NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विशेष: कौन उड़ा रहा है संविधान की धज्जियां
जिस तरह से धर्म-संसदों का आयोजन किया जा रहा है उससे लगता है कि इस देश में कोई संवैधानिक व्यवस्था है ही नहीं। देश की बड़ी आबादी की उपेक्षा ऐसे की जाती है मानो ये इस देश के नागरिक ही न हों।
राज वाल्मीकि
26 Jan 2022
constitution

हम बड़े गर्व और गौरव से अपने संविधान के लागू होने का जश्न मनाते हैं। 26 जनवरी 1950 से लागू हुए अपने संविधान का इस वर्ष हम 73वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। हर बार हम अपने  शौर्य और संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं। हमारे जाबांज सैनिक हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं। हम अपने शक्ति प्रदर्शन पर गौरवान्वित होते हैं। अपनी  देश की आन बान और शान पर गर्वित होते हैं। विदेशों में भी हमारे इस शौर्य पर्व को सराहा जाता है। विभिन्न प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियां विविधता में एकता का प्रदर्शन करती हैं। पर  इस बार पश्चिम  बंगाल,  तमिलनाडु तथा  केरल की   झांकियों को जिस तरह से रिजेक्ट किया जा रहा है उससे राजनीति की बू आ रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि  इन राज्यों में विपक्षी  दलों का शासन है। इसके आलावा इसमें हिंदुत्व के हावी होने के संकेत मिल रहे हैं। हिन्दू धर्म-संस्कृति को आगे बढ़ाने वाली झांकियों को प्रमुखता दी जा रही है। मानो ये देश किसी एक धर्म विशेष का ही हो।

दूसरी ओर जिस तरह से धर्म-संसदों का आयोजन किया जा रहा है उससे लगता है कि इस देश में कोई संवैधानिक व्यवस्था है ही नहीं। धर्म संसद खुलेआम एक धर्म विशेष के लिए दूसरे धर्मों के लोगों का कत्लेआम तक करने का दुस्साहस भरा ऐलान कर रही हैं। 

क्यों रह जाता है देश का एक बड़ा हिस्सा अदृश्य होकर

देश की बड़ी आबादी जो दलितों और पिछड़ों की है उसकी उपेक्षा ऐसे की जाती है मानो ये इस देश के नागरिक ही न हों। देश को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो ये किसी एक धर्म विशेष के लोगों का देश हो। देश में जातिवाद और सम्प्रदाय जैसे मुद्दों को हवा दी जाती है। ऊपर से यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि यहां सब कुछ सामान्य है। विविधता में एकता है। अन्दर ही अन्दर जाति और  वर्ग के नाम पर नफरत फैलाई जाती है। दलितों पर अत्याचार किया जाता है। उन्हें अपने बराबर समझने की मानसिकता नहीं बनती। 

इक्कीसवीं सदी में भी मानव द्वारा यानी एक जाति विशेष के लोगों द्वारा मानव मल साफ़ करने की कुप्रथा आज भी जारी है। क्या प्रगतिशीलता का दावा करने वाले सभ्य समाज को इस पर शर्म नहीं आनी चाहिए। इस वर्ष  2022 में ही 18 जनवरी को गुजरात के सूरत जिले में दो सफाई कर्मचारियों विशाल पोल (38) और प्रमोद तेजी (30) की सीवर सफाई के दौरान दम घुटने से मौत हो गई। ये तो हकीकत है हमारे डिजिटल इंडिया की। 

डिजिटल इंडिया बनाने वालों का ध्यान इस और क्यों नहीं जाता कि एक जाति विशेष के लोगों को आज भी सीवर और सेप्टिक टैंको में घुसकर सफाई करनी पड़ती है। क्यों नहीं ऐसी मशीने बनाई जातीं कि उनसे सीवर और सेप्टिक टैंक साफ़ किये जाएं। इंसानों को अपनी जान न गवानी पड़े। दूसरी ओर मानव मल ढोने जैसी अमानवीय कुप्रथा को जड़ से मिटाने की घोषणा देश के प्रधानमंत्री क्यों नहीं करते। क्या ये उनके लिए बड़ा मुद्दा नहीं है कि “हम भारत के लोग” जिन्हें मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार हमारा संविधान देता है उन्हें हम मानव मल  ढोने को मजबूर कर रहे हैं। भारत की विशेषताओं की महिमा का गुणगान करने वाले प्रधानमंत्री  इस अमानवीयता पर क्यों मौन धारण कर लेते हैं?

इस देश में हाशिए के वर्ग के लोग चाहे वे दलित हों, आदिवासी हों, पिछड़े हों, अल्पसंख्यक हों, महिलाएं हों, जो कि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा हैं, वे किस प्रकार की जलालत भरी जिंदगी जी रहे हैं, उनको क्यों परदे के पीछे रखा जाता है।  

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अघोषित पाबंदी 

हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है पर असल में हमें ये आज़ादी नहीं है। सच्चाई तो ये है कि यदि कोई कॉमेडीयन मजाक में भी देश की किसी कमी पर बोल दे तो उसे देशद्रोही समझा जाता है। सत्ताधारी को यह तो बिलकुल बर्दाश्त नहीं कि कोई उस पर उंगली उठाए। यदि  लोग सत्ताधारी या उसकी सरकार की सच्ची आलोचना करें तो उन्हें बहुत भारी पड़ती है। कभी-कभी जेल की सलाखों के पीछे भी जाना पड़ता है तो कभी अपनी जान गवानी पड़ती है। जैसे कि अघोषित इमरजेंसी का दौर हो। आम आदमी में जैसे एक डर बैठा दिया गया है कि सरकार के खिलाफ कुछ भी बोला तो बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अभी हाल ही में युवा दलित कवि बच्चा लाल उन्मेष की एक कविता इन्स्टाग्राम पर आई और आधे घंटे में हटा ली गई। कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है : 

क्या खाते हो भाई?
“जो एक दलित खाता है साब!”
नहीं मतलब क्या-क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कर्ज़ का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या मिला है भाई
“जो दलितों को मिलता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या मिला है?
ज़िल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में।

इस तरह की अभिव्यक्ति पर भी डर लगता है।

धर्म सत्ता पाने का एक हथियार 

हमारा देश पंथनिरपेक्ष है। सभी को अपनी पसंद का धर्म अपनाने की स्वतंत्रता है। पर हमारे यहां जिस धर्म की बढ़ चढ़ कर बात की जाती है उस के बारे में प्रख्यात दलित साहित्यकार जय प्रकाश कर्दम कहते हैं – “धर्म का काम लोगों को जोड़ना होता है। समाज में मनुष्यता का संचार करना होता है। हमारे यहां धर्म का पाखंड होता है। यहां धर्म संसदें ऐसी हैं जो धर्म की जगह अधर्म फैलाती हैं। और सच तो यह है कि धर्म हमारे यहां सत्ता प्राप्त करने का हथियार है। चीनी क्रन्तिकारी माओत्से तुंग ने कहा था कि –‘सत्ता बन्दूक की नाल से निकलती है।‘ पर हमारे यहां सत्ता मंदिरों की घंटियों और शंखों से निकलती है।“ यहां जनता की आम समस्याओं जैसे स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई को मुद्दा नहीं बनाया जाता। 

जहां संविधान सभी नागरिकों को जाति, सम्प्रदाय, लिंग, नस्ल,  भाषा, क्षेत्र आदि का कोई भेदभाव नहीं करता। सबकी बराबरी और मानवीय गरिमा की बात करता है। वहां हमारे राजनैतिक दल जाति और सम्प्रदाय के समीकरण बनाकर सत्ता हथियाना चाहते हैं। 

संविधान कहीं मनुविधान में न बदल जाए 

दुखद है कि आज देश में एक ऐसी सोच हावी होती जा रही है जो संविधान का सम्मान नहीं करती। उसकी जगह मनुविधान को प्रमुखता देती है। कुछ कट्टरवादी तो संविधान की प्रतियां तक जलाने का दुस्साहस करते हैं। धर्म संसदें तो अपना संविधान चलाना चाहती हैं। ऐसे में जाहिर है कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने जिस सुशिक्षित, समृद्ध और समता मूलक समाज का सपना देखा था। वह पूरा नहीं हो सकता। राजस्थान के हाई कोर्ट में मनु की मूर्ति खड़ी हुई है, संविधान जहां लागू होता है वहां बाबा साहब की मूर्ति होनी चाहिए। लेकिन वहां मनु की मूर्ति लगा देना यह अपने आप में संविधान के अनादर का द्योतक है।

वरिष्ठ साहित्यकार जय प्रकाश कर्दम जी कहते हैं कि –“संविधान एक अच्छी कविता की तरह रह गया है जिसे लोग सुनते हैं, वाह वाह करते हैं पर उस पर अमल नहीं करते हैं।“ 

अभी जिस तरह की विचारधारा का प्रचार-प्रसार हो रहा है उससे निश्चित रूप में संविधान और लोकतंत्र खतरे में हैं। और यह खतरा निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। खतरा मनुवाद की वापसी का भी है। ऐसे में लोकतंत्र और संविधान को बचाए रखने के लिए लोकतान्त्रिक मूल्यों के रक्षकों को सतर्क रहने की आवश्यकता है ताकि संविधान बचा रहे लोकतंत्र बचा रहे। और “हम भारत के लोग” अपने संवैधानिक मूल्यों को बचा कर रखें।

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार निजी हैं।)

Constitution of India
republic day
Constitutional right
law and order

Related Stories

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

यति नरसिंहानंद : सुप्रीम कोर्ट और संविधान को गाली देने वाला 'महंत'

भारतीय लोकतंत्र: संसदीय प्रणाली में गिरावट की कहानी, शुरुआत से अब में कितना अंतर?

लोकतंत्र के सवाल: जनता के कितने नज़दीक हैं हमारे सांसद और विधायक?

बढ़ती हिंसा और सीबीआई के हस्तक्षेप के चलते मुश्किल में ममता और तृणमूल कांग्रेस

बाबा साहेब की राह पर चल देश को नफ़रती उन्माद से बचाने का संकल्प

बिहार में शराबबंदी से क्या समस्याएं हैं 

पत्नी नहीं है पति के अधीन, मैरिटल रेप समानता के अधिकार के ख़िलाफ़

एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

मध्य प्रदेश : धमकियों के बावजूद बारात में घोड़ी पर आए दलित दूल्हे


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License