NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अफ़ग़ान की चर्चित अंतरिम सरकार को लेकर भारत सावधान – भाग 1
अब्दुल्ला को इस बात की पूरी उम्मीद होगी कि जब समय आएगा, जो कि बहुत ही पास है, दिल्ली ग़नी के साथ चल रहे अपने अशांत रिश्ते के गतिरोध को तोड़ने में एक रचनात्मक भूमिका निभायेगी।
एम. के. भद्रकुमार
15 Oct 2020
नई दिल्ली, 5 अक्टूबर, 2020 को भारत के एनएसए अजीत डोभाल (बायें) ने अफ़ग़ान राष्ट्रीय उच्च सुलह परिषद के अध्यक्ष,अब्दुल्ला (दायें) से मुलाक़ात की।
नई दिल्ली, 5 अक्टूबर, 2020 को भारत के एनएसए अजीत डोभाल (बायें) ने अफ़ग़ान राष्ट्रीय उच्च सुलह परिषद के अध्यक्ष,अब्दुल्ला (दायें) से मुलाक़ात की।

अफ़ग़ानिस्तान की राष्ट्रीय सुलह उच्च परिषद के अध्यक्ष अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह का नई दिल्ली दौरा कई कारणों से एक बहुत अहमियत वाली घटना बन जाती है, इस समय दोहा में चल रही शांति प्रक्रिया के मद्देनज़र भारत की अफ़ग़ान नीतियों को फिर से क़ायम करने को लेकर इसकी वास्तविक क्षमता सबसे अहम है।

अब्दुल्लाह इस्लामाबाद की उस उच्च प्रोफ़ाइल दौरे के 10 दिन बाद दिल्ली आये, जो 12 वर्षों में पाकिस्तान की राजधानी की उनका पहला दौरा था। 1980 के दशक में सोवियत कब्ज़े के ख़िलाफ़ अफ़ग़ान ‘जिहाद’ की अवधि के दौरान अहमद शाह मसूद के क़रीबी सहयोगी के तौर पर अब्दुल्लाह ने पाकिस्तान से सभी तरह की दूरी बनाये रखी। भारत, क़ाबुल पर मुजाहिदीन के अधिग्रहण के तुरंत बाद 1990 के दशक से ही उन्हें जानता था।

एक लोकतांत्रिक मिज़ाज और प्रतिबद्ध धर्मनिरपेक्ष मूल्यों वाले एक अफ़ग़ान राष्ट्रवादी के तौर पर अब्दुल्ला ने अफ़ग़ानिस्तान के आधुनिक ताक़तों की अगुआई करने वाले ऐसे विश्ववादी नज़रिये वाले नेता के तौर पर भारत के साथ ख़ुद को जोड़े रखा,जो कि इस उपमहाद्वीप में वास्तव में दुर्लभ है।

यक़ीनन अपने फ़ायदे-नुक़सान की मानसिकता वाले पाकिस्तानी प्रतिष्ठान की नज़र में अब्दुल्ला के दामन पर लंबे समय तक भारत का दोस्त होने का दाग़ रहा है। जब तक अब्दुल्ला पाकिस्तानी जासूसों और कूटनीतिज्ञों की नज़र में अब्दुल्ला का बनना शुरू नहीं हो गया, तब तक वे अपने तालिबान प्रोजेक्ट से आगे बढ़ने के दौरान अब्दुल्लाह को एक मामूली खिलाड़ी के रूप में नजरअंदाज़ ही करते रहे, पाकिस्तान ने जल्द ही अब्दुल्ला से रिश्ते बढ़ाना शुरू कर दिया, क्योंकि उन्हें किसी की परवाह करनी थी।

इसी बीच अब्दुल्ला का क़द भी बढ़ने लगा और एक परिपक्व, व्यावहारिक राजनीतिज्ञ और राष्ट्रीय शख़्स के तौर पर उनका निरंतर हो रहा रूपांतरण एक सम्मोहक वास्तविकता बन गया। यह सब उस ग़ैर-मामूली गर्मजोशी, शिष्टाचार और आतुरता को दिखाता है,जिसके साथ इस्लामाबाद ने प्रोटोकॉल से आगे जाकर अब्दुल्ला के लिए एक लाल कालीन बिछा दी।

वास्तव में यह कोई रहस्य तो है नहीं कि अब्दुल्ला वाशिंगटन की तरफ़ से मिलते मजबूत समर्थन वाले क़ाबुल की ओर से "अफ़ग़ान नेतृत्व, अफ़ग़ान स्वामित्व और अफ़ग़ान नियंत्रित" शांति प्रक्रिया को रफ़्तार देने के लिये आगे आये हैं। सच कहा जाय तो, यह ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन (अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान से सम्बद्ध) ही था,जिसने सबसे पहले इस बात विचार को सामने रखा था कि अब्दुल्ला की वक़त महज़ उस डॉक्टर की तरह थी,जो अफ़ग़ान मरीज़ के लिए दवा लिखे। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन  के अध्यक्ष,जॉन एलेन ने यह निबंध मई में लिखा था,जिसमे कहा गया था-

“अब्दुल्ला किसी ऐसी व्यापक टीम का नेतृत्व करने वाला एक उत्कृष्ट पसंद है,जो अफ़ग़ान राजनीतिक नेताओं, पार्टियों, अफ़ग़ान महिलाओं और नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व करती है। जैसा कि उन्होंने बताया है कि उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति, करज़ई के साथ काम किया है,जो इन सब मामलों के ख़ुद ही एक अहम खिलाड़ी हैं,लेकिन वे करज़ई के विरोधी भी रहे हैं। उन्होंने ग़नी के साथ काम किया है और उनके विरुद्ध अभियान भी चलाये थे। उन्होंने अपने देश की सेवा बतौर विदेश मंत्री की है। उन्होंने पिछले दो विवादास्पद राष्ट्रपति चुनावों में अपने देश के बने रहने में मदद की है। और साथ ही साथ उनकी पश्तून और ताजिक वाली मिली जुली विरासत उन्हें एकदुट करने वाली स्वाभाविक शख़्सियत भी बनाती है। ग़ौरतलब है कि अब्दुल्ला का संयुक्त राज्य अमेरिका और दुनिया भर में गहरा सम्मान है।”

अमेरिकी प्रतिष्ठानों का मुख्य विचार यही रहा है कि अब्दुल्ला पर शांति प्रक्रिया को भंग नहीं किये जाने को लेकर भरोसा किया जा सकता है और इसके बजाय कि इसे किसी एक दिशा में आगे बढ़ाया जाये, यह ज़्यादा मुफ़ीद होगा कि इससे अमेरिकी हितों को समायोजित किया जाये, हालांकि सेना की वापसी जल्द या बाद में शुरू होगी।

बेशक, दोहा में हो रही वह बातचीत आने वाले दिनों में एक निर्णायक पल की ओर इशारा करती है, जिसमें हिंसा में कमी पर समझ बनने की संभावना है, यह वार्ता काबुल में संभावित नयी सत्ता-साझेदारी व्यवस्था से जुड़ी हुई है, भारतीय प्रतिष्ठान अफ़ग़ान राजनीतिक परिदृश्य पर अब्दुल्ला के क़द और बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं।

पाकिस्तान के भरोसे और यक़ीन को (स्पष्ट रूप से) जीतने में अब्दुल्ला की कामयाबी ने तालिबान पर भी असर डाला होगा और काबुल में आकार लेने वाली किसी भी अंतरिम सत्ता-साझादारी की व्यवस्था में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका में निर्णायक कारक बन सकता है।

लेकिन,यहां एक चेतावनी भी है। मौजूदा राष्ट्रपति,अशरफ़ ग़नी को इसके पहले रास्ता बनाने और फिर परिदृश्य से हट जाने को लेकर सहमत होना चाहिए, जो कि जितना कहना आसान है,उतना करना आसान है नहीं ।

सामरिक दबाव

5 अक्टूबर को ग़नी की अचानक दोहा के लिए रवानगी और अब्दुल्ला का भी दिल्ली के लिए कूच करने जैसी गतिविधि से पता चलता है कि इस चतुर राजनेता के पास छठी इंद्रिय है, जो उसे समझाती है कि उसके पैरों तले ज़मीन खिसक रही है। ग़नी ने दोहा में शांति वार्ता आयोजित करने वाले क़तर के मेजबानों और उनके प्रतिनिधिमंडल से मिलने की उम्मीद की, लेकिन उस तालिबान से नहीं, जो उनसे बात नहीं करेगा।

ग़नी को अमेरिकी सेना और सुरक्षा प्रतिष्ठान के उन वर्गों से समर्थन हासिल है, जो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के "हमेशा के लिए इस युद्ध" से छुटकारा दिलाने को लेकर राष्ट्रपति ट्रम्प की योजनाओं से नाराज़ हैं। जैसा कि कल्पना की जा सकती है कि ऐसे भी अलग-अलग हित समूह हैं, जो इस युद्ध की मुनाफ़ाखोरी पर पल-बढ़ हैं, वे युद्ध की लूट के आदी हो चुके हैं, और वे जबतक संभव हो,इस फ़ायदे के धंधे के चलाये रखना चाहते हैं।

इसके अलावा, वाशिंगटन बेल्टवे की प्रभावशाली शीत युद्ध लॉबी अभी तक रूस के साथ सहज नहीं हो पायी है। ख़ासकर चीन के साथ बढ़ती प्रतिद्वंद्विता का भी दबाव है कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैन्य ठिकानों को बरक़रार रखे। किर्गिस्तान में चल रही मौजूदा उथल-पुथल भी अमेरिकी प्रतिष्ठान की शीत युद्ध लॉबी के संकल्प को ही मज़बूत करेगी।

ग़ौरतलब है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) से जुड़े एक प्रसिद्ध चीनी विश्लेषक ने हाल ही में लिखा था कि ऐसी कोई संभावना नहीं है कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से सेना हटायेगा और उसका आख़िरी एजेंडा वखन कॉरिडोर पर नियंत्रण हासिल करना होगा। पीएलए युद्ध अनुसंधान विभाग के सैन्य विज्ञान संस्थान के विदेशी सैन्य अनुसंधान संस्थान के एक शोधकर्ता, ली यून का विश्लेषण कुछ इस तरह है,

“इस साल (चुनावी वर्ष) तालिबान के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने का सबसे सीधा कारण ट्रम्प का चुनावी अभियान है। लेकिन,अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का सबसे बुनियादी कारण अमेरिका की शक्ति में आयी गिरावट के चलते पड़ने वाला सामरिक दबाव है …

“अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर अमेरिका की वापसी का पड़ने वाला प्रभाव अमेरिका की वापसी योजना पर निर्भर करता है। पहला विकल्प तो अमेरिका को अपने वादे को पूरा करना और अपने सैनिकों को पूरी तरह से वापस लेने का है… (लेकिन) तालिबान के पूरी तरह से अफ़ग़ानिस्तान को नियंत्रित करने की संभावना है। अमेरिकी सेना की वापसी की घोषणा का किया जाना एक बार फिर से संयुक्त राज्य अमेरिका की वियतनाम युद्ध की नाकामी को दोहराये जाने की तरह है और ऐसा होना एक तरह से संयुक्त राज्य अमेरिका के पतन की पुष्टि करना है। यह कुछ वैसी स्थिति है,जिसका सामना एकमात्र महाशक्ति  इस समय नहीं करना चाहती है।”

“दूसरा विकल्प वह सीरियाई मॉडल है, जिसमें संयुक्त राज्य महज़ कुछ ही अहम इलाक़ों पर अफना नियंत्रण रखे। भू-राजनीतिक नज़रिये से अमेरिका के लिए अफ़ग़ानिस्तान के सबसे अहम इलाक़े, वखन कॉरिडोर है। हालांकि, यह कॉरिडोर बेहद छोटा है और चीन, पाकिस्तान और ताजिकिस्तान से घिरा हुआ है।”

“तीसरा विकल्प अमेरिकी समर्थक शासन के वजूद को बनाये रखने को लेकर सैनिकों की सीमित वापसी है… हालांकि, यह योजना अफ़ग़ानिस्तान को विभाजन और उथल-पुथल की स्थिति में डालती रहेगी, यह सामरिक दबाव के लिहाज से अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण को जारी रखने में मदद करेगा।”

“तुलनात्मक रूप से अमेरिका की तरफ़ से तीसरे विकल्प के अपनाये जाने की ज़्यादा संभावना है। ठीक इसी तरह, अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सामरिक दबाव (अमेरिकी) किसी भी तरह से चुनाव परिणामों से प्रभावित नहीं होगा। ऐसा इसलिए है,क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में सामरिक दबाव का कार्यान्वयन अमेरिकी शक्ति और राष्ट्रीय हितों से निर्धारित होता है, और ऐसा करना दोनों ही पार्टियों की स्थापित नीति रही है।”

अगर अलग तरीक़े से कहा जाये, तो ग़नी का अमेरिकी रणनीतिक हलकों के भीतर काफी असर है, हालांकि ट्रम्प प्रशासन और ट्रम्प की तरफ़ से उनसे व्यक्तिगत तौर पर दूरी बनाकर रखा गया है।

बहुत हद तक अब्दुल्ला को इस बात की ज़बरदस्त उम्मीद होगी कि जब समय आयेगा, जो कि तेज़ी से पास आ रहा है, दिल्ली ग़नी के साथ परेशान चल रहे उनके रिश्ते में गतिरोध को तोड़ने में एक रचनात्मक भूमिका निभायेगी। लेकिन,भारतीय बयानों में कहा गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान में स्थायी शांति और समृद्धि के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया है और अफ़ग़ानिस्तान में व्यापक और स्थायी युद्ध विराम के प्रयासों का स्वागत किया है।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

India Wary as Afghans Discuss Interim Govt – Part 1

Afghanistan
Abdullah Abdullah
US
TALIBAN
Pakistan
PM MODI
us elections
US Army
Donald Trump
Ashraf Ghani

Related Stories

कानपुर हिंसा: दोषियों पर गैंगस्टर के तहत मुकदमे का आदेश... नूपुर शर्मा पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं!

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

जम्मू-कश्मीर के भीतर आरक्षित सीटों का एक संक्षिप्त इतिहास

सिख इतिहास की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करता प्रधानमंत्री का भाषण 

100 राजनयिकों की अपील: "खामोशी से बात नहीं बनेगी मोदी जी!"

प्रधानमंत्री जी... पक्का ये भाषण राजनीतिक नहीं था?

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

कार्टून क्लिक: इमरान को हिन्दुस्तान पसंद है...

कश्मीरी माहौल की वे प्रवृत्तियां जिनकी वजह से साल 1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ

फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये


बाकी खबरें

  • hisab kitab
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश में क्यों पनपती है सांप्रदायिक राजनीति
    24 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले वहां सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत फिर से हो गयी है। सवाल यह है कि उप्र में नफ़रत फैलाना इतना आसान क्यों है? इसके पीछे छिपी है देश में पिछले दस सालों से बढ़ती बेरोज़गारी
  • night curfew
    रवि शंकर दुबे
    योगी जी ने नाइट कर्फ़्यू तो लगा दिया, लेकिन रैलियों में इकट्ठा हो रही भीड़ का क्या?
    24 Dec 2021
    देश में कोरोना महामारी फिर से पैर पसार रही है, ओमिक्रोन के बढ़ते मामलों ने राज्यों को नाइट कर्फ़्यू लगाने पर मजबूर कर दिया है, जिसके मद्देनज़र तमाम पाबंदिया भी लगा दी गई है, लेकिन सवाल यह है कि रैलियों…
  • kafeel khan
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोरखपुर ऑक्सिजन कांड का खुलासा करती डॉ. कफ़ील ख़ान की किताब
    24 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के इस वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार परंजोय गुहा ठाकुरता डॉ कफ़ील ख़ान की नई किताब ‘The Gorakhpur Hospital Tragedy, A Doctor's Memoir of a Deadly Medical Crisis’ पर उनसे बात कर रहे हैं। कफ़ील…
  • KHURRAM
    अनीस ज़रगर
    मानवाधिकार संगठनों ने कश्मीरी एक्टिविस्ट ख़ुर्रम परवेज़ की तत्काल रिहाई की मांग की
    24 Dec 2021
    कई अधिकार संगठनों और उनके सहयोगियों ने परवेज़ की गिरफ़्तारी और उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामलों को कश्मीर में आलोचकों को चुप कराने का ज़रिया क़रार दिया है।
  •  boiler explosion
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    गुजरात : दवाई बनाने वाली कंपनी में बॉयलर फटने से बड़ा हादसा, चपेट में आए आसपास घर बनाकर रह रहे श्रमिक
    24 Dec 2021
    गुजरात के वडोदरा में बॉयलर फटने से बड़ा हादसा हो गया, जिसकी चपेट में आने से चार लोगों की मौत हो गई, जबकि कई घायल हुए जिनका इलाज अस्पताल में जारी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License