NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
मुद्दा: सवाल बसपा की प्रासंगिकता का नहीं, दलित राजनीति की दशा-दिशा का है
जहां तक बसपा की राजनीतिक प्रासंगिकता का प्रश्न है, तो दो या तीन चुनाव हारने से किसी भी पार्टी की प्रासंगिकता खत्म नहीं होती है। लेकिन असल प्रश्न यह है कि पार्टी की राजनीतिक दशा और दिशा क्या है? साथ ही वह अपनी विचारधारा पर कहां खड़ी है।
कृष्ण सिंह
26 Feb 2022
mayawati
फाइल फोटो

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कई तरह के विमर्शों, सवालों और मुद्दों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को लेकर भी उठ रहा है। बीते तीन दशकों में यह पहली बार है कि जब उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में बसपा को एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में नहीं देखा जा रहा है। उसकी प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठ रहे हैं और चुनाव के पहले से ही उसे भाजपा की बी टीम के रूप में देखा जा रहा है। इसकी वजह भी है। उत्तर प्रदेश की सत्ता में बीते पांच वर्षों से शासन कर रही भाजपा की नीतियों पर सवाल उठाने के बजाय बसपा प्रमुख मायावती विपक्षी दलों, सपा और कांग्रेस पर ज्यादा हमलावर दिखाई देती हैं।

वह कहती हैं कि दलितों ने सपा के शासन में बहुत मुश्किल समय का सामना किया है। प्रश्न यह है कि यदि सपा के शासनकाल (2012 से 2017) में दलितों की स्थिति खराब हुई, तो फिर बसपा ने सपा के साथ 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में गठबंधन क्यों किया था। और इस गठबंधन से सपा के बजाय बसपा को ज्यादा फायदा हुआ था। सपा, बसपा और आरएलडी के इस महागठबंधन में बसपा को 10 और सपा को पांच सीटों पर जीत मिली थी, जबकि आरएलडी को एक भी सीट नहीं मिली।

अहम मुद्दों पर चुप्पी  

महत्वपूर्ण बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव हों, 2017 के विधानसभा चुनाव हों या फिऱ 2019 के लोकसभा चुनाव, भाजपा ने दलितों में जाटव और पिछड़ों में यादव समुदाय पर निशाना साधा। भाजपा यह प्रचार करती रही है कि बसपा के शासनकाल में केवल जाटवों और सपा के शासनकाल में सिर्फ यादवों को फायदा मिला। यानी उसने दलितों और पिछड़ों में गैर-जाटव और गैर-यादव मतों को अपने पक्ष में करने की रणनीति अपनाई और काफी हद तक कामयाब भी हुई। दिलचस्प यह है कि मायावती ने योगी आदित्यनाथ के पांच वर्षों के शासनकाल में दलितों की स्थिति क्या रही है, इस पर कुछ नहीं बोला। हाथरस-जैसा जघन्य कांड पुरानी बात नहीं है। इसके अलावा पिछड़ों और अति पिछड़ों में भी भाजपा सरकार के प्रति काफी नाराजगी देखी जा रही है। युवा रोजगार को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कोरोना की दूसरी लहर में गंगा नदी में तैरती लाशों की तस्वीरें अभी भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। किसानों की समस्याएं अपनी जगह पर बनी हुई हैं और अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाकर ध्रुवीकरण की राजनीति को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। लेकिन मायावती इन सवालों पर चुप हैं। उल्टा, भाजपा और बसपा के बीच राजनीतिक रूप से रिश्तों में गर्मजोशी देखी जा रही है।

कुछ दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक साक्षात्कार में कहा कि मायावती ने यूपी में अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई है। जाटव वोट उनके साथ जाएगा और उन्हें बड़ी तादाद में मुसलमानों का भी वोट मिलेगा। यहां गौर करने वाली बात यह है कि अमित शाह ने बसपा के संदर्भ में केवल जाटव वोटों की ही बात की, पूरे दलित समाज के वोटों की नहीं। लेकिन मजेदार यह है कि शाह की इस बात से मायावती काफी प्रसन्न नजर आईं। उन्होंने शाह की बात को उनका बड़प्पन बताया। क्या यह भाजपा-बसपा के बीच भविष्य के किसी नए समीकरण का संकेत है? शाह जैसे मंझे हुए चुनावी रणनीतिकार का यह कहना राजनीतिक रूप से सामान्य बात नहीं है। राजनीतिक दृष्टि से इसमें कई संकेत छिपे हैं। इससे एक ध्वनि यह निकलती है कि क्या यूपी में भाजपा मुश्किल में है और अगर चुनाव परिणामों के बाद भाजपा को किसी दल की मदद की जरूरत पड़ती है तो वह बसपा की ओर देख सकती है। दूसरी ध्वनि यह निकलती है, जो ज्यादा स्पष्ट-सी लगती है, कि मुस्लिम मतों में किसी तरह से बंटवारा हो जाए। अगर इस संदर्भ में देखें तो बसपा ने बहुत-सी सीटों पर मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। बसपा के उम्मीदवारों को लेकर कुछ मीडिया रिपोर्टों के विश्लेषण से लगता है कि बसपा, भाजपा के बजाय सपा को नुकसान पहुंचा सकती है। खैर, हकीकत 10 मार्च को सामने आ जाएगी।

विचारधारा का प्रश्न

अब जहां तक बसपा की राजनीतिक प्रासंगिकता का प्रश्न है, तो इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि दो य़ा तीन चुनाव हारने से किसी भी पार्टी की प्रासंगिकता खत्म नहीं होती है। लेकिन असल प्रश्न यह है कि पार्टी की राजनीतिक दशा और दिशा क्या है? साथ ही वह अपनी विचारधारा पर कहां खड़ी है। खासकर बसपा-जैसी पार्टी जिसका उदय एक खास विचारधारा के साथ हुआ और जिसने बहुजन समाज को अपनी ओर आकृष्ट किया था। कांशीराम ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़ी जातियों, अति पिछड़ी जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को मिलाकर बहुजन राजनीति की परिकल्पना की और उसे साकार करने के लिए बसपा की स्थापना की। कांशीराम की बहुजन राजनीति की परिकल्पना कांग्रेस और भाजपा-जैसे दलों की राजनीति से एकदम विपरीत थी, लेकिन प्रश्न यह है कि सन 2022 में बसपा उत्तर प्रदेश की राजनीति में कहां पर है?

दलित राजनीति : कुछ प्रश्न

बसपा की वर्तमान दशा-दिशा के संदर्भ में दलित राजनीति को लेकर एक प्रश्न यह भी सामने आता है कि आखिर क्या कारण है कि दलितों की मुक्ति के सवाल पर बने राजनीतिक दल और संगठन एक समय के बाद या तो बिखर जाते हैं, या फिर उसी व्यवस्था का शिकार हो जाते हैं या फिर उसी व्यवस्था में जा मिलते हैं जिसके विरोध में उनका जन्म हुआ था। क्या कारण है कि शासक वर्ग की पार्टियां एक समय के बाद अपने हिसाब से उन्हें अपने पक्ष में अनुकूलित कर लेती हैं। बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर की मृत्यु के बाद रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) से लेकर दलित पैंथर और अब बसपा तक दलित आंदोलन की कई परिघटनाएं इसका उदाहरण हैं। कांग्रेस के साथ गठजोड़ के बाद आरपीआई अपना प्रभाव खोती गई और बाद में वह कई गुटों में बंटते हुए बिखराव का शिकार हो गई। यहां यह तथ्य गौर करने लायक है कि आरपीआई और कांग्रेस के बीच गठबंधन से पहले दादा साहेब गायकवाड़ ने बहुत ही जोरदार तरीके से भूमि के सवाल को उठाया और उसको लेकर मजबूत जनसंघर्ष भी किया था। यह दलित आंदोलन की एक बहुत बड़ी घटना थी। उन्होंने शासक वर्ग की असली नब्ज को पकड़ लिया था, क्योंकि दलितों का अधिकांश हिस्सा भूमिहीन है। हालांकि दूसरे दलित नेताओं ने दादा साहेब गायकवाड़ के इस कदम को कम्युनिस्ट मानकर खारिज भी किया।

दादा साहेब गायकवाड़ महाड़ आंदोलन के समय से ही बाबा साहेब अंबेडकर के करीबी सहयोगी थे। जमीन के लिए किए गए जनसंघर्ष ने उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस को हिलाकर रख दिया था। लेकिन बाद में कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के बाद दादा साहेब फिर कभी उस तरह के जनसंघर्ष को अंजाम नहीं दे पाए।

फिर 1970 के दशक में दलित पैंथर भारत के दलित आंदोलन में एक चिंगारी बन कर सामने आए। उन्होंने दलित आंदोलन में एक रेडिकल बदलाव की कोशिश की, लेकिन बाद में यह चिंगारी भी बुझ गई। कर्नाटक में दलित संघर्ष समिति ने काफी सक्रियता के साथ काम किया लेकिन बाद में वह भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई। ऐसे कई संगठन सामने आए लेकिन वे अपनी प्रासंगिकता खोते चले गए। अब बसपा ही दलित राजनीति का एकमात्र सबसे बड़ा संगठन है।

दलित आंदोलन में किसी भी संगठन और नेता के लिए बाबा साहेब अंबेडकर प्रेरणास्रोत और प्रकाशपुंज रहे हैं। दलित जनमानस में बाबा साहेब अंबेडकर के प्रति अगाध प्रेम और असीम आदर है। यह इसलिए है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण को दलितों की मुक्ति के लिए संघर्ष में लगा दिया था। उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वह छल-कपट से घृणा करते थे। उन्होंने जाति आधारित श्रेष्ठता को गलत माना और उसे चुनौती दी। उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठानों के शीर्ष से लोहा लिया। वह चाहते तो शासक वर्ग के साथ समझौता करके अपने लिए तमाम तरह की सहूलियतों और सुखों को हासिल कर सकते थे। वह हर तरह के शोषण को समाप्त करना चाहते थे। बाबा साहेब की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी। समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का उनका सिद्धांत कोई सामान्य सिद्धांत नहीं है बल्कि इसमें लोकतंत्र के लिए एक व्यापक दृष्टि है। दुखद यह है कि अधिकांश दलित नेताओं ने बाबा साहेब के सिद्धांतों और उनके व्यापक विजन को मूर्तरूप देने के बजाय उन्हें ही देवत्व में तब्दील कर दिया। जबकि अंबेडकर रूढ़िवाद और व्यक्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे।

चुनावी जुनून तक सीमित

दलित नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के लिए बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर दलित जनमानस का भावनात्मक रूप से इस्तेमाल किया। उन्होंने दलितों के भौतिक और सांस्कृतिक पहलुओं की अनदेखी की। उनके लिए चुनाव जीतना ही सबकुछ था। इसके लिए उन्होंने तरह-तरह के समझौते किए और अंबेडकर के विचारों की अपनी तरह से व्याख्या की। हालांकि चुनावी राजनीति भी महत्वपूर्ण है और दलितों की मुक्ति के लिए सत्ता हासिल करना भी जरूरी। लेकिन बाद इतने से नहीं बनती है। बहुजन समाज पार्टी इसका उदाहरण है। बसपा 1984 में अपने जन्म के कुछ ही वर्षों बाद उत्तर प्रदेश में सत्ता में भागीदार बन गई। इससे दलित समाज की आकांक्षाओं और सपनों को नए पंख लगे। उन्होंने उसे अपनी मुक्ति के रूप में देखा। लेकिन इन 38 वर्षों में उत्तर प्रदेश में दलितों की स्थिति क्या है? उनके जीवन में किस तरह के सामाजिक, भौतिक और सांस्कृतिक बदलाव आए हैं? शायद बसपा ने यह मान लिया कि राजनीतिक सत्ता हासिल करने से ही दलितों की सभी समस्याएं हल हो जाएंगी। उसकी राजनीति में भौतिक और सांस्कृतिक पहलुओं से ज्यादा भावनात्मक मुद्दे हावी रहे। राजनीतिक सत्ता के साथ-साथ किसी समाज में बदलाव के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन भी जरूरी हैं, इस बात को उसने नजरअंदाज कर दिया।

अब फिर से वही मूल प्रश्न सामने आता है कि आखिर दलित नेता और दलित संगठन एक समय के बाद उसी व्यवस्था के शिकार क्यों हो जाते हैं जिसको बदलने की वे बातें करते थे। हालांकि, इसका उत्तर आसान नहीं है। यह एक जटिल प्रश्न है। इसका एक सरल उत्तर यह हो सकता है कि शासक वर्ग की पार्टियां इस तरह की बदलाव की शक्तियों को स्वीकार नहीं करती हैं। उनके पास अपार संसाधन हैं। व्यवस्था पर उनका कब्जा होता है। और इसके जरिये वे दलित आंदोलन, संगठन और इसी तरह के अन्य आंदोलनों को या तो आसानी से दबा देते हैं, या फिर उन्हें कमजोर कर देते हैं और या फिर अपने हिसाब से उन्हें अपने पक्ष में अनुकूलित कर लेते हैं। यह भी सत्य है कि जिन दलित नेताओं और संगठनों ने शासक वर्ग की बड़ी पार्टियों के साथ अपने अल्पकालिक चुनावी फायदे के लिए समझौता किया वे एक समय बाद या तो अप्रासंगिक हो गए या फिर व्यवस्था के एक छोटे से पुर्जे मात्र बनकर रह गए।

किसी भी समाज की गति और उसका गतिविज्ञान एक सीधी रेखा-जैसा नहीं होता है। उसकी कई परतें होती हैं। आज अनुसूचित जातियों से पढ़े-लिखे युवा सामने आ रहे हैं। अपने पूर्वजों के बनिस्बत उनके सामने एक व्यापक दुनिया खुली हुई है। उनके पास अपने इतिहास की समझ है। उनके पास विगत आंदोलनों की विरासत है। उन आंदोलनों के उतार-चढ़ाव और नाकामियों के अनुभव हैं। उनके पास बाबा साहेब अंबेडकर-जैसा प्रकाश-पुंज है। हो सकता है कि भविष्य में हमें दलित आंदोलन का एक नया रूप देखने को मिले। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं)

Uttar pradesh
UP Assembly Elections 2022
UP Polls 2022
MAYAWATI
BSP
Dalits
Dalit Politics
Dalit Rights

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया


बाकी खबरें

  • Himachal Pradesh Anganwadi workers
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिमाचल प्रदेश: नियमित करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरीं आंगनबाड़ी कर्मी
    24 Feb 2022
    प्रदर्शन के दौरान यूनियन का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से मिला व उन्हें बारह सूत्रीय मांग-पत्र सौंपा। मुख्यमंत्री ने आगामी बजट में कर्मियों की मांगों को पूर्ण करने का आश्वासन दिया। यूनियन…
  • Sulaikha Beevi
    अभिवाद
    केरल : वीज़िंजम में 320 मछुआरे परिवारों का पुनर्वास किया गया
    24 Feb 2022
    एलडीएफ़ सरकार ने मठीपुरम में मछुआरा समुदाय के लोगों के लिए 1,032 घर बनाने की योजना तैयार की है।
  • Chandigarh
    सोनिया यादव
    चंडीगढ़ के अभूतपूर्व बिजली संकट का जिम्मेदार कौन है?
    24 Feb 2022
    बिजली बोर्ड के निजीकरण का विरोध कर रहे बिजली कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान लगभग 36 से 42 घंटों तक शहर की बत्ती गुल रही। लोग अलग-अलग माध्यम से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन प्रशासन पूरी तरह से लाचार…
  • Russia targets Ukraine
    एपी
    रूस ने यूक्रेन के वायुसेना अड्डे, वायु रक्षा परिसम्पत्तियों, सैन्य आधारभूत ढांचे को बनाया निशाना, अमेरिका-नाटो को चेताया
    24 Feb 2022
    रूस के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि सेना ने घातक हथियारों का इस्तेमाल यूक्रेन के वायुसेना अड्डे, वायु रक्षा परिसम्पत्तियों एवं अन्य सैन्य आधारभूत ढांचे को निशाना बनाने के लिये किया है। उसने आगे दावा…
  • Hijab controversy
    भाषा
    हिजाब विवाद: बेंगलुरु के कॉलेज ने सिख लड़की को पगड़ी हटाने को कहा
    24 Feb 2022
    सूत्रों के अनुसार, लड़की के परिवार का कहना है कि उनकी बेटी पगड़ी नहीं हटायेगी और वे कानूनी राय ले रहे हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय और सरकार के आदेश में सिख पगड़ी का उल्लेख नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License