NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
झारखण्ड : झारखण्ड के आधुनिक बौद्धिक प्रणेता निर्मल मिंज का कोरोना से निधन
आदिवासी शिक्षा और भाषा के विकास को लेकर जीवनपर्यंत निभायी गयी इनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए साहित्य अकादमी ने 2017 में उन्हें विशेष भाषा सम्मान दिया था।
अनिल अंशुमन
10 May 2021
झारखण्ड : झारखण्ड के आधुनिक बौद्धिक प्रणेता निर्मल मिंज का कोरोना से निधन

कोरोना माहामारी का बेलगाम संक्रमण जिस तेजी से हमारी बौद्धिक विभूतियों को असमय ही हमसे छीन ले रहा है, अकल्पनीय जैसा लगता है। झारखण्ड प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रह सका है।  कई नामी गिरामी सामाजिक बौद्धिक हस्तियों की महामारी संक्रमण से अचानक हुई मौतों ने सबको अवसादग्रस्त सा कर दिया है । 

5 मई को झारखण्ड प्रदेश के बौद्धिक प्रतीक और झारखण्ड अलग राज्य गठन आंदोलन के सिद्धांतकारों में प्रमुख रहे जाने माने शिक्षाविद डा. निर्मल मिंज जी को भी कोरोना संक्रमण ने अपना शिकार बना लिया है।

पिछले कई दिनों से संक्रमण से जूझते हुए 94 वर्षीय मिंज रांची स्थित अपने निवास पर ही इलाजरत अवस्था में ज़िदगी की जंग हार गए। इनके असामयिक निधन से झारखण्ड प्रदेश को सदैव मार्गदर्शन देनेवाली उस बौद्धिक पीढ़ी का लगभग अंत सा हो गया है जिसमें डा. रामदयाल मुंडा व ड. वीपी केसरी सरीखे वरिष्ठ शिक्षाविद और सांस्कृतिक-सामाजिक संगठक हुआ करते थे।

रांची स्थित एनडब्ल्यू जीएल चर्च के प्रमुख संस्थापक और बिशप रहे मिंज की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 6 मई को पूरे प्रदेश में लॉकडाउन होने के कारण सोशल मीडिया माध्यम से देश विदेश के हजारों लोग ऑनलाइन दफ़न-आराधना में शामिल हुए।

2017 में साहित्य अकादमी के विशेष भाषा सम्मान से पुरस्कृत होने वाले डा.मिंज का जन्म 11 फ़रवरी 1927 को झारखण्ड स्थित आदिवासी बाहुल्य गुमला के सामान्य उराँव आदिवासी परिवार में हुआ था। बचपन से ही अत्यंत मेधावी होते हुए भी घर के अर्थाभाव के कारण चैनपुर-गुमला के विद्यालयों में ही पढ़ाई करनी पड़ी। बाद में पटना विश्वविद्यालय और श्रीरामपुर से आगे पढाई करते हुए अमेरिका के लूथर सेमिनरी व यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनिसोटा में उच्च शिक्षा ग्रहण की। यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो से डाक्टरेट की डिग्री भी हासिल की।

अपने भोगे हुए कड़वे यथार्थ से उन्हें ग्रामीण आदिवासी बच्चों की पढ़ाई की सारी तकलीफें भली भांति याद थी। इसलिए झारखण्ड लौटकर 1971 में गरीब व कमज़ोर आदिवासी छात्र-छात्राओं के लिए रांची में गोस्सनर कॉलेज की स्थापना कर झारखण्ड प्रदेश में आदिवासी शिक्षा की नयी बुनियाद डाली। इस कॉलेज की एक खासियत आज भी है कि थर्ड डिविजन से भी पास हुए छात्रों को पूरे सम्मान के साथ यहाँ दाखिला देकर उनका मनोबल बढ़ाया जाता है।

उस दौरान आदिवासी भाषाओँ को मुख्यधारा में स्थापित करने हेतु अपने कॉलेज में ही सबसे पहले झारखंडी जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओँ का पठन पाठन कार्य शुरू किया। रांची विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर जनजातीय-क्षेत्रीय भाषा विभाग के गठन और वहाँ इसकी पढाई शुरू करवाने में भी अहम भूमिका निभायी।  

1980 में नॉर्थ वेस्टर्न गोस्सनर एवं जियोलॉजिकल लूथेरन कलीशिया के प्रथम बिशप बनकर तात्कालिक चर्च धारा में भी आदिवासी भाषाओँ को स्थापित करने का साहस दिखाते हुए छोटानागपुर मसीही प्रार्थनाओं में आदिवासी वाद्ययंत्रों और गीत गायन परम्परा की शुरुआत की।

शिक्षा–संस्कृति के माध्यम से आदिवासी समाज के अन्दर प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने को सर्वप्रमुख कार्य बनाकर अंग्रेजी-हिंदी व कुडुख भाषाओँ में दर्जनों अकादमिक व सामाजिक साहित्य की रचना की। वे उराँव आदिवासी समुदाय की कुडुख भाषा के अच्छे जानकार होने के साथ साथ वे आला दर्जे के आदिवासी गायक–वादक भी थे।  

आदिवासी सवालों को केंद्र में लाने के लिए इंडियन काउन्सिल ऑफ़ इंडिजिनस एंड ट्राइबल पीपल्स के गठन में महती भूमिका निभाते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्किंग ग्रुप ऑफ़ इंडिजिनस ट्राइबल पीपल्स कमिटी के सदस्य बने। इस मंच से भी वे झारखण्ड के आदिवासियों को सवालों को सामने लाते रहे। 70 – 80 दशक में झारखण्ड अलग राज्य गठन आंदोलन की बेहद सरगर्मियों से भरा समय था। इस आन्दोलन को सही दिशा एवं धारा देने के लिए तत्कालीन आजसू से जुड़कर उसके सैद्धांतिक मार्गदर्शक की भूमिका में सक्रिय रहे। 1987 में झारखण्ड अलग प्रान्त बनाने की मांग को लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति से विशेष रूप से मिलकर ज्ञापन भी दिए। इसी वर्ष सरकार द्वारा गठित झारखण्ड समन्वय समीति के भी प्रमुख सदस्य बनाए गए। 

आदिवासी शिक्षा और भाषा के विकास को लेकर जीवनपर्यंत निभायी गयी इनकी सक्रीय भूमिका को देखते हुए 2017 साहित्य अकादमी ने विशेष भाषा सम्मान दिया। 

विगत कुछ वर्षों से शारीरिक अस्वस्थता के कारण वे रांची स्थित अपने निवास से ही आदिवासी सामाजिक अभियानों के मार्गदर्शक बने हुए थे।                                                                             

मिंज के निधन से पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गयी। लॉकडाउन पाबंदियों के कारण उनके अंतिम यात्रा में अधिक लोग चाहकर भी शामिल नहीं हो सके तो सोशल मीडिया में उन्हें याद करते हुए शोक संवेदनों-संस्मरणों का तांता स लग गया। 

प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मिंज के निधन को समस्त झारखंडी समाज के लिए अपूर्णीय क्षति बताते हुए कहा कि जनजातीय व क्षेत्रीय भाषा-साहित्य के संरक्षण और विकास के लिए वे जीवनपर्यंत प्रयासरत रहे। राज्यपाल ने भी उनके निधन पर गहरा शोक जताया।  झारखण्ड के सभी राजनीतिक दलों के साथ साथ अनेक आदिवासी सामाजिक संगठनों ने भी उनके निधन को प्रदेश के लिए गंभीर क्षति बताया।  

7 मई को प्रदेश की राजधानी स्थित भाकपा माले मुख्यालय में झारखंड प्रदेश की चर्चित विभूति मिंज के असामयिक निधन पर श्रद्धांजली दी गयी। उन्हें आदिवासी समाज में वाम प्रगतिशील विचारों का सुचिंतित वाहक बताते हुए कहा गया कि वे सिर्फ आदिवासी ही नहीं बल्कि पूरे झारखंडी समाज के अगुवा बौद्धिक सिद्धांतकार और निर्माता रहे। जिन्होंने अपनी बौद्धिक प्रतिभा से एक व्यापक सोच वाले कुशाग्र रणनीतिकार की भूमिका निभाई। माले ने झारखण्ड सरकार से मांग की है कि प्रदेश के किसी बड़े शैक्षणिक संस्थान का नामकरण मिंज के नाम पर हो।  

झारखण्ड जन संस्कृति मंच ने उनकी विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए कहा है कि झारखंडी भाषा-संस्कृति एवं साहित्य को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 70 के दशक में ‘तरंग भारती’ से जुड़कर दर्जनों शैक्षिक व सामाजिक प्रश्नों से जुड़ी अनेकों पुस्तकें लिखकर झारखण्ड आंदोलन को नयी दिशा देने का काम किया।

कई महत्वपूर्ण सवालों को लेकर मिंज से मेरे भी सामाजिक ताल्लुकात रहें हैं और मेरे बुलावे पर कई साहित्यिक–सामाजिक विमर्शों में उन्होंने आकर संबोधित भी किया। मेरी नज़र में वर्तमान समय में वे उन वरिष्ठ आदिवासी बौद्धिक प्रणेता में से थे जो बिना किसी संकीर्ण सोच के एक व्यापक सामाजिक नज़रिए व एकजुटता को दिल से महत्व देते थे। 

शायद इसका कारण है कि वे सदैव आदिवासी समाज को प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच से लैस करने को काफी महत्व देते थे। रामदयाल मुंडा की भांति वे उन चंद वरिष्ठ आदिवासी बुद्धिजीवियों में शामिल रहे जिनका वामपंथ से कभी दुराव नहीं रहा और हमेशा एक जीवंत बिरादराना सम्बन्ध क़ायम रहा। जिसका एक उदाहरण इसी से समझा जा सकता है कि जब रांची में भाकपा माले का राष्ट्रिय महाधिवेशन होना था तो उसके स्वागत समिति का अध्यक्ष बनना उन्होंने सहर्ष स्वीकार करते हुए उद्घाटन सत्र को विशेष रूप से संबोधित भी किया था।

Jharkhand
Nirmal Minj
COVID-19
Hemant Soren
CPI-ML
Pandemic

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • manual scevenging
    सक्षम मलिक
    हाथ से मैला ढोने की प्रथा का ख़ात्मा: मुआवज़े से आगे जाने की ज़रूरत 
    19 Oct 2021
    सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन के मुताबिक़, देश भर में हाथ से मैला ढोने के चलते 2016 से 2020 के बीच कुल मिलाकर 472 और सिर्फ़ साल 2021 में 26 मौतें हुई हैं।
  • Bakhtawarpur
    न्यूज़क्लिक टीम
    बख्तावरपुर : शहर बसने की क़ीमत गाँव ने चुकाई !
    19 Oct 2021
    दिल्ली के नरेला के पास बसे बख्तावरपुर गाँव के निवासी शहर के बसने की क़ीमत चुका रहे है. उनका आरोप है कि दिल्ली सरकार ने उनको उनके हाल पर छोड़ दिया है. वे बरसों से अपने इलाक़े के लिए एक अदद नाले की…
  • Muzaffarpur rail
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार में भी दिखा रेल रोको आंदोलन का असर, वाम दलों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया
    19 Oct 2021
    संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर हुए धरना-प्रदर्शन के दौरान नेताओं ने केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त करने और कृषि कानून और श्रम कोड रद्द करने सहित अन्य कई मांगें उठाई।
  • MK Stalin
    विग्नेश कार्तिक के.आर., विशाल वसंतकुमार
    तमिलनाडु-शैली वाला गैर-अभिजातीय सामाजिक समूहों का गठबंधन, राजनीति के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? 
    19 Oct 2021
    देश में तमिलनाडु के पास सबसे अधिक सामाजिक रुप से विविध विधायी प्रतिनिधित्व है, और साथ ही देश में सभी जातीय समूहों का समानुपातिक प्रतिनिधित्व मौजूद है।
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: ख़ाकी का 'भगवा लुक'
    19 Oct 2021
    कर्नाटक के उडूपी ज़िले में एक पुलिस थाने के कभी सिपाहियों ने वर्दी की जगह भगवा रंग के कपड़े पहने। फिर तर्क आया कि विजयदशमी का दिन था इसलिए वर्दी की जगह “भगवा लुक” का आनंद ले लिया। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License