NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बोली बानी, जूती खात कपाल!
मनीषियों का कहना है कि जीभ पर काबू पाना जरूरी है। यह जीभ ही है जो मनुष्य-मनुष्य के बीच द्वेष पैदा करती है और परस्पर भेदभाव को बढ़ावा देती है। मजे की बात ये है कि यही एक चीज है जो मनुष्य को पशु से अलग करती है।
शंभूनाथ शुक्ल
19 Aug 2021
बोली बानी, जूती खात कपाल!
Image courtesy : CJP

पिछले सात-आठ वर्षों में हम पा रहे हैं कि नेताओं के बोल-बचन उनके क़ाबू में नहीं रहते हैं, जो नहीं बोलना चाहिए, वे वही बोलते हैं।एक सभ्य समाज में भाषा के जो मानदंड हैं, उनकी अवहेलना लगातार हो रही है ज़ानबूझ कर एकदूसरे को नीचा दिखाने की ख़ातिर ओछी भाषा का प्रयोग तथा अपमानित करने के लिए नीच हरकतें करना आम होता जा रहा है।
 
हम अपने को 74 साल पुराना लोकतंत्र भले ही बताएँ किंतु यदि हमने सभ्य भाषा बरतना नहीं शुरू किया तो हम किसी क़बीलाई समाज की तरह ही बने रहेंगे। ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान को हम क्यों कोसते हैं? क्या हम उनसे बेहतर हैं? तालिबानी तो फिर भी शांतिपूर्ण हस्तांतरण की बात कर रहे हैं। हम अगर मानव समाज के अतीत में जाएँ तो पाएँगे कि अधिकांश युद्ध और हिंसा के पीछे भाषा ही रही है। भारत के अपने महाकाव्य चाहे महाभारत हो या रामायण, युद्ध की पृष्ठभूमि में भाषा ही थी। 
 
भाषा के गिरते स्तर और प्रयोग का एक क़िस्सा है। क़रीब 35 साल पहले लखनऊ के बनारसी बाग इलाके की एक सकरी गली में घुसते समय हमारी टैक्सी सामने आ रही एक मारुति गाड़ी से सट गई। गाली बकता हुआ हमारा कनपुरिया ड्राइवर उतरा और सामने वाली कार के चालक से भिड़ गया। उस कार को एक युवक चला रहा था और उसके बगल में एक संभ्रांत से दिखने वाले व्यक्ति बैठे थे। उन्होंने हाथ जोड़कर हमारे ड्राइवर से कहा कि अरे साहब अब गलती तो हो ही गई पर यदि थोड़ा आप ही दब लेते तो शायद रास्ता न जाम होता। हमारे ड्राइवर पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया। एक तो वह ही गलत साइड उस गली में घुसा था और अकड़ रहा था। सामने वाले ने गलती होते हुए भी अपनी विनम्रता से पूरे मामले को टाल दिया। जब वह ड्राइवर वापस टैक्सी में आया तो मैने कहा कि देखा लखनऊ और कानपुर की तहजीब का फर्क। तुमने अपनी बोली से पूरे कानपुर की इमेज बिगाड़ दी। वह लज्जित-सा बैठा रहा। और बोला साहब मीठी बोली-बानी हो तो कोई भी हार सकता है। पर आज यही मीठी बोली-बानी पता नहीं कहां खो गई है। वह चाहे लखनऊ हो या कानपुर अथवा दिल्ली, मीठी बोली गायब होती जा रही है।
 
रहीम का एक बहुश्रुत दोहा है कि रहिमन जिव्हा बावरी, कर गई सरग-पताल। आपुहिं तो भीतर गई जूती खात कपाल।  इस दोहे में रहीम जी ने बताया है कि जुबान का तो काम ही बोलना है और वह बिना समय या सीमा को समझे बोल देती है पर खामियाजा भुगतना पड़ता है सिर को क्योंकि उस बोल का जवाब तो जूता से ही मिलता है। 
 
छोटे-से एक दोहे से रहीम जी ने सारी ज्ञान की बात कह दी कि जिस किसी का भी अपनी जुबान पर काबू नहीं है उसे तो जूते खाने ही पड़ेंगे। इसलिए बोलने के पहले खूब सोच-विचार कर लेना चाहिए कि इसका असर कितना पड़ेगा। एक आम आदमी का अपनी जबान पर काबू नहीं है तो उसे तो इसका बदला तत्काल मिल जाएगा और अगर वह व्यक्ति प्रभावशाली है तो उसका खामियाजा बाद में दिखेगा। तथा अपनी जुबान पर काबू न रख पाने वाला व्यक्ति राजनीतिक है तो समाज में उसकी जुबान का जहर घुलेगा। 
 
आमतौर पर हम चुनाव के वक्त पाते हैं कि न तो आम आदमी, न प्रभावशाली व्यक्ति और न राजनेता अपनी जुबान पर काबू कर पाने में सक्षम होते हैं। उलटे यह कह दिया जाता है कि चुनाव के समय ऐसी बातें करना एक तरह से क्षम्य है क्योंकि आपतिकाले मर्यादा नास्ति। यानी आपत्ति काल में मर्यादा को नहीं देखा जाता।
 
इसीलिए मनीषियों का कहना है कि जीभ पर काबू पाना जरूरी है। यह जीभ ही है जो मनुष्य-मनुष्य के बीच द्वेष पैदा करती है और परस्पर भेदभाव को बढ़ावा देती है। मजे की बात कि यही एक चीज है जो मनुष्य को पशु से अलग करती है। आखिर भाषा ज्ञान तो ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करता है। अगर इस भाषा ज्ञान से परस्पर एकता बनने की बजाय दूरियां पनपें तो यह भाषा ज्ञान निरर्थक जाएगा। आजतक जितने भी युद्घ और अशांति फैली है उसके पीछे इसी तरह की गलत भाषा का प्रयोग ही रहा है। अगर मिथकीय काल में हम जाएं तो इसी भाषा के कारण ही पूरा महाभारत युद्ध हुआ। द्रोपदी यदि अपने महल में आए दुर्योधन को अंधे का पुत्र न कहतीं तो शायद यह युद्ध टल सकता था। और ऐतिहासिक काल में देखिए तो पता चलता है कि राजा पुरु का एक वाक्य ही सिकंदर को इतना प्रभावित कर गया कि उसने पुरु से जीता राज्य वापस कर दिया। यानी बोली ही मनुष्य को शत्रु बनाती है और बोली ही मित्र। 
 
इसीलिए तो कबीर ने कहा है कि ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपुहिं शीतल होय। पर इसी बोली पर काबू पाना ही तो सबसे बड़ा संयम है। बोली पर काबू होता तो कितने युद्ध टल जाते और मनुष्यता इस पृथ्वी पर अपने श्रेष्ठ रूप में कायम रहती।
 
बोली से कटुता ही नहीं पैदा होती बल्कि अहंकार को बढ़ावा मिलता है। कटूक्ति बोलने वाला निश्चय ही अहंकारी होगा। और उसका यह अहंकार ही उसे दूसरे का अपमान करने को उकसाता है। आखिर मान-अपमान तो इसी बोली पर ही निर्भर हैं। किसी को बोलकर ही अपमानित किया जाता है और अहंकारी व्यक्ति इसका खूब इस्तेमाल करता है। यही नहीं अहंकार बुद्घि का हरण भी करता है। और बुद्धिहीन आदमी भला कैसे अपनी जुबान पर काबू रख सकता है। 
 
जुबान पर काबू न रख पाने वाले व्यक्ति अक्सर बात-बात पर भड़कने लगते हैं और वे स्वयं तो बीमार रहते ही हैं बाकी समाज को भी बीमार रहने को विवश कर देते हैं। चिकित्साविज्ञान की नई खोजें बताती हैं कि अक्सर उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियों की वजह यही असंयम होता है। जो लोग छोटी-छोटी बातों पर उत्तेजित हो जाते हैं उन्हें उच्च रक्तचाप या मधुमेह की बीमारी आम बात है। इसलिए अगर निरोगी बनना है तो संयम रखें।

संयम न सिर्फ खानपान में बल्कि बोलचाल में भी संयम को अपनाना जरूरी होता है। यह संयम आता है अपनी हर अभिव्यक्ति पर काबू पाने से। अभिव्यक्ति के पहले यदि सोच-विचार किया जाए तो शायद व्यक्ति वही बोलेगा जो लोगों को शीतल कर सके और शीतल रहने का मतलब शांत रहना। यह शांति ही मनुष्य के स्वास्थ्य और उसके सामाजिक जीवन के लिए सबसे अहम है।

पिछले तीस सालों में काफी कुछ बदल गया है। मन की शांति इसी बोली ने हरण कर ली है। अब न सिर्फ आम आदमी बल्कि अभिजात्य वर्ग भी अपनी बोली पर काबू नहीं पा पा रहा है और अनावश्यक रूप से लड़ाई-झगड़े बढ़ने लगे हैं। छोटी-छोटी बातों पर वाद-विवाद बढ़ जाता है और मारपीट होने लगती है। और यह सारा कुछ इसी बोली के कारण है। कोई भी आदमी विनम्र नहीं रहना चाहता मानों विनम्रता अब अपने मायने ही खो चुकी है। 

अहंकार के चलते व्यक्ति अपनी वाणी को और कटु करता जा रहा है। खासकर शहरों में यह और देखने को मिलता है, जहां समय का सर्वथा अभाव है और समयाभाव के कारण हर व्यक्ति को हड़बड़ी है। आफिस जाने की हड़बड़ी, फिर शाम को घर जाने की और बच्चों को स्कूल जाने की। नतीजा व्यक्ति के पास अब न तो समय बचा है और न सोच-विचार करने की क्षमता ही उसके पास बची है और इस सबका नतीजा है बिगड़ती बोली। पर ध्यान रखा जाए कि बोली के कड़वा होने पर नुकसान ही उठाना पड़ता है और हारता अंतत: अहंकार ही है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Hate Speech
Hate Crime
Political leader
Modi Govt
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • indian freedom struggle
    आईसीएफ़
    'व्यापक आज़ादी का यह संघर्ष आज से ज़्यादा ज़रूरी कभी नहीं रहा'
    28 Jan 2022
    जानी-मानी इतिहासकार तनिका सरकार अपनी इस साक्षात्कार में उन राष्ट्रवादी नायकों की नियमित रूप से जय-जयकार किये जाने की जश्न को विडंबना बताती हैं, जो "औपनिवेशिक नीतियों की लगातार सार्वजनिक आलोचना" करते…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2.5 लाख नए मामले, 627 मरीज़ों की मौत
    28 Jan 2022
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 6 लाख 22 हज़ार 709 हो गयी है।
  • Tata
    अमिताभ रॉय चौधरी
    एक कंगाल कंपनी की मालिक बनी है टाटा
    28 Jan 2022
    एयर इंडिया की पूर्ण बिक्री, सरकार की उदारीकरण की अपनी विफल नीतियों के कारण ही हुई है।
  • yogi adityanath
    अजय कुमार
    योगी सरकार का रिपोर्ट कार्ड: अर्थव्यवस्था की लुटिया डुबोने के पाँच साल और हिंदुत्व की ब्रांडिंग पर खर्चा करती सरकार
    28 Jan 2022
    आर्थिक मामलों के जानकार संतोष मेहरोत्रा कहते हैं कि साल 2012 से लेकर 2017 के बीच उत्तर प्रदेश की आर्थिक वृद्धि दर हर साल तकरीबन 6 फ़ीसदी के आसपास थी। लेकिन साल 2017 से लेकर 2021 तक की कंपाउंड आर्थिक…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    रेलवे भर्ती: अध्यापकों पर FIR, समर्थन में उतरे छात्र!
    28 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं रेलवे परीक्षा में हुई धांधली पर चल रहे आंदोलन की। क्या हैं छात्रों के मुद्दे और क्यों चल रहा है ये आंदोलन, आइये जानते हैं अभिसार से
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License