NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
भारतीय अर्थव्यवस्था : हर सर्वे, हर आकंड़ा सुना रहा है बदहाली की कहानी
NCRB के आत्महत्या के आंकड़े, आरबीआई के कंज्यूमर कॉन्फिडेंट सर्वे के आंकड़े और मनरेगा फंड के खात्मे के आंकड़े को मिलाकर पढ़िए तो अर्थव्यवस्था की बदहाली में बदलाव के आसार नहीं दिखते हैं।
अजय कुमार
01 Nov 2021
economic crisis

साल 2020 के लिए प्रकाशित नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं भारत में साल 2020 में 1 लाख 53 हजार 52 लोगों ने आत्महत्या की। साल 2019 के मुकाबले यह 10 फ़ीसदी अधिक है। साल 1967 के बाद यह चौथा ऐसा साल है जहां पर सबसे अधिक मौतें आत्महत्या की वजह से हुई हैं। हर 10 लाख की आबादी पर निकाला जाए तो 11.3 लोगों ने जिंदगी से परेशान होकर जिंदगी को अलविदा कह दिया। आत्महत्या के इन आंकड़ों में 16.5 फ़ीसदी वे हैं जो महीने की सैलरी पर अपना जीवन गुजारते थे, 15.7 फ़ीसदी वे हैं जो दिन भर की मेहनत करके अपना पेट भरते थे। साल 2019 के मुकाबले साल 2020 में अपनी दुकान खोलकर और खुद का व्यापार कर जिंदगी जीने वाले लोगों के आत्महत्या के आंकड़े में 26.1 फ़ीसदी  और 49 फ़ीसदी इज़ाफ़ा हुआ है।

अगर आत्महत्या के कारणों को टटोलें तो सबसे अधिक 69 फ़ीसदी आत्महत्या का कारण गरीबी है। उसके बाद बेरोजगारी का नंबर आता है जिसकी वजह से 24 फ़ीसदी लोगों ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या के सबसे अधिक दर्दनाक आंकड़े पढ़ने लिखने वाले विद्यार्थियों के बीच से आए हैं जहां हर साल 7 से 8 फ़ीसदी बच्चे आत्महत्या कर लेते थे लेकिन 2020 में इनमें 21 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा देखने को मिला है। इसका भी सबसे बड़ा कारण गरीबी से पनपा छात्र जीवन पर कई तरह का दबाव बताया जा रहा है। साल 2019 में दूसरे के जमीन पर मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले कृषि क्षेत्र के 4324 मजदूरों ने आत्महत्या की थी। इसमें 18 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा 5 हजार को पार कर चुका है।

तमाम तरह की परेशानियां मिलकर आत्महत्या का कारण बनती हैं। उन्हें आंकड़ों में जिक्र करना नामुमकिन है। फिर भी उन तमाम तरह तरह की परेशानियों में सबसे बड़ा कारण आर्थिक दबाव का होता है। आत्महत्या के आंकड़े भी यही बता रहे हैं कि जब जिंदगी में पैसा कमाने का साधन छीन लिया गया तो बहुत लोग आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुए। इसका मतलब यह है कि आत्महत्या में हुआ इजाफा कहीं ना कहीं भारत की बदहाल गरीबी की तरफ भी इशारा करता है। यह बदहाल गरीबी सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के आंकड़े बताते हैं कि कमाई के साधन छिन जाने की वजह से तकरीबन 23 करोड लोग एक ही साल गरीबी रेखा से नीचे चले गए। 

इस बदहाली से उभरना बहुत कठिन है। लेकिन अर्थव्यवस्था के विकास को मापने वाले संकेत को आसार हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था सुधर रही है। IMF जैसी वैश्विक संस्था का अनुमान है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ साल 2021-22 में 9.5 फ़ीसदी रहेगी। जो दूसरे देशों की विकास दर के मुकाबले कम है। लेकिन साल 2022-23 में 8.5 फीसदी रह सकती है, जो दूसरे देशों से बेहतर जीडीपी ग्रोथ को बताती है। 

लेकिन ठीक इसके उलट मिजाज भारत के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित कंज्यूमर कॉन्फिडेंट सर्वे के आंकड़े बताते हैं। यह आंकड़े अर्थव्यवस्था के मिजाज को बताते हैं जिस मिजाज को नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो से मिलने वाले आत्महत्या के आंकड़े बता रहे हैं।  

ये भी पढ़ें: भारत में बेरोज़गारी मापने के पैमानों के साथ क्या समस्या है? 

कंज्यूमर कॉन्फिडेंट सर्वे में देश के बड़े-बड़े शहरों में जाकर लोगों से बातचीत की जाती है। लोगों से पूछा जाता है कि इस साल और आने वाले साल में भारत की अर्थव्यवस्था को वह किस तरह से देखते हैं। उनके लिहाज से महंगाई बढ़ी है या घटी है? रोजगार कम हुआ है या बड़ा है? आमदनी और रोजगार के साधन में बढ़ोतरी होगी या कमी होगी? इस तरह के तमाम सवाल उन लोगों से पूछे जाते हैं जो रोजाना अर्थव्यवस्था के चक्र का सामना करते हैं। अगस्त और सितंबर महीने में देश के 13 बड़े शहरों में जाकर आरबीआई ने तकरीबन 5000 से ज्यादा परिवारों से ऐसे सवाल पूछ कर कंज्यूमर कॉन्फिडेंट सर्वे का आंकड़ा पेश किया है। 

रोजगार के क्षेत्र में कंज्यूमर कॉन्फिडेंट माइनस 60 से 80 फ़ीसदी के बीच है। यानी तकरीबन 60 से 80 फ़ीसदी को लगता है कि भारत में रोजगार की स्थिति बेहतर नहीं है। अगले साल रोजगार की बेहतरी की संभावना करने वाले महज 8% लोग हैं। महंगाई के मामले में 90 फ़ीसदी लोगों को लगता है कि इस साल महंगाई कम नहीं होने वाली। तकरीबन 80 से 90 फ़ीसदी लोगों को लगता है कि अगले साल भी महंगाई कम नहीं होने वाली। तकरीबन 50 से 60 फ़ीसदी लोगों को लगता है कि उनकी आमदनी पिछले साल के मुकाबले कम हुई है। तकरीबन 20 से 40 देखो लगता है कि आने वाले साल में उनकी आमदनी बढ़ेगी। तकरीबन 50 से 60 फ़ीसदी लोग कह रहे हैं कि उन्होंने इस साल गैर जरूरी चीजों पर बहुत कम खर्चा किया है। करीबन 20 फ़ीसदी लोग ऐसे हैं जो यह कह रहे हैं कि वह आने वाले साल में इस साल की अपेक्षा गैर जरूरी चीजों पर बहुत कम खर्च करेंगे। 

इन आंकड़ों का मतलब क्या है? इन आंकड़ों का यही मतलब है कि भले ही इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड से लेकर तमाम तरह के एक्सपर्ट कहें कि भारत की अर्थव्यवस्था सुधार की गति पर है लेकिन लोगों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था नहीं सुधरने वाली। लोगों को भारत की अर्थव्यवस्था में रोजगार की संभावना नहीं दिख रही है। महंगाई पहले से ज्यादा बदतर स्थिति में दिख रही है। उन्हें ऐसा भी नहीं लगता कि आने वाले समय में महंगाई की मार कम होगी। गैर जरूरी चीजों पर उन्होंने खर्च करना कम कर दिया है। अगर भारत की अर्थव्यवस्था सुधर रही होती तो लोगों का भरोसा भी उस पर होता। वह गैर जरूरी चीजों पर खर्च कम ना करते। ऐसा नहीं सोचते कि आने वाले साल में इस साल के मुकाबले और कम खर्च करेंगे। आरबीआई द्वारा प्रकाशित कंजूमर कॉन्फिडेंट सर्वे कह रहा है कि साल 2012 के बाद यह ऐसा साल है जहां पर लोगों का विश्वास अर्थव्यवस्था के सुधार में बहुत कम हुआ है।

प्रभात पटनायक से लेकर तमाम बड़े अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था में सुधार करने के लिए बार-बार यह लिख चुके हैं कि सबसे गरीब दबे कुचले लोगों तक रोजगार के अवसर पहुंचाए जाएं। उनकी जेब में पैसा डाला जाए। तभी जाकर अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। भारत में अमीरों से ज्यादा गरीबों की संख्या है। 94 फ़ीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। बहुत बड़ी आबादी रोजाना काम करके अपनी जिंदगी गुजारती है। जब तक इनकी जेब में पैसा नहीं पहुंचेगा तब तक अर्थव्यवस्था को गति नहीं मिलेगी। लेकिन इनकी क्या हालत है?

मनरेगा के तहत कोरोना के दौरान 11 करोड़ लोगों को दिन भर का रोजगार मिला था। मनरेगा का नियम है कि ग्रामीण क्षेत्र के किसी भी अकुशल मजदूर को काम मांगने पर 100 दिन का काम भी आ जाएगा। इस योजना की इस साल हालत यह हो चुकी है कि इसका पूरा बजट खत्म हो चुका है। सरकार ने वित्त वर्ष 2022 के लिए जितना बजट मनरेगा को दिया था उस से तकरीबन 8686 करोड़ रुपए अधिक का बिल बन चुका है। जबकि यह अभी अक्टूबर का महीना चल रहा है। देश के 35 केंद्र शासित और राज्यों में से 21 राज्यों के पास मनरेगा का किसी तरह का फंड नहीं है। वह नेगेटिव बैलेंस में चल रहे हैं। यानी इन जगहों पर अगर पैसा नहीं आया तो मनरेगा के तहत तमाम मजदूरों को काम नहीं मिलने वाला। अगर वह मजदूरी करेंगी भी तो उन्हें मजदूरी नहीं मिलने वाली। किसान मजदूर शक्ति संगठन के संस्थापक निखिल डे कहते हैं मनरेगा के फंड के खात्मे की वजह से जो पहले से ही बदहाल हैं गरीबी में जी रहे हैं उन पर बहुत बड़ी मार पड़ेगी। साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर मनरेगा का बकाया मजदूरों को नहीं दिया जा रहा है तो इसका मतलब है कि संविधान के तहत बनने वाले अनुबंध को तोड़ा जा रहा है। मनरेगा के तहत मजदूरी का ना दिया जाना "भीख के आधुनिक रूप" की तरह लगता है। आंकड़े कहते हैं कि तकरीबन 13 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जो मनरेगा के तहत काम मांग रहे हैं लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा है। निखिल डे कहते हैं कि मनरेगा के तहत काम मांगने पर काम दिया जाना सरकार की अनिवार्य जिम्मेदारी है। यह आंकड़ा 13% से बहुत ज्यादा है। 13% का आंकड़ा तो पंजीकृत मजदूरों के बीच से निकला है। जो मजदूर पंजीकृत नहीं है, वह भी काम मांगते हैं। उनका कोई आंकड़ा नहीं मिला है।

इस तरह से इस हफ्ते मिली इन तीन तरह के आंकड़ों को मिलाकर पढ़ा जाए तो भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर उतनी सुनहरी नहीं लगती जितनी सुनहरी बताने की कोशिश विशेषज्ञ और वैश्विक संस्थाएं कर रहे हैं। अर्थव्यवस्था की बदहाली इतनी ज्यादा है कि जीडीपी ग्रोथ के चाहे जैसे आंकड़े दिए जाए लेकिन लोग उस पर भरोसा नहीं करने वाले।

ये भी पढ़ें: महंगाई और बेरोज़गारी के बीच अर्थव्यवस्था में उछाल का दावा सरकार का एक और पाखंड है

suicide
suicide in india
NCRB data on suicide
मनरेगा
मनरेगा फंड में कमी
बजट ऑफ मनरेगा
Budget of MGNREGA
consumer confidence survey of RBI
एंप्लॉयमेंट
Employment
महंगाई
Inflation
Spending of non essential item

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

गतिरोध से जूझ रही अर्थव्यवस्था: आपूर्ति में सुधार और मांग को बनाये रखने की ज़रूरत

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 


बाकी खबरें

  • medical camp
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: सोनभद्र के सिंदूर मकरा में क़हर ढा रहा बुखार, मलेरिया से अब तक 40 आदिवासियों की मौत
    30 Nov 2021
    प्रशासन सिर्फ़ 20 मौतों की पुष्टि कर रहा है। सरकारी दावों के उलट रिहंद जलाशय की तलहटी में बसे सिंदूर मकरा गांव में उदासी और सन्नाटा है। बीमारी और मौत से आदिवासी ख़ासे भयभीत हैं। आदिवासियों की लगातार…
  • Honduras President
    उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: मध्य अमेरिका में एक और कास्त्रो का उदय
    30 Nov 2021
    वामपंथी पार्टी की शियोमारा कास्त्रो बनेंगी होंदुरास की पहली महिला राष्ट्रपति। रविवार को हुए राष्ट्रपति पद के चुनावों में कास्त्रो ने सत्तारूढ़ नेशनल पार्टी नासरी असफुरा को पीछे छोड़ दिया है।
  •  Mid Day Meal Workers
    सरोजिनी बिष्ट
    बंधुआ हालत में मिड डे मील योजना में कार्य करने वाली महिलाएं, अपनी मांगों को लेकर लखनऊ में भरी हुंकार
    30 Nov 2021
    मिड डे मील योजना में काम करने वाली रसोइयों का आक्रोश उस समय सामने आया जब वे अपनी मांगों के साथ 29 नवम्बर को लखनऊ के इको गार्डेन में "उत्तर प्रदेश मिड डे मील वर्कर्स यूनियन" के बैनर तले एक दिवसीय धरने…
  • workers
    मुकुंद झा
    निर्माण मज़दूरों की 2 -3 दिसम्बर को देशव्यापी हड़ताल,यूनियन ने कहा- करोड़ों मज़दूर होंगे शामिल
    30 Nov 2021
    भारत की निर्माण मज़दूर फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखबीर ने कहा कि इस हड़ताल में केंद्रीय मुद्दों के साथ साथ राज्य के अपने मुद्दे भी शामिल होंगे। इस हड़ताल में हरियाणा और राजस्थान के कई जिलों में…
  • UP farmers
    प्रज्ञा सिंह
    पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसान बनाम हिंदू पहचान बन सकती है चुनावी मुद्दा
    30 Nov 2021
    किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सामाजिक पहचान बदल दी है, उत्तरप्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में यहां से 122 सीटें हैं और अगले साल की शुरुआत में यहां चुनाव होने हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License