NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
शिक्षा
भारत
राजनीति
अब कैंपस बन रहे हैं प्रतिरोध के गढ़!
जेएनयू का आंदोलन छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। इसके अलावा इस दौर में कैंपसों में जो जंग छिड़ी है वह केवल कैंपस के मुद्दों तक सीमित नहीं है, उनका फलक वृहद् है और संघर्ष भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, जबकि छात्रों पर लगातार बर्बर दमनचक्र जारी है।
कुमुदिनी पति
12 Nov 2019
JNU protest

पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय कैंपस प्रतिरोध के केंद्र बने हैं। इनमें कुछ ख़ास नाम जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू), हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), जादवपुर विश्वविद्यालय और पंजाब व गढ़वाल जैसे छोटे विश्वविद्यालय भी हैं। पर, इस दौर में कैम्पसों में जो जंग छिड़ी है वह केवल कैंपस के मुद्दों तक सीमित नहीं है, उनका फलक वृहद् है और संघर्ष भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, जबकि छात्रों पर लगातार बर्बर दमनचक्र जारी है। और, बहुसंख्यक छात्रों के बीच ‘सॉलिडैरिटी’ कुछ इस प्रकार विकसित हुई है जो जातीय व साम्प्रदायिक विभाजनों से ऊपर उठ चुकी है।

11 नवम्बर को जेएनयू में जो प्रतिरोध का ज्वार दिखा वह साधारण नहीं था-छात्रों ने वॉटर कैनन और लाठियों की मार को धता बताते हुए दीक्षान्त समारोह स्थल के बाहर डेरा डालकर वहां मौजूद मानव संसाधन विकास मंत्री को झुकने पर मजबूर कर दिया। युवा वर्ग के भीतर पुनः ऐसी चेतना का विकास हो रहा है जो चीन के तियानमेन स्क्वायर के जनतंत्र-पक्षधर संघर्ष से मिलता-जुलता है; या उस समय के आन्दोलन की पुनरावृत्ति के बीज संजोए है, जो जेपी ने छेड़ी थी और जिसमें हज़ारों की संख्या में छात्र कैंपसों के बाहर निकलकर सामाजिक बदलाव के लिए लड़ रहे थे। यह इसलिए है कि अब कैंपस के प्रश्न बड़े सामाजिक सवालों से सीधे जुड़े दिखाई दे रहे हैं। इस चेतना की तुलना आप नवनिर्माण आंदोलन या दक्षिण भारत में हिन्दी-विरोधी या जलिकट्टु के समर्थन में चले आन्दोलनों से कर सकते हैं।

75407659_1080313325509023_5589559370607230976_n.jpg

धनाड्य-पक्षधर मस्विदा नई शिक्षा नीति के विरुद्ध, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए लड़ रहे छात्र-युवा इस बात की परवाह किये बगैर कि उनपर कितना दमन होगा या उनके कैरियर पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, प्रतिरोध की नई उंचाइयां तय कर रहे हैं और देश के सबसे ज्वलंत सवालों को सरकार के मुंह पर मार रहे हैं। वे अब ‘करो या मरो’ वाली स्थिति में पहुंच चुके हैं, क्योंकि उनके अस्तित्व को ही चुनौती है।

जेएनयू का आंदोलन छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है, क्योंकि यहां एक सांस्कृतिक युद्ध आरम्भ हो चुका है-कि सनातन, रूढ़िवादी, हिन्दुत्ववादी भारत बनेगा या उदार, विश्वप्रेमी व मुक्तिवादी भारत रहेगा। यहां एक तरफ काश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार से लेकर श्रमिकों व दलितों के हकों की बात चली तो दूसरी ओर उग्र सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरुद्ध छात्रों व अध्यापकों ने मिलकर आवाज़ बुलंद की।

कैंपस में फीस और लोकतंत्र के सवाल से लेकर देश में चल रहे कॉरपोरेट लूट, भूमि अधिग्रहण, इतिहास के भगवाकरण और धर्मनिरपेक्षता को नष्ट करने जैसे प्रश्न आज जेएनयू के हर छात्र के मन में हैं। जेएनयू से ही कन्हैया जैसा छात्र नेता उभर कर आता है, जो नया बिहार और नया हिंदुस्तान के सपने लिए बेगुसराय में भगवा विजारधारा को कड़ी चुनौती देता है। क्या कारण है कि ‘आज़ादी’ के युद्धघोष से भाजपा के प्रधानमंत्री सहित शीर्षस्थ नेता इतना घबरा गए हैं कि हर भाषण में इस नारे के प्रवर्तकों को ‘टुकड़ा-टुकड़ा’ गैंग के नाम से पुकारते हैं?

दरअसल जेएनयू में देश के कोने-कोने से सामान्य पृष्ठभूमि वाले और विदेशी छात्र आते हैं। इस बार जेएनयू प्रशासन ने जो छात्र-विरोधी कदम उठाए हैं-मसलन हॉस्टल व मेस फीस को 300 प्रतिशत बढ़ाना, उसे समय पर न जमा करने पर हॉस्टल से निकालना, रात 11.30 बजे के बाद ‘कर्फ्यू’ लागू करना, लड़कियों का लड़कों के हॉस्टल में प्रवेश करने पर पाबंदी और बिना वॉर्डन की अनुमति के बाहर जाने पर रोक, ड्रेस कोड आदि। छात्र समुदाय पर ऐसा हमला हुआ है, जिससे 40 प्रतिशत छात्र शिक्षा से वंचित होंगे। छात्रों पर अंकुश के चलते कैंपस का उदार व जनवादी ताना-बाना छिन्न-भिन्न होगा।

एक प्रोफेसर ने कहा कि ‘‘इस तरह तो जेएनयू का चरित्र ही बदल जाएगा’’। उच्च शिक्षण संस्थानों के आर्थिक अनुदान में बदलाव, शिक्षा कानून में परिवर्तन, नियुक्तियों सहित अन्य नियमों, मसलन रोस्टर प्रणाली में बदलाव, लिंग्दोह समिति की सिफारिशें और फीस वृद्धि, पुलिस व अर्धसैनिक बल की दखल जो ओडिशा, पश्चिम बंगाल व उत्तराखण्ड में भी हुई है-यह सब कैंपस-स्वायत्तता पर हमले हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लड़ाई

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी छात्र संघ को समाप्त करने का प्रयास जारी है, जो 96 वर्ष पुराना है और जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिये। पर विश्वद्यिलय द्वारा छात्र संघ की जगह छात्र परिषद के निमार्ण की प्रक्रिया तब औंधे मुंह गिरी जब छात्रों ने लगातार आमरण अनशन करते हुए, पुलिस का बर्बर लाठीचार्ज झेले और लड़ते रहे। 39 छात्र धारा 151, धारा 307 व 7 सीएलए ऐक्ट को धता बताते हुए जेल के बाहर आए हैं तथा आगे के संघर्ष की तैयारी में जुटे हैं।

छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी विजय रही कि छात्र परिषद के लिए 70 पदों पर केवल 17 ने नामांकन पत्र भरे और उनमें से भी 15 ने उन्हें वापस ले लिया, जिसके कारण परिषद चुनाव रद्द हुआ।

यह वही विश्वविद्यालय है जिसने पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह के नेतृत्व में योगी आदित्यनाथ को विश्वविद्यालय आने से रोका था, जिसके चलते वह विश्वविद्यालय प्रशासन के कोपभाजन का शिकर बनी हैं और भांति-भांति का उत्पीड़न झेलती हैं। अब भी कई छात्र निष्कासित हैं और कई की एंट्री पर बैन है।

जामिया मिल्लिया का आंदोलन

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में भी लंबा आंदोलन चला है पर अंत में छात्रों की विजय हुई, जबकि वहां छात्र संघ को पहले ही खत्म कर दिया गया है। दरअसल विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में शरीक एक इज़राइल प्रतिनिधिमंडल का जब छात्र विरोध करने गए,  उन्हें प्रशासन द्वारा पुलिस बर्बरता का शिकार बनाया गया और 5 छात्रों को कारण बताओ नोटिस दी गई। इस कदम के विरुद्ध लड़ रहे छात्र-छात्राओं पर बाउन्सरों द्वारा हमला करवाया गया और गार्डों ने उन्हें बचाने की जगह प्रॉक्टर के इशारे पर उन्हें पिटने दिया। यह केवल जामिया की कहानी नहीं है; इलाहाबाद में भी ऋचा सिंह और धरने पर बैठी आम छात्रों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गुण्डों ने हमला किया था और अश्लील गालियां दीं।

वर्तमान दौर में जेएनयू, जामिया, इलाहाबाद, एएमयू सहित कई कैम्पसों को पुलिस छावनी बना दिया गया है और चौबीसों घंटे सीआरपीएफ को गेट पर तैनात किया गया है, मानो छात्र अपराधी या आतंकवादी हैं। उनपर राष्ट्रद्रोह व अन्य संगीन धाराएं लगाई जा रही हैं। वीसी कैंपस से नदारद रहते हैं। कई कैंपसों में आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी की ताकत भी बढ़ी है। इसका प्रमुख कारण है कि शासन चुन-चुनकर ऐसे कुलपतियों को नियुक्त कर रहा है जो भगवा विचार वाले तानाशाह हैं। उनके जरिये विश्वविद्यालयों में दक्षिपंथी सोच के प्राध्यापकों की अवैध नियुक्ति भी धड़ल्ले से हुई है और ये अधापक विद्यार्थी परिषद के छात्रों को लगातार बढ़ावा देते व उकसाते हैं। ये भगवा निजी सेना जैसे काम करते हैं और शक्ति के लिहाज पहले-दूसरे स्थान पर कायम हैं। उदार विचारों या वामपंथी विचारों को मानने वाले छात्रों, अध्यापकों या विद्वानों को कैंपस में कार्यक्रम करने से हिंसा द्वारा रोकने हेतु इनका इस्तेमाल हो रहा है।

75262306_1080313412175681_4373356161458503680_n.jpg

कैम्पसों में ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है कि वाम-लोकतांत्रिक विचार वालों का छात्रों के साथ बातचीत (Interaction) करना असंभव-सा होता जा रहा है। यह केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला नहीं, बल्कि एक फासिस्ट रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत एक ही विचार (दक्षिणपंथी) को पनपने का मौका दिया जाएगा, बाकी विचार रौंद कर खत्म किये जाएंगे।

छात्र-अधिकारों के लिए लड़ने वाले यूनियनों को खत्म करने की साजिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है। यद्यपि वाम और दलित संगठन साथ आ रहे हैं, अभी भी महिला-हकों और पर्यावरण-रक्षा के लिए काम करने वाली ताकतें अदृष्य हैं। पर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और कर्मचारी छात्रों के साथ एकजुट हुए हैं। आज ज़रूरत है कि छात्र कैंपस के बाहर के जनवादी संघर्षों से जुड़ें, क्योंकि भारी पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ रही है, नियुक्तियां रुकी हैं और छंटनी जारी है। हाल में रेलवे निजीकरण के विरुद्ध ऐसा सैलाब बिहार में दिखा। इस बात को भी तवज्जो दी जाए कि तमाम लड़ाकू छात्र यूनियनों व संगठनों को राष्ट्रीय स्तर पर गोलबंदी करने की दृष्टि से एक लचीली केंद्रीय समन्वय समिति समय की मांग है।

(लेखक एक महिला एक्टिविस्ट और राजनीतिक विश्लेषक हैं। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की पूर्व उपाध्यक्ष भी रही हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।) 

JNU
JNUSU
JNU Student Protest
Fee Hike
MHRD
Allahabad University
Jamia Milia Islamia
Aligarh Muslim university
Central University of Hyderabad
BHU

Related Stories

जेएनयू: अर्जित वेतन के लिए कर्मचारियों की हड़ताल जारी, आंदोलन का साथ देने पर छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष की एंट्री बैन!

बीएचयू: लाइब्रेरी के लिए छात्राओं का संघर्ष तेज़, ‘कर्फ्यू टाइमिंग’ हटाने की मांग

‘जेएनयू छात्रों पर हिंसा बर्दाश्त नहीं, पुलिस फ़ौरन कार्रवाई करे’ बोले DU, AUD के छात्र

जेएनयू हिंसा: प्रदर्शनकारियों ने कहा- कोई भी हमें यह नहीं बता सकता कि हमें क्या खाना चाहिए

JNU में खाने की नहीं सांस्कृतिक विविधता बचाने और जीने की आज़ादी की लड़ाई

हिमाचल: प्राइवेट स्कूलों में फ़ीस वृद्धि के विरुद्ध अभिभावकों का ज़ोरदार प्रदर्शन, मिला आश्वासन 

बीएचयू : सेंट्रल हिंदू स्कूल के दाख़िले में लॉटरी सिस्टम के ख़िलाफ़ छात्र, बड़े आंदोलन की दी चेतावनी

नौजवान आत्मघात नहीं, रोज़गार और लोकतंत्र के लिए संयुक्त संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ें

गरमाने लगा बनारस: किसान आंदोलन के समर्थक छात्रों के खिलाफ FIR, सिंधोरा थाने पर प्रदर्शन

यूपी में पश्चिम से पूरब तक रही भारत बंद की धमक, नज़रबंद किए गए किसान नेता


बाकी खबरें

  • नाइश हसन
    मेरे मुसलमान होने की पीड़ा...!
    18 Apr 2022
    जब तक आप कोई घाव न दिखा पाएं तब तक आप की पीड़ा को बहुत कम आंकता है ये समाज, लेकिन कुछ तकलीफ़ों में हम आप कोई घाव नहीं दिखा सकते फिर भी भीतर की दुनिया के हज़ार टुकड़े हो चुके होते हैं।
  • लाल बहादुर सिंह
    किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़
    18 Apr 2022
    किसानों पर कारपोरेटपरस्त  'सुधारों ' के अगले डोज़ की तलवार लटक रही है। जाहिर है, हाल ही में हुए UP व अन्य विधानसभा चुनावों की तरह आने वाले चुनाव भी भाजपा अगर जीती तो कृषि के कारपोरेटीकरण को रोकना…
  • सुबोध वर्मा
    भारत की राष्ट्रीय संपत्तियों का अधिग्रहण कौन कर रहा है?
    18 Apr 2022
    कुछ वैश्विक पेंशन फंड़, जिनका मक़सद जल्द और स्थिर लाभ कमाना है,  ने कथित तौर पर लगभग 1 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति को लीज़ पर ले लिया है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,183 नए मामले, 214 मरीज़ों की मौत हुई
    18 Apr 2022
    देश की राजधानी दिल्ली में कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं। दिल्ली में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 517 नए मामले सामने आए है |
  • भाषा
    दिल्ली में सीएनजी में सब्सिडी की मांग को लेकर ऑटो, टैक्सी संगठनों की हड़ताल
    18 Apr 2022
    दिल्ली में ऑटो, टैक्सी और कैब चालकों के विभिन्न संगठन ईंधन की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर सीएनजी में सब्सिडी और भाढ़े की दरों में बदलाव की मांग को लेकर सोमवार को हड़ताल पर हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License