NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
भारत
राजनीति
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ने भारतीय किसानों एवं खाद्य सुरक्षा को जोखिम में डाल दिया है
विश्व व्यापार संगठन के नियमों में दो स्तरों पर समस्या बनी हुई है, जिसे मुक्त व्यापार समझौतों द्वारा बद से बदतर बना दिया गया है।
भारत डोगरा
22 Mar 2021
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ने भारतीय किसानों एवं खाद्य सुरक्षा को जोखिम में डाल दिया है
प्रतीकात्मक छवि। | छवि साभार: फ्लिकर 

बड़े व्यवसायों के हमलों से छोटे और मझौले किसानों को बचाने के लिए चलने वाले आंदोलन और संघर्ष कई देशों में जारी हैं। इन संघर्षों ने हर जगह किसानों के छिपे हुए दुश्मन— अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों को रेखांकित करने वाले नियमों- को बेनकब कर दिया है। इनकी शर्तें किसानों की कीमत पर बड़े व्यावसायिक हितों के पक्षपोषण के लिए बनाई गई हैं।

समस्याएं दो स्तरों पर मौजूद है – वह है विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) एवं मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के नियमों में। 

डब्ल्यूटीओ ने कृषि से संबंधित मुद्दों को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जोड़ दिया है। पूर्ववर्ती व्यापार व्यवस्थाओं के तहत इस प्रकार का मामला देखने में नहीं आता था। इतना ही नहीं, बल्कि इसे मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका एवं यूरोपीय संघ के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। हालाँकि इन देशों में कृषि, दुग्ध उत्पादन एवं अन्य सम्बंधित गतिविधियों के लिए औसत कृषि भूमि आकार भारत की तुलना में काफी अधिक है। इन क्षेत्रों में भी ज्यादातर में बेहद शक्तिशाली कृषि-व्यावसायिक हितों का वर्चस्व बना हुआ है, जो अधिक से अधिक जमीन को अपने कब्जे में कब्जे में करते जा रहे हैं।

इस प्रकार डब्ल्यूटीओ व्यापार शासन की प्रक्रिया में शामिल होते हुए विकासशील एवं गरीब देशों (इसमें सबसे बड़ी संख्या भारत में है) के कमजोर छोटे किसानों को अमीर देशों के कृषि क्षेत्रों के साथ बेहद असमान और गैर-वाजिब प्रतिस्पर्धा में धकेल दिया गया है।

तीन पहलुओं ने इस अन्याय को और अधिक बढ़ाने का काम किया है: एक, अमीर देशों में कृषि क्षेत्र के लिए भारी पैमाने पर सरकारी सब्सिडी की व्यवस्था ने, जिसे गरीब देशों द्वारा कर पाना संभव नहीं है। दूसरा, बड़े कृषि-व्यवसाय से जुडी कम्पनियाँ, जो सबसे प्रमुखता से अमेरिका में मौजूद हैं, जिन्होंने बड़े किसानों के स्वार्थ में लॉबीइंग करते हुए पर्याप्त संसाधनों का ढेर जमा करने के लिए अपने छोटे किसानों को उपेक्षित छोड़ दिया है। छोटे किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण पर पड़ने वाले उनके हानिकारक प्रभावों को ताकतवर अंतर्राष्ट्रीय लॉबी द्वारा पूरी तरह से अनदेखी कर दी जाती है।

डब्ल्यूटीओ के नियमों के बारे में माना जाता है कि इसके नियम, इन तथाकथित मूल्य-विकृतियों वाली सब्सिडी में कमी लाने में कारगर साबित हो सकते हैं। किन्तु अमेरिका और यूरोपीय संघ की प्रभुत्वशाली भूमिका के कारण उनके द्वारा दी जा रही सब्सिडी को नियमों के अनुपालन के तौर पर वर्गीकृत कर दिया जाता है। जबकि इन राष्ट्रों की ओर से विकासशील देशों द्वारा मुहैया की जा रही सब्सिडी को लेकर आपत्ति दर्ज की जाती है, जो आजीविका एवं खाद्य सुरक्षा की सुरक्षा के काम आती हैं।

अमीर देशों में गहन-मशीनीकृत एवं उर्जा-प्रधान प्रकृति की खेती और उनके द्वारा एक ही किस्म की खेती पर जोर दिए जाने को देखते हुए कृषि वस्तुओं को डंप करने की प्रवृति काफी अधिक है, जो विकासशील देशों में छोटे किसानों को बर्बाद कर सकती हैं। बड़े पैमाने पर सब्सिडी के चलते उनके उत्पादों के मूल्य निर्धारण को उनकी लागत से भी नीचे की दर पर बनाये रखना उनके लिए संभव है।

इसलिए जहाँ एक तरफ आयात करने पर अनुचित प्रतिस्पर्धा का भारी जोखिम मौजूद है, वहीं दूसरी तरफ गरीब देशों के किसानों के सामने डब्ल्यूटीओ द्वारा अपनी रूल-बुक से उनकी सब्सिडी पर चाबुक चलाने का जोखिम बना हुआ है। इस प्रक्रिया के जरिए गरीब उपभोक्ताओं के सामने अपनी खाद्य सब्सिडी को खो देने का संकट उत्पन्न हो गया है। 

डब्ल्यूटीओ व्यापार के साथ-साथ तथाकथित बौद्धिक संपदा अधिकारों को भी सम्बद्ध करता है। इस प्रकार पेटेंट्स को पौधों और फसलों सहित जीवन के विविध स्वरूपों पर लागू किया जा रहा है। इससे किसानों की बीजों तक पहुँच और उनके बीज पर अधिकार को भी सीमित कर दिया गया है। बड़ी कम्पनियों द्वारा बेचे जाने वाले महंगे पेटेंटेड बीजों की नियमित खरीद उनके उपर एक और बोझ लादने के समान है।

मानव विकास रिपोर्ट (एचडीआर) ने व्यापार पर एक विशेष अंक तैयार किया है, जो मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली में गैर-बराबरी और अन्याय को सामने लाता है। यह रिपोर्ट कहती है “कृषि सब्सिडी के माध्यम से मुहैय्या किये जा रहे वित्तीय हस्तांतरण की तुलना में कहीं अधिक प्रतिगामी या अपेक्षाकृत कम प्रभावी-प्रणाली की रुपरेखा को तय कर पाना मुश्किल होगा। औद्योगिक देश खुद को एक ऐसी प्रणाली में जकड़े हुए हैं जो देश के भीतर पैसे की बर्बादी तो करती ही है, साथ ही साथ लोगों की आजीविका को भी नष्ट करती है।”

एचडीआर के अनुसार इसने बेहद अनुचित व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम किया है। एचडीआर  का मानना है “खेती में नियमों की वर्तमान रुपरेखा के साथ एक समस्या यह है कि वे डब्ल्यूटीओ की क़ानूनी वैधता के हवाले से अनुचित व्यापार नियमों को संस्थाबद्ध करने का काम करती हैं। यह इस बारे में सवाल खड़े करता है कि कब एक सब्सिडी, को सब्सिडी नहीं कह सकते। और जवाब मिलता है कि ऐसा नहीं है “जब विकसित देश उसे सब्सिडी न माने”। 

जहाँ एक तरफ विकासशील देश डब्ल्यूटीओ शासन के तहत लादे गए नए नियमों के बेहद अस्थिर और नुकसानदेह प्रभावों से उभर पाने से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एफटीए की एक श्रृंखला को प्रस्तावित और हस्ताक्षरित करने के क्रम भी शुरुआत हो चुकी है। इसने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नुकसानदेह प्रभावों को और अधिक बढ़ा दिया है जैसा कि उदहारण के तौर पर इन समझौतों के नियमों में आयात और पेटेंट्स की शर्तों को देखा जा सकता है, जो अक्सर और भी ज्यादा हानिकारक होते हैं। जैसे कि डब्ल्यूटीओ मंच पर समझौतों में दी गई छूट, अक्सर छोटे अंतर्राष्ट्रीय मंचों या द्विपक्षीय मंचों पर हस्ताक्षरित किये जाने वाले समझौतों से नदारद पाई जाती हैं।

उदहारण के लिए 1990 के शुरूआती दशक में नाफ्टा समझौते में अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको शामिल थे, जिसमें सस्ते मक्के के आयात के कारण मेक्सिको में करीब दस लाख किसानों को विस्थापित होना पड़ा। इतना ही नहीं, बल्कि विशालकाय खाद्य-प्रसंस्करण कंपनियों द्वारा की गई घपलेबाजी के कारण खाद्य सुरक्षा को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा था। मक्के से बनने वाले प्रमुख आहार केक के दामों में कमी आने के बजाय भारी बढ़ोत्तरी देखने को मिली थी, जैसा कि समझौते पर दस्तखत किये जाते वक्त वादा किया गया था।

मुक्त व्यापार समझौतों में, विशेषकर जिनमें बेहद अमीर और प्रभुत्वशाली देश के साथ विकासशील देश शामिल हैं, में कमजोर खिलाड़ी की नीतियों को प्रभावित करने के लिए कहीं अधिक गुंजाईश बनी रहती है। इससे समूची खाद्य और कृषि क्षेत्र को कहीं व्यापक स्तर पर विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारों पर नाचने के लिए मजबूर किया जा सकता है। इस प्रकार की आशंकाओं को अमेरिका और भारत के बीच में मुक्त व्यापार समझौते के तहत चल रही बातचीत के सन्दर्भ में व्यक्त किया जा रहा है।

भारत में वर्तमान में जारी किसानों के आंदोलन ने इस ओर ध्यान आकर्षित कराया है कि किस प्रकार से सरकार की कई नीतियों के पीछे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं डब्ल्यूटीओ से संबंधित समस्याएं जुड़ी हुई हैं।

एक हालिया नीतिगत मसले पर सी द्वारा, बढ़ती भूख और कुपोषण की रिपोर्टों और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को विस्तारित किये जाने की मांग के बीच, खाद्य सब्सिडी प्रणाली को सीमित करना एक अजीबोगरीब बात है। किसानों, उपभोक्ताओं और खाद्य सुरक्षा संगठनों को कमजोरों के हितों की रक्षा के लिए सीमाओं के पार जाकर आपसी सहयोग बढ़ाने की जरूरत है। 

टिप्पणीकार पत्रकार एवं लेखक हैं। आपकी हालिया किताबों में प्रोटेक्टिंग अर्थ फॉर चिल्ड्रेन एवं मैन ओवर मशीन शामिल हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

International Trade Puts Indian Farmers and Food Security at Risk

food security
WTO
FTA
NAFTA
Farm Protests
Human Development Report
Indo US Trade Deal
Dairy Sector
Trade subsidies

Related Stories

युद्ध, खाद्यान्न और औपनिवेशीकरण

खेती के संबंध में कुछ बड़ी भ्रांतियां और किसान आंदोलन पर उनका प्रभाव

कृषि क़ानून और खाद्य सुरक्षा 

अमेरिका क्यों तीनों कृषि क़ानूनों का समर्थन करता है?

जम्मू-कश्मीर में केंद्र के दो एजेंडे: लैंड यूज पर नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा का खात्मा

साम्राज्यवादी एजेंडे के सामने मोदी के कृषि विधेयकों का साष्टांग दंडवत


बाकी खबरें

  • International
    न्यूज़क्लिक टीम
    2021: अफ़ग़ानिस्तान का अमेरिका को सबक़, ईरान और युद्ध की आशंका
    30 Dec 2021
    'पड़ताल दुनिया भर' की के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने न्यूज़क्लिक के मुख्य संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से बात की कि 2021 में अफ़ग़ानिस्तान ने किस तरह एक ध्रुवी अमेरिकी परस्त कूटनीति को…
  • Deen Dayal Upadhyaya Gorakhpur University
    सत्येन्द्र सार्थक
    दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पर गंभीर आरोप, शिक्षक और छात्र कर रहे प्रदर्शन
    30 Dec 2021
    गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पर कुछ प्रोफेसर और छात्रों ने आरोप लगाया है कि “कुलपति तानाशाही स्वभाव के हैं और मनमाने ढंग से फ़ैसले लेते हैं। आर्थिक अनियमितताओं के संदर्भ में भी उनकी जाँच होनी…
  • MGNREGA
    सुचारिता सेन
    उत्तर प्रदेश में ग्रामीण तनाव और कोविड संकट में सरकार से छूटा मौका, कमज़ोर रही मनरेगा की प्रतिक्रिया
    30 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश में देश की तुलना में ग्रामीण आबादी की हिस्सेदारी थोड़ी ज़्यादा है। सबसे अहम, यहां गरीब़ी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या देश की तुलना में कहीं ज़्यादा है। इस स्थिति में कोविड…
  • delhi
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना पाबंदियों के कारण मेट्रो में लंबी लाइन बसों में नहीं मिल रही जगह, लोगों ने बसों पर फेंके पत्थर
    30 Dec 2021
    दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों के बाहर गुरुवार सुबह लगातार दूसरे दिन यात्रियों की लंबी-लंबी कतारें देखी गईं।
  • AFSHPA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    नगा संगठनों ने अफस्पा की अवधि बढ़ाये जाने की निंदा की
    30 Dec 2021
    केंद्र ने बृहस्पतिवार को नगालैंड की स्थिति को ‘‘अशांत और खतरनाक’’ करार दिया तथा अफस्पा के तहत 30 दिसंबर से छह और महीने के लिए पूरे राज्य को ‘‘अशांत क्षेत्र’’ घोषित कर दिया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License