के साथ बातचीत की विशाल मेज के सामने बैठ कर वे दिव्य आनंद की अनुभूति कर रहे हों!

फिलहाल, इस पूरे खेल में भारत के हाथ से बाजी दूर ही रहेगी। इस मुकाम से आगे बाजी तालिबान और पाकिस्तान के हाथ में चली गई है। तालिबान ने अफगानिस्तान के कई जिलों पर फिर से कब्जा कर लिया है और अमेरिका समर्थित हजारों अफगान सैनिकों को मार डाला है। अब अमेरिका के घटते समर्थन की वजह से वहां अफगान सैनिकों की ताकत कम हो जाएगी। शायद ही वो अब तालिबान के सामने टिक पाएंगे।

कई जिलों में कब्जे के बाद अब यह और साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में कई और इलाकों पर उसका वर्चस्व हो जाएगा। यह स्थिति तभी रुकेगी जब लड़ाई तुरंत रोकने पर सहमति बन जाए। लेकिन इसकी संभावना नहीं दिखती। जैसे, इन वारदात को ही लीजिये। लोगार प्रांत के एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के घर पर तालिबान ने हमला किया और उनके एक भाई और निजी सुरक्षा गार्ड की हत्या कर दी। दूसरे भाई को घायल कर दिया। जलालाबाद सिटी में खुफिया एजेंसी की एक गाड़ी को दिन-दहाड़े आईईडी से उड़ा दिया गया। इस हमले में एजेंसी का एक अफसर और तीन अन्य लोग घायल हो गए।

पूरी तरह अलग-थलग पड़ा भारत

भारत के साथ असल दिक्कत यह है कि अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति में भारत पूरी तरह से अलग-थलग पड़ा हुआ है। अफगानिस्तान में शांति कायम करने के लिए दोहा में जो बातचीत चल रही है, उस पर असर डालने की उसकी क्षमता शून्य है। मई में खलीलजाद के सामने भारतीय अधिकारियों ने जो मांग रखी थी, उनमें से कोई भी पूरी नहीं हुई है।

तालिबान ने कई मुद्दों पर बड़े ही रणनीतिक ढंग से अपना रवैया अस्पष्ट रखा है। कई विवादास्पद मुद्दों मसलन भविष्य की सरकार के गठन, महिलाओं के अधिकार और नए संविधान जैसे मुद्दों पर उसने अपना अपना रवैया बिल्कुल भी साफ नहीं किया है।

दुर्भाग्य से भारत में मोदी सरकार पिछले कुछ वक्त से हार्ले डेविडसन बाइक की पिछली सीट की सवारी में ही मशगूल रही। और यह मोटरसाइकिल उत्तरी अमेरिका की ओर भागती दिखी। अगर अफगानिस्तान में भारत की नीति सधी हुई होती तो शायद वह आज इस देश का भविष्य तय करने वाली बातचीत में अहम भूमिका में होता। बातचीत भारत के मनमुताबिक नहीं होती तो भारत अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की तैनाती कर सकता था लेकिन लद्दाख में चीन के साथ तनातनी और नियंत्रण रेखा और कश्मीर तनाव की स्थिति में यह विकल्प उसके दायरे से बाहर हो गया है।

तालिबान की बदली हुई रणनीति

इन हालात के बीच दोहा में चल रही बातचीत में हिस्सा ले रहे तालिबानी दल में बदलाव पर गौर करना भी जरूरी हो गया है। तालिबान ने जिस तरह से कट्टरपंथी मौलवी अब्दुल हकीम हक्कानी को अपना प्रमुख वार्ताकार बनाया है, उसने कई शंकाओं को जन्म दिया है।  दरअसल, उदारवादी माने जाने वाले शेर मोहम्मद अब्बास स्तानकजाई और मुल्ला बारादर की जगह पर आए बेहद कट्टर हक्कानी तालिबान सुप्रीम हैबतुल्ला अखुनजादा के बेहद करीबी हैं। हक्कानी को प्रमुख वार्ताकार बना कर तालिबान ने यह संदेश देने की कोशिश की है वह भविष्य की सौदेबाजियों पर अपना सीधा नियंत्रण चाहता है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मौलवी हक्कानी के पाकिस्तान के साथ समीकरण कैसे हैं? पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के लिए मौलवी हक्कानी कोई नया नाम नहीं है क्योंकि वह क्वेटा में कई साल तक लो-प्रोफाइल में रहा है। 2001 में अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले के बाद यहीं पर अफगान तालिबान की पूरी लीडरशिप रह रही थी। मौलवी हाल तक वहां एक मदरसा चलाता था। यहीं से वह तालिबान का कोर्ट भी चलाता था और मौलवियों की एक काउंसिल का नेतृत्व करता था, जो इस्लामी अमीरात की विचारधारा के मुताबिक फतवे जारी किया करता था।

अहम बात यह है कि उम्र के छठे दशक की शुरुआत में चल रहे मौलवी को ऐसे समय में आगे कर तालिबान का मुख्य वार्ताकार बनाया गया, जब तालिबान और अफगान सरकार के बीच कैदियों की अदला-बदली की समस्या हल कर ली गई थी। शांति वार्ता के लिए दोहा में सजे मंच से पर्दा उठने से ठीक पहले मौलवी को मुख्य वार्ताकार बनाना एक तरह से आखिरी वक्त में बदली गई रणनीति थी।

फायदा किसका?

इस पूरे बदले हालात में किसका फायदा है? चीन बड़ी तेजी से चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर (CPEC)  को बढ़ा कर अफगानिस्तान तक ले जाने में लगा हुआ है. दूसरी ओर, पाकिस्तान ने शांति वार्ता पर अपनी पकड़ बना रखी है। इस पूरे मामले में तनाव अब चरम पर है। पाकिस्तान के पास अपना वीटो कार्ड है और वह इसका इस्तेमाल भारत को इस पूरी शांति प्रक्रिया के हाशिये पर रखने के लिए कमर कसे हुए है। पाकिस्तान और चीन सरकार के प्रति मोदी सरकार की अदावत को देखते हुए इससे अलग और उम्मीद ही क्या हो सकती थी?

बहरहाल, एक सप्ताह पहले अफगानिस्तान के उप राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह की हत्या की कोशिश को एक बड़ी चेतावनी के तौर पर लेने की जरूरत है। भारत अफगानिस्तान में अपनी परोक्ष लड़ाई हार चुका है और अफगानिस्तान लड़ाकों ने अपनी पैठ मजबूत कर ली है। फिलहाल कम से कम तालिबान की ओर हमारे कदम पाकिस्तान की पहल के समांतर बढ़ने चाहिए. खलीलजाद इस वक्त ज्यादा काम नहीं आने वाले।

साभार : Indian Punchline

इस लेख इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

India’s Overture to Taliban Comes too Late

Afghanistan
US
TALIBAN
India Doha
Donald Trump

Related Stories

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

सीमांत गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष: सभी रूढ़िवादिता को तोड़ती उनकी दिलेरी की याद में 

भारत ने खेला रूसी कार्ड

भारत को अफ़ग़ानिस्तान पर प्रभाव डालने के लिए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की ज़रूरत है

कैसे कश्मीर, पाकिस्तान और धर्मनिर्पेक्षता आपस में जुड़े हुए हैं

भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति

रिपोर्ट के मुताबिक सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की जलवायु योजनायें पेरिस समझौते के लक्ष्य को पूरा कर पाने में विफल रही हैं 

अगर तालिबान मजबूत हुआ तो क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ेगा असर?

बाइडेन प्रशासन अफ़ग़ानों के साथ जो कर रहा है वह क्रूरता है!


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License