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ईरान का ‘लुक ईस्ट’ नज़रिया और भारत के लिए संभावना
भारत को रूस, चीन और यूरोपीय संघ का अनुकरण करना चाहिए क्योंकि इन सभी देशों ने फ़ारस की खाड़ी के क्षेत्रीय घटकों के साथ अपने रिश्तों को कामयाबी के साथ विविधता बख़्शी है।
एम. के. भद्रकुमार
23 Jul 2020
Chabahar Port
चाबहार बंदरगाह ईरान, भारत, अफ़ग़ानिस्तान और चीन सबके लिए फ़ायदेमंद है

मंगलवार को तेहरान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान और रूस की अगुवाई वाला ईरान यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU), दोनों पक्षों के बीच व्यापार सम्बन्धों के विस्तार पर तीन और कार्य-दल स्थापित करेगा, जिसे लेकर उन भारतीय विश्लेषकों को छोड़कर किसी को अचरज नहीं होना चाहिए,जो फ़ारस की खाड़ी की राजनीति को बहुत सरलता के साथ शिया ईरान और सुन्नी अरब देशों के बीच दो आधार वाली राजनीति के तौर पर देखते हैं। इस रिपोर्ट में ईरान के यूरेशियन एकीकरण पर रोशनी डाली गयी है। सवाल है कि आख़िर इसका निहितार्थ क्या  है?

इसमे कोई शक नहीं कि ईरान-रूस सम्बन्ध गहरे हो रहे हैं और जिसके यूरेशिया और फ़ारस की खाड़ी वाले विशाल क्षेत्र के भू-अर्थशास्त्र के लिए दूरगामी नतीजे होंगे। ऐसे में ईरान को नहीं समझ पाने वाले अमेरिका की तरफ़ से किये जा रहे उसके ख़िलाफ़ दुष्प्रचारों के बीच भारत को इन सब बातों से बेख़बर नहीं रहना चाहिए।

ईरान के विदेश मंत्री,जवाद ज़रीफ़ पिछले दो महीनों में रूस की अपने दूसरे दौरे पर मंगलवार को मॉस्को में थे। इस दौरे का का पूरा ध्यान जेसीपीओए (2015 परमाणु समझौते) पर है, जिससे ट्रम्प प्रशासन ने दो साल पहले अपने हाथ एकतरफ़ा खींच लिए थे। वॉशिंगटन अब राष्ट्रपति ट्रम्प के शीघ्र ही समाप्त हो रहे कार्यकाल से पहले इस जेसीपीओए को ख़त्म करने की पूरी कोशिश कर रहा है।

अमेरिकी घरेलू राजनीति में बहुत ही अस्थिरता होने के चलते इज़राइल भी घबराया हुआ है और इस बात को लेकर चिंतित है कि नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प अपने पद पर बने रहेंगे या नहीं। हाल ही में ईरान में आतंकवादी बम विस्फ़ोटों में आयी अचानक तेज़ी अमेरिका-इज़रायल के ख़ुफ़िया तंत्र द्वारा तेहरान को कुछ कठोर क़दम उठाने से रोकने के लिए एक हताशा भरे आख़िरी प्रयास का संकेत देता है, जो नवंबर से पहले किसी टकराव का बहाना बन सकता है।

लेकिन, इस मामले को अमेरिका-इजरायल की जो बात जटिल बनाती है, वह यह है कि जेसीपीओए पर हस्ताक्षर करने वाले यूरोपीय संघ के साथ-साथ ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी (2015 से पहले) ईरान के ख़िलाफ़ सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध वाली वाशिंगटन की सुनियोजित योजना के साथ पहले की तरह जुड़ने से इंकार कर रहे हैं।

इसके अलावा, यूरोपीय संघ हाल ही में अपने ख़ुद के हितों को आगे बढ़ाने के लिए एक भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इन प्रतिबंधों का इस्तेमाल करने को लेकर अमेरिका के इस एकतरफ़ावाद और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के उल्लंघन की खुली आलोचना कर रहा है। पिछले शुक्रवार को एक बयान में यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख,जोसेप बोरेल ने कहा कि इन प्रतिबंधों के ज़रिये यूरोप के मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप अस्वीकार्य है। दिलचस्प बात तो यह है कि बोरेल ने ईरान के ख़िलाफ़ इन अमेरिकी प्रतिबंधों का हवाला देते हुए इसे एक मुद्दे के तौर पर नामंज़ूर कर दिया।

इस तरह की जटिल पृष्ठभूमि में रूसी समर्थन पर ईरान की निर्भरता अहम होती जा रही है। अक्टूबर तक आने वाले तीन महीने इसलिए महत्वपूर्ण हैं,क्योंकि जेसीपीओए एक और महत्वपूर्ण बिन्दु तक पहुंच जायेगा,यानी ईरान की ख़रीद और बिक्री पर लगे संयुक्त राष्ट्र का प्रतिबंध समाप्त हो जायेगा। हम रूस (और चीन) के साथ ईरान के सैन्य सहयोग के मज़बूत होने की उम्मीद कर सकते हैं।

अब इस ईएईयू में ईरान के जुड़ने के साथ-साथ 400 बिलियन डॉलर का चीन-ईरान के बीच वह व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौता भी होने वाला है, जिसे लेकर बातचीत जारी है। हमें यहां जो कुछ भी नज़र आ रहा है, वह कुल जमा एक शानदार ईरानी ‘लुक ईस्ट’रणनीति है।

हालांकि भू-आर्थिक नज़रिये से चीन के साथ यह रणनीतिक साझेदारी समझौता जहां एक तरफ़ वैश्विक स्तर पर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के प्रमुख ढांचे के रूप में ईरान की हैसियत में आयी उछाल को चिह्नित करेगा, वहीं दूसरी तरफ़ ईएईयू में ईरान के जुड़ जाने से 26 करोड़ की कुल आबादी वाला एक मुक्त-व्यापार क्षेत्र भी खुलेगा।

एक भागीदार के रूप में ईरान की विशिष्टता स्थानीय क्षमता वाली प्रौद्योगिकी, अप्रयुक्त बाज़ार (जनसंख्या: 8 करोड़), तेल और गैस (दुनिया के सबसे बड़े गैस भंडार में से एक), और इसकी भौगोलिक स्थिति सहित विशाल खनिज संसाधनों में निहित है। फ़ारस की खाड़ी के अन्य देशों में से कोई भी देश एक क्षेत्रीय शक्ति से संपन्न देश के तौर पर ईरान की साख की बराबरी नहीं कर सकता है।

कुछ के पास तेल हो सकता है, कुछ के पास गैस हो सकता है; लेकिन किसी के पास ईरान की तरह सुशिक्षित और कुशल जनसंख्या, बड़ा बाज़ार, विज्ञान और उन्नत प्रौद्योगिकी, मज़बूत कृषि आधार, और लौह अयस्क, बॉक्साइट और एल्युमिनियम से लेकर जस्ता और सीसा, यूरेनियम, तांबे, सोने और हर्बर्टस्मिथाइट तक भारी मात्रा में विभिन्न खनिजों के भंडार नहीं हैं।  

यूरोपीय संघ की नज़र में ईरान अप्रत्याशित रूप से एक इस वार्ता में शामिल होने वाला एक गंभीर देश है। यूरोपीय संघ इस बात को लेकर बेहद सचेत है कि ईरान के प्रति ट्रम्प प्रशासन की 'अधिकतम दबाव' वाली रणनीति पूरी तरह से तेहरान को दबाव में लाने में नाकाम रही है। यूरोपीय संघ को यह भी समझ में आता है कि अगर ट्रम्प अपने फिर से चुने जाने में नाकाम रहते हैं, जिसके आसार लगातार बढ़ते जा रहे हैं, तो जो बिडेन के कार्यकाल में ईरान को लेकर अमेरिका नीतियां में नाटकीय रूप से बदलाव आयेगा।

हम उम्मीद कर सकते हैं कि बिडेन अपने पूर्ववर्ती के उस 'अधिकतम दबाव’ वाली रणनीति से अचानक अपने हाथ खींच सकते हैं,जो बराक ओबामा प्रशासन की विरासत वाली जेसीपीओए में प्रवेश करने के रास्ते में गतिरोध बनी हुई है और इससे वाशिंगटन की जेसीपीओए में भागीदारी को पुनर्जीवित करेगा।

इसे आसानी से पूरी तरह ऐसे समझा जा सकता है कि यूरोपीय सहयोगियों के साथ तालमेल बनाते हुए बिडेन प्रशासन एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में ईरान के लिए पश्चिमी प्रौद्योगिकी के व्यापार, निवेश और प्रवाह को खोलते हुए ईरान के व्यापक एकीकरण के ढांचे के भीतर 2015 के परमाणु समझौते को लाने के लिए CP JCPOA + पर बातचीत करने के नज़रिये से तेहरान के साथ एक रचनात्मक जुड़ाव की ओर बढ़ेगा।

बेशक, इससे इन कठिन वार्ताओं को पूरा करने में तेज़ी आयेगी। रूस और चीन के साथ ईरान की रणनीतिक साझेदारी इस बात का संकेत है कि ईऱान वैश्विक नज़रिये वाला एक प्रामाणिक क्षेत्रीय शक्ति है। तेहरान अमेरिका के साथ आने वाले समय में इस पोकर खेल (ताश का एक प्रकार का खेल,जिसमें शर्त लगाना व अकेले खेलना शामिल होता है।) के लिए सक्रिय रूप से अपनी विश्वसनीयता बना रहा है।

यही वह स्थिति है, जहां भारतीय कूटनीति के लिए मौक़े हैं। ईरान को लेकर भारत की किसी भी बड़ी शक्ति के साथ न तो प्रतिस्पर्धा है और न ही ईरान, चीन के साथ भारत की प्रतिस्पर्धा वाला कोई मैदान है। बल्कि इसके ठीक उलट, भारत को रूस, चीन और यूरोपीय संघ का अनुकरण करना चाहिए,जिनमें से सभी देशों ने फ़ारस की खाड़ी के इन क्षेत्रीय घटकों के साथ अपने रिश्तों को कामयाबी के साथ विविधता दी है।

महत्वपूर्ण बात तो यही है कि भारतीय कूटनीति को फ़ारस की खाड़ी में न सिर्फ़ ईरान, बल्कि सऊदी अरब के साथ अमेरिकी नीतियों में बदलाव की प्रबल संभावना का अनुमान लगाना चाहिए, क्योंकि भारत ने वास्तव में कैपिटल हिल, वाशिंगटन के कथित उदार प्रतिष्ठान और अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान की क़ीमत पर अपने दोस्त खो दिये हैं।

हमारे देश में अमेरिकी पैरोकार फ़ारस की खाड़ी को ईरान और सऊदी अरब के बीच दो बुनियादी हिस्सा दिखाकर भ्रम पैदा कर रहे हैं। वे या तो अनजाने में या तो जानबूझकर अनभिज्ञ हैं या फिर इस समय मध्यपूर्व के मुस्लिम देशों में चल रही क्षेत्रीय राजनीति के छिपे रुझान को जानबूझकर नहीं दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

पश्चिम एशिया की राजनीति के उत्तरी स्तर में हाल के दशक में एक भीषण नाराज़गी वाली जिस क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता में उबाल आया है, उसकी एक तरफ तुर्की और कतर है और दूसरी तरफ़ सऊदी अरब, यूएई और मिस्र है।

सऊदी-ईरानी प्रतिद्वंद्विता, जो कि कहीं ज़्यादा दिखावटी है, इसके ठीक उल्टा मुस्लिम ब्रदरहुड के काले साये को देखते हुए तुर्की और कतर के ख़िलाफ़ सऊदी-अमीरात-मिस्र का संघर्ष का मक़सद अस्तित्वगत हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड इस क्षेत्र के सत्तावादी शासन में परिलक्षित होता है। इस हक़ीक़त को भारतीय मीडिया की धारणाओं का हिस्सा बनना बाक़ी है।

जिस तरह की अटकलें लगाया जा रही हैं, उसके आधार पर हमें फ़ारस की खाड़ी में एक युद्धविराम की उम्मीद करनी चाहिए, जो सउदियों और अमीरातियों को लीबिया से लेकर मिस्र और अरब प्रायद्वीप तक पूर्व में फ़ैले इस क्षेत्र के व्यापक पट्टी में एकाकी सोच के साथ राजनीतिक इस्लाम की संभावित लहर पर केंद्रित होगा। तुर्की और मिस्र के बीच किसी सैन्य टकराव से इंकार नहीं किया जा सकता है, जिसमें अनिवार्य रूप से तुर्की की ओर से कतर और मिस्र की तरफ़ से सउदी और अमीरात शामिल हो जायेगा।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत सिंगापुर या मोनाको की तरह एक आयामी नगर-राज्य नहीं है, जहां से पश्चिम एशियाई राजनीति को लेकर कोई तरफ़दारी वाला विचार देखने को मिल सके। भारत पश्चिम एशिया का पड़ोसी है और भारत फ़ारस की खाड़ी की राजनीति को शिद्दत के साथ महसूस करता है। भारत को ईरान के बारे में अपनी समझ के लिए किसी अमेरिकी पैरोकार की ज़रूरत नहीं है।

ईरान के साथ भारत के सम्बन्ध के लिए ज़रूरी है कि यूएस-इज़रायल के पैरोकारों द्वारा फ़ैलाये गये बेबुनियाद ख़बरों और ग़लत सूचनाओं से बनी ग़लत धारणाओं से बचे। इसलिए जब तक भारत अपनी सामरिक स्वायत्तता बरक़रार रखता है और स्वतंत्र विदेशी नीतियों का अनुसरण करता है, तब तक ईरान के साथ आपसी समझ का आधार दिल्ली स्थित नीति निर्माताओं के लिए बना रहेगा।

वह दिन दूर नहीं है,जब दिल्ली और तेहरान के संयुक्त प्रयासों की बदौलत भारत द्वारा विकसित चाबहार बंदरगाह कंटेनर टर्मिनलों से अफ़ग़ान सीमा तक रेलगाड़ियां चलेंगी। वास्तव में, इस विडंबना के एक दिलचस्प मोड़ पर अफ़ग़ानिस्तान ने चाबहार बंदरगाह से चीन के रास्ते कांडला पर एक खेप भेजा है !

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Iran’s ‘Look East’ Approach and Potential for India

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