NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जम्मू कश्मीर : धारा 370 हटाने के बाद भी वन अधिकार क़ानून लागू करने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई
इससे पहले, पूर्ववर्ती पहाड़ी राज्य के पास भारतीय संविधान में मौजूद धारा 370 के तहत विशेष प्रावधान थे जो उसे ख़ुद के लिए क़ानून बनाने का अधिकार देते थे और राज्य में केंद्रीय क़ानूनों को लागू करने या न करने का विवेक भी देते थे।    
सुमेधा पाल
22 Jan 2020
Translated by महेश कुमार
JAAMU AND KASHMIR

धारा 370 को निरस्त करने के छह महीने बाद, जिसके कारण जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन राज्य में भूमि का पुनर्गठन शुरू हुआ है, अब इस क्षेत्र के आदिवासी अपनी मान्यता और वन अधिकार अधिनियम को लागू करने की लड़ाई लड़ रहे हैं, जो वन अधिकार क़ानून अब इस क्षेत्र में लागू है।

2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में गुर्जरों और बक्करवालों की आबादी लगभग 11.9 प्रतिशत है – यानी कुल 1 करोड़ 20 लाख 50 हज़ार की कुल आबादी में से 15 लाख हैं। बड़ी तादाद यानी क़रीब दस लाख गुर्जर पर्वतीय क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ वे पशुधन पालन और छोटे पैमाने पर कृषि पर निर्भर हैं। वर्षों से, कश्मीर में चल रहे सशस्त्र संघर्ष के कारण कई चारागाह के क्षेत्र इन घुमंतू आदिवासियों की पहुँच से बाहर हो गए हैं।

5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने उत्तर भारत के प्रदेश जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया गया था, इस राज्य में अनुसूचित जनजाति के लोगों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों (वन अधिकार की मान्यता) अधिनियम, 2006 (जिसे वन अधिकार अधिनियम के रूप में भी जाना जाता है) के लिए लागू नहीं था। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जम्मू इकाई ने जम्मू-कश्मीर में इस क़ानून को लागू न करने के लिए पूर्व विशेष दर्जे को मुख्य कारण बताया था।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए, ट्राईबल रिसर्च एंड कल्चरल डेवलपमेंट के जावेद राही ने बताया, "पुनर्गठन के अलावा एफ़आरए के साथ-साथ कई अन्य क़ानून जैसे कि संरक्षण अधिनियम 1980 इस क्षेत्र में लागू हो जाएगा। हम ज्ञापन के ज़रिये इसके बारे में गवर्नर को लिख रहे हैं और उन्हे इन क़ानूनों को लागू करने के लिए आग्रह कर रहे हैं। गुर्जर-बकरवाल, ख़ानाबदोशों और ग्रामीण लोगों को इससे भारी नुक़सान हो रहा हैं, जबकि इन क़ानूनों को लागू करने की प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई है।”

एक्टिविस्ट लोगों का कहना है कि अधिनियम को लागू करने की ज़िम्मेदारी अब जनजातीय मंत्रालय पर है।

केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा एक आउटरीच कार्यक्रम (लोगों से मिलने) के तहत नवगठित केंद्र शासित प्रदेश के दौरे पर हैं, आदिवासी समूह अपनी मांगों पर विचार करने के लिए दबाव बनाने के लिए कमर कस रहे हैं।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए, क्षेत्र के एक एक्टिविस्ट मसूद ने बताया, "इस मुद्दे पर यथास्थिति बने रहने के अलावा कुछ नहीं हो रहा है, और इसके बारे में कोई चर्चा भी नहीं है।"

वन अधिकार अधिनियम पारंपरिक वनवासियों को जबरन विस्थापित किए जाने के ख़िलाफ़ संरक्षित करता है और उनके पास अन्य अधिकार भी होते हैं, जिसमें चराई के अधिकार, जल संसाधनों और वन उत्पादों का इस्तेमाल (लकड़ी को छोड़कर) शामिल हैं। केंद्रीय वन अधिकार अधिनियम के लागू होने से आदिवासी समुदायों और वनवासियों को वनों पर अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त करने का अधिकार मिल जाता है। अब तक, राज्य के वन क़ानून, आदिवासी एकटीविस्ट के अनुसार केवल वनवासियों को चराई का अधिकार देते थे।

अधिनियम को लागू करने में केंद्र सरकार की पहल में कमी राज्य की भूमि में उनकी इच्छा की पृष्ठभूमि में आती है। हाल ही में जंगलों की भूमि पर सौ से अधिक परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा दी गई और वहाँ अवैध निर्माण तेज़ हो गया है।

5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम पारित किया था। इस अधिनियम के ज़रिये पूर्व में जम्मू और कश्मीर के 153 अधिनियमों को निरस्त कर दिया गया है, और 166 अधिनियमों को बरक़रार रखा गया है और 106 नए क़ानून लागू किए गए हैं।

इससे पहले, पूर्ववर्ती पहाड़ी राज्य भारतीय के पास संविधान में मौजूद धारा 370 के तहत विशेष प्रावधान थे जो उसे ख़ुद के लिए क़ानून बनाने का अधिकार देते थे और राज्य में केंद्रीय क़ानूनों को लागू करने या न करने का विवेक भी देते थे।

J&K
Article 370
tribal rights
fra
Forest Rights
Gujjar-Bakarwals
Forest Rights Act in Jammu and Kashmir
Article 370 Abrogated (

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

कैसे जम्मू-कश्मीर का परिसीमन जम्मू क्षेत्र के लिए फ़ायदे का सौदा है

जम्मू-कश्मीर: बढ़ रहे हैं जबरन भूमि अधिग्रहण के मामले, नहीं मिल रहा उचित मुआवज़ा

तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 

जम्मू-कश्मीर: अधिकारियों ने जामिया मस्जिद में महत्वपूर्ण रमज़ान की नमाज़ को रोक दिया

अपनी ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष करते ईरुला वनवासी, कहा- मरते दम तक लड़ेंगे

केजरीवाल का पाखंड: अनुच्छेद 370 हटाए जाने का समर्थन किया, अब एमसीडी चुनाव पर हायतौबा मचा रहे हैं

जम्मू-कश्मीर में उपभोक्ता क़ानून सिर्फ़ काग़ज़ों में है 

कश्मीर को समझना क्या रॉकेट साइंस है ?  


बाकी खबरें

  • एम.ओबैद
    एमपी : ओबीसी चयनित शिक्षक कोटे के आधार पर नियुक्ति पत्र की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे
    26 Apr 2022
    चयनित शिक्षक पिछले एक महीने से नियुक्ति पत्र को लेकर प्रदेश भर में धरना प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन मांग पूरी न होने पर अंत में आमरण अनशन का रास्ता चयन किया।
  • अखिलेश अखिल
    यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का अमृतकाल है
    26 Apr 2022
    इस पर आप इतराइये या फिर रुदाली कीजिए लेकिन सच यही है कि आज जब देश आज़ादी का अमृतकाल मना रहा है तो लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तम्भों समेत तमाम तरह की संविधानिक और सरकारी संस्थाओं के लचर होने की गाथा भी…
  • विजय विनीत
    बलिया पेपर लीक मामला: ज़मानत पर रिहा पत्रकारों का जगह-जगह स्वागत, लेकिन लड़ाई अभी बाक़ी है
    26 Apr 2022
    "डबल इंजन की सरकार पत्रकारों को लाठी के जोर पर हांकने की हर कोशिश में जुटी हुई है। ताजा घटनाक्रम पर गौर किया जाए तो कानपुर में पुलिस द्वारा पत्रकारों को नंगाकर उनका वीडियो जारी करना यह बताता है कि…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जन आंदोलनों के आयोजन पर प्रतिबंध अलोकतांत्रिक, आदेश वापस लें सरकार : माकपा
    26 Apr 2022
    माकपा ने सवाल किया है कि अब जन आंदोलन क्या सरकार और प्रशासन की कृपा से चलेंगे?
  • ज़ाहिद खान
    आग़ा हश्र काश्मीरी: गंगा-ज़मुनी संस्कृति पर ऐतिहासिक नाटक लिखने वाला ‘हिंदोस्तानी शेक्सपियर’
    26 Apr 2022
    नाट्य लेखन पर शेक्सपियर के प्रभाव, भारतीय रंगमंच में महत्वपूर्ण योगदान और अवाम में उनकी मक़बूलियत ने आग़ा हश्र काश्मीरी को हिंदोस्तानी शेक्सपियर बना दिया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License