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भारत
राजनीति
झारखंड विधान सभा चुनाव 2019 : अवसरवाद की राजनीति में गुम हुए झारखंड राज्य के सपने!
पक्ष और विपक्ष के दोनों गठबंधनों दलों में सीट और टिकट बँटवारे को लेकर इस कदर बवाल मचा हुआ है कि कौन सा दल और नेता कब क्या स्टैंड लेगा, धुरंधर विशेषज्ञ भी नहीं बता पा रहें हैं।
अनिल अंशुमन
18 Nov 2019
jharkhand elections
Image Courtesy: Hindustan Times

बीते 15 नवंबर को झारखंड प्रदेश ने अपने राज्य गठन के 18 साल पूरा कर किशोर से युवावस्था में कदम रख दिया । दुर्योग ऐसा कि इसी समय इस राज्य का विधान सभा चुनाव हो रहा है। कहने को तो लोकतन्त्र के इस महापर्व से राज्य की दशा दिशा को बेहतर बनाने के लिए ही यह संवैधानिक कवायद है । लेकिन कुर्सी राजनीति के सभी महारथी दलों और उनके नेताओं ने जिस तरह से अवसरवादी सियासत की धींगामुश्ती मचा रखी है , युवा झारखंड के बेहतर भविष्य की कल्पना करना दूभर हो रहा है । प्रदेश की कुर्सी – सत्ता के दावेदार वर्तमान सत्ताधारी दल से लेकर अन्य सभी दावेदार दलों और उनके नेताओं के पाला बदल और बदलते बयानों का ऐसा समां बनाया जा रहा है कि जनकवि धूमिल जी की कविता पंक्तियां सहसा साकार हो उठी हैं --  “ हमारे यहाँ लोकतन्त्र इक तमाशा है,जिसकी जान मदारियों की भाषा है"!

पक्ष और विपक्ष के दोनों गठबंधनों दलों में सीट और टिकट बँटवारे को लेकर इस कदर बवाल मचा हुआ है कि कौन सा दल और नेता कब क्या स्टैंड लेगा , धुरंधर विशेषज्ञ भी नहीं बता पा रहें हैं। मसलन  प्रदेश भाजपा सरकार के वरिष्ठ मंत्री व कद्दावर नेता सरयू राय जी का पत्ता खुद उनके सहयोगी रहे मुख्यमंत्री रघुवर जी ने काट दिया। जवाब में सरयू राय भी मंत्रीपद और विधान सभा से इस्तीफा देकर अपनी वर्तमान सीट के अलावे रघुवर दास की सीट पर भी ताल ठोककर खड़े हो रहें हैं। वहीं, पार्टी के कई वर्तमान विधायक भी टिकट नहीं  मिलने से पार्टी छोड़कर दूसरे दलों से उम्मीदवार बन रहे हैं। दूसरी ओर अब तक जिस एनडीए गठबंधन के तहत फिर से सरकार में आने का दावा किया जा रहा था, वह लगभग पूरी तरह से टूट चुका है।

गठबंधन के मुख्य घटक दल ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन ने सीट बँटवारे के सवाल पर भाजपा से बगावत करते हुए न सिर्फ स्वतंत्र चुनाव लड़ने की घोषणा की है बल्कि भाजपा की कई जीती हुई सीटों पर भी अपना उम्मीदवार दे दिया है। जवाब में भाजपा ने भी आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो की सीट समेत अन्य सभी सीटों पर आजसू के खिलाफ पार्टी प्रत्याशी दे दिया है। मीडिया के हवाले से भाजपा प्रवक्ता के अनुसार यदि एनडीए गठबंधन टूट चुका है तो राज्य की सभी सीटों पर पार्टी प्रत्याशी देने की बात कही जा रही है।
 
विपक्षी महागठबंधन का भी लगभग एक ही हाल दीख रहा है – झामुमो – कॉंग्रेस – राजद ने आपसी सहमति से सीटों का बंटवारा तो कर लिया है लेकिन दो विधायकों समेत कई अन्य इलाकों में मजबूत प्रभाव रखनेवाले वामपंथी दलों को इससे बाहर रखा गया है। अन्य प्रमुख विपक्षी दल झविमो तो पहले ही से महागठबंधनी नेतृत्व मामले पर क्षुब्ध होकर ‘एकला चलो’ की  राह अपनाए हुए है। फिलहाल यही ऐसा दल है जिसमें सभी दलों के पाला बदलने वाले बागियों को बिना शर्त पार्टी टिकट दिया जा रहा है।
 
30 नवंबर को पहले चरण का चुनाव होना है। जिसके तहत 13 विधान सभा क्षेत्रों के प्रत्याशियों के नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जिनमें 38 प्रत्याशी  (भाजपा – 7 , जेवीएम – 7 ) करोड़पति हैं और कइयों पर भ्रष्टाचार और हत्या के मुकदमे चल रहें हैं। एक प्रत्याशी पर तो आय से अधिक संपत्ति के आरोप में सीबीआई व ईडी की विशेष जांच भी चल रही है। निस्संदेह सभी जागरूक मतदाता इन्हीं में से अपने जनप्रतिनिधियों का चयन कर राज्य को विकास के पाठ पर आगे ले जाएँगे। रही सही कसर राज्य चुनाव आयोग तो निकाल ही देगा।

बच जाता है वो अहम सवाल कि जिस राज्य और जनता की बेहतरी और विकास के नाम पर यह सारी कवायद हो रही है,अपने गठन के 19 साल पूरे कर लेने के बाद आज वह किन सवालों–चुनौतियों से घिरा हुआ है। भ्रष्टाचार के सवाल पर मोदी–रघुवर सरकार का नारा रहा है – ‘ज़ीरो टोलरेंस’ और ‘ न खाऊँगा , न खाने दूंगा’ का। चार दिन पहले ही सरकार के आजसू मंत्री के विभागीय अदना से जेई के घर से नगद 2.46 करोड़ रुपये नगद बरामदगी और विभीन्न बैंकों के लॉकरों में अकूत संपत्ति का होना, एक छोटी बानगी ही कही जाएगी। जबकि सरकार के पूर्व वरिष्ठ मंत्री सरयू राय जी ने तो मीडिया बुलाकर कह दिया है कि – लालू यादव के कार्यकाल में हुए घोटालों से भी हज़ारगुना अधिक घोटाले और भ्रष्टाचार इस शासन में हुए हैं , जिनके सबूत उनके पास हैं।

 झारखंड प्रदेश को आदिवासी बाहुल्य राज्य माना गया है इसलिए आदिवासी सवाल यहाँ का एक अहम केंद्रीय विषय रहा है। झारखंड अलग राज्य गठन के लिए बर्बर राज्य दमन से जूझते हुए भी सबसे अधिक व लंबी लड़ाई इसी समुदाय के लोगों ने जो बहादुराना संघर्ष किए जगजाहिर है। अलग राज्य गठन का केंद्रीय पहलू था –- जंगल - ज़मीन व प्रकृतिक संसाधनों के पारंपरिक अधिकारों की स्थापना तथा अपनी देशज भाषा- संस्कृति व परंपरा के समुचित संरक्षण के साथ साथ तथाकथित विकास से हो रहे विस्थापन–पलायन से अस्तित्व संकट जैसे सवालों से निजात पाना।

आज प्रदेश के व्यापक आदिवासी समुदायों में वर्तमान सरकार के खिलाफ गहरा क्षोभ है। क्योंकि इसने सीएनटी–एसपीटी क़ानूनों में संसोधन तथा लैंड बैंक के नाम पर तमाम गरमजरुआ ज़मीनों को यहाँ के आदिवासी मूलवासियों से छीनने की साजिश रची है । बरसों–बरस से रैयत रहे आदिवासी–किसानों को अडानी जैसी कॉर्पोरेट–निजी कंपनियों को ज़मीन देने के लिए लाठी–गोली के बल पर जबरन उजाड़ दिया गया। संविधान की पाँचवी अनुसूची के तमाम विशेषाधिकारों का सबसे अधिक हनन करने का आरोप भी इसी शासन पर है।

मूल झारखंडी जनता का एक प्रमुख आरोप है कि वर्तमान भाजपा राज ने अपने अलग राज्य में नौकरी व रोजगार पाने के सारे अधिकारों को तहस–नहस कर गलत स्थानीयता व नियोजन नीति थोपा है। राज्य में विभिन्न क्षेत्रों और विभागों में अबतक हुई बहालियों में अधिकांश बाहरियों की नियुक्ति को वे इसका प्रमाण बताते हैं।

विडम्बना ही है कि राज्य के मेधावी युवाओं को अपने राज्य में सम्मानजनक रोजगार देनवाले संस्थान झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन की इनके शासन काल में   में मात्र 6 ही परीक्षाएँ हो सकीं हैं , जिनमें से कई के रिजल्ट–बहाली के खिलाफ हाई कोर्ट में केस चल रहें हैं।वहीं,राज्य के अनुबंध पर काम करनेवाले सभी मानदेयकर्मियों के साथ वर्तमान सरकार द्वारा लाठी–दमन का रवैया अपनाने के खिलाफ बड़े बड़े विरोध आंदोलन पिछले दिनों कई बार देखे गए।

भूख से हो रही मौतों को लेकर तो पिछले दिनों यह प्रदेश इस कदर सुर्खियों में आया कि खुद देश के प्रधानमंत्री तक को सफाई देते हुए कहना पड़ गया कि  झारखंड को बदनाम न किया जाय। चर्चा यह भी रही कि पूरे प्रशासन को सरकार का सख्त आदेश था कि भूख से हो रही मौतों का कारण सिर्फ बीमारी दिखाया जाय। यही कारण था कि भूख से हुई मौत मामले में किसी भी मृतक का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया।

कई जाने माने झारखंडी सामाजिक–राजनीतिक विशेषज्ञों ने लिखकर और सभा–सेमीनारों में बोलते हुए झारखंड के सपनों से विश्वासघात करने का भाजपा शासन पर खुलकर आरोप लगाया है। उन सबों के अनुसार जिस झारखंड अलग प्रदेश बनाने के श्रेय इस पार्टी के लोग अटल जी व अपनी पार्टी को देते हैं , झारखंड गठन के बाद की स्थितियाँ साफ दिखला रहीं हैं कि 19 वर्षों में यह क्या से क्या बना दिया गया है! किस तरह यह प्रदेश सिर्फ यहाँ की ज़मीन–जंगल , खनिज़ और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट का खुला चरागाह बन गया है । वर्षों से स्थापित यहाँ के इस्पात और कोयला क्षेत्र समेत तमाम सरकारी उद्योगों का निजीकरण डंके की चोट पर किया जा रहा है।

बीते दिनों की घटनाओं ने पूरे देश को दिखला दिया है कि वर्तमान का झारखंड प्रदेश किस तरह से मॉब लिंचिंग का हब सा बना दिया गया है। अबतक दर्ज़ हुए 29 कांडों में से किसी भी कांड के दोषी को आज तक सज़ा नहीं मिली । जो पकड़े भी गए तो पुलिस द्वारा कोर्ट में कमजोर रिपोर्ट पेश किए जाने से सभी आरोपी छुट गए।  यही नहीं, आरोपियों को बेल मिल जानेपर भाजपा के मंत्री , नेता उनका सार्वजनिक नागरिक अभिनंदन करते भी देखे गए। वर्तमान सरकार के धर्मांतरण विरोधी कानून और एनआरसी इत्यादि थोपे जाने से यहाँ के अल्पसंख्यकों को हर दिन भय के वातवरण में जीना पड़ रहा है।

 झारखंड विकास के तमाम दावा दलीलों के बावजूद इस पर पर्दा नहीं ही डाला जा सकता है कि उपरोक्त जलते परिदृश्य तथा शिक्षा क्षेत्र की बदहाली , सुखाड़ , मानवतस्करी और खेल प्रतिभाओं के पलायन जैसे कई अन्य दहकते ज़रूरी सवालों से आज का युवा झारखंड घिरा हुआ है। अलग राज्य गठन के 19 बरस बीत जाने के बाद भी कायम–अनुत्तरित इन सारे सवालों के वास्तविक समाधान और सपनों को पूरा करने में राज्य में जारी विधान सभा चुनाव कितना कारगर होगा .... और अभी की चुनावी धींगामुस्ती करनेवालों को इससे कितना लेना देना है , फिलहाल आनेवाले समय की आगोश में है ...!

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