NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
भारतीय बाल साहित्य विश्व के श्रेष्ठ बाल साहित्य के समकक्ष : बालस्वरूप राही
इस वर्ष प्रख्यात लेखक एवं बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक की जन्मशतवार्षिकी है। बालस्वरूप राही ने साहित्य अकादमी में निरंकार देव सेवक और बाल साहित्य विषयक संगोष्ठी में उद्घाटन वक्तव्य दिया।
प्रदीप सिंह
01 Dec 2019
Balswaroop Raahi

“भारतीय बाल साहित्य को हेय दृष्टि से देखने की ज़रूरत नहीं है। भारतीय बाल साहित्य विश्व के किसी भी देश के श्रेष्ठ बाल साहित्य के समकक्ष है। बाल साहित्य में दो विशेषताएं अवश्य होनी चाहिए जिससे कि बाल मन की भावनाएं और कामनाएं प्रकट हो सकें। हमें बच्चों के लिए उपदेश देने की बजाय संदेश देने की कोशिश करनी चाहिए।” 

यह विचार प्रसिद्ध साहित्याकर बालस्वरूप राही के हैं। वे साहित्य अकादमी में निरंकार देव सेवक और बाल साहित्य विषयक संगोष्ठी में उद्घाटन वक्तव्य दे रहे थे। इस वर्ष प्रख्यात लेखक एवं बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक की जन्मशतवार्षिकी है।   

निरंकार देव सेवक के बाल साहित्य का मूल्यांकन करते हुए बालस्वरूप ने कहा कि सेवक जी की कविताओं में बच्चों की भावनाएं और कामनाएं दोनों ही हैं और उनकी कविताओं की एक-एक पंक्ति रसमय है, वे कहीं भी नीरस नहीं होतीं। निरंकार देव सेवक की पुत्रवधू ने उनके जीवन से जुड़े कई मार्मिक प्रसंग श्रोताओं से साझा करते हुए उनकी दिनचर्या से जुड़े कई प्रसंगों को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वे बेहद साधारण जीवन व्यतीत करते थे। 

वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु ने कहा, “सेवक जी केवल बाल कविताएं लिखते ही नहीं थे वे बच्चों के सरल, जिज्ञासु मन और बाल कविता के मर्म, दोनों को ही बहुत गहराई से समझते थे। इसीलिए आज़ादी के बाद के कालखंड में वे स्वभावतः बच्चों के सर्वाधिक प्रिय और पसंदीदा कवियों में से थे, जिनकी कविताएं गांव-गांव, गली-गली में गूंजा करती थीं। बच्चे जाने-अनजाने उन्हें गाते-गुनगुनाते थे और आनंदित हो उठते थे। जाने कितनी ही पीढ़ियों के बच्चे सेवक जी की कविताओं के साथ झूम-झूमकर नाचते-गाते हुए बड़े हुए। इन कविताओँ से ही उन्होंने जीवन के बड़े-बड़े पाठ सीखे। साथ ही बचपन को आनंद से जीने की कला, नायाब मस्ती और अनोखे रंग-ढंग भी।” 

आगे उन्होंने कहा कि सेवक जी ने अपने युग के अन्य बाल साहित्यकारों की तरह केवल बच्चों के लिए लिखा ही नहीं, बल्कि बाल साहित्य को सही दिशा देने का बड़ा चुनौती भरा काम भी किया। वे एक बड़े और मूर्धन्य बाल साहित्यकार हैं तो साथ ही बाल साहित्य के दिग्दर्शक और युग-निर्माता भी। और दोनों ही मोरचों पर उनका योगदान महत्वपूर्ण है।

साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने कहा कि साहित्य अकादमी बाल साहित्य का महत्त्व भली-भांति समझती है और उसके विकास के लिए सतत प्रयत्नशील है। उन्होंने साहित्य अकादेमी द्वारा बाल साहित्य के संवर्धन के लिए किए जा रहे कार्यों का भी ज़िक्र किया।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र ‘निरंकार देव सेवक एवं बाल कविता’ की अध्यक्षता प्रख्यात कवि एवं बाल साहित्यकार दिविक रमेश ने की तथा कमलेश भट्ट ‘कमल’, जगदीश व्योम एवं रजनीकांत शुक्ल ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। 

अपने अध्यक्षीय भाषण में दिविक रमेश ने कहा कि बाल साहित्य बच्चों की आवाज़ है और हमें उसका उसी तरह से सम्मान और प्यार करना चाहिए जैसाकि हम बच्चों को करते हैं। उन्होंने सेवक जी द्वारा बच्चों के मनोविज्ञान को समझकर लिखी गई कविताओं की प्रशंसा करते हुए कहा कि बच्चे हमेशा स्वतंत्रता प्रिय होते हैं अतः हम बाल साहित्यकारों को उनकी इस प्रवृत्ति का सम्मान करते हुए ही उनके लिए कविताएं लिखनी चाहिए। उन्होंने बच्चों के माता पिताओं से भी बाल साहित्य पढ़ने की अपील करते हुए कहा कि इससे जहां वे अपने बच्चों के मनोविज्ञान को अच्छे से समझ पाएंगे साथ ही उनके लिए अच्छे बाल साहित्य का चयन भी कर पाएंगे। 

संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में ‘निरंकार देव सेवक की विचार दृष्टि एवं बाल साहित्य’ विषय पर सुधीर विद्यार्थी ने कहा कि निरंकार देव सेवक का समग्र मूल्यांकन होना चाहिए। हमने उनके बाल साहित्य की तो चर्चा की है लेकिन उनके द्वारा लिखे गए महत्त्वपूर्ण प्रौढ़ साहित्य को अनदेखा किया है। उनके द्वारा लिखी गई कविताएं, संपादकीय तथा अन्य कॉलम भी अद्वितीय हैं और उनपर विचार किया जाना ज़रूरी है। विचार-विमर्श हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात लेखक सुधीर विद्यार्थी ने की और शकुंतला कालरा, उषा यादव एवं श्याम सुशील ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। 

बाल साहित्य पर हमारे साहित्य जगत में अलग तरह का ही रवैया रहा है। जबकि सच्चाई है कि बच्चे हमारे साहित्य के पाठक हैं और बच्चों को ध्यान मे रखते हुए साहित्य की ज़रूरत है। पर बच्चों के बारे में या किसी भी बच्चे के बारे में हम वास्तव में कितना जानते हैं, इस पर हमें विचार करना चाहिए। बाल साहित्य का पाठक होने के लिए बच्चे का साक्षर होना आवश्यक है। बच्चों को साक्षर करने के लिए यानी उन्हें शिक्षा देने के लिए जिस स्तर पर प्रयास हो रहे हैं, वे सब हमारे सामने हैं। हमें हमारी शिक्षा व्यवस्था को इस संदर्भ में टटोलना होगा, उसका परीक्षण और आकलन करना होगा। वास्तव में वह बच्चों को किस तरह से शिक्षित करती है। बल्कि कई मायनों में यह कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि वह बच्चे को शिक्षित होने से एक हद तक रोकती है।

बाल साहित्य की व्याप्ति के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट हमारी शिक्षा व्यवस्था का यह चरित्र है कि वह पाठ्यपुस्तक केन्द्रित है और पाठ्यपुस्तक के इर्द-गिर्द ही सारी शिक्षा व्यवस्था घूमती है। शिक्षा व्यवस्था की जो धुरी है वह तो बिलकुल ही पाठ्यपुस्तक से चिपकी हुई चलती है। पाठ्यपुस्तक स्वयं परीक्षा व्यवस्था से पैदा होने वाले भावों से आवेशित हो उठती है। जो डर परीक्षा के बारे में सोचकर बच्चों को लगता है, वही डर शिक्षकों को पाठ्यपुस्तकों को देखकर लगने लगता है। अगर हमें हमारे बाल साहित्य को अधिक सार्थक और ऊर्जावान बनाना है तो इस दिशा में प्रयास करने होंगे, साहित्यिक पत्रिकाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। वहां बाल साहित्य पर विमर्श बढ़ाना होगा।

साहित्य अकादमी ने बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक की जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। कार्यक्रम का उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात कवि एवं बाल साहित्यकार बाल स्वरूप राही ने दिया जबकि बीज वक्तव्य प्रकाश मनु की अनुपस्थिति में श्याम सुशील द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में निरंकार देव सेवक की पुत्रवधू एवं प्रख्यात संगीतकार पूनम सेवक विशेष रूप से उपस्थित थीं। स्वागत वक्तव्य साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने दिया। कार्यक्रम में कई महत्त्वपूर्ण बाल साहित्यकार और लेखक उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादमी के संपादक अनुपम तिवारी ने किया।

Balswaroop Raahi
Indian children's literature
Senior litterateur Prakash Manu
Nirankar Dev Sevak
Child poem

Related Stories


बाकी खबरें

  • BJP
    अनिल जैन
    खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं
    01 May 2022
    राजस्थान में वसुंधरा खेमा उनके चेहरे पर अगला चुनाव लड़ने का दबाव बना रहा है, तो प्रदेश अध्यक्ष सतीश पुनिया से लेकर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत इसके खिलाफ है। ऐसी ही खींचतान महाराष्ट्र में भी…
  • ipta
    रवि शंकर दुबे
    समाज में सौहार्द की नई अलख जगा रही है इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा
    01 May 2022
    देश में फैली नफ़रत और धार्मिक उन्माद के ख़िलाफ़ भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) मोहब्बत बांटने निकला है। देशभर के गावों और शहरों में घूम कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन किए जा रहे हैं।
  • प्रेम कुमार
    प्रधानमंत्री जी! पहले 4 करोड़ अंडरट्रायल कैदियों को न्याय जरूरी है! 
    01 May 2022
    4 करोड़ मामले ट्रायल कोर्ट में लंबित हैं तो न्याय व्यवस्था की पोल खुल जाती है। हाईकोर्ट में 40 लाख दीवानी मामले और 16 लाख आपराधिक मामले जुड़कर 56 लाख हो जाते हैं जो लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट की…
  • आज का कार्टून
    दिन-तारीख़ कई, लेकिन सबसे ख़ास एक मई
    01 May 2022
    कार्टूनिस्ट इरफ़ान की नज़र में एक मई का मतलब।
  • राज वाल्मीकि
    ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना
    01 May 2022
    “मालिक हम से दस से बारह घंटे काम लेता है। मशीन पर खड़े होकर काम करना पड़ता है। मेरे घुटनों में दर्द रहने लगा है। आठ घंटे की मजदूरी के आठ-नौ हजार रुपये तनखा देता है। चार घंटे ओवर टाइम करनी पड़ती है तब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License