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झारखंड:  इस बार ग़म और गुस्से में बीता हूल दिवस, सिदो–कान्हू के वंशज की संदिग्ध मौत को लेकर आंदोलन
इस बार 30 जून को न सिर्फ यहाँ पूरी तरह से सन्नाटा छाया रहा बल्कि पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील रहा। वजह थी इसी 12 जून को सिदो–कान्हू के वंशज परिवार के युवा संताल रामेश्वर मुर्मू की संदिग्धवस्था हुई मौत को लेकर उभरा क्षेत्र के अदिवासियों का आक्रोश।
अनिल अंशुमन
01 Jul 2020
झारखंड:  इस बार ग़म और गुस्से में बीता हूल दिवस, सिदो–कान्हू के वंशज की संदिग्ध मौत को लेकर आंदोलन

30 जून झारखंडवासियों के लिए काफी महत्व का दिन होता है। इस दिन अपने समय में सर्वचर्चित रहा दामिन ई कोह (संताल परगना) के इलाके में लड़े गए देश की आजादी का सबसे पहला संगठित महासंग्राम ‘संताल–हूल’ की याद में ‘हूल दिवस’ झारखंड प्रदेश में पूरे जोशो-खरोश के साथ मनाया जाता है। झारखंड राज्य गठन के पश्चात सरकार ने भी इस दिवस पर राजकीय अवकाश घोषित कर रखा है। व्यापक झारखंडी जन इस दिन हूल के नायक–नायिकाओं की शहादत और उनकी संघर्ष परम्परा को याद करते श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। विशेषकर पूरे संताल परगना के इलाके में तो हर 30 जून को व्यापक स्तर पर शहीद मेला लगाने कि परम्परा आज भी जारी है।

कार्यक्रम का मुख्य केंद्र है दुमका से सटा हुआ भोगनाडीह गाँव, जहां 1855 में इसी दिन दसियों हज़ार संताल आदिवासियों ने सिदो–कान्हू – चाँद – भैरव तथा फूलो – झानो अपने योद्धा नायक – नायिकाओं के सशत्र नेतृत्व में अंग्रेजी हुकुमत और देसी शोषक सूदखोर – महाजनों के खिलाफ ‘हूल! हूल!’ का उद्घोष करते हुए महासंग्राम शुरू किया था।

अब तक कि रवायत यही रही है कि हूल उद्घोषणा की स्थली गाँव भोगनाडीह में हर वर्ष 30 जून के ऐतिहासिक दिवस पर यहाँ हजारों – हज़ार का मेला लगता है। शहीद ग्राम कहे जानेवाले इस गाँव में स्थापित सिदो–कान्हू कि प्रतिमा पर माल्यार्पण करने राज्य के मुख्यमंत्री – मंत्री – सांसद – विधायक से लेकर सभी राजनितिक दलों के नेता – कार्यकर्त्ता तथा विभिन्न सामाजिक व आदिवासी संगठनों के लोग पहुँचते हैं । राज्य गठन के बाद से तो यहाँ प्रत्येक वर्ष सरकारी स्तर पर भव्य समारोह का आयोजन भी किया जाता है।

इस बार 30 जून को न सिर्फ यहाँ पूरी तरह से सन्नाटा छाया रहा बल्कि पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील कर निषेधाज्ञा लागू कर दिया गया था। वजह थी इसी 12 जून को सिदो– कान्हु के वंशज परिवार के युवा संताल रामेश्वर मुर्मू की संदिग्धवस्था हुई मौत को लेकर उभरा क्षेत्र के अदिवासियों का आक्रोश। जो इस हत्याकांड के प्रति सरकार और प्रशासन के लापरवाह और संवेदनहीन रवैये से काफी क्षुब्ध होकर निरंतर आंदोलनरत हैं। सभी रामेश्वर मुर्मू की हत्या की निष्पक्ष जांच व इसमें शामिल असली दोषियों को सज़ा देने और क्षेत्र के विधायक व राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा इस हत्याकांड का गंभीरता से संज्ञान लेने की मांग कर रहे हैं। साथ ही गाँव में स्थापित शहीद नायक सिदो – कान्हू की प्रतिमा से आये दिन छेड़ छाड़ व अपमानित करनेवाले तथा यहाँ के निवासी आदिवासियों– महिलाओंके साथ दुर्व्यवहार करनेवाले कतिपय अपराधी तत्वों को रोकने के लिए अविलम्ब पुलिस पिकेट लगाने इत्यादि मांगों को लेकर पिछले कई दिनों से धरना–अनशन कर रहें हैं ।

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जिसमें सिदो – कान्हू के वंशज परिवार के लोग तथा स्थानीय ग्रामवासी शामिल हैं। जिन्होंने पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से देश व झारखंड प्रदेश के लोगों साथ साथ झारखंड सरकार व प्रशासन से अपील की थी कि रामेश्वर मुर्मू की शोक में 30 जून का हूल दिवस समारोह नहीं मनाया जाय । क्योंकि आदिवासी समाज की पारम्परिक मान्यता है कि जबतक मृतक का विधिवत श्राद्ध कर्म नहीं होता है , कोई भी जश्न–उत्सव नहीं मनाया जाता है। मृतक रामेश्वर मुर्मू का अभी तक श्राद्धकर्म नहीं हुआ है इसलिए इस बार हूल दिवस समारोह स्थगित रखा जाय। इसके समर्थन में कई आदिवासी–सामाजिक संगठनों के लोग भी खड़े हो गए। हालांकि कुछेक आन्दोलनकारियों ने उनकी मागें पूरी नहीं होने तक यहाँ सरकार अथवा राजनितिक दलों के किसी भी नेता को यहाँ नहीं घुसने देने की भी बात कही थी। दुर्भाग्य है कि गोदी मीडिया ने इस विरोध मामले को आदिवासियों के उग्र होने का सनसनी समाचार बनाकर ही परोसा।

इस 30 जून को जब आदिवासी महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को लेकर सतत मुखर रहने वाली प्रो. रजनी मुर्मू ने अपने पति व कुछ आदिवासी एक्टिविस्टों के साथ भोगनाडीह गाँव में प्रवेश करना चाहा तो पुलिस ने निषेधाज्ञा लागू होने का हवाला देकर उन्हें रोक दिया। बाद में साथ चल रहे मित्र के बताये दूसरे रास्ते से सभी गाँव के अंदर जा सके।  

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 गाँव में उन्होंने देखा कि सिदो–कान्हू के शहीद स्मारक स्थल से लेकर चप्पे–चप्पे पर पुलिस तैनात थी और स्मारक स्थल किसी को भी जाने कि इज़ाज़त नहीं थी। स्मारक स्थल के एक किनारे व पीछे की ओर कुछ ग्रामीण भी बैठे हुए थे। प्रो. रजनी मुर्मू शहीदों के वंशज परिवार व मृतक रामेश्वर मुर्मू के घरवालों से भी जाकर मिलीं। रामेश्वर मुर्मू कि विधवा पत्नी ने काफी दुःख और पीड़ा के साथ बताया कि अभी तक राज्य सरकार अथवा प्रशासन के किसी भी प्रतिनिधि का यहाँ नहीं आना शहीद नायकों का सरासर अपमान है। स्थानीय प्रशासन पर मामले की लीपापोती करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनवाकर उनके पति की सुनियोजित ह्त्या को संदिग्ध मौत बता रही रही है। हत्या का केस स्थानीय थाना में तत्काल दर्ज कराये जाने के बावजूद उसने जानबूझकर आरोपी को नहीं गिरफ्तार किया और उसे कोर्ट में सरेंडर करने का मौक़ा दिया। जब देश व झारखंड राज्य के लिए लड़कर जान देनेवाले सिदो–कान्हू जैसे शहीद नायकों के वंशजों की कोई सुध नहीं लिया जा रहा है तो लोगों का क्या इंसाफ़ मिलेगा!

झारखंड आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के वरिष्ठ आदिवासी सामाजिक कार्यकर्त्ता प्रेमचन्द मुर्मू भी इस मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व उनकी सरकार के उदासीन रवैये को लेकर काफी आहत हैं। लेकिन इस मामले को लेकर प्रदेश के मुख्य विपक्षी राजनीतिक दल भाजपा के स्थानीय से लेकर पार्टी सांसदों तक के कूद पड़ने पर उनका कहना है कि राज्य में पिछली सरकार से लेकर कई बार राज्य में शासन में करनेवाली इस पार्टी ने अपने शासन काल में सिदो–कान्हू के वंशजों के लिए क्या किया? अब जबकि राज्य की जनता ने उन्हें सत्ता से हटाकर विपक्ष में बैठा दिया है तो अब वे शहीदों के वंशजों की आड़ में अपनी राजनीति की रोटी सेंकने पर उतारू हैं।

रामेश्वर मुर्मू हत्या मामले में उन्होंने भी सरकार से अविलम्ब न्यायिक जांच कि मांग करते हुए शहीद के वंशजों को इन्साफ देने की मांग की है। जो भी हो, फिलहाल तो इतना तकाजा तो बनता ही है कि खुद उनके अपने विधानसभा क्षेत्र का मामला होने के साथ साथ प्रदेश के आदिवासी मुख्यमंत्री होने के कारण उन्हें बिना कोई देर किये शहीदों के वंशज परिवारों व मृतक की विधवा से जाकर खुद मिलना चाहिए। मामले का संज्ञान लेते हुए रामेश्वर मुर्मू की हत्या की सीबईआई जाँच की मांग मानकर सभी असली दोषियों को सज़ा दिलवाने की व्यवस्था कर मृतक के विधवा के इन्साफ कि गारंटी करें। साथ ही शहीदों के सभी वंशज परिवारों के सम्मानजनक व सुरक्षित जीवन यापन की भी सरकारी तौर पर समुचित स्थायी व्यवस्था करें। क्योंकि शहीदों के परिजनों–वंशजों का सम्मान किसी भी लोकतांत्रिक जनप्रिय सरकार की एक प्रमुख योग्यता मानी जाती है!

 

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Sidhu Murmu and Kanhu Murmu

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