NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
क्या कोरोना के लिए चीन को ज़िम्मेदार ठहराना तार्किक तौर पर सही है?
ज़रा सोचिए कि जब अमेरिका अभी तक पूरी तरह से कोरोना वायरस को स्वीकार नहीं कर रहा है तो वह कैसे कह सकता है कि एक देश के तौर पर चीन ने कोरोना के बारे में बताने में देरी की।
अजय कुमार
17 Apr 2020
कोरोना वायरस
Image courtesy: AbcNews

कोरोना से इस समय पूरी दुनिया लड़ रही है। लेकिन जब इसकी शुरुआत हुई थी तब इसका केंद्र केवल चीन था। इसलिए अगर वर्तमान की सतह पर खड़े होकर कोई यह पूछे कि कोरोना वायरस को फैलने से न रोक पाने के लिए किस को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है तो हममें से अधिकतर लोगों का जवाब होगा- चीन। लेकिन क्या इस जवाब में ईमानदारी है? क्या अमेरिका के राष्ट्रपति का यह आरोप सही है कि अगर चीन तेज़ी से कदम उठाता तो वायरस को चीन में ही रोक देता। चीन से बाहर नहीं निकलने देता।

सच्चाई यह है कि तर्क रखने का तरीका गलत है। वर्तमान और इतिहास में अंतर होता है। जिस तरह से हम वर्तमान की सतह पर खड़े होकर इतिहास को देखते हैं। इतिहास की परिस्थितियां वैसी नहीं होती हैं। एक समय में इतिहास ही वर्तमान भी होता है।  

सोचिये जब कोरोना चीन में फैला होगा तब उसके सामने कौन सी परिस्थितियां होंगी!

क्या कोरोना तभी वैश्विक महामारी बन चुका था?

बिलकुल नहीं, उस समय तक वह केवल चीन की समस्या थी। ऐसे में चीन जैसे मजबूत देश की प्राथमिकताएं क्या होंगी? इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। बहुत सारी प्राथमिकताएं हो सकती हैं। आधिकारिक तौर पर 31 दिसम्बर  2019 को चीन ने पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन को यह बताया कि चीन के वुहान के इलाके में कुछ न्यूमोनिया के ऐसे मामले आए हैं जिनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन चीन पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि 31 दिसंबर से पहले ही चीन में वायरस फैलने से तीन दर्जन ऐसे मामले आ चुके थे, जिसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यह बात भी मानी जा सकती है। लेकिन इसके लिए सीधे चीन को दोष देना उचित नहीं है कि चीन अगर तभी विश्व स्वास्थ्य संगठन को बात देता तो सही होता, यह कहना सही नहीं है।  

इसे ऐसे समझिये कि अगर गोरखपुर में कोई बीमारी फैलेगी तो सबसे पहले गोरखपुर का प्रशासन इसकी जांच पड़ताल करेगा, उसके बाद उत्तर प्रदेश का शासन, उसके बाद भारत सरकार की बारी आएगी और भारत सरकार उसकी जाँच पड़ताल करेगी। इसमें कुछ वक्त लगेगा तब जाकर मामला इस बिंदु पर आएगा कि इस बीमारी से जुड़ी सूचनाओं को कैसे प्रसारित किया जाए? सरकार ऐसे ही काम करती है और किसी भी सरकार को ऐसी ही काम करना भी चाहिए। इसी वजह से सरकार अपने स्तर पर ही बहुत सारी परेशानियों से डील कर लेती है। दिक्कत तभी आती है, जब सरकार किसी परेशनी से डील नहीं कर पाती है। कोरोना के मामलें में भी यही कहा जा रहा है कि चीन ने जब तक वुहान में लॉकडाउन लागू किया तब तक वुहान से करीब 50 लाख लोग पूरी दुनिया में फ़ैल चुके थे।

वायरस नया था तो चीन ने पूरी दुनिया के लिए वायरस का जीनोम सीक्वेंस 11 जनवरी को जारी कर दिया। इस पर पूरी दुनिया सोचनी लगी कि क्या कदम उठाया जाए? अचानक से कोई भी देश खुद को देश- दुनिया से काटकर पूरी तरह से लॉकडाउन लागू करने जैसा बड़ा फैसला तो नहीं ले सकता। भारत जैसे देश ने 25 मार्च को जब लॉकडाउन लागू किया तब तक कोरोना को लेकर पूरी दुनिया में ढाई महीने से अधिक का समय बीत चुका था। इसलिए भारत को फैसला लेने में आसानी हुई। फिर भी भारत का बहुत बड़ा प्रबुद्ध वर्ग यह कह रहा था कि भारत ने किस आधार पर पूरे देश में ताला लगा दिया। तो ज़रा सोचिये चीन कैसे अचनाक लॉकडाउन का फैसला ले सकता था। जब वही कोरोना से प्रभावित होने वाला पहला देश था।
 
विदेश मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के रे से इस विषय पर बातचीत हुई। प्रकाश के रे कहते हैं कि अमेरिका द्वारा फैलाया जा रहा ये प्रचार विशुद्ध बकवास है। पहली बात तो कॉमन सेन्स की है। कॉमन सेन्स से अगर आप सोचे तो यह जाहिर है कि प्रशासन के कई स्तर होते हैं। लोकल लेवल से लेकर स्टेट लेवल तक का प्रशासन। इन सब से होकर जब बातें गुजरती है तो देरी लगना स्वाभाविक है। उसमें भी अगर एक नया वायरस है, तब तो सोच ही सकते हैं कि देरी स्वाभाविक है। केवल यह चीन का ही नहीं किसी भी स्टेट का यही चरित्र होता है। सबसे पहले लोकल लेवल पर परेशानी संभालने की कोशिश की जाती है,  तब डिस्ट्रिक्ट लेवल की बारी आती है, उसके बाद स्टेट लेवल का अधिकारी उसे देखता है। इसमें समय लगता है।

इस कॉमन सेन्स की बात छोड़ दें तो आधिकारिक बात यह है कि 11 जनवरी को चीन ने वायरस का जीनोम सीक्वेंस पूरी दुनिया के लिए जारी कर दिया था। 24 जनवरी तक चीन के वैज्ञानिकों का रिसर्च पेपर लांसेट और न्यू मेडिकल जर्नल जैसी पत्रिकाओं में छप चुका था। लांसेट के एडिटर ने यह बात भी लिख दी थी कि दुनिया चीनी वैज्ञानिकों की कर्ज़दार रहेगी। वुहान एक वैश्विक शहर है। यहां कुछ बड़ा घट रहा हो और पता न चले यह नामुमकिन है। जनवरी से दुनिया के अख़बारों में कोरोना को लेकर खबर छप रही हैं। केरल ने जनवरी से इसे रोकने का काम शुरू कर दिया। तब यह कैसा कहा जा सकता है कि चीन ने सूचनाओं को छिपाया।  

अमेरिका में जो मौते हो रही हैं, वह उसकी अपनी खामियों की वजह से हो रही हो। अभी भी अमेरिका में लॉकडाउन लागू नहीं किया गया है। अमेरिका का हेल्थ सिस्टम पूरी तरह से मेडिकल इंश्योरेंस पर निर्भर है। इंश्योरेंस नहीं तो इलाज नहीं वाली बात सामने आ जाती है। 25,000 से अधिक मौत हो जाने के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप तो कह रहे हैं कि घबराने की बात नहीं है। यह एक फ्लू है।  

सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल जैसी संस्था कहती है कि साल 2010 के बाद से लेकर अब तक हर साल अमेरिका में फ्लू की वजह से 12,000 से लेकर 61,000 तक लोग मरते हैं। ऐसे में ज़रा सोचिए कि जब अमेरिका अभी तक पूरी तरह से कोरोना वायरस को स्वीकार नहीं कर रहा है तो वह कैसे कह सकता है कि एक देश के तौर पर चीन ने कोरोना के बारे में बताने में देरी की।

दरअसल दिक्कत यह है कि जितनी जल्दी लोग अमेरिका पर भरोसा करते हैं, उतनी जल्दी चीन पर नहीं। सूचना तंत्र पर अमेरिका का कब्ज़ा होने की वजह से लोग चीन को एक ऐसे मुल्क की तरह देखते हैं जो तानाशाही रवैया अपनाता है, सूचनाओं को छिपाता है। हमें पता नहीं चलता लेकिन हमारा बौद्धिक संसार पश्चिम से ज्यादा आयातित है। इसलिए अमेरिका के सॉफ्ट पावर का हम पर भयंकर असर पड़ता है, अमेरिका के हितों में लिपटी अंतर्राष्ट्रीय खबरें हमें सही जान पड़ती हैं। सच्चाई जानने के लिए हम सही पहलुओं से जुड़ नहीं पाते।  

Coronavirus
COVID-19
China
USA
Epidemic corona Virus
Donand Trump
WHO

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • maha covid
    अमेय तिरोदकर
    कोविड-19 मामलों की संख्या में आये भारी उछाल से महाराष्ट्र के कमजोर तबकों को एक और लॉकडाउन का डर सताने लगा है!
    04 Jan 2022
    दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों को अपनी आजीविका के नुकसान का डर फिर से सताने लगा है। पिछले दो लॉकडाउन के दौरान वे ही इससे सबसे अधिक बुरी तरह से प्रभावित हुए थे। 
  • SAFDAR
    रवि शंकर दुबे
    सफ़दर: आज है 'हल्ला बोल' को पूरा करने का दिन
    04 Jan 2022
    सफ़दर की याद में मज़दूरों और कलाकारों का साझा कार्यक्रम- क्योंकि सफ़दर के विचार आज भी ज़िंदा हैं...
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट : देश में 24 घंटों में 37,379 नए मामले, ओमीक्रॉन के मामले बढ़कर 1,892 हुए 
    04 Jan 2022
    देश में आज फिर कोरोना के 37,379 नए मामले दर्ज किये गए हैं। वही ओमीक्रॉन के 192 नए मामलों के साथ कुल मामलो की संख्या बढ़कर 1,892 हो गयी है।
  • The Beatles
    ब्रेंडा हास
    "द बीटल्स" से नए साल की सीख
    04 Jan 2022
    जे के रोलिंग, ओप्रा विन्फ़्रे, स्टीवन स्पीलबर्ग और द बीटल्स में क्या चीज़ एक जैसी है? संकेत: यह न तो प्रसिद्धि है और न ही उनका पैसा।
  • punjab assembly
    डॉ. ज्ञान सिंह
    पंजाब विधानसभा चुनाव: आर्थिक मुद्दों की अनदेखी
    04 Jan 2022
    सर्दी में भोजन करने के बाद रेवड़ी खाने से भोजन पचाने में मदद मिलती है। पिछले कई विधानसभा चुनावों की तरह, लोगों को लंबे वादों को पचाने के लिए एक बार फिर से राजनीतिक रेवड़ियाँ बांटी जा रही हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License