NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या यही समय है असली कश्मीर फाइल को सबके सामने लाने का?
कश्मीर के संदर्भ से जुडी हुई कई बारीकियों को समझना पिछले तीस वर्षों की उथल-पुथल को समझने का सही तरीका है।
लव पुरी
04 Apr 2022
kashmir jammu
प्रतीकात्मक चित्र 

21 मई 1990 को उनकी हत्या से कुछ दिनों पहले श्रीनगर के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक मौलवियों में से एक, मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक ने एक सम्मानीय विद्वान-कार्यकर्त्ता को फोन के जरिये संदेश भिजवाया था। फारूक चाहते थे कि विद्वान अपने रसूख का इस्तेमाल प्रशासन से उन्हें गिरफ्तार करने में लगायें, क्योंकि उन्हें अपनी जान जाने का खतरा महूसस हो रहा था। फारुख की आशंका कश्मीर घाटी में व्याप्त भय के माहौल पर आधारित थी क्योंकि उग्रवादियों ने इस बीच में कई लक्षित हत्याएं कर दी थीं। वहां पर उस दौरान एक प्रशासनिक और सुरक्षा का ताना-बाना ढह चुका था।

ऐतिहासिक तौर पर कश्मीर के भीतर मीरवाइज को 20वीं सदी के दूसरे तिमाही में राजनीतिक भूमिका हासिल हो चुकी थी। ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि मीरवाइज फारुक भी आतंकवादियों के निशाने पर आ चुके थे। वे 8 दिसंबर, 1989 को तत्कालीन भारतीय गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद के अपहरण सहित आतंकवादियों के कुछ कृत्यों के आलोचक थे और कथित तौर पर इस कृत्य को उन्होंने गैर-इस्लामिक करार दिया था। जिन विद्वान-कार्यकर्ता से फारुक ने संपर्क साधा था, उन्हें जम्मू-कश्मीर के बारे में उनके ज्ञान के लिए सभी राजनीतिक दलों के बीच में व्यापक पैमाने पर सम्मान प्राप्त था। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सहित सत्ता संरचना में शामिल कई लोगों से संपर्क साधने की कोशिश की और उन्हें मीरवाइज फारुक की जान को खतरे के लिए आगाह किया था।

विद्वान-कार्यकर्ता से कहा गया कि फारुक को अपनी सुरक्षा की मांग करनी चाहिए, जो उन्हें तत्काल प्रदान कर दी जायेगी। उनकी ओर से अधिकारियों को मीरवाइज की बाध्यताओं की स्थिति का स्मरण कराया गया। खुद की सुरक्षा की मांग आम कश्मीरियों के बीच फारुक की राजनीतिक स्थिति समझौता करने वाली साबित हो सकती थी। इसलिए, उन्हें गिरफ्तार करना ही सबसे बेहतर विकल्प था, क्योंकि इससे घाटी में उनकी राजनीतिक जमा-पूँजी को बरकरार रखने और उनके जीवन की रक्षा कर पाना संभव बना रहता।

इसके कुछ दिनों के भीतर ही हथियारबंद लोगों का एक समूह, नागिन झील के पास फारुक के निवास स्थान मीरवाइज मंजिल पर दस्तक देता है। वे उनसे मुलाक़ात करने के धोखे से आये थे। उनके कर्मचारियों में से एक उन्हें बैठक कक्ष में ले गया, और जैसे ही फारुक ने प्रवेश किया, गोलियों की बौछार ने उनका स्वागत किया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। बाद में, पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि इस हमले को हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने अंजाम दिया था। हिजबुल मुजाहिदीन सन 1990 में सिर्फ एक महीने पहले ही अस्तित्व में आया था। 

आमतौर पर यह धारणा बनी हुई है कि अपनी मौत के कुछ दिनों पहले तक, मीरवाइज फारुक ने दिवंगत जार्ज फर्नांडिस के साथ कई अवसरों पर टेलीफोन के जरिये बातचीत की थी, जो उस दौरान राष्ट्रीय मोर्चा गठबंधन सरकार में कश्मीर मामलों का विभाग संभाल रहे थे। आतंकियों ने इस बातचीत को इंटरसेप्ट भी कर लिया था। उग्रवादियों की नजर में इसने फारुक की किस्मत पर मुहर लगा दी थी। उनकी हत्या 1988-90 के उथल-पुथल वाले समय के संदर्भ में हुई थी। जैसा कि विद्वान-कार्यकर्ता दिवंगत बलराज पुरी अपने बेस्टसेलर प्रत्यक्ष अनुभव के खाते से, कश्मीर: टुवर्ड्स इंसर्जेंसी में लिखते हैं, कि इस उथल-पुथल के पीछे घरेलू, अंतर्राष्ट्रीय और सुरक्षा मकसद थे।

मीरवाइज परिवार की कहानी एक व्यक्तिगत त्रासदी की कहानी है, जिसमें विपरीत ताकतों से भरे माहौल में अपने राजनीतिक अस्तित्व और व्यावहारिकता को बनाये रखने का संघर्ष छिपा है। फारुक को 1960 के दशक में अपने चाचा मीरवाइज यूसुफ शाह की मृत्यु के बाद, जो पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर मुज़फ्फ्फराबाद से पलायन कर यहाँ आ बसे थे, मीरवाइज का लबादा विरासत में मिला था। शेख अब्दुल्ला के साथ उनके चाचा की प्रतिद्वंदिता “शेर-बकरा” वाली प्रतिद्वंदिता के तौर कुख्यात थी। 1931 में अब्दुल्ला, घाटी में जामा मस्जिद के मौलवी मीरवाइज युसूफ शाह के साथ लोगों की नेतृत्वकारी भूमिका संभालने के बाद एक राजनीतिक नायक के तौर पर उभरे थे।

16 अक्टूबर 1932 को मुस्लिम कांफ्रेंस का गठन हुआ था जिसमें शेख अब्दुल्ला इसके अध्यक्ष और चौधरी गुलाम अब्बास इसके महासचिव बने। अब्दुल्ला की राजनीतिक गोलबंदी ने एक मंच के तौर पर कश्मीरी इस्लाम के प्रतीक हजरतबल मस्जिद का इस्तेमाल किया। जबकि फारुक के चाचा मीरवाइज युसूफ शाह के पास जामा मस्जिद में अपना आधार था। घाटी की आबादी के बढ़ते राजनीतिकरण के परिणामस्वरूप फारुक और अब्दुला के बीच में वैचारिक मदभेद विकसित होते चले गये। 

एक संस्था के तौर पर, धार्मिक कारणों की वजह से मीरवाइज के पास श्रीनगर के कुछ हिस्सों पर प्रभाव बना हुआ था, जबकि अब्दुल्ला कश्मीर में राजनीतिक सुधारों के पक्षकार के तौर पर एक नए युग के प्रतीक बन गये थे। अब्दुला के समर्थकों को शेर के तौर पर जाना जाता था, जबकि जो मीरवाइज के समर्थक थे उन्हें बकरा कहा जाता था।

1950 से लेकर 1960 के दशक के बीच में, जब अब्दुल्ला नई दिल्ली से अलग-थलग पड़ गए थे, तो उस दौरान मीरवाइज युसूफ शाह और नई दिल्ली के बीच में एक गुपचुप जुड़ाव की शुरुआत हो चुकी थी। दोनों पक्ष एक-दूसरे के सम्मान और अपनी-अपनी सीमाओं की कद्र करने पर सहमत थे। उन्होंने तय किया कि शाह नई दिल्ली और श्रीनगर के बीच सुलह में कभी बाधक नहीं बनेंगे। और इसके अलावा, यह कि नई दिल्ली लगातार इस बारे में सचेत रहेगी कि शाह जैसे नेता तभी तक महत्वपूर्ण बने रह सकते हैं जब तक उनके पास राजनीतिक बल बना हुआ है।

मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारुक की हत्या के बाद, उनके छोटे बेटे उमर फारुक ने मीरवाइज का पदभार संभाला। वे आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के संस्थापकों में से एक थे, जो कि 9 मार्च 1993 को अलगाववादी दलों के एक समूह के तौर पर अपने अस्तित्व में आया था। अपने पिता की तरह उमर की राजनीति की एक सुसंगत विशेषता स्थानीय राजनीतिक तापमान के प्रति अनुकूलन की रही है। 2002 में, जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सुलह के विचार ने कश्मीर में लोकप्रिय कल्पना-शक्ति के तौर पर आकार लेना शुरू किया, तो मीरवाइज उमर ने दिवंगत अब्दुल गनी लोन के साथ मिलकर, जमीयत-ए-इस्लामी के पूर्व नेता दिवंगत सैय्यद अली शाह गिलानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उस बिंदु पर, दिवंगत गिलानी ने नई दिल्ली के साथ सुलह और भारत-पाकिस्तान के बीच सुलह का विरोध किया था। मीरवाइज उमर और गिलानी के बीच की सार्वजनिक प्रतिद्वंदिता 21 मई 2002 को आतंकवादियों द्वारा अब्दुल गनी लोन की हत्या दिवंगत मीरवाइज फारुक के सम्मान में आयोजित एक स्मारक समारोह में की गई थी।

कश्मीर के मीरवाइज की कहानी यह दर्शाती है कि कश्मीर के संदर्भ में बारीकियों को समझने का रास्ता पिछले तीस वर्षों में कश्मीर में उथल-पुथल को समझने और ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण करने के जरिये होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर में तीन-दशक की त्रासदी को समझने का फलक, विशेषकर 1990 के दशक के बाद पैदा हुई पीढ़ी के लिए, जातीय, धार्मिक और भौगौलिक दृष्टि से समावेशी होनी चाहिए। इसमें उन्हें गैर-कश्मीरी भाषी लोगों, विशेषकर जो पीर-पंजाल रेंज के दक्षिण में रहते हैं, की पीड़ा हो भी शामिल करना चाहिए। इस क्षेत्र ने संघर्ष के पहले दो दशकों में करीब 40% नागरिक हत्याओं को भुगता है, जिसमें सुदूर पहाड़ियों में मामूली राहत और पुनर्वास के साथ नरसंहार और बड़े पैमाने पर विस्थापन की मार झेली है। ये लोग जम्मू-कश्मीर के सबसे दुर्गम हिस्सों में निवास करते हैं, और बाकियों की तरह अच्छी तरह से जुड़े नहीं है, उनकी तरह अच्छी तरह से शिक्षित, मुखर नहीं हैं। और इसी का नतीजा है कि सार्वजनिक स्थानों तक उनकी पहुँच नहीं है, जहाँ उन्हें देखा जा सकता था, और उनकी बात बहुत कम सुनी जाती है।

लेखक जम्मू-कश्मीर पर दो पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित एक्रॉस द एलओसी शामिल है। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस मूल आलेख को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: 

Is it Time for the Real Kashmir File?

Kashmir
Mirwaiz
Militancy in Kashmir
politics in Jammu and Kashmir Civilian Killings
New Delhi in Kashmir
Atal Bihari Vajpayee
Sheikh Abdullah
All Party Hurriyat Conference

Related Stories

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती

जम्मू-कश्मीर: अधिकारियों ने जामिया मस्जिद में महत्वपूर्ण रमज़ान की नमाज़ को रोक दिया

कश्मीर में एक आर्मी-संचालित स्कूल की ओर से कर्मचारियों को हिजाब न पहनने के निर्देश

4 साल से जेल में बंद पत्रकार आसिफ़ सुल्तान पर ज़मानत के बाद लगाया गया पीएसए

गुजरात दंगे और मोदी के कट्टर आलोचक होने के कारण देवगौड़ा की पत्नी को आयकर का नोटिस?


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर एक हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 71 मरीज़ों की मौत
    06 Apr 2022
    देश में कोरोना के आज 1,086 नए मामले सामने आए हैं। वही देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 11 हज़ार 871 रह गयी है।
  • khoj khabar
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं, देश के ख़िलाफ़ है ये षडयंत्र
    05 Apr 2022
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने दिल्ली की (अ)धर्म संसद से लेकर कर्नाटक-मध्य प्रदेश तक में नफ़रत के कारोबारियों-उनकी राजनीति को देश के ख़िलाफ़ किये जा रहे षडयंत्र की संज्ञा दी। साथ ही उनसे…
  • मुकुंद झा
    बुराड़ी हिन्दू महापंचायत: चार FIR दर्ज लेकिन कोई ग़िरफ़्तारी नहीं, पुलिस पर उठे सवाल
    05 Apr 2022
    सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि बिना अनुमति के इतना भव्य मंच लगाकर कई घंटो तक यह कार्यक्रम कैसे चला? दूसरा हेट स्पीच के कई पुराने आरोपी यहाँ आए और एकबार फिर यहां धार्मिक उन्माद की बात करके कैसे आसानी से…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एमपी : डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे 490 सरकारी अस्पताल
    05 Apr 2022
    फ़िलहाल भारत में प्रति 1404 लोगों पर 1 डॉक्टर है। जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मानक के मुताबिक प्रति 1100 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए।
  • एम. के. भद्रकुमार
    कीव में झूठी खबरों का अंबार
    05 Apr 2022
    प्रथमदृष्टया, रूस के द्वारा अपने सैनिकों के द्वारा कथित अत्याचारों पर यूएनएससी की बैठक की मांग करने की खबर फर्जी है, लेकिन जब तक इसका दुष्प्रचार के तौर पर खुलासा होता है, तब तक यह भ्रामक धारणाओं अपना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License