NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
घटते जंगलों से बेपरवाह समाज, चेतावनी देती रिपोर्टें
इस वर्ष जनवरी में आई 'भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट' कहीं खुशी, कहीं निराशा और कहीं चिंता जाहिर करती है। 
शिरीष खरे
02 Feb 2022
forest
पारिस्थितिक संतुलन के लिए वनों को कुल भूमि क्षेत्र पर 33 प्रतिशत की आवश्यकता होती है, जबकि भारत में कुल भूमि क्षेत्र पर लगभग 24 प्रतिशत जंगल है। प्रतीकात्मक फोटो: शिरीष खरे 

एक नजर यदि पूरी दुनिया के जंगलों पर डालें, तो हमें अंधाधुंध विकास की कीमत का अंदाजा हो जाएगा और यह भी कि पूरी मानवीय सभ्यता आखिर जा किस दिशा में रही है। प्रश्न है कि जंगल और उसकी संपदा के बूते 'मॉडर्न वर्ल्ड' की हर नवीनतम तकनीक की सूचना रखने वाले लोगों को क्या यह भी पता है कि दुनिया के जंगल किस तेजी से सिकुड़ रहे हैं।

विश्व स्तर पर हर साल लगभग एक करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र घट रहा है। जाहिर है कि विकास के लिए भारत में भी जंगल कटता है, लेकिन इस वर्ष जनवरी में आई 'भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट' कहीं खुशी, कहीं निराशा और कहीं चिंता जाहिर करती है। ऐसा इसलिए कि भारत में 2,261 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की वृद्धि कुछ हद तक आश्वस्त करती है। लेकिन, इस मामूली वृद्धि को इस तथ्य के साथ दर्ज किये जाने की आवश्यकता है कि वनावरण क्षेत्र देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का महज 24 प्रतिशत ही रह गया है।

वहीं, पिछले दस वर्षों में देश में 52 टाइगर रिजर्व के वन क्षेत्र में 22.62 वर्ग किलोमीटर की गिरावट आई है, जो बाघ संरक्षण के लिए एक नई चुनौती है। जाहिर है जहां बाघ हैं वहां का भी जंगल कट रहा है। यह तथ्य हमें यह एहसास दिलाने के लिए काफी है कि वन क्षेत्र नहीं बचा, तो हमारी वन विरासत भी नहीं बच पाएगी। 

पारिस्थितिक संतुलन के लिए चाहिए जंगल

सामान्य: तथ्यों से ऐसा लग सकता है कि अभी तो हमारे पास काफी जंगल बचा हुआ है, इसलिए इस तरह की रिपोर्ट और आलेख प्रकाशित होना मानो एक रूटीन का भाग है। लेकिन, घटते वनों के पूरे परिदृश्य को समझना है, तो हमें पारिस्थितिक संतुलन की अवधारणा को भी जान लेना चाहिए। दरअसल, पारिस्थितिक संतुलन के लिए वनों को कुल भूमि क्षेत्र पर 33 प्रतिशत की आवश्यकता होती है, जबकि हमारे पास कुल भूमि क्षेत्र पर लगभग 24 प्रतिशत जंगल शेष है। पारिस्थितिक संतुलन के मुताबिक पूरी दुनिया में जहां-जहां जंगल है, उसे हिस्से में दुनिया के 80 प्रतिशत जीव-जंतुओं का रहवास है। इन्हीं वनों, वन्य-जीवों और संपदाओं पर मनुष्य का अस्तित्व निर्भर है।

तीव्र जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण बड़े पैमाने पर हो रही वनों की कटाई से कोई इंकार नहीं कर सकता है। प्रकृति के बिगड़ते चक्र और ग्लोबल वार्मिंग का असर पहले से ही महसूस किया जा रहा है। 'संयुक्त राष्ट्र' द्वारा पिछले साल जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है, ''एक तिहाई संक्रामक रोग वनों की कटाई के कारण होते हैं।"

इन प्रभावों का परिणाम जलवायु परिवर्तन पर पड़ता है। यही वजह है कि सरकारों द्वारा वन क्षेत्र को बढ़ाने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। लिहाजा, पिछले कुछ वर्षों में भारत में सामाजिक वानिकी, वन उत्सव, वृक्षारोपण जैसी योजनाओं को गंभीरता से लागू किया गया है।

1987 से हो रहा वन क्षेत्र का अध्ययन

भारत में कई वर्षों से जारी सामाजिक वानिकी, वन उत्सव, वृक्षारोपण जैसी योजनाओं का सकारात्मक असर अब दिखना शुरू हो रहा है, जिसकी पुष्टि हाल में प्रकाशित 'भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट' से होती है। बता दें कि अपने देश में वन क्षेत्र का अध्ययन वर्ष 1987 से प्रारंभ हुआ। यह अध्ययन प्रत्यक्ष सर्वेक्षण और उनसे प्राप्त जानकारी के आधार पर किया जाता है।

90 के दशक से इस दिशा में उपग्रह इमेजरी, साथ ही रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीक का उपयोग भी किया जा रहा है। कुल वन वृक्ष के मुकाबले यदि 10% से कम वृक्षारोपण हो तो उसे 'जंगल' की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। जाहिर है कि किसी स्थान का जंगल बचाने के लिए उस स्थान पर 10% से अधिक वृक्षारोपण की दरकार होती है।

इसी तरह, वन क्षेत्र को 'झाड़ी वन', 'दुर्लभ वन', 'मध्यम सघन वन' और 'अत्यंत सघन वन' के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 'भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट' हर दो साल में प्रकाशित होती है, जिससे देश भर में वन क्षेत्र की स्थिति के बारे में अपडेट किया जा सके। जैसा कि कहा जा चुका है कि इस साल जारी रिपोर्ट ने भारत को थोड़ी राहत दी है। हालांकि, इस रिपोर्ट में वन क्षेत्रों पर अतिक्रमण एक प्रमुख मुद्दा है। इसलिए, राज्य के साथ-साथ केंद्र सरकार के लिए भी यह रिपोर्ट इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि वह इस चुनौती से कैसे निपटेगी।

मध्य-प्रदेश सूची में सबसे ऊपर

बता दें कि देश का वन और वृक्ष आच्छादन क्षेत्र 8.09 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, वर्ष 2019 की तुलना में इसमें 2,261 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। अब तक एक अच्छी बात यह है कि भारत के 17 राज्यों के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेशों में उनके भौगोलिक क्षेत्र के 33% से अधिक भाग पर वन हैं। मध्य-प्रदेश सूची में सबसे ऊपर है, इसके बाद अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र हैं।

हालांकि, सबसे बड़े वन क्षेत्र वाले मध्य-प्रदेश में पिछले दो वर्षों में वन क्षेत्र के दौरान गिरावट देखी गई है। 'सघन' और 'अत्यंत सघन' वन क्षेत्र की दोनों श्रेणियों में क्रमश: 11 और 132 वर्ग किलोमीटर तक वनों की कटाई चौंकाती है। दूसरी तरफ, महाराष्ट्र में 20 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की वृद्धि सुखद लगती है। यहां 'सघन' और 'अत्यंत सघन' वन क्षेत्र की दोनों श्रेणियों में क्रमश: 13 और 17 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। जाहिर है कि इसमें पिछले दस वर्षों में महाराष्ट्र में लागू की गई वृक्षारोपण योजना ने प्रमुख भूमिका निभाई है।

देश के विभिन्न राज्यों द्वारा वन क्षेत्र को बढ़ाने के प्रयास किए गए। महाराष्ट्र के अलावा पांच राज्यों में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 647 वर्ग किलोमीटर, उसके बाद तेलंगाना 632 वर्ग किलोमीटर, ओडिशा 537 वर्ग किलोमीटर, कर्नाटक 155 वर्ग किलोमीटर और झारखंड 110 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ा है। हालांकि, पूर्वोत्तर राज्यों के प्रदर्शन में गिरावट आई है। अरुणाचल प्रदेश ने 257 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र खो दिया है। फिर मणिपुर 249 वर्ग किलोमीटर, नागालैंड 235 वर्ग किलोमीटर, मिजोरम 186 वर्ग किलोमीटर और मेघालय 73 वर्ग किलोमीटर जंगल कटा है।

पूर्वोत्तर राज्यों में घट रहा जंगल

पूर्वोत्तर राज्यों में वन क्षेत्र एक हजार 20 वर्ग किलोमीटर कम हो गया है और अब इन राज्यों में कुल वन क्षेत्र एक लाख 69 हजार 521 वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश के पर्वत, पहाड़ी और आदिवासी जिलों में वन क्षेत्र घटा है। पिछले दो वर्षों में देश के पर्वतीय क्षेत्रों में वनावरण में 902 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, देश का वन भंडार 79.4 मिलियन टन है। वर्ष 2019 के बाद से इसमें 7,204 मिलियन टन की वृद्धि हुई है। वहीं, बाघ संरक्षण क्षेत्र देश के कुल वन क्षेत्र का 7.8 प्रतिशत है। भारत में 52 बाघ परियोजनाओं में से 20 बाघ परियोजनाओं के वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है और 32 बाघ परियोजनाओं के वन क्षेत्र में कमी आई है। बाघ के रास्ते में जंगल 11 हजार 575 वर्ग किलोमीटर है। रिपोर्ट में ग्लोबल वार्मिंग को भी देखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और केंद्र शासित प्रदेशों में तापमान बढ़ गया है।

वहीं, महाराष्ट्र में बांस के आवरण एक हजार 882 वर्ग किलोमीटर कम हो गया है। मध्य-प्रदेश के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी गिरावट है। 2019 में राज्य का पंजीकृत बांस क्षेत्र 15,408 वर्ग किलोमीटर था, जो 2021 में 13 हजार 526 वर्ग किलोमीटर रह गया है।

बेशक गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर-प्रदेश जैसे राज्य अन्य राज्यों की तुलना में अधिक वन विरासत संरक्षित कर रहे हैं। लेकिन, इस साल की रिपोर्ट में इन राज्यों को भी वन विरासत संरक्षित करने के लिए अपने प्रयासों को तेज करने की चेतावनी दी गई है।

(शिरीष खरे पुणे स्थित स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

forest
forest department
forest right act
forest policy

Related Stories

सामूहिक वन अधिकार देने पर MP सरकार ने की वादाख़िलाफ़ी, तो आदिवासियों ने ख़ुद तय की गांव की सीमा

जब जम्मू-कश्मीर में आर्द्रभूमि भूमि बन गई बंजर


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License