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भारत की लद्दाख में बची-खुची गुंजाइश
साफ़ शब्दों में कहा जाये, तो अमेरिका के साथ भारत के मंत्रिस्तरीय संवाद का कोई वास्तविक नतीजा सामने नहीं आया है।
एम. के. भद्रकुमार
31 Oct 2020
भारत की लद्दाख में बची-खुची गुंजाइश
दिल्ली में 27 अक्टूबर, 2020 को मीडिया को संबोधित करते भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (दाएं) और अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो (बाएं)।

संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ ‘2+2' मंत्रिस्तरीय वार्ता अपने पीछे अनिश्चितताओं का निशान छोड़ते हुए ख़त्म हो गयी है। सही मायने में इसका कोई वास्तविक नतीजा सामने नहीं आया है। बातें, बातें और महज़ बातें ही हमारे पास हैं, ऐसी बातें,जो हर किसी को स्तब्ध कर दे। शब्दों की बाज़ीगरी के अलावा, ठोस नतीजों के तौर पर कुछ भी ख़ास नहीं है।

2+2 के बाद जारी किया गया संयुक्त बयान किसी घटना को सारांश रूप में रखने वाली प्रकृति की तरह ज़्यादा है। इसके अलावा एक नये अमिरका-भारत हेल्थ डायलॉग के संदर्भ में एक अनूठा परिवर्धन दिखायी देता है। यह एक स्वागत योग्य परिवर्धन है।

अमेरिका और भारत, दोनों ही वैश्विक महामारी में सबसे बुरी तरह प्रभावित होने वाले देशों के रूप में बराबर के मुक़ाबले में हैं और वे आपस में अच्छे और बुरे तमाम अनुभवों को साझा कर सकते हैं। जितनी जल्दी यह हेल्थ डायलॉग शुरू हो, उतना ही अच्छा है। अगर अमेरिका आज भारत को अपने पुराने सिस्टम से आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के निर्माण में मदद कर सकता है, तो लाखों-करोड़ों भारतीय हमेशा के लिए उसका आभारी रहेंगे।

1990 के दशक के दूसरे भाग में जब बिल क्लिंटन प्रशासन ने भारत में नये सिरे से रुचि ली थी, तो इस बात को लेकर बहुत ज़्यादा उम्मीदें पाली गयी थीं कि नये रिश्ते गुणात्मक रूप से सामाजिक क्षेत्रों में भारत के पुनर्जागरण में मदद करेंगे। लेकिन, अफ़सोस की बात है कि जैसे-जैसे साल बीतते गये, वैसे-वैसे पूरा ध्यान सैन्य मामलों पर केंद्रित होने लगा और हथियारों के खेप बेचने वाले, हथियारों के बिचौलिये और हथियारों के लॉबिस्ट केंद्र में आते गये, और बाक़ी "पारस्परिकता" का शोर एकदम से थम गया।

डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में तो इंसानियत से जुड़े विषयों को लेकर जो कुछ भी बचा था, उसे भी छोड़ दिया गया। इस समय निश्चित ही रूप से चीन का उदय दोनों देशों के लिए एक आंखों का कांटा बन गया है, और दोनों देशों के बीच के इस रिश्ते को एक ऊर्जा प्रदान करता है।

यही कारण है कि 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी चुनाव से ठीक एक हफ़्ता भर पहले  ‘2+2' की बैठक तय कर देना एक पहेली बना हुआ है। अमेरिका इस समय एक गंभीर राजनीतिक बदलाव में फंसा हुआ है, और इस बात का कोई मतलब नहीं है कि चुनाव में जीत किसे हासिल होती है, क्योंकि अमेरिकी नीतियों का बदल जाना तय है। इसके अलावे, अमेरिकी घरेलू राजनीति के घनघोर बहाव के बीच अमेरिका-भारतीय रिश्तों को थामने की कोशिश का कोई तार्किक आधार नहीं दिखता है।

इसके बावजूद '2+2' की बैठक तय कर दी गयी। पूर्वी लद्दाख में चल रहा गतिरोध तक़रीबन छह महीने पुराना है। लेकिन, दिल्ली में अमेरिकी विदेश मंत्री, माइक पोम्पिओ के आने से हम उन चीनी लोगों के कमज़ोर किये जाने को लेकर उम्मीद नहीं कर सकते, जो उन्हें गंभीरता से लेते ही नहीं हैं। पोम्पिओ चीनियों के लिए किसी Centaur से कहीं ज़्यादा गेम की दुकान की अलमारियों में सज़े बहलाने वाला बोलता हुआ एक ऐसे खिलौने हैं, जिसे चलता किया जाना चाहिए।

इसलिए, निष्कर्ष यही हो सकता है कि हम शायद उनके लिए किसी रस्मी दावत की व्यवस्था करने के लिए बाध्य थे, क्योंकि यह उनके लिए शायद एक आख़िरी कूटनीतिक घटनाक्रम साबित हो और यही कि उस बीईसीए पर हस्ताक्षर किए जा सकें, जिसके अंतर्गत पेंटागन के लिए अनिवार्य है कि वह साझीदारों के साथ सैन्य सूचनाओं, सैन्य सुविधाओं, अत्यधिक संवेदनशील संचार साज़-ओ-सामान और भू-स्थानिक मानचित्रों को साझा करे।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भू-स्थानिक ख़ुफ़िया जानकारियां और तत्काल ली गयी उसकी फ़ोटो चीन के साथ चल रहे भारत के गतिरोध में भारतीय सेना के लिए उपयोगी हैं, क्योंकि सर्दी आ गयी है और चीन के इरादों का लगातार मूल्यांकन किये जाने की ज़रूरत है। 3 नवंबर से पहले बीईसीए के किसी भी तरह के स्थगन के कारण इसमें देरी होने का जोखिम तब तक बना रहता, जब तक कि नया प्रशासनिक अमला नहीं आ जाता है, जिसमें कि कई महीने लग सकते हैं।

विश्लेषकों की नज़र में भारत के लिए बीईसीए एक 'ताक़त बढ़ाने वाला ऐसा घटक' है, जो निश्चित तौर पर सैन्य क्षमता में चीन से काफ़ी कमतर है। सवाल है कि क्या यह एक 'गेम-चेंजर' साबित होगा? लेकिन, चीन भी ऐसी क्षमताओं के लिए जाना जाता है। यह कहना पर्याप्त होगा कि बीईसीए के होते हुए भी चीन के मुक़ाबले सैन्य क्षमता में यह फ़र्क़ एक हक़ीक़त है।

इसके अलावा, बीईसीए के साथ तालमेल बनाये रखना या उसकी तरफ़ से मुहैया कराये जाने वाले इनपुट उनके इस्तेमाल के किसी बिंदु के बाहर उपयोगी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि सत्तर प्रतिशत भारतीय हथियार रूसी मूल के हैं, जिनके लिए अमेरिकी तकनीक सेवायें किसी काम के नहीं हो सकती हैं।

निश्चित रूप से अमेरिका को भी भारतीय रक्षा क्षमताओं को लेकर एक समझ विकसित होगी और यहां तक कि ज़रूरत पड़ने पर वह हमारी कमियों को दुरुस्त करने की स्थिति में भी होगा। अमेरिका इस धरती पर ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी साइबर क्राइम का बेताज बादशाह है। जिस किसी को भी यह जानने की उत्सुकता हो कि ऐसी चीज़ें कैसे हो पाती हैं, तो उसे एडवर्ड स्नोडेन के संस्मरण,’परमामनेंट रिकॉर्ड’ को ज़रूर पढ़ना चाहिए।

रूस के सामने भविष्य में भारत को अत्याधुनिक सैन्य तकनीक हस्तांतरित करते हुए ख़तरा महसूस करने की स्थिति बन सकती है। इसके अलावा, भारत को अमेरिका के साथ चीन से सम्बन्धित उन डेटा और ख़ुफ़िया जानकारी को साझा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है, जो एंग्लो-सैक्सन देशों के साथ अमेरिका की फ़ाइव आइज़ वाले गठबंधन के लिए इनपुट बन सकता है। इस पर चीन का ध्यान ज़रूर होगा।

इस बीईसीए पर हस्ताक्षर करने के साथ ही भारत ने चार मूलभूत समझौतों में से उस अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये हैं, जो अपने वास्तविक सहयोगी के रूप में पात्र होने को लेकर अमेरिका किसी भी देश के लिए वक़ालत करता है। अगर, दूसरे शब्दों में कहें, तो ब्रिक्स और एससीओ में भारत की सदस्यता की ताक़त में कमी आयेगी।

अंतर्राष्ट्रीय धारणा तो यही बनेगी कि एक अमेरिकी-भारतीय सैन्य गठबंधन इस क्षेत्र के भू-राजनीति में समाने आ रहा है। इससे भारत के कई पारंपरिक मित्रों और पड़ोसियों के भारत के प्रति रवैये पर असर पड़ेगा और उन देशों के  बीच निराशा पैदा होना और युद्ध जैसी स्थिति पैदा होना भी तय है।

अगर अमेरिकी रक्षा मंत्री, मार्क एस्पर के शब्दों को उधार लेते हुए कहा जाय, तो इस बीच अमेरिका ने इस बात की परिकल्पना कर ली है कि भारत "21 वीं सदी की सबसे अहम साझेदारों में से एक बन सकता है।" असल में बीईसीए लगातार भारत को उस "पारस्परिकता" की अनिवार्यता की याद दिलायेगा, जो इस बात की मांग करती है कि भारत, अमेरिका के सहयोगियों की तरह ही अपने हथियारों के जखीरे को किसी दूसरे देश के हथियारों की जगह अमेरिकी हथियारों से भर ले। (यह एक अहम बात है)।

इस “पारस्परिकता” की यह ज़रूरत होगी कि भारत रूसी हथियार पर अपनी निर्भरता को लगातार कम करता जाये। बिल्कुल ग़लती न करें, क्योंकि ख़ास तौर पर उस समय,जब "समय पर आज़माये गये" भारत-रूसी मित्रता जैसे ही कमज़ोर पड़ेगी, इसे लेकर भारत की अनुमति को सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के पास अपने राजनैतिक-सैन्य उपाय मौजूद हैं।

असल में मुद्दा तो यही है कि यह "पारस्परिकता" रूस के बाज़ार की गुंज़ाइश को नकारते हुए अमेरिका को अपने हथियार उद्योग के घरेलू औद्योगिक आधार को विस्तार देने में सक्षम बनायेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को लेकर इन्हीं बातों को रखना हमारा बड़ा मक़सद है। एस्पर ने पिछले सप्ताह ज़बरदस्त तरीक़े से अपनी बात को रखते हुए कहा था, "हमें (अमेरिका) उन चीन और रूस के साथ प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, जिनके सरकारी स्वामित्व वाले उद्योग जिस तरीके से सैन्य निर्यात में तेज़ी ला सकते हैं, उस तरीक़े से हम नहीं ला सकते हैं…

“चूंकि बीजिंग और मास्को दुनिया के हथियार बाज़ार में अपने-अपने हिस्से का विस्तार करने के लिए काम करते हैं, वे दूसरे देशों को अपने सुरक्षा नेटवर्क की तरफ़ आकर्षित करते हैं, रिश्तों को विकसित करने के संयुक्त राज्य अमेरिका की कोशिशों को चुनौती देते हैं, और ठीक उसी तरह भविष्य में संचालित होने वाले परिवेश को जटिल बना देते हैं। इन्हीं चुनौतियों की रौशनी में हमने संयुक्त राज्य अमेरिका को वैश्विक बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने और सहयोगियों और साझेदारों के साथ अपने सहयोग को मज़बूत करने के लिए अपने तौर-तरीक़ों में सुधार करने का निश्चय किया है।”

अमेरिका अपने एशियाई साझेदारों को चीन विरोधी मोर्चे में शामिल होने के लिए तैयार करवाने को लेकर बेचैन है। यह समझ में आता है कि मोदी अपने दूसरे कार्यकाल में भारत की गुटनिरपेक्षता के पारंपरिक राजनयिक सिद्धांतों को त्यागने और अमेरिका के क़रीब जाने के लिए जवाबदेह हो सकते हैं। सीधे-सरल शब्दों में कहा जाये तो '2+2' की पहुंच बीईसीए से आगे निकल जाती है।

हालांकि, जैसे ही अमेरिका में चुनाव का दौर समाप्त होता है,तो उसके बाद लगभग निश्चित है कि अगला प्रशासन पोम्पिओ के इस बड़बोले बयानबाज़ी को ठंडे बस्ते में डालने वाला है। सवाल है कि ऐसी स्थिति में फिर क्या होगा? हिमालय के पार चीन का वजूद भारत के लिए अभी भी एक कठोर वास्तविकता है। चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय जुड़ाव अब भी अहम होगा।

अमेरिका-भारतीय सैन्य गठबंधन पर इस श्रृंखला के पहले के दो हिस्सों को हिन्दी और अंग्रेज़ी में नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

Emerging Contours of the US-Indian Military Alliance

अमेरिकी-भारतीय सैन्य गठबंधन की उभरती रूपरेखा

A Sixth Eye to Spy on Tibet, Xinjiang

तिब्बत, शिनजियांग पर जासूसी करने वाली छठी आंख

अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस मूल आलेख को भी पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

India’s Remains of the Day in Ladakh

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