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अब कैंपस बन रहे हैं प्रतिरोध के गढ़!
जेएनयू का आंदोलन छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। इसके अलावा इस दौर में कैंपसों में जो जंग छिड़ी है वह केवल कैंपस के मुद्दों तक सीमित नहीं है, उनका फलक वृहद् है और संघर्ष भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, जबकि छात्रों पर लगातार बर्बर दमनचक्र जारी है।
कुमुदिनी पति
12 Nov 2019
JNU protest

पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय कैंपस प्रतिरोध के केंद्र बने हैं। इनमें कुछ ख़ास नाम जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू), हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), जादवपुर विश्वविद्यालय और पंजाब व गढ़वाल जैसे छोटे विश्वविद्यालय भी हैं। पर, इस दौर में कैम्पसों में जो जंग छिड़ी है वह केवल कैंपस के मुद्दों तक सीमित नहीं है, उनका फलक वृहद् है और संघर्ष भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, जबकि छात्रों पर लगातार बर्बर दमनचक्र जारी है। और, बहुसंख्यक छात्रों के बीच ‘सॉलिडैरिटी’ कुछ इस प्रकार विकसित हुई है जो जातीय व साम्प्रदायिक विभाजनों से ऊपर उठ चुकी है।

11 नवम्बर को जेएनयू में जो प्रतिरोध का ज्वार दिखा वह साधारण नहीं था-छात्रों ने वॉटर कैनन और लाठियों की मार को धता बताते हुए दीक्षान्त समारोह स्थल के बाहर डेरा डालकर वहां मौजूद मानव संसाधन विकास मंत्री को झुकने पर मजबूर कर दिया। युवा वर्ग के भीतर पुनः ऐसी चेतना का विकास हो रहा है जो चीन के तियानमेन स्क्वायर के जनतंत्र-पक्षधर संघर्ष से मिलता-जुलता है; या उस समय के आन्दोलन की पुनरावृत्ति के बीज संजोए है, जो जेपी ने छेड़ी थी और जिसमें हज़ारों की संख्या में छात्र कैंपसों के बाहर निकलकर सामाजिक बदलाव के लिए लड़ रहे थे। यह इसलिए है कि अब कैंपस के प्रश्न बड़े सामाजिक सवालों से सीधे जुड़े दिखाई दे रहे हैं। इस चेतना की तुलना आप नवनिर्माण आंदोलन या दक्षिण भारत में हिन्दी-विरोधी या जलिकट्टु के समर्थन में चले आन्दोलनों से कर सकते हैं।

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धनाड्य-पक्षधर मस्विदा नई शिक्षा नीति के विरुद्ध, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए लड़ रहे छात्र-युवा इस बात की परवाह किये बगैर कि उनपर कितना दमन होगा या उनके कैरियर पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, प्रतिरोध की नई उंचाइयां तय कर रहे हैं और देश के सबसे ज्वलंत सवालों को सरकार के मुंह पर मार रहे हैं। वे अब ‘करो या मरो’ वाली स्थिति में पहुंच चुके हैं, क्योंकि उनके अस्तित्व को ही चुनौती है।

जेएनयू का आंदोलन छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है, क्योंकि यहां एक सांस्कृतिक युद्ध आरम्भ हो चुका है-कि सनातन, रूढ़िवादी, हिन्दुत्ववादी भारत बनेगा या उदार, विश्वप्रेमी व मुक्तिवादी भारत रहेगा। यहां एक तरफ काश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार से लेकर श्रमिकों व दलितों के हकों की बात चली तो दूसरी ओर उग्र सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरुद्ध छात्रों व अध्यापकों ने मिलकर आवाज़ बुलंद की।

कैंपस में फीस और लोकतंत्र के सवाल से लेकर देश में चल रहे कॉरपोरेट लूट, भूमि अधिग्रहण, इतिहास के भगवाकरण और धर्मनिरपेक्षता को नष्ट करने जैसे प्रश्न आज जेएनयू के हर छात्र के मन में हैं। जेएनयू से ही कन्हैया जैसा छात्र नेता उभर कर आता है, जो नया बिहार और नया हिंदुस्तान के सपने लिए बेगुसराय में भगवा विजारधारा को कड़ी चुनौती देता है। क्या कारण है कि ‘आज़ादी’ के युद्धघोष से भाजपा के प्रधानमंत्री सहित शीर्षस्थ नेता इतना घबरा गए हैं कि हर भाषण में इस नारे के प्रवर्तकों को ‘टुकड़ा-टुकड़ा’ गैंग के नाम से पुकारते हैं?

दरअसल जेएनयू में देश के कोने-कोने से सामान्य पृष्ठभूमि वाले और विदेशी छात्र आते हैं। इस बार जेएनयू प्रशासन ने जो छात्र-विरोधी कदम उठाए हैं-मसलन हॉस्टल व मेस फीस को 300 प्रतिशत बढ़ाना, उसे समय पर न जमा करने पर हॉस्टल से निकालना, रात 11.30 बजे के बाद ‘कर्फ्यू’ लागू करना, लड़कियों का लड़कों के हॉस्टल में प्रवेश करने पर पाबंदी और बिना वॉर्डन की अनुमति के बाहर जाने पर रोक, ड्रेस कोड आदि। छात्र समुदाय पर ऐसा हमला हुआ है, जिससे 40 प्रतिशत छात्र शिक्षा से वंचित होंगे। छात्रों पर अंकुश के चलते कैंपस का उदार व जनवादी ताना-बाना छिन्न-भिन्न होगा।

एक प्रोफेसर ने कहा कि ‘‘इस तरह तो जेएनयू का चरित्र ही बदल जाएगा’’। उच्च शिक्षण संस्थानों के आर्थिक अनुदान में बदलाव, शिक्षा कानून में परिवर्तन, नियुक्तियों सहित अन्य नियमों, मसलन रोस्टर प्रणाली में बदलाव, लिंग्दोह समिति की सिफारिशें और फीस वृद्धि, पुलिस व अर्धसैनिक बल की दखल जो ओडिशा, पश्चिम बंगाल व उत्तराखण्ड में भी हुई है-यह सब कैंपस-स्वायत्तता पर हमले हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लड़ाई

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी छात्र संघ को समाप्त करने का प्रयास जारी है, जो 96 वर्ष पुराना है और जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिये। पर विश्वद्यिलय द्वारा छात्र संघ की जगह छात्र परिषद के निमार्ण की प्रक्रिया तब औंधे मुंह गिरी जब छात्रों ने लगातार आमरण अनशन करते हुए, पुलिस का बर्बर लाठीचार्ज झेले और लड़ते रहे। 39 छात्र धारा 151, धारा 307 व 7 सीएलए ऐक्ट को धता बताते हुए जेल के बाहर आए हैं तथा आगे के संघर्ष की तैयारी में जुटे हैं।

छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी विजय रही कि छात्र परिषद के लिए 70 पदों पर केवल 17 ने नामांकन पत्र भरे और उनमें से भी 15 ने उन्हें वापस ले लिया, जिसके कारण परिषद चुनाव रद्द हुआ।

यह वही विश्वविद्यालय है जिसने पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह के नेतृत्व में योगी आदित्यनाथ को विश्वविद्यालय आने से रोका था, जिसके चलते वह विश्वविद्यालय प्रशासन के कोपभाजन का शिकर बनी हैं और भांति-भांति का उत्पीड़न झेलती हैं। अब भी कई छात्र निष्कासित हैं और कई की एंट्री पर बैन है।

जामिया मिल्लिया का आंदोलन

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में भी लंबा आंदोलन चला है पर अंत में छात्रों की विजय हुई, जबकि वहां छात्र संघ को पहले ही खत्म कर दिया गया है। दरअसल विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में शरीक एक इज़राइल प्रतिनिधिमंडल का जब छात्र विरोध करने गए,  उन्हें प्रशासन द्वारा पुलिस बर्बरता का शिकार बनाया गया और 5 छात्रों को कारण बताओ नोटिस दी गई। इस कदम के विरुद्ध लड़ रहे छात्र-छात्राओं पर बाउन्सरों द्वारा हमला करवाया गया और गार्डों ने उन्हें बचाने की जगह प्रॉक्टर के इशारे पर उन्हें पिटने दिया। यह केवल जामिया की कहानी नहीं है; इलाहाबाद में भी ऋचा सिंह और धरने पर बैठी आम छात्रों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गुण्डों ने हमला किया था और अश्लील गालियां दीं।

वर्तमान दौर में जेएनयू, जामिया, इलाहाबाद, एएमयू सहित कई कैम्पसों को पुलिस छावनी बना दिया गया है और चौबीसों घंटे सीआरपीएफ को गेट पर तैनात किया गया है, मानो छात्र अपराधी या आतंकवादी हैं। उनपर राष्ट्रद्रोह व अन्य संगीन धाराएं लगाई जा रही हैं। वीसी कैंपस से नदारद रहते हैं। कई कैंपसों में आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी की ताकत भी बढ़ी है। इसका प्रमुख कारण है कि शासन चुन-चुनकर ऐसे कुलपतियों को नियुक्त कर रहा है जो भगवा विचार वाले तानाशाह हैं। उनके जरिये विश्वविद्यालयों में दक्षिपंथी सोच के प्राध्यापकों की अवैध नियुक्ति भी धड़ल्ले से हुई है और ये अधापक विद्यार्थी परिषद के छात्रों को लगातार बढ़ावा देते व उकसाते हैं। ये भगवा निजी सेना जैसे काम करते हैं और शक्ति के लिहाज पहले-दूसरे स्थान पर कायम हैं। उदार विचारों या वामपंथी विचारों को मानने वाले छात्रों, अध्यापकों या विद्वानों को कैंपस में कार्यक्रम करने से हिंसा द्वारा रोकने हेतु इनका इस्तेमाल हो रहा है।

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कैम्पसों में ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है कि वाम-लोकतांत्रिक विचार वालों का छात्रों के साथ बातचीत (Interaction) करना असंभव-सा होता जा रहा है। यह केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला नहीं, बल्कि एक फासिस्ट रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत एक ही विचार (दक्षिणपंथी) को पनपने का मौका दिया जाएगा, बाकी विचार रौंद कर खत्म किये जाएंगे।

छात्र-अधिकारों के लिए लड़ने वाले यूनियनों को खत्म करने की साजिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है। यद्यपि वाम और दलित संगठन साथ आ रहे हैं, अभी भी महिला-हकों और पर्यावरण-रक्षा के लिए काम करने वाली ताकतें अदृष्य हैं। पर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और कर्मचारी छात्रों के साथ एकजुट हुए हैं। आज ज़रूरत है कि छात्र कैंपस के बाहर के जनवादी संघर्षों से जुड़ें, क्योंकि भारी पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ रही है, नियुक्तियां रुकी हैं और छंटनी जारी है। हाल में रेलवे निजीकरण के विरुद्ध ऐसा सैलाब बिहार में दिखा। इस बात को भी तवज्जो दी जाए कि तमाम लड़ाकू छात्र यूनियनों व संगठनों को राष्ट्रीय स्तर पर गोलबंदी करने की दृष्टि से एक लचीली केंद्रीय समन्वय समिति समय की मांग है।

(लेखक एक महिला एक्टिविस्ट और राजनीतिक विश्लेषक हैं। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की पूर्व उपाध्यक्ष भी रही हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।) 

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