NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
समाज
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस: कहां हैं हमारे मानव अधिकार?
दलित पुरुषों का सीवर में मरना जारी है। दलित महिलाओं द्वारा मानव मल ढोना जारी है। दलित युवकों को अभी भी बारात निकालने, घोड़ी पर चढ़ने से रोका जा रहा है। कहां हैं उनके मानव अधिकार? क्यों नहीं हैं उन्हें इज़्ज़त से जीने का अधिकार?
राज वाल्मीकि
10 Dec 2020
Sanitation workers

मानव अधिकारों के तहत संविधान में लैंगिक समानता है यानी स्त्री हो या पुरुष सभी के अधिकार बराबर हैं। पर वास्तव में हमारे समाज में महिलाओं और दलितों को उनके समानता के अधिकार से वंचित किया जाता है। उन्हें गरिमा से जीने का हक नहीं दिया जाता है। तभी तो मानव मल ढोने की प्रथा जारी है। दलितों का सीवर में सीवर सफाई के दौरान जहरीली गैसों से दम घुटकर मरना जारी है। दलित महिलाओं द्वारा मानव मल ढोना जारी है। कहां हैं उनके मानव अधिकार? क्यों नहीं हैं उन्हें इज़्ज़त से जीने का अधिकार?

जातिगत ढांचे के अंतर्गत हमारी सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार की है कि दलित समुदाय के लोगों को वर्चस्वशाली जाति समुदाय के द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है। हाल ही में जेवर के गोपालगढ़ गांव में दलित युवक की बारात नहीं चढ़ने दी गई। कथित उच्च जाति के दबंग युवकों ने बारात के साथ चल रहे हरगोविंद के बेटे संजय और श्रीपाल के साथ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। गाली-गलौज करके मारपीट कर दी। बचाव में आई पुष्पा देवी पत्नी रामकिशन के साथ अभद्र व्यवहार किया गया। उनको मारपीट कर घायल कर दिया गया। मानवाधिकार के अंतर्गत अन्य समुदायों की तरह दलित युवकों को भी बारात में घोड़ी पर चढ़ कर आने का अधिकार है। पर जातिवादी मानसिकता के कारण यानी अपनी उच्च जाति के घमंड के कारण उन्हें बर्दाश्त नहीं होता कि कोई दलित उनकी बराबरी करे। उनका गुस्सा जाति सूचक गाली-गलौज और मारपीट में निकलता है। यह जातिगत भेदभाव और छुआछूत का एक ताजा उदाहरण है।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार देश के सभी नागरिकों को मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। गरिमा के साथ इंसान तभी जी सकता है जब उसे उसके सारे मानवीय अधिकार प्राप्त हों। उसकी आजीविका के लिए उसका सम्मानजनक पेशा हो। दुखद है कि हमारे देश मे ऐसा है नहीं। हमारे देश में कुछ ऐसी कुप्रथाएं हैं जिसकी वजह से इंसान अपनी आजीविका के लिए अमानवीय कार्य करने को विवश है। उनमें से एक है मैलाप्रथा का जारी रहना। यह एक ऐसी प्रथा है जो छुआछात और जातिवाद पर आधारित है। भले ही हमारे संविधान ने छुआछात की प्रथा का उन्मूलन कर दिया हो पर देश की सामाजिक व्यवस्था जाति आधारित होने के कारण आज भी यह कुप्रथा मौजूद है। जातिगत  भेदभाव उच्च-निम्न क्रम पर आधारित है। इतना ही नहीं हमारे देश में पितृसत्ता है जिसके कारण यहां लैंगिक भेदभाव है। मानव अधिकारों के तहत संविधान में लैंगिक समानता है यानी स्त्री हो या पुरुष सभी के अधिकार बराबर हैं। पर वास्तव में हमारे समाज में महिलाओं और दलितों को उनके समानता के अधिकार से वंचित किया जाता है। उन्हें गरिमा से जीने का हक नहीं दिया जाता है। तभी तो मानव मल ढोने की प्रथा जारी है। दलितों का सीवर में सीवर सफाई के दौरान जहरीली गैसों से दम घुटकर मरना जारी है। दलित महिलाओं द्वारा मानव मल ढोना जारी है। कहां हैं उनके मानव अधिकार? क्यों नहीं हैं उन्हें इज़्ज़त से जीने का अधिकार?

दुनिया के सभी लोग अपने बुनियादी मानव अधिकारों का आनंद ले सकें इसके लिए ही अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस की शुरूआत संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसम्बर 1948 में की और 1950 में महासभा ने सभी देशों को इसकी शुरूआत के लिए आमंत्रित किया। लेकिन दुखद है कि हमारे देश में मानवाधिकार कानून को अमल में लाने के लिए एक लम्बा समय लगा। इसे भारत में 26 सितम्बर 1993 को लागू किया गया।

हम सब जानते हैं कि प्रकृति इंसान और इंसान में भेद नहीं करती। वह सब को जीने का अवसर देती है। सबको हवा, पानी, भोजन और जीने की परिस्थितियां उपलब्ध कराती है। भले ही स्थान, विशेष की जलवायु के कारण कहीं गोरे लोग होते हैं - कहीं काले तो कहीं सांवले। कहीं लम्बे तो कहीं नाटे कद के। पर सबकी मानवीय बुनियादी जरूरतें एक सी होती हैं।

यह इन्सानी  प्रवृति होती है कि वह रंग, धर्म, क्षेत्र, भाषा, नस्ल, सम्प्रदाय, जाति के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन समझता है। शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर को, अमीर गरीब को कमतर समझता है। वह उस पर अपना आधिपत्य चाहता है। उसे अपना गुलाम बनाना चाहता है। उससे अपनी सेवा करवाना चाहता है। वह दूसरों के आत्मसम्मान को कुचल कर अपने अहम् भाव को तुष्ट करता है। इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पड़ा है। राजाओं के युग में एक राजा दूसरे राजा को युद्ध में हराकर उसे अपना बन्दी बना लेता था और उसके राज्य पर कब्जा कर लेता था। दूसरों पर हुकूमत करना ही उसका उद्देश्य होता था।

उपनिवेशवाद का दौर भी आया। जहां ब्रिटिश शासकों ने दुनिया के अधिकांश भागों पर अपना कब्जा कर लिया था। वहां उन्होने अपने नियमों के अनुसार शासन शुरू कर दिया था। ब्रिटिश शासकों के बारे में कहा जाता है कि उनके राज्यों में कभी सूर्यास्त नहीं होता था।

इन्हीं अंगरेजों ने हमारे देश पर भी लगभग दो सौ वर्षों तक राज किया। उनका उद्देश्य सिर्फ राज करना ही नहीं था बल्कि यहां के लोगों का शोषण कर अपने देश को समृद्ध करना था। यहां की धन-दौलत को लूटकर अपना खजाना भरना था। ब्रिटेन ने औद्योगिक क्रान्ति के दौरे में यहां से कच्चा माल ले जाकर वहां की निर्मित वस्तुएं यहां बेचकर यहां के लघु उद्योगों को भी तबाह कर दिया था।

अंग्रेजों ने ही यहां के निवासियों का शोषण किया हो - बात सिर्फ इतनी नहीं है। अपने देश की सामंतवादी व्यवस्था ने - जमींदारी प्रथा ने भी आम आदमी का जमकर शोषण किया। बाद में पूरी दुनिया में दो वर्ग प्रमुख रूप से उभर कर सामने आए - ये हैं पूंजीपति व सर्वहारा। पूंजीपति वर्ग सर्वहारा यानी मजदूर वर्ग का शोषण कर फूलने-फलने लगा।

हमारे देश में तो जातिवादी व्यवस्था भी एक बड़ा कारक बन कर उभरी। मनुवादी व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ जातियों को श्रेष्ठ एवं कुछ को तुच्छ घोषित कर दिया गया। इसमें पौराणिक परिकल्पना दी गई कि सभी मनुष्य ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं। उनके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य पैरों से शूद्रों का उत्पन्न होना बताया गया। इसी व्यवस्था के तहत शूद्रों का काम उपरोक्त तीनों  वर्णों की सेवा करना बताया गया। परिणामस्वरूप शूद्रों (दलितों) की स्थिति बद से बदतर होती गई। उन्हें सभी मानवाधिकारों से वंचित कर दिया गया। दयनीय स्थिति में जीने को विवश कर दिया गया। जाति एवं जन्म के आधार पर उन्हें हमेशा के लिए गुलाम बना दिया गया।

इसी प्रकार पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत स्त्रियों को भी पुरूषों के साथ समानता के अधिकारों से वंचित कर दिया गया। उन्हें प्रताड़ित करना वर्चस्वशाली लोगों ने अपना अधिकार समझ लिया। उनके ग्रंथ भी यह कह कर इसे न्यायोचित ठहराने लगे कि - ‘‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।’’

यह सब सिर्फ हमारे देश में ही हुआ हो - ऐसा नहीं है। गोरे अंग्रेजों ने नस्लवाद के नाम पर काले लोगों को अपना गुलाम बना लिया था। इस प्रकार शूद्र, दलित, आदिवासी, स्त्रियां, काले लोग सदियों से मानवाधिकारों से वंचित रहे।

कालान्तर में उन्हें अपनी गुलामी का एहसास हुआ और अपनी गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए जाग्रत हुए, आक्रोशित हुए और विद्रोह किया। फ्रांस की क्रान्ति को इसका पहला कदम कहा जा सकता है - जब पहली बार स्वतन्त्रता, समानता, न्याय एवं भ्रातृत्व की बात हुई। सबको मनुष्य होने का एहसास कराया गया। उनके समान अधिकारों की बात हुई। उसके बाद तो दासता की मुक्ति हेतु अनेक संघर्ष हुए। उसमें अमेरिका-अफ्रीका-रूस-भारत में स्वतन्त्रता संग्राम हुए। लोगों ने अपनी मुक्ति की लम्बी लड़ाई लड़ी।

समान मानव अधिकारों की लड़ाई में महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग, नेलसन मण्डेला, भीमराव आंबेडकर जैसे लेागों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हमारे देश में तो दलितों एवं आदिवासियों का, संवैधानिक भाषा में कहें तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का, समान मानव अधिकारों के लिए अभी भी संघर्ष चल रहा है। आज के समय में दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श एवं स्त्री विमर्श मुख्य मुद्दे बने हुए हैं।

हमारे देश की विडम्बना यह है कि यहां कानून तो बन जाते हैं पर उन पर अमल नहीं होता। आज भी देश का एक बड़ा वर्ग अपने इंसान होने की लड़ाई लड़ रहा है। हर इंसान को सम्मान के साथ जीने, इज़्ज़त की आजीविका अपनाने का हक होना ही चाहिए। संक्षेप में कहें तो स्वतन्त्रता, समानता, न्याय एवं बंधुता ही जीवन के बुनियादी सरोकार हैं और हमारे मानव अधिकार इन्हीं की वकालत करते हैं। पर सिर्फ काननू या मानव अधिकार आयोग बनाने से हमें समान अधिकार नहीं मिल जाएंगे। इसके लिए जरूरी है हम अपनी जातिवादी, मनुवादी सोच बदलें और देश के हर नागरिक को उसके गरिमा के साथ जीने के अधिकार का लुत्फ उठाने दें।

लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

इसे भी देखें : खोज ख़बर : कोरोना नहीं जाति के वायरस ने गटर में मारे 26, अत्याचार के 115 से अधिक केस

International Human Rights Day
human rights in india
Sanitation Workers
Dalits
caste discrimination
Religious discrimination
Caste System
Unequal society
Nelson Mandela
B R Ambedkar

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया

मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में सैलून वाले आज भी नहीं काटते दलितों के बाल!


बाकी खबरें

  • asgar
    सौरव कुमार
    धनबाद: कोरोना महामारी में कोयला बिनाई का काम करने वालों ने गंवाई जानें और आजीविका
    01 Nov 2021
    लॉकडाउन में कोयला खदानों के चालू रहने के बावजूद, आवाजाही पर लगे कड़े प्रतिबंधों के चलते कोयला बीनने वालों की आय खत्म हो गई।
  • dengue
    भाषा
    दिल्ली में डेंगू के मामले बढ़े, अब तक 6 की मौत, स्वास्थ्य मंत्री ने की स्थिति की समीक्षा
    01 Nov 2021
    सोमवार को जारी दिल्ली नगर निकाय की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल अभी तक मच्छिर जनित बीमारी के कारण छह लोगों की मौत हुई जबकि डेंगू के मामले बढ़कर 1,530 हो गए।
  •  Rupesh Prajapati
    सरोजिनी बिष्ट
    रूपेश प्रजापति केस : सुसाइड या जेल में हत्या? न्याय की भीख मांगता एक परिवार
    01 Nov 2021
    रूपेश कुमार प्रजापति कौन है? आखिर उसके साथ क्या हुआ कि मानवाधिकार आयोग तक को संज्ञान लेना पड़ा, ये सवाल आज बेहद अहम हैं क्योंकि इन्हीं सवालों के जवाब हमें यह बताते हैं कि एक ताकतवर सिस्टम किस कदर एक…
  • India
    आत्मन शाह
    नहीं, भारत "मुस्लिम-राष्ट्र" नहीं बनेगा! 
    01 Nov 2021
    भारत के मुस्लिम-बहुल राष्ट्र में बदलने की आशंका एक झूठा प्रचार है, जो प्रचार देश में हिंदू और मुस्लिम आबादी के विकास की ऐतिहासिक दर को ध्यान में नहीं रखता है।
  • banaras
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्टः जिस मुसहर बस्ती में 42 दिन पहले मना था मोदी के जन्मदिन का जश्न, उस पर ही चलवा दिया बुलडोज़र
    01 Nov 2021
    "सबसे पहले हमारे बच्चों की पाठशाला पर बुलडोज़र गरजा। फिर झोपड़ी ढहाई जाने लगी। हमारे घरों का सारा सामान निकालकर बाहर फेंका जाने लगा। ठंड के बावजूद बस्ती के 62 लोग खुले आसमान के नीचे आ गए हैं।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License