NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
झारखंड–बिहार: आंदोलनकारी किसानों पर दमन के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरे वामदल
30 नवंबर को बिहार सीपीएम राज्य मुख्यालय में सभी वामपंथी दलों ने संयुक्त प्रेस वार्ता कर मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने छल–षड्यंत्र से कोरोना काल की आड़ लेकर संसद से विवादास्पद कृषि नीतियाँ पास की हैं जो पूरी तरह से किसान विरोधी और कॉरपोरेट का पक्ष लेने वाली हैं।
अनिल अंशुमन
01 Dec 2020
आंदोलनकारी किसानों पर दमन के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरे वामदल

मौजूदा केंद्र की सरकार द्वारा थोपे गए कृषि विरोधी तीनों कानूनों का विरोध कर रहे आंदोलनकारी किसानों के समर्थन के साथ-साथ सरकार द्वारा उन पर किए जा रहे दमन के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में सड़कों पर प्रतिवाद शुरू हो गया है। 30 नवंबर को भाकपा माले ने देशव्यापी विरोध दिवस मनाया जिसके तहत झारखंड और बिहार में जगह-जगह विरोध मार्च निकाल कर आंदोलनकारी किसानों के पक्ष में आवाज़ बुलंद करते हुए केंद्र सरकार के पुतले जलाए गए।

पटना में आयोजित प्रतिवाद कार्यक्रम में माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने विशेष रूप से शामिल हुए और कारगिल चौक पर आयोजित विरोध सभा को संबोधित किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने मोदी सरकार के किसान विरोधी दमनकारी रवैये का तीखा विरोध करते हुए कहा कि पूरा देश किसानों का साथ दे रहा है तो मोदी सरकार ने किसानों के खिलाफ जंग छेड़ दी है।

उन्होंने आगे कहा कि किसान विरोधी कृषि क़ानूनों के खिलाफ पूरे देश में किसानों का शाहीन बाग बन रहा है। आज पूरे देश में किसानों का ही मुद्दा है। जिन्होंने तीन दिनों से दिल्ली की सीमा को चारो तरफ से ऐसे घेर रखा है मानो मोदी सरकार किसानों से जंग लड़ रही है।  

दिल्ली सीमा पर इकट्ठे किसानों के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों में सड़कों पर हो रहे जुझारू विरोध को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों का गुस्सा अचानक ही नहीं फूटा है। जिस प्रकार से राज्य सभा में संविधान व लोकतन्त्र की हत्या करके तीनों कृषि क़ानूनों को पारित करवाया गया, सरकार की विफलता से कृषि संकट की मार झेल रहे किसानों के अंदर दबे हुए गुस्से का विस्फोट कर दिया। उक्त कृषि क़ानूनों के विरोध में किसानों का पक्ष पूरी तरह से जायज है। उनका यह कहना भी जायज़ है कि ये कानून खेती–किसानी को चौपट कर कॉर्पोरेट का गुलाम बनाने वाली नीतियाँ हैं। जिसका खुला प्रमाण है कि जिस आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत पहले आलू– प्याज़ जैसे आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी–कालाबाजारी नहीं हो सकती थी लेकिन मोदी सरकार ने अब उसका दरवाजा खोल दिया है। अब पूंजीपतियों को सस्ते दर पर किसानों से समान खरीद कर मनमाना दामों पर बेचकर धड़ल्ले से मुनाफाखोरी करने की खुली छूट मिल गयी है ।  

दीपांकर भट्टाचार्य ने आगे कहा कि केंद्र सरकार द्वारा सैकड़ों किसान मंडियों को तोड़ देने का हश्र हम देख चुके हैं। नीतीश कुमार की सरकार ने तो 2006 में ही सारी मंडियां खत्म कर दी थी। मोदी सरकार कह रही है कि यह आंदोलन विपक्ष के उकसावे से हो रहा है लेकिन पंजाब के अंदर तो विपक्ष भाजपा–अकाली दल–आप ही हैं। इसलिए आज जब पूरा देश किसानों का साथ दे रहा है तो मोदी सरकार इन किसानों के बारे में अनाप – शनाप बोलना और दुष्प्रचार करना बंद करे।

प्रतिवाद सभा को संबोधित करते हुए बिहार विधान सभा में माले विधायक दल नेता महबूब आलम ने केंद्र सरकार के दमनात्मक रवैये का विरोध करते हुए कहा कि मोदी सरकार ने यदि जंग का ऐलान कर रखा है तो किसान भी उसका जवाब देने के लिए मजबूती से डटे हुए हैं। जिससे ऐसा लगता है कि यह देश किसानों का शहीनबाग बनने वाला है।

30 नवंबर को ही बिहार सीपीएम राज्य मुख्यालय में सभी वामपंथी दलों ने संयुक्त प्रेस वार्ता कर मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने छल–षड्यंत्र से कोरोना काल की आड़ लेकर संसद से विवादास्पद कृषि नीतियाँ पास की हैं जो पूरी तरह से किसान विरोधी और कारपोरेट का पक्ष लेने वाली हैं।

उन्होंने उक्त कृषि कानूनों को अविलंब वापस लेने तथा इसका विरोध कर रहे किसानों पर भीषण दमन पर रोक लगाने की मांग की है। 2 दिसंबर को इस सवाल पर पूरे बिहार में विरोध मार्च – प्रदर्शन और मोदी सरकार के पुतला दहन कार्यक्रम की घोषणा की है। साथ यह भी कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर बिहार के किसान भी दिल्ली कूच करेंगे।

प्रेसवार्ता को सीपीएम–सीपीआई व भाकपा माले के राज्य सचिवों ने संयुक्त रूप से संबोधित किया। जसम–जलेस–प्रलेस–इप्टा समेत कई सांस्कृतिक संगठनों ने आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पटना के गांधी मैदान में सांस्कृतिक प्रतिवाद कार्यक्रम का आयोजन किया। जिसमें वरिष्ठ कवि आलोकधन्वा सहित कई अन्य वरिष्ठ संस्कृतिकर्मियों ने सक्रिय भागीदारी निभाते हुए आंदोलनकारी किसानों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की।

सूचना के अनुसार माले विधायक व अखिल भारतीय किसान महासभा नेता सुदामा प्रसाद और जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और युवा विधायक संदीप सौरभ के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली के सिंधु बार्डर पर जुटे किसानों के आन्दोलान में शामिल होने पहुँच हुई है। जहां वे किसानों के जारी विरोध कार्यक्रमों में शामिल होकर उनका पुरजोर समर्थन कर रहें हैं। एक्टू–आईसा व माले की ओर से मेडिकल कैंप भी लगाया गया है।

इस सवाल पर झारखंड में भी वामपंथी दलों–संगठनों के अलावे कई सामाजिक संगठनों ने प्रतिवाद कार्यक्रम किए। इसके पहले 26 नवंबर को भी सभी वामपंथी दलों का संयुक्त राजभवन मार्च निकालकर उक्त तीनों कृषि क़ानूनों का पुरजोर विरोध किया। मार्च का नेतृत्व वामदल नेताओं के अलावा माले विधायक विनोद सिंह ने भी किया।

सोशल मीडिया में भी किसानों के आंदोलन के साथ साथ सरकार द्वारा किए जा रहे भीषण दमन की प्रतिक्रिया में काफी पोस्ट वायरल कर मोदी सरकार के किसान विरोधी रवैये का तीखा विरोध किया जा रहा। कई पोस्टों में कहा जा रहा है कि मोदी जी दिल्ली की सीमा पर आंदोलित किसानों के बीच जाने की बजाय बनारस में अपने कार्यकर्त्ताओं को कृषि कानून के फायदे गिना रहें हैं तो देश के गृह मंत्री हैदराबाद जाकर नगर निगम चुनावों में पार्टी का चुनाव प्रचार का किसान-हित कार्य में व्यस्त हैं।

Jharkhand
Farmer protest
Farm bills 2020
left parties
CPM
CPI
CPI-ML
Indian Farmers General Assembly
Narendra modi
BJP
Amit Shah

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

पंजाब: आप सरकार के ख़िलाफ़ किसानों ने खोला बड़ा मोर्चा, चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर डाला डेरा

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License