NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
शिक्षा
भारत
राजनीति
एक उम्मीद का नाम है जेएनयू
उत्तराखंड के ज्यादातर शिक्षा संस्थानों में इस समय विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। ये शिक्षा संस्थान और इनसे जुड़े छात्र-छात्रा जेएनयू की ओर एक उम्मीद से देख रहे हैं। जेएनयू इनकी उम्मीद है कि यहां भी स्थितियां बदली जा सकती हैं, प्रतिरोध के स्वर के ज़रिये यहां भी व्यवस्था बेहतर की जा सकती है।
वर्षा सिंह
21 Nov 2019
uttrakhand student protest

उत्तराखंड में फीस बढ़ोतरी, कैंपस में सुविधाओं का अभाव, सेमेस्टर सिस्टम का विरोध, शिक्षकों की कमी जैसे अहम मुद्दों को लेकर स्टुडेंट्स प्रदर्शन कर रहे हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा फीस में की गई बढ़ोतरी का लगातार विरोध हो रहा है। आयुष छात्र-छात्राएं लगातार धरने पर बैठे हुए हैं। कुमाऊं में छात्रसंघ अध्यक्ष की गिरफ्तारी के विरोध में उग्र प्रदर्शन हो रहा है। हल्द्वानी महाविद्यालय की छात्राएं शिक्षकों के तबादले और सिलेबस पूरा न होने पर तालाबंदी कर रही हैं।

मुख्यमंत्री, मंत्रियों का सार्वजनिक कार्यक्रमों में विरोध

सोमवार को देहरादून में एनएसयूआई और युवा कांग्रेस ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का विरोध किया। मुख्यमंत्री गांधी पार्क स्थित जिम का उद्घाटन करने पहुंचे थे। उसी समय एनएसयूआई और युवा कांग्रेस कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के विरोध के लिए आगे बढ़े। वहां मौजूद पुलिस कर्मियों ने उन्हें रोक लिया।

जिसके बाद कार्यकर्ताओं ने सड़क पर बैठकर ही “मुख्यमंत्री गो बैक” के नारे लगाए और मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से जाने के बाद ही सड़क से उठे। इससे पहले देहरादून में विधायक आवास के बाहर भी धरना प्रदर्शन किया गया। हालांकि मंगलवार शाम तक गढ़वाल विश्व विद्यालय ने परीक्षा फीस में की गई 1200 रुपये की बढ़ोतरी वापस ले ली। लेकिन आयुष छात्रों की लड़ाई अभी जारी है।

गर्ल्स हॉस्टल को जेएनयू से उम्मीद

गढ़वाल विश्वविद्यालय के हॉस्टल में नियम-कानून की तमाम पाबंदियां झेल रही छात्राएं भी जेएनयू की ओर उम्मीद से ताक रही हैं। पॉलिटिकल साइंस से पीएचडी कर रही और आइसा से जुड़ी शिवानी पांडे कहती हैं कि यहां गर्ल्स हॉस्टल को लड़कियों के लिए जेल सरीखा बना दिया गया है। वह बताती हैं कि अभी शाम छह बजे हॉस्टल के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सर्दियां शुरू होने पर साढ़े पांच बजे ही गेट बंद हो जाएंगे। हॉस्टल के अंदर ने खेलने की जगह है, न लाइब्रेरी है, न कोई ऐसी जगह जहां लड़कियां अपना स्पेस ढूंढ़ सकें और अपना स्ट्रेस कम कर सकें। मान लीजिए कोई अपना एकांत चाहता है तो वो उस सिस्टम में कहां जाएगा।

शिवानी कहती हैं कि बहुत सारी स्टुडेंट्स हैं, जो पांच-छह बजे तक प्रैक्टिकल क्लास में रहते हैं, वहां से आकर छह बजे हॉस्टल में बंद हो जाती हैं। वो एक जेल जैसी जगह बन गई है। जब हम 21वीं सदी की बात कर रहे हैं, वे लड़कियां 18 साल से ऊपर की हैं। एमफिल-पीएचडी कर रही छात्राओं को तो उनके निर्णय लेने की आज़ादी दीजिए। उन्हें कब हॉस्टल में आना-जाना है ये आप तय क्यों करते हैं।

हॉस्टल की दिक्कत के बारे में पूछने पर एक लड़की ने बताया कि पांच बजे उसकी क्लास छूटी, जिसके बाद वो हॉस्टल पहुंची। उसी समय उसके पीरियड्स आ गए। लेकिन उसे सैनेटरी नैपकिन लेने के लिए बाहर जाने की इजाजत नहीं मिली।

एक लड़की ने कहा कि मॉर्निंग वॉक की इजाज़त मांगी तो हॉस्टल वार्डन ने कहा कि तुम्हारे पीछे लड़के भागेंगे, तब क्या करोगी।

एक तरफ स्त्रियों की बराबरी और महिला सशक्तिकरण की बात की जाती है, दूसरी ओर गर्ल्स हॉस्टल को जेल बना दिया है। शिवानी कहती हैं कि हमारा श्रीनगर कैंपस एक सुरक्षित जगह है, जहां पर्याप्त सिक्योरिटी गार्ड्स हैं। इसके बावजूद इतनी पाबंदियां डाली गई हैं।

दिक्कत ये भी है कि यहां कैंपस की मेन स्ट्रीम पॉलिटिक्स में लड़कियां नहीं है, इसलिए लड़कियों के मुद्दे सामने नहीं आ पाते। शिवानी पांडे कहती हैं कि पंजाब यूनिवर्सिटी में जब एक लड़की छात्र संघ में आई और उन्होंने डेढ़ साल मूवमेंट चलाया, उसके बाद लड़कियों के हॉस्टल से जुड़े नियमों को लचीला बनाया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टल में भी समय को लेकर बड़ा आंदोलन चला। जेएनयू बहुत लिबरल है।

वर्ष 1973 में स्थापित गढ़वाल विश्वविद्यालय में आज तक कोई लड़की छात्रसंघ अध्यक्ष नहीं बनी। छिटपुट पदों पर भी बहुत कम लड़कियां चुनकर आईँ। आइसा ने वर्ष 2016 में छात्राओं के प्रतिनिधित्व को लेकर मूवमेंट चलाया, जिसके बाद छात्रसंघ में एक पोस्ट लड़कियों के लिए बनाई गई। शिवानी पांडे उस पोस्ट पर पहली छात्रा रिप्रेजेंटेटिव बनी।

वर्ष 2018 में यहां छात्राओं को आठ बजे तक लाइब्रेरी में जाने की इजाजत के लिए लाइब्रेरी भरो आंदोलन चलाया गया। जिसके बाद छात्राएं हॉस्टल से लाइब्रेरी जा सकती हैं। शिवानी बताती हैं कि वहां भी हॉस्टल की वार्डन एक केयरटेकर को भेज देती हैं, ये जांचने कि लड़की लाइब्रेरी में ही है या नहीं।

हॉस्टल में लड़कियों को लड़का दोस्त बनाने पर भी ताने दिये जाने की शिकायतें हैं। छात्राएं कहती हैं कि यदि हम इस उम्र में लड़कों को दोस्त नहीं बनाएंगे तो कब बनाएंगे। ये हमारा निजी फैसला है कि हम किससे दोस्ती करते हैं। जो लोग जेंडर इक्वेलिटी, जेंडर पॉलिटिक्स पढ़ा रहे हैं, वही ये सब चीजें कर रहे हैं।

गढ़वाल विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रह रही एक छात्रा कहती हैं कि ये हमें सिर्फ फिजिकली 6 बजे के बाद अंदर रखने की बात नहीं है, मेंटली और साइकोलॉजिकली भी बाउंडेशन लगा देते हैं। पूरा दिन कॉलेज में गुजारने के बाद आपको अपना निजी वक्त शाम को मिलता है। उस समय भी यदि आप अपना समय अपने हिसाब से न बिता सकें तो ये एक समस्या हो जाती है। ये हमारी मर्जी है कि हम कमरे में बैठें या बाहर रहें। हम ब्वॉयफ्रेंड के साथ जाएं, घूमने जाएं या बिना किसी मकसद से टहलें। हमारा स्पेस खत्म किया जा रहा है।

जेएनयू में लड़कियां भी लड़कों के साथ पुलिस के डंडे खाती हैं। अपनी आवाज उठाती हैं। गढ़वाल विश्वविदालय के गर्ल्स हॉस्टल के इन मुद्दों पर बात करने के लिए यहां लड़कियां एकजुट नहीं हो पाती। ये छात्रा कहती है कि जेएनयू में बच्चे पिट कर आ जाएंगे, जेल के अंदर भी चले जाएंगे लेकिन जिस चीज के लिए वे लड़ रहे हैं, उस पर कायम रहेंगे। यहां पर पारिवारिक दबाव को इस्तेमाल किया जाता है। रेस्टिकेट होने, कॉलेज से निकालने का खतरा होता है। इतनी दूर दराज के गांवों से बच्चे पढ़ने आते हैं और अगर किसी कारणवश आपको डिग्री न मिले या अभिवावकों तक गलत तरीके से बात पहुंचे, तो एक डर होता है। इसलिए छात्राएं सबकुछ चुपचाप झेल लेती हैं।

गढ़वाल विश्वविद्यालय के गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन बबीता पाटनी कहती हैं कि वे विश्वविद्यालय प्रशासन के बनाए गए नियमों के अनुसार चलती हैं। विश्वविद्यालय ने लाइब्रेरी आउटिंग की अनुमति दी है तो लड़कियां जाती हैं। छह बजे हॉस्टल के गेट बंद करने का निर्णय विश्वविद्यालय प्रशासन का है।

जेएनयू जैसे संस्थानों की ओर उम्मीद से देखते गढ़वाल विश्वविद्यालय के गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियों को अपने हिस्से की लड़ाई स्वयं ही लड़नी होगी। फिर उनके साथ खड़े होने वाले लोग भी जुटेंगे। 

जेएनयू और छात्रों के पक्ष में जुटेंगे सामाजिक संगठन

इधर, देहरादून में पीपुल्स फोरम उत्तराखंड के साथ कई सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल 21 नवंबर को केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ एक दिवसीय धरना देंगे। पीपुल्स फोरम के जयकृत कंडवाल कहते हैं कि फीस वृद्धि को लेकर जेएनयू के छात्र और प्रदेश में आयुष छात्र और विश्वविद्यालयों के छात्र आंदोलनरत हैं। सरकार उनकी मांगों को दरकिनार करते हुए सत्ता के घमंड में न्यायालय के आदेश की भी अवमानना कर रही है। इस तानाशाही रवैये के विरोध में एकजुट हो लड़ने का निर्णय लिया गया है। वे जेएनयू के साथ खड़े हैं और चाहते हैं कि महंगी फीस उच्च शिक्षा हासिल करने की राह में बाधा न बने।

(मुख्यमंत्री का विरोध करते एनएसयूआई से जुड़े छात्र)

Uttrakhand
Student Protests
JNU
JNU Protest
Garhwal University
Haldwani College
Protests at public events against CM and Ministers
Trivendra Singh Rawat
NSUI
AISA
JNUSU

Related Stories

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

जेएनयू: अर्जित वेतन के लिए कर्मचारियों की हड़ताल जारी, आंदोलन का साथ देने पर छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष की एंट्री बैन!

‘जेएनयू छात्रों पर हिंसा बर्दाश्त नहीं, पुलिस फ़ौरन कार्रवाई करे’ बोले DU, AUD के छात्र

जेएनयू हिंसा: प्रदर्शनकारियों ने कहा- कोई भी हमें यह नहीं बता सकता कि हमें क्या खाना चाहिए

JNU में खाने की नहीं सांस्कृतिक विविधता बचाने और जीने की आज़ादी की लड़ाई

यूपी: खुलेआम बलात्कार की धमकी देने वाला महंत, आख़िर अब तक गिरफ़्तार क्यों नहीं

बीएचयू : सेंट्रल हिंदू स्कूल के दाख़िले में लॉटरी सिस्टम के ख़िलाफ़ छात्र, बड़े आंदोलन की दी चेतावनी

नौजवान आत्मघात नहीं, रोज़गार और लोकतंत्र के लिए संयुक्त संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ें

रेलवे भर्ती मामला: बर्बर पुलिसया हमलों के ख़िलाफ़ देशभर में आंदोलनकारी छात्रों का प्रदर्शन, पुलिस ने कोचिंग संचालकों पर कसा शिकंजा

रेलवे भर्ती मामला: बिहार से लेकर यूपी तक छात्र युवाओं का गुस्सा फूटा, पुलिस ने दिखाई बर्बरता


बाकी खबरें

  • lakheempur
    अनिल जैन
    विशेष: किसिम-किसिम के आतंकवाद
    24 Oct 2021
    विविधता से भरे भारत में आतंकवाद के भी विविध रूप हैं! राजकीय आतंकवाद से लेकर कॉरपोरेट आतंकवाद तक।
  • china
    अनीश अंकुर
    चीन को एंग्लो-सैक्सन नज़रिए से नहीं समझा जा सकता
    24 Oct 2021
    आख़िर अमेरिका या पश्चिमी देशों के लिए चीन पहेली क्यों बना हुआ है? चीन उन्हें समझ क्यों नहीं आता? ‘हैज चाइना वॉन' किताब लिखने वाले सिंगापुर के लेखक किशोर महबूबानी के अनुसार "चीन को जब तक एंग्लो-सैक्सन…
  • Rashmi Rocket
    रचना अग्रवाल
    रश्मि रॉकेट : महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले अपमानजनक जेंडर टेस्ट का खुलासा
    24 Oct 2021
    फ़िल्म समीक्षा: किसी धाविका से यह कहना कि वह स्त्री तो है, लेकिन उसके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने के कारण वह स्त्री वर्ग में नहीं आ सकती अपने आप में उसके लिए असहनीय मानसिक यातना देने…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    शाह का कश्मीर दौरा, सत्ता-निहंग संवाद और कांग्रेस-राजद रिश्ते में तनाव
    23 Oct 2021
    अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी किये जाने के बाद गृहमंत्री अमित शाह पहली बार कश्मीर गये हैं. सुरक्षा परिदृश्य और विकास कार्यो का जायजा लेने के अलावा कश्मीर को लेकर उनका एजेंडा क्या है?…
  • UP Lakhimpur
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    ‘अस्थि कलश यात्रा’: लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए चार किसानों की अस्थियां गंगा समेत दूसरी नदियों में की गईं प्रवाहित 
    23 Oct 2021
    12 अक्तूबर को लखीमपुर खीरी से यह कलश यात्रा शुरू हुई थी, यह देश के कई राज्यों में फिलहाल जारी है। उत्तर प्रदेश में ये यात्रा पश्चिमी यूपी के कई जिलों से निकली, जिनमें मुझफ्फरनगर और मेरठ जिले शामिल थे…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License