NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
‘विकलांगता’ क्या मख़ौल या मज़ाक उड़ाने का विषय है?
खुशबू सुंदर प्रकरण के बाद यही कहा जा सकता है कि उच्च पदों पर या सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर सकने वाले ऐसे व्यक्तियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई ज़रूर हो ताकि ऐसा संदेश जाए कि विकलांगों का अपमान या किसी भी तरह सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित लोगों के किसी भी किस्म के नकारात्मक चित्रण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सुभाष गाताडे
16 Oct 2020
khusbu
खुशबू सुंदर बीजेपी में शामिल होने के दौरान। फोटो ट्विटर से साभार

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस, लगभग तीस साल हो गए जबसे दस अक्तूबर को इसे मनाया जाता है।

दरअसल वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ की सालाना गतिविधि के तौर पर इसका आगाज़ हुआ था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इस दिवस को मनाने का मकसद है कि ‘‘दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को लेकर जागरूकता पैदा की जाए और इन प्रयासों के लिए समर्थन जुटाया जाए।’

इसे विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि इस दिवस के महज तीन दिन बाद मानसिक स्वास्थ्य का मसला नकारात्मक ढंग से सुर्खियां बना, जब भाजपा में शामिल हुईं तमिलनाडु की नेत्री खुशबू सुंदर ने अपनी पूर्व पार्टी कांग्रेस के प्रति ऐसे ही अपमान जनक लफ़्ज़ों का प्रयोग किया, जब उन्होंने कांग्रेस को ‘मानसिक तौर पर विकलांग पार्टी कहा जो अपने लिए नहीं सोच सकती है।’

जाहिर था उनके इस बयान को लेकर उनके गृहप्रांत तमिलनाडु में जबरदस्त जनारोष उठा और विकलांगों के अधिकारों के लिए संघर्षरत नेशनल प्लेटफॉर्म फार राइटस आफ द डिसएबल्ड ने उनके खिलाफ - चेन्नई, कांजीपुर, मदुराई, कोईम्बतूर, तिरूपुर आदि प्रमुख शहरों के अलावा अन्य जगहों पर - राज्य के तीस अलग अलग पुलिस स्टेशनों में शिकायत दर्ज करायी।

मालूम हो, भारत जैसे मुल्क में जहां विकलांगता का बेहद नकारात्मक चित्रण करना आम है, जहां व्यक्ति की विकलांगता को उसके व्यक्तित्व का हिस्सा मान लिया जाता है तथा जो उसके साथ भेदभाव को भी सामान्यीक्रत (normalise) कर देता है, वहां ऐसा कोई भी आचरण बेहद निन्दनीय है और ऐसे चित्रण को रोकने के लिए कानून बने हैं। किसी ‘विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति का ऐसा भद्दा मज़ाक 2016 में बने राइटस आफ पर्सन्स विथ डिसएबिलिटीज एक्ट की धारा 92/ए/ का साफ साफ उल्लंघन भी है, जिसके मुताबिक ‘‘ जो कोई सचेतन तौर पर विकलांग व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान पर अपमानित करेगा या डराएगा तो उसे कम से कम छह माह की सज़ा हो सकती है जिसे पांच साल और जुर्माने तक बढ़ाया जा सकता है।’’

विडम्बना ही है समाज के अग्रणी लोगों द्वारा ऐसे लफ़्ज़ों का प्रयोग बेहद आम है।

ऐसे अपमानजनक प्रयोगों में संविधान की कसम खाकर अपना पद संभाले प्रधानमंत्री मोदी भी कहीं पीछे नहीं हैं। ‘द वायर’ पर अपने एक प्रोग्राम में जानीमानी पत्राकार आरफा खानम शेरवानी ने इस बात के सबूत पेश किए थे कि किस तरह 2014 के चुनावों की तैयारी के दौरान सभाओं में विकलांगों के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग उनके द्वारा किया गया था।  

हम याद कर सकते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले खडगपुर के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इसी किस्म का व्यवहार राष्ट्रीय रोष का सबब बना था, जब डिसलेक्सिया/अपपठन/वाकविकार - अक्षरों एवं अक्षरों के विन्यास एवं ध्वनियों से उनके मिलान में अक्षम या कठिनाई से होने वाला एक डिसऑर्डर, जिससे दुनिया के तमाम बच्चे प्रभावित होते हैं - को दूर करने को लेकर किसी छात्रा द्वारा लिए गए प्रोजेक्ट की चर्चा के दौरान उन्होंने उस छात्रा की बातचीत को अधबीच में ही काटते हुए उन्होंने पूछा था कि क्या इस प्रोजेक्ट से 40-50 साल के बच्चों की भी मदद हो सकती है - और वह हंस दिए थे और जब छात्रा ने कहा कि ‘हां’ तो उन्होंने कहा कि फिर ‘‘ऐसे बच्चे की मां भी बहुत खुश होगी।’ याद रहे डिसलेक्सिया को लेकर उनकी इस हंसी को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी पर उनकी अप्रत्यक्ष टिप्पणी के तौर पर समझा गया था।

याद रहे डिसलेक्सिया - जिसके बारे में हम लम्बे वक्त़ तक अनभिज्ञ रहे हैं और जिसको दूर करने के लिए किए जा रहे प्रोजेक्ट ने मोदी को हंसने का एक बहाना दे दिया था - दरअसल सीखने में कठिनाई की आम दिक्कत है जो पढ़ने, लिखने और स्पेलिंग करने में बाधा पहुंचाती है, -  गौरतलब है कि सीखने की इस विशिष्ट कठिनाई से बु़द्धिमत्ता/प्रतिभा पर कोई असर नहीं होता - के बारे में खुद भारत सरकार की तरफ से इंगित किया गया है कि दुनिया भर में 5 से 20 फीसदी बच्चे इससे प्रभावित होते हैं, जबकि भारत में यह प्रतिशत लगभग 15 है। और अगर हम वर्ष 2013 में मान्यताप्राप्त स्कूलों में दाखिला लिए लगभग 22 करोड 90 लाख छात्रों की संख्या को देखें तो अकेले भारत में ऐसे बच्चों की संख्या साड़े तीन करोड़ तक पहुंचती है। अभी ज्यादा वक्त़ नहीं हुआ है जब ऐसी किसी स्थिति के बारे में जनमानस में जागरूकता आयी है। विडम्बना ही है कि इस स्थिति की व्यापकता के बावजूद भारत में इसे लेकर जागरूकता लाने का श्रेय एक तरह से बॉलीवुड की एक फिल्म ‘तारे ज़मीं पर’ को जाता है।

यह समझना जरूरी है कि सार्वजनिक जीवन में शामिल ऐसे लोगों का ऐसा विवादास्पद आचरण एक तरह से पूरे समाज में विकलांगता के प्रश्न के प्रति बेरूखी भरे रूख को ही प्रतिबिम्बित करता है। 


मिसाल के तौर अपने एक महत्वपूर्ण आलेख ‘अंडरएस्टिमेटिंग डिसएबिलिटी’ / इंडियन एक्स्प्रेस, 7 जनवरी 2016/ में जनाब विवेक देब्रॉय - जो ‘नीति आयोग’ के सदस्य हैं - ने इसी बात की ताईद करते हुए लिखा था कि ‘विकलांगता को हम न ठीक से परिभाषित कर रहे हैं और न उस सच्चाई को ठीक से ग्रहण कर रहे हैं।’ विकलांगता को नापने में बरते जा रहे एक किस्म के ‘मनमानेपन’ की चर्चा करते हुए वह बताते हैं कि वर्ष 1872 से 1931 के बीच जनगणना के दौरान विकलांगता को लेकर महज एक प्रश्न पूछा गया, 1941 से 1971 के दरमियान ऐसा कोई प्रश्न नहीं पूछा गया,  जिस प्रश्न को 1981 में पूछा गया, उसे 1991 में फिर हटा दिया गया। उनके मुताबिक रेखांकित करनेवाली बात है कि विकलांगता को लेकर 2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना भी मुमकिन नहीं है क्योंकि विकलांगता की परिभाषा एक जैसी नहीं है क्योंकि 2001 में पांच किस्म की विकलांगता को लेकर सवाल पूछे गए जबकि 2011 में आठ किस्म की विकलांगता को लेकर।
चाहे रोजगार में उनके प्रतिशत की गैरजानकारी का मामला हो या उनकी वास्तविक संख्या को लेकर हमारी गैरजानकारी हों, या उन्हें मज़ाक के केन्द्र में रखना हो, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों हैं। इसकी कई स्तर पर व्याख्या मुमकिन है। 


दरअसल जब तक विकलांगता को चिकित्सकीय निगाहों से देखा जाता रहेगा, शरीर की खास स्थिति को ‘अबनॉर्मल’ अर्थात ‘असामान्य’ कहा जाता रहेगा, तब तक इसी किस्म के आकलन तक हम पहुंचेंगे। इस सन्दर्भ में विशेष चुनौतियों वाले व्यक्तियों के प्रश्न पर 1978 में प्रकाशित अपनी चर्चित किताब ‘हैण्डिकैपिंग अमेरिका’ में विकलांगों के अधिकारों के लिए संघर्षरत फ्रैंक बोवे जो बात कहते हैं, वह गौरतलब है। उनका कहना है कि असली मुद्दा विकलांगता के प्रति - फिर चाहे वह दृष्टिजनित हो या चलनजनित -सामाजिक प्रतिक्रिया का है। अगर कोई समुदाय भौतिक, स्थापत्यशास्त्रीय, यातायात सम्बन्धी तथा अन्य बाधाओं को बनाये रखता है तो वह समाज उन कठिनाइयों का निर्माण कर रहा है जो विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति को उत्पीड़ित करते हैं। दूसरी तरफ, अगर कोई समुदाय इन बाधाओं को हटाता है, तो विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति अधिक ऊंचे स्तर पर काम कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ‘विकलांगता’ सामाजिक तौर पर निर्मित होती है। इस गहरे एहसास के बाद कहें या अन्य वजहों से कहें अधिकतर विकसित देशों में विकलांगता को नापने का पैमाना ‘सामाजिक कारणों’ की तरफ बढ़ा है, जिसमें उन संस्थागत एवं सामाजिक प्रणालियों को रेखांकित किया जाता है, जो एक तरह से सामान्य जीवन जीने में बाधा बनती हैं।

अंत में अगर हम खुशबू सुंदर के विवादास्पद बयान की तरफ लौटें तो बताया जा रहा है कि उन्होंने उस बयान के लिए माफी मांग ली है।

सवाल यह उठता है कि क्या कानून के तहत किसी व्यवहार को अगर अपराध में शुमार किया जाता हो, वहां महज माफी मांगने से मामला समाप्त मान लिया जाए। तो इसका अर्थ क्या यही निकलता है कि आईंदा दलित-आदिवासी, जो आम जीवन में ऐसे अपमानों का आए दिन सामना करते रहते हैं,  वे ऐसी शाब्दिक माफी को ही अंतिम मान लें, जिन्हें ऐसे अपमान, वंचना, भेदभाव से बचाने के लिए अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम /1989/ जैसा बहुद प्रगतिशील कानून बना है।

दरअसल होना तो यही चाहिए कि उच्च पदों पर या सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर सकने वाले ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जरूर हो ताकि ऐसा संदेश जाए कि विकलांगों का अपमान या किसी भी तरह सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित लोगों के किसी भी किस्म के नकारात्मक चित्रण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

( सुभाष गाताडे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

disability
Mental health
BJP
khushbu sundar
Narendra modi

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..


बाकी खबरें

  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    आप ने भगवंत मान को बनाया सीएम उम्मीदवार, चुनाव आयोग पर भेदभाव का आरोप और अन्य ख़बरें
    18 Jan 2022
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी आम आदमी पार्टी का भगवंत मान को सीएम उम्मीदवार घोषित करने पर , चुनाव आयोग की कार्रवाइयों पर उठते सवाल और अन्य ख़बरों पर।
  • up elections
    अजय कुमार
    5 साल के कामकाज में महंगाई और मज़दूरी के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पूरी तरह से फेल!
    18 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश और पंजाब में 5 साल में रोजगार पहले से भी कम हुआ है। बेरोजगारी बढ़ी है। महंगाई बढ़ी है। कमाई कम हुई है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: क्या कोरोना के नए मामलों में आई है कमी? या जाँच में कमी का है असर? 
    18 Jan 2022
    दिल्ली में अचानक कोरोना मामलों में कमी आई है। आखिर केस कम होने के पीछे क्या कारण है? क्योंकि इस बीच कोरोना जाँच में भी भारी कमी हुई है। आँकड़े बताते हैं कि जाँच की संख्या घटाकर आधी कर दी गई है।
  • BJP
    रवि शंकर दुबे
    बीजेपी में चरम पर है वंशवाद!, विधायक, मंत्री, सांसद छोड़िए राज्यपाल तक को चाहिए परिवार के लिए टिकट
    18 Jan 2022
    यूपी विधानसभा चुनावों से पहले इन दिनों बीजेपी के भीतर जमकर बवाल चल रहा है। हर नेता अपने परिवार के सदस्यों के लिए टिकट मांग रहा है, ऐसे में बीजेपी ने कुछ की ख्वाहिशें तो पूरी कर दी हैं, लेकिन कुछ…
  • Asaduddin Owaisi
    अजय गुदावर्ती
    राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता के बारे में ओवैसी के विचार मुसलमानों के सशक्तिकरण के ख़िलाफ़ है
    18 Jan 2022
    मुसलमानों के सामाजिक बस्तीकरण के खिलाफ और उनकी आर्थिक गतिशीलता के लिए निरंतर अभियान, जो एआइएमआइएम और उसके नेताओं की राजनीति से परे है, के जरिए ही देश की अल्पसंख्यक राजनीति सही दिशा में आगे बढ़ेगी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License