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भारत
राजनीति
झारखंड : कुर्सी की राजनीति की नई चाल- भाजपा के हुए बाबूलाल
सिर्फ डेढ़ महीने पहले हेमंत सोरेन सरकार के शपथग्रहण के पहले ही बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा करने वाले झविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने 21 फरवरी को मीडिया बुलाकर हेमंत सरकार को खरी–खोटी सुना दी।
अनिल अंशुमन
22 Feb 2020
Babulaal

क्रिकेट के खेल की तरह झारखंड की सियासी दुनिया भी अनिश्चितताओं की शिकार होती जा रही है। जहां सत्ता यानी कुर्सी की राजनीति में कौन राजनेता कैसी करवट लेगा, इसका कयास नहीं लगाया जा सकता है। अभी करीब डेढ़ महीने पहले हेमंत सोरेन सरकार के शपथ ग्रहण के पहले ही बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा करने वाले झविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने 21 फरवरी को मीडिया बुलाकर हेमंत सरकार को खरी–खोटी सुना दी। उसे ट्विटर पर चलने वाली सरकार बताते हुए ‘पिछली भाजपा सरकार द्वारा राज्य का खजाना खाली कर देने’ के जवाब में यह भी कह दिया कि– नाचे न जाने आंगन टेढ़ा ....।

राजनीति के जानकारों के अनुसार बाबूलाल मरांडी द्वारा ऐसा किया जाना कोई अचंभा नहीं है।  क्योंकि विगत 17 फरवरी को सार्वजनिक तौर से उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा में विधिवत विलय करते हुए हेमंत सोरेन सरकार का प्रतिपक्ष होने का ओहदा ले लिया। 24 फरवरी को प्रदेश भाजपा द्वारा झारखंड की विधान सभा में उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की भी चर्चा ज़ोरों पर है।

चालू कुर्सी सियासत में किसी भी राजनेता अथवा पार्टी द्वारा खुद से ही स्थापित की गयी छवि और भूमिका को धता बताकर पाला बदल कर लेना कोई अचंभा जैसा नहीं रह गया है। इसे लेकर मतदाता–जनता क्या सोचेंगे यह सवाल भी कोई मायने नहीं रखता है। क्योंकि सारी कवायद होती है देश अथवा प्रदेश के हितों और विकास के नाम पर।
 
जो 17 फरवरी को झारखंड कि राजधानी स्थित प्रभातारा मैदान में प्रदेश भाजपा आहूत मिलन समारोह में बाबूलाल मराण्डी के पार्टी समेत विधिवत शामिल होने पर भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा जनता को बताया भी गया कि – झारखंड की आवाज़ सुनकर ही आए हैं। इसे और भी वजनदार बताते हुए कल तक भाजपा में शामिल होने के सवाल पर– कुतुब मीनार से कूद जाऊंगा , भाजपा में नहीं जाऊंगा .... कहनेवाले बाबूलाल ने भी कह डाला कि– झाड़ू लगाने का भी काम मिलेगा तो करूंगा। 2006 में मैंने अलग पार्टी बनाई और झारखंड की धरती में घूमता रहा, समस्याओं को देखा महसूस किया। आज भाजपा में जाना नहीं हुआ है यह विचारधारा आधारित पार्टी है। जबकि बाकी पार्टियां परिवार की पार्टी हो गयी हैं। इस अवसर पर लगे हाथों यह भी कह डाला कि सीएए / एनआरसी के नाम पर विपक्ष भ्रम फैला रहा है।
 
दूसरी ओर बाबूलाल जी फ्यूज बल्ब हो गए हैं, अब नहीं जलेंगे .... का मंत्रोच्चार करनेवाले लोग अब ऐलान कर रहें हैं कि बाबूलाल जी के आने से भाजपा की ताकत बढ़ेगी।

इस पूरे प्रकरण पर भाकपा माले का यही कहना है कि हम पहले से कहते रहें हैं कि बाबूलाल जी सौम्यता, शालीनता की चादर ओढ़कर भाजपा विरोध की जितनी भी छवि बना लें, राजनीति की धरातल पर वे हमेशा ही भाजपा की ‘बी टीम’ रहें हैं। उनकी पार्टी के अधिकांश विधायक सिर्फ भाजपा में शामिल होकर कैसे उसे मजबूत और सरकार में ही जाते रहें हैं। वहीं, झामुमो नेता व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की टिप्पणी है कि वे जहां भी रहें, खुश रहें।

अधिक नकारात्मक और तीखी प्रतिक्रिया है उन आदिवासी युवाओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं में जो बाबूलाल के भाजपा विरोधी रुख के कारण उन्हें राज्य में एक विकल्प और आदिवासी हितों का मजबूत सहारा मानते थे। सोशल मीडिया में अब उन्हें ढोंगी बाबूलाल और आदिवासियों के साथ विश्वासघात करनेवाला करार दिया जा रहा है। सबसे अधिक गहरी निराशा राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय के उन लोगों को हुई जो बाबूलाल को अब तक सच्चा सेक्युलर नेता मानते थे। अभी सम्पन्न हुए विधान सभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ बाबूलाल को उनके चुनावी क्षेत्र धनवार से भारी मतों से जिताया और अन्य कई सीटों पर झविमो प्रत्याशियों को वोट दिया।

कहा जाता है कि राजनीति जो ना कराये। हेमंत सोरेन सरकार के सत्ताशीन होते ही पश्चिमी सिंहभूम के बुरुगुलिकेरा में हुए नरसंहार कांड के लिए प्रदेश की सरकार को कठघरे में खड़ा करने वालों में बाबूलाल सबसे मुखर हैं। लेकिन शायद वे भूल बैठे हैं कि राज्य के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हीं के शासन काल में जब 1 फरवरी 2001 को खूंटी के तपकरा में विस्थापन के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हजारों आदिवासियों पर अंधाधुंध फायरिंग कर पुलिस द्वारा 8 मासूमों की जान ले ली थी। असंख्य झारखंड वासियों की आकांक्षाओं पर वज्रपात करने वाले उस कांड पर आज तक उन्होंने कभी कोई अफसोस नहीं जताया है...इसे क्या कहा जाएगा?
 
फिलहाल चालू सत्ता सियासत में सब जायज है, ये कहकर वास्तविक लोकतन्त्र के तकाजों और जनता की आकांक्षाओं को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। साथ ही इसका हवाला देकर अवसरवाद और सुविधा की राजनीति के तहत स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करने की कवायद भी अपने आप में कोई निरपेक्ष या हवाई बात नहीं है... अंतिम फैसला हमेशा जनता का होता है।

इन्हीं संदर्भों में देखना है कि गोदी मीडिया की चारण वंदना और केंद्र सरकार लिखित पथकथा को प्रदेश की गैर भाजपा सरकार पर नित दिन थोपे जाने से परे, 14 वर्षों तक झारखंड प्रदेश में सदैव खुद को भाजपा विरोध का सबसे बड़ा चैंपियन स्थापित करने वाले और प्रदेश सत्ता का सबसे सही उम्मीदवार जताने वाले, सौम्य–शालीन छवि दिखलाकर जनता के सवालों-सपनों के साथ उतनी क्रूरता बरतते हुए, पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा विरोधी महागठबंधन का प्रमुख घटक बनकर भाजपा के खिलाफ लोगों से घर घर जाकर वोट मांगने वाले, उसी का नेता– कार्यकर्त्ता और झाड़ू लगानेवाला बनकर अपनी अगली पारी और पाला बदलने वाले बाबूलाल की नयी राजनीति क्या रंग लेगी और राज्य की जनता उसपर क्या प्रतिक्रिया देगी?

साथ ही एक और मौका आया है। सदैव राष्ट्रहित–देशहित का हवाला देकर नित प्रतिदिन संविधान और लोकतान्त्रिक मूल्यों की जड़ें कमजोर कर रहे वर्तमान की सत्ता–सियासत व उसके धुरंधर नेताओं के मूल्यों वाली आदर्श राजनीति करने के दावों की एक और ज़मीनी परीक्षण का! 

Jharkhand
Babulal Marandi
BJP
Hemant Soren
Leader of Jharkhand BJP Legislature Party
Central Supervisor
Social Media
Jharkhand Politics

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